हिंदी विवेक प्रकाशित ‘मंदिर: राष्ट्र के ऊर्जा केंद्र’ ग्रंथ और विहिप के दिनदर्शिका का हुआ विमोचन

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मुकेश गुप्ता

मुंबई। हमारे मंदिर पहले की तरह समजाभिमुख बनकर शिक्षा, चिकित्सा, सेवा, आस्था, प्रेरणा, शक्ति, धर्म प्रचार और समाज प्रबोधन का केंद्र बने, यह आज की आवश्यकता है। यह वक्तव्य मिलिंद परांडे ने ‘मंदिर राष्ट्र के ऊर्जा केंद्र’ ग्रंथ के विमोचन कार्यक्रम के दौरान प्रमुख वक्ता के तौर पर दिया। उन्होंने आगे कहा कि यदि समाज बंट गया या सो गया तो मंदिर पुनः ध्वस्त हो जाएंगे, इसलिए हमें ऐसे सशक्त संगठित जागरूक समाज का निर्माण करना होगा कि भविष्य में भी कोई मंदिरों को तोड़ने का साहस न कर पाए। हिंदुत्व के जागरण और विमर्श के केंद्र में लाने में मंदिर खासकर रामजन्मभूमि आंदोलन की प्रमुख भूमिका रही है। मंदिर के विविध पहलुओं को मंदिर ग्रंथ में रेखांकित किया गया है। अतः निश्चित रूप से मंदिर ग्रंथ मार्गदर्शक सिद्ध होगा, ऐसा मझे पूर्ण विश्वास है। हिंदी विवेक के इस सराहनीय कार्य के लिए मैं उनका अभिनंदन करता हूं। आज देश का कोई भी चर्च या मस्जिद सरकारी नियंत्रण में नहीं है किंतु मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में रखा गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी सरकार से कहा है कि मंदिरों को नियंत्रित कर उसकी व्यवस्था संभालना सरकार का काम नहीं है। बावजूद इसके मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में रख कर मंदिरों की संपत्ति का सरकार दुरुपयोग कर रही है। इसलिए मंदिरों को मुक्त करना हमारा कर्तव्य है। मंदिर की अर्थव्यवस्था, व्यवस्थापन, कार्यप्रणाली, पारदर्शिता, समाज की सहभागिता और मंदिर के सम्बंध में हमारी दृष्टि कैसी होनी चाहिए, ऐसे विविध विषयों से इस ग्रंथ में अवगत कराया गया है।

मुंबई के दादर पूर्व स्थित स्वामी नारायण मंदिर के सभागृह में हिंदी विवेक पत्रिका द्वारा प्रकाशित ‘मंदिर: राष्ट्र के ऊर्जा केंद्र’ ग्रंथ का विमोचन समारोह हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। इसी के साथ विहिप के दिनदर्शिका का भी विमोचन किया गया। मंच पर विराजमान विहिप के केंद्रीय संगठन महामंत्री मिलिंद परांडे जी, मंदिर स्थापत्य व मूर्ति विशेषज्ञ डॉ. गो. ब. देगलूरकर, झा कंस्ट्रक्शन प्रा. लि. के चेयरमैन व एमडी रामसुंदर झा एवं उनकी धर्म पत्नी मनोरमा झा, विहिप कोंकण प्रांत मंत्री मोहन सालेकर, हिंदुस्थान प्रकाशन संस्था के अध्यक्ष पद्मश्री रमेश पतंगे, हिंदी विवेक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमोल पेडणेकर एवं हिंदी विवेक की कार्यकारी सम्पादक श्रीमती पल्लवी अनवेकर के करकमलों द्वारा ग्रंथ एवं दिनदर्शिका का विमोचन किया गया।
भारत माता की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं कवि रजनीकांत द्वारा सुंदर कविता का प्रस्तुतिकरण कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। इसके बाद मंच पर उपस्थित सभी मान्यवरों का परिचय व स्वागत सम्मान किया गया।

हिंदी विवेक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमोल पेडणेकर ने अपनी प्रस्तावना में हिंदी विवेक पत्रिका के १५ वर्षों की उल्लेखनीय सफल यात्रा पर संक्षेप में प्रकाश डाला और विशेष तौर पर इस बात पर जोर दिया कि हमने मंदिरों के महत्व को भुला दिया इसलिए हमें गुलाम होना पड़ा। मंदिर राष्ट्र व समाज जागरण के प्रमुख केंद्र रहे है इसलिए हमारी मंदिर की परंपरा को शुरू करने से ही भारत विश्वगुरु की भूमिका में आएगा। लोकरंजन के साथ लोकमंगल करने के उद्देश्य से हिंदी विवेक पत्रिका द्वारा ‘मंदिर: राष्ट्र के ऊर्जा केंद्र’ ग्रंथ को प्रकाशित किया गया है। इस ग्रंथ को सफल बनाने में हमारे समाज के गणमान्य जनों का अपेक्षित सहयोग मिला है, जिसके लिए हम सदैव उनके आभारी रहेंगे। मंदिर ग्रंथ का विमोचन कार्यक्रम देश के चार स्थानों पर करने की हमने योजना बनाई है। पहला कार्यक्रम आज हो रहा है। दूसरा कार्यक्रम 29 नवम्बर को मध्य प्रदेश के इंदौर में मा. भैया जी जोशी की उपस्थिति में होने जा रहा है। तीसरा कार्यक्रम मुम्बई के प्रसिद्ध संस्था भागवत परिवार द्वारा मुम्बई में ही किया जाएगा और चौथा कार्यक्रम दक्षिण भारत में होगा। इसके साथ ही परिसंवाद के कार्यक्रम भी होंगे जिसमें मंदिर के विविध विषयों पर चर्चा की जाएगी।

इसके बाद हिंदुस्थान प्रकाशन संस्था के अध्यक्ष पद्मश्री रमेश पतंगे ने अपने भाषण में कहा कि जब समाज खड़ा हो गया तो राम मंदिर बन गया। इसलिए समाज का खड़ा होना आवश्यक है। मंदिर और देवता का सामर्थ्य क्या होता है इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने दो कहानियां सुनाकर श्रोताओं को रोमांचित कर दिया। हिन्दू समाज के भेदभाव और कमियों को दूर करना होगा तभी समाज संगठित एवं शक्तिशाली स्वरूप में खड़ा होगा। उन्होंने आगे कहा कि सरदार पटेल को ऐसा क्यों लगा कि सोमनाथ का मंदिर खड़ा होना चाहिए? के.एन. मुंशी और राजेंद्र प्रसाद को क्यों लगा कि मंदिर खड़ा होना चाहिए? वो तो विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता नहीं थे। तब तो विहिप का जन्म भी नहीं हुआ था परंतु वो इस बात को जानते थे कि भारत स्वतंत्र हो रहा है और स्वतंत्रता का प्रतीक क्या है तो वह हमारा मंदिर है। यदि मंदिर खड़ा होता है और भारत स्वतंत्र होता है तो दुनिया में एक सकारात्मक संदेश जाएगा।
मंदिर स्थापत्य व मूर्ति विशेषज्ञ डॉ. गो. ब. देगलूरकर जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि मंदिर के स्थापत्य कला के शिल्पकारों को हमने भुला दिया। जिन्होंने भव्य दिव्य मंदिर बनाए। मंदिर एक सामाजिक संस्था है जिसमें समाज के सभी वर्गों की सहभागिता होती है। मंदिर में जाने के पूर्व उसकी परिक्रमा करनी चाहिए। मंदिर की बाहरी दीवार पर अंकित सुरा सुंदरी आपसे कुछ कहती है, उसे समझना चाहिए। मनुष्य का शरीर और मंदिर का स्वरूप एक जैसा होता है।

इस दौरान झा कंस्ट्रक्शन प्रा. लि. के चेयरमैन व एमडी तथा डायरेक्टर रामसुंदर झा एवं उनकी धर्मपत्नी मनोरमा झा, गोवर्धन इको विलेज के निदेशक गौरंगदास प्रभुजी, महालक्ष्मी मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन वी. एन. गुपचुप, टेम्पल कनेक्ट के संस्थापक गिरीष वासुदेव कुलकर्णी एवं हिंदी विवेक के प्रतिनिधि दत्तात्रेय ताम्हणकर एवं महेश जुन्नरकर को मंच पर उपस्थित मान्यवरों के हाथों पुरस्कार, पुस्तक, शोल व श्रीफल देकर विशेष तौर पर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का सफल संचालन हिंदी विवेक की कार्यकारी सम्पादक श्रीमती पल्लवी अनवेकर ने किया और सभी का आभार माना। अंत में श्रीमती मानसी राजे द्वारा पसायदान के उपरांत कार्यक्रम का समापन किया गया।

भारत के डेयरी उद्योग का आधुनिकीकरण गौ पालकों को सशक्त करेगा

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मथुरा। कभी भारत में दूध की नदियां बहती थीं। ब्रज भूमि कृष्ण कन्हैया की माखन, दही, छाछ की लीलाओं से गुंजित था।
दूध आज फिर चर्चा में है, नकली दूध से देवी देवताओं का अभिषेक हो रहा है, दूध की परिक्रमा लग रही है। रासायनिक जहरों से नकली मिलावटी, पनीर, खोया, मिठाई बना कर लोगों की सेहत से खिलवाड़ हो रहा है।

बहरहाल, दुग्ध क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में चलाए गए ऑपरेशन फ्लड की बदौलत श्वेत क्रांति से भारत में दुग्ध उत्पादन में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। आज पूरा भारत पीता है अमूल का दूध।

भारत की विशाल दुधारू मवेशी आबादी, जिसमें लगभग 300 मिलियन गाय और भैंस शामिल हैं, एक विरोधाभास भी प्रस्तुत करती है। एक ओर, देश का डेयरी उद्योग दुनिया में सबसे बड़ा है, जो सालाना 210 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक दूध का उत्पादन करता है। दूसरी ओर, इस उद्योग को महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जो इसकी स्थिरता और डेयरी किसानों की आजीविका को खतरे में डालती हैं।

दूध की कीमतों में उतार-चढ़ाव, उत्पादन लागत में वृद्धि और पौधों पर आधारित विकल्पों से प्रतिस्पर्धा जैसे आर्थिक दबावों ने डेयरी किसानों की लाभप्रदता पर भारी असर डाला है। मूल्य स्थिरीकरण कार्यक्रमों को लागू करना, उत्पाद पेशकशों में विविधता लाना और सहकारी विपणन रणनीतियों का समर्थन करना सौदेबाजी की शक्ति को मजबूत करने में मदद कर सकता है, एक डेयरी एक्सपर्ट कहते हैं।

हालांकि, डेयरी उद्योग के पर्यावरणीय प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जल उपयोग और भूमि क्षरण सभी महत्वपूर्ण चिंताएँ हैं। अपशिष्ट प्रबंधन और पुनर्चक्रण के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रोत्साहित करना, संधारणीय कृषि प्रथाओं में अनुसंधान को बढ़ावा देना और कार्बन क्रेडिट और संधारणीय प्रमाणन के लिए पहलों का समर्थन करना इन मुद्दों को कम करने में मदद कर सकता है।

इसके अलावा, श्रम की कमी और पशु स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ डेयरी उद्योग के सामने आने वाली चुनौतियों को और बढ़ा देती हैं।

भारत में दूध उद्योग को उन्नत और आधुनिक बनाने के लिए, डेयरी मूल्य श्रृंखला के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। विशेषज्ञ दक्षता, स्वच्छता और दूध की गुणवत्ता में सुधार के लिए स्वचालित दूध देने की प्रणाली को लागू करने का सुझाव देते हैं। वे पशु स्वास्थ्य, पोषण और प्रजनन की निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करने और संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित करने की भी सलाह देते हैं।

भारत में मजबूत कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। परिवहन और भंडारण के दौरान दूध की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सरकार को इसमें निवेश करना चाहिए। कई अध्ययन डेटा प्रबंधन, आपूर्ति श्रृंखला ट्रैकिंग और वित्तीय प्रबंधन के लिए डिजिटल टूल अपनाने की सलाह देते हैं।

पशुपालन में सुधार महत्वपूर्ण है। कृत्रिम गर्भाधान और भ्रूण स्थानांतरण जैसी वैज्ञानिक प्रजनन तकनीकों को बढ़ावा देने से पशुधन की आनुवंशिक गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। नुकसान को कम करने के लिए प्रभावी रोग नियंत्रण और टीकाकरण कार्यक्रमों की आवश्यकता है। दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए फ़ीड और चारे की गुणवत्ता और उपलब्धता में सुधार करना आवश्यक है।

किसानों का सशक्तिकरण महत्वपूर्ण है। आधुनिक कृषि पद्धतियों, पशुपालन और व्यवसाय प्रबंधन पर डेयरी किसानों को प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक है। डेयरी सहकारी समितियों को मजबूत करने से किसान सशक्त हो सकते हैं और सामूहिक सौदेबाजी को सुविधाजनक बना सकते हैं।

उन्नत तकनीक के साथ प्रसंस्करण संयंत्रों को उन्नत करके डेयरियों का आधुनिकीकरण उत्पाद की गुणवत्ता और दक्षता में सुधार कर सकता है। पनीर, दही और मक्खन जैसे मूल्यवर्धित डेयरी उत्पादों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने से लाभप्रदता बढ़ सकती है। दूध और डेयरी उत्पादों की सुरक्षा और शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए अभिनव पैकेजिंग और कठोर गुणवत्ता नियंत्रण उपाय आवश्यक हैं। आईएसओ 22000 जैसे अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानकों का अनुपालन करने से बाजार तक पहुंच प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।

सहकारी विशेषज्ञ अजय दुबे कहते हैं, “नई तकनीक विकसित करने और डेयरी फार्मिंग प्रथाओं में सुधार करने के लिए अनुसंधान और विकास में निवेश करें। डेयरी उद्योग को समर्थन देने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली आपूर्ति और पशु चिकित्सा सेवाओं जैसे बुनियादी ढांचे का विकास करें।”

ईमानदारी से विकास का आधार बना उपचुनाव में जीत का कारण

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राजस्थान की 7 विधानसभा सीटों के उपचुनाव नतीजों ने प्रदेश में डबल इंजन वाली भाजपा सरकार के जनकल्याणकारी कामों पर मोहर लगाई है। यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की मंशा के अनुरूप प्रदेश के लिए ईमानदारी से विकास को आधार बना कर जो काम हुए, वही इस जीत का मुख्य आधार बने हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार ने 11 महीनों में ’सर्वजन हिताय’ को आधार बनाकर समावेशी विकास करके दिखाया। मुख्यमंत्री ने पूर्वी राजस्थान और शेखावाटी अंचल के लोगों के दशकों से सूखे कंठों की प्यास बुझाने के लिए संशोधित पीकेसी-एकीकृत ईआरसीपी योजना एमओयू और यमुना जल समझौता किया। जब इन योजनाओं के पूरा होने पर पानी खेतों को सींचेगा तो किसानों के चेहरे पर मुस्कान आएगी, साथ ही इन इलाकों में नई कृषि और औद्योगिक क्रांति देखने को मिलेगी।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के अनुसार देश में चार ही जातियां गरीब, युवा, महिला, किसान हैं और इसी सोच को आधार बनाकर राज्य सरकार ने जब अपना पहला बजट पेश किया गया तो सभी ओर से एक ही आवाज आई कि यह बजट समावेशी, सर्वस्पर्शी और सर्वांगीण विकास वाला है। विकसित राजस्थान-2047 की आधारशिला सरकार के पहले वर्ष में ही रख दी गई है। इन चार प्रमुख वर्गों सहित सभी वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं एवं ऊर्जा, सड़क, औद्योगिक विकास, पर्यटन, वन एवं पर्यावरण, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, सुशासन, सिंचाई, कृषि, सहकारिता, पशुपालन एवं डेयरी जैसे सभी क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए जरूरी बजट दिया गया। सभी ने कहा कि यह पहली बार हुआ है जब बजट में सभी 200 विधानसभा क्षेत्रों को बिना किसी भेदभाव के विकास कार्यों की महत्वपूर्ण सौगातें मिली हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व वाली राज्य की डबल इंजन की सरकार द्वारा ईमानदारी से प्रदेश के विकास की नवीन इबारत लिखी जा रही है। सभी को मालूम है पिछली कांग्रेस सरकार में विकास एवं रोजगार के नाम पर जिस ’इन्वेस्ट राजस्थान समिट’ का आयोजन किया गया, उसका क्या हश्र हुआ। मजबूत संकल्प और दृढ़इच्छा शक्ति वाली भाजपा सरकार ने पहले वर्ष ही 9 से 11 दिसंबर तक राइजिंग राजस्थान ग्लोबल इनवेस्मेंट समिट के आयोजन करने का फैसला लिया, इस समिट में अब तक 25 लाख करोड़ रुपये से अधिक के एमओयू साइन हो चुके हैं। इससे प्रदेश का औद्योगिक विकास नई गति से आगे बढ़ेगा, साथ ही राज्य की बड़ी युवा आबादी को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के मौके भी मिलेंगे।

राजस्थान का युवा, महिला, किसान, गरीब और वंचित वर्ग कांग्रेस की लूट और उनके झूठ को पहचान गया। जनता ने भाजपा सरकार के कामों को स्वीकार करते हुए उपचुनाव में विधानसभा सीटों पर जीत का जो फैसला सुनाया है, निश्चित तौर पर इससे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और भाजपा सरकार को प्रदेश का चहुंमुखी विकास करने की नई ऊर्जा मिलेगी।

आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए मीडिया जुड़ाव हेतु सीएमएस द्वारा “राष्ट्रीय मीडिया परामर्श” का सफल आयोजन

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नई दिल्ली 23 नवंबर 2024 : आर्द्रभूमि संरक्षण के मीडिया जुड़ाव हेतु आयोजित “राष्ट्रीय मीडिया परामर्श” का तीन दिवसीय राष्ट्रीय मीडिया परामर्श कार्यक्रम का आज ग्रेटर नोएडा स्थित सूरजपुर आर्द्रभूमि पर क्षेत्रीय भ्रमण के साथ सफल समापन हुआ। इस कार्यक्रम में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, GIZ के इंडो-जर्मन जैव विविधता कार्यक्रम एवं WWF-इंडिया जैसे संगठनों के प्रतिनिधियों सहित कई विश्वविधालयों के पत्रकारिता के छात्र छात्रों ने भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण के प्रति मीडिया के जुड़ाव को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बिन्दुओ पर परिचर्चा की।

उल्लेखनीय है यह व्यापक कार्यक्रम 21 नवंबर को हमदर्द कन्वेंशन सेंटर, जामिया हमदर्द में शुरू हुआ, जहां दिल्ली-एनसीआर विश्वविद्यालयों के पत्रकारिता और जनसंचार छात्रों के लिए एक सघन क्षमता निर्माण कार्यशाला आयोजित की गई। उद्घाटन सत्र में सम्मानित वक्ताओं में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के वैज्ञानिक एफ डॉ. रमेश एम, इंडो-जर्मन जैव विविधता कार्यक्रम, GIZ के वरिष्ठ सलाहकार श्री किर्तिमान अवस्थी, और जामिया हमदर्द के सेंटर फॉर मीडिया एंड मास कम्युनिकेशन स्टडीज की निदेशक प्रो. रेशमा नसरीन शामिल थे।

दूसरे दिन, नई दिल्ली के द ललित होटल में वरिष्ठ पत्रकारों और पर्यावरण विशेषज्ञों की बैठक हुई। इस दौरान, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के सदस्य और पूर्व में आर्द्रभूमि प्रभाग के संयुक्त सचिव डॉ. सुजीत बाजपेई, GIZ के इंडो-जर्मन जैव विविधता कार्यक्रम के निदेशक श्री रविंद्र सिंह, और WWF-इंडिया के सीनियर डायरेक्टर-इकोलॉजिकल फुटप्रिंट श्री सुरेश बाबू ने आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र में नवाचार की आवश्यकता पर चर्चा की। वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया के निदेशक डॉ. रितेश कुमार ने भारत की आर्द्रभूमि के इतिहास और वर्तमान स्थिति पर उपयोगी जानकारी साझा की।

अंतिम दिन, सूरजपुर आर्द्रभूमि का शैक्षिक क्षेत्रीय भ्रमण आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों को आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र और संरक्षण की चुनौतियों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ। इस भ्रमण का आयोजन गौतम बुद्ध नगर के जिला वन अधिकारी श्री प्रमोद कुमार श्रीवास्तव, रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर श्रीमती अनामिका झा और साइट प्रभारी श्री राम अवतार चौधरी ने किया। इस दौरान, प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ श्री सुरेंद्र मिया ने इस क्षेत्र के विविध पक्षियों की जानकारी दी।

इस कार्यक्रम की सफलता पर CMS की महानिदेशक, डॉ. वसंती राव ने कहा, “यह तीन दिवसीय आयोजन पर्यावरणीय पत्रकारिता के लिए एक मजबूत मंच के रूप में उभरा है, जिसने अनुभवी पत्रकारों, भावी मीडिया पेशेवरों और विशेषज्ञों को आर्द्रभूमि संरक्षण के विज्ञान, नीति और सार्वजनिक समझ के बीच के अंतर को पाटने में मदद की है।”

डॉ. रमेश एम ने आर्द्रभूमि संरक्षण के व्यापक महत्व पर प्रकाश डाला, “आज सूरजपुर आर्द्रभूमि का अनुभव यह दर्शाता है कि ये पारिस्थितिकी तंत्र वायु प्रदूषण जैसी वर्तमान पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान बन सकते हैं। इस कार्यक्रम ने जटिल पर्यावरणीय अंतर्संबंधों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित किया है।”

यह आयोजन सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) द्वारा इंडो-जर्मन तकनीकी सहयोग परियोजना ‘वेटलैंड्स मैनेजमेंट फॉर बायोडायवर्सिटी एंड क्लाइमेट प्रोटेक्शन’ के तहत किया गया। यह परियोजना जर्मन संघीय पर्यावरण, प्रकृति संरक्षण, परमाणु सुरक्षा और उपभोक्ता संरक्षण मंत्रालय (BMUV) के अंतर्राष्ट्रीय जलवायु पहल (IKI) द्वारा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के सहयोग से कार्यान्वित किया गया ।

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