लेखक गाँव: हिमालय की गोद में साहित्य और संस्कृति का संगम

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दिल्ली। डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, एक प्रख्यात साहित्यकार, राजनेता और विचारक, जिन्होंने अपने साहित्यिक और सामाजिक योगदान से भारतीय संस्कृति और साहित्य को नए आयाम दिए हैं, ने ‘लेखक गाँव’ की संकल्पना को मूर्त रूप देने का बीड़ा उठाया है। यह लेखक गाँव न केवल एक भौगोलिक स्थान है, बल्कि यह एक वैचारिक तपोभूमि है, जहाँ साहित्य, संस्कृति और विचारों का अनूठा संगम होगा। यह लेख इस अनूठी परियोजना की अवधारणा, उद्देश्य, और इसके सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालता है, साथ ही ‘स्पर्श हिमालय महोत्सव 2025’ के संदर्भ में इसके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करता है।

लेखक गाँव की संकल्पना

‘लेखक गाँव’ हिमालय की गोद में बसा एक ऐसा स्थान है, जो साहित्य और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार के लिए समर्पित है। डॉ. निशंक के शब्दों में, यह “मात्र एक स्थान नहीं, अपितु वह वैचारिक तपोभूमि है जहाँ हिमालय की मौन चेतना में साहित्य बोलता है, संस्कृति मुस्कराती है और विचार साधना का स्वरूप लेते हैं।” यह परियोजना भारतीय साहित्य और संस्कृति को एक वैश्विक मंच प्रदान करने का प्रयास है, जहाँ रचनाकार, विचारक और शिक्षाविद् एकत्रित होकर भारतीयता के मूल्यों को पुनर्जनन और प्रचारित करेंगे।

लेखक गाँव का विचार हिमालय की प्राकृतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रेरित है। हिमालय, जो भारतीय संस्कृति में सदा से साधना, ज्ञान और शांति का प्रतीक रहा है, इस परियोजना का आधार बनता है। यह गाँव एक ऐसी जगह होगी जहाँ साहित्यकार अपनी रचनात्मकता को निखार सकेंगे, विचारक गहन चिंतन में डूब सकेंगे, और संस्कृति के संवाहक भारतीय मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचा सकेंगे। यह स्थान केवल लेखकों के लिए नहीं, बल्कि उन सभी के लिए खुला होगा जो भारतीय संस्कृति और साहित्य के प्रति संवेदनशील हैं और इसे समृद्ध करना चाहते हैं।

स्पर्श हिमालय महोत्सव 2025

लेखक गाँव की अवधारणा को और अधिक सशक्त बनाने के लिए डॉ. निशंक ने ‘स्पर्श हिमालय महोत्सव की घोषणा की है। यह महोत्सव लेखक गाँव में आयोजित होने वाला एक अनूठा आयोजन होगा, जो साहित्य, संस्कृति और विचारों का उत्सव होगा। डॉ. निशंक के अनुसार, यह महोत्सव “भारतीयता, विचार और सृजन का जीवंत संगम” बनेगा। इसमें देश-विदेश के साहित्यकार, शिक्षाविद्, और संस्कृति प्रेमी हिस्सा लेंगे, और यह आयोजन विचारों के यज्ञ के रूप में उभरेगा।


महोत्सव का उद्देश्य भारतीय साहित्य और संस्कृति को वैश्विक मंच पर स्थापित करना है। यहाँ होने वाले संवाद और चर्चाएँ न केवल साहित्यिक होंगी, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मुद्दों पर भी केंद्रित होंगी। यह आयोजन भारतीयता के मूल्यों को पुनर्जनन करने और उन्हें आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा। हिमालय की पृष्ठभूमि में आयोजित यह महोत्सव पर्यावरण, स्थिरता और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे विषयों को भी प्राथमिकता देगा, जो आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक हैं।

लेखक गाँव का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

लेखक गाँव और इसके अंतर्गत आयोजित होने वाला स्पर्श हिमालय महोत्सव भारतीय समाज और संस्कृति के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, यह परियोजना साहित्य और संस्कृति को आमजन तक पहुँचाने का एक प्रयास है। आज के डिजिटल युग में, जहाँ साहित्य और संस्कृति को अक्सर व्यावसायिकता के दबाव में उपेक्षित किया जाता है, लेखक गाँव एक ऐसी जगह होगी जहाँ रचनात्मकता को प्रोत्साहन मिलेगा और साहित्य को उसका खोया हुआ गौरव वापस मिलेगा।

दूसरा, यह परियोजना भारतीयता के मूल्यों को पुनर्जनन करने का एक प्रयास है। भारतीय संस्कृति में साहित्य, कला और दर्शन का गहरा समन्वय रहा है, और लेखक गाँव इस समन्वय को पुनर्जनन करने का एक मंच प्रदान करेगा। यहाँ होने वाले आयोजन युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में मदद करेंगे, जो आज के वैश्वीकरण के दौर में अपनी पहचान खोने के खतरे में हैं।

तीसरा, लेखक गाँव हिमालय के पर्यावरणीय और आध्यात्मिक महत्व को भी रेखांकित करता है। हिमालय न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय दर्शन और साहित्य का स्रोत भी रहा है। लेखक गाँव इस क्षेत्र की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और इसे वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।

डॉ. निशंक का योगदान और दृष्टिकोण

डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने अपने साहित्यिक और राजनैतिक जीवन में हमेशा भारतीय संस्कृति और शिक्षा को प्राथमिकता दी है। 100 से अधिक पुस्तकों के लेखक के रूप में, उन्होंने साहित्य के विभिन्न रूपों—कविता, उपन्यास, कहानी—के माध्यम से भारतीय मूल्यों को प्रस्तुत किया है। उनकी यह पहल उनके उस दृष्टिकोण का हिस्सा है, जिसमें वे साहित्य और संस्कृति को समाज के विकास का आधार मानते हैं।

लेखक गाँव और स्पर्श हिमालय महोत्सव की संकल्पना डॉ. निशंक की दूरदर्शिता का परिचय देती है। उन्होंने न केवल इस परियोजना की नींव रखी, बल्कि इसे देश के प्रबुद्ध शिक्षकों और चिंतकों के साथ साझा कर इसे एक सामूहिक प्रयास बनाने का प्रयास किया है। उनकी यह पहल न केवल साहित्यिक समुदाय को प्रेरित करेगी, बल्कि समाज के हर वर्ग को भारतीयता के प्रति गर्व का अनुभव कराएगी।

लेखक गाँव और स्पर्श हिमालय महोत्सव 2025 भारतीय साहित्य, संस्कृति और विचारों के लिए एक नया युग शुरू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह परियोजना हिमालय की शांति और सौंदर्य को साहित्य और संस्कृति के साथ जोड़कर एक ऐसी तपोभूमि का निर्माण कर रही है, जहाँ विचारों का यज्ञ होगा और संस्कृति की लौ प्रज्वलित होगी। डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की यह पहल न केवल साहित्यकारों के लिए, बल्कि प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह परियोजना हमें याद दिलाती है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, और इसे संरक्षित और समृद्ध करना हम सभी का दायित्व है।

उदासीनता और भ्रष्टाचार से आगरा के हरियाली के ख्वाब बेमानी हुए

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आगरा । उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित वृक्षारोपण मुहिमें, जिन्हें अक्सर पर्यावरणीय मील का पत्थर बताया जाता है, ज़मीनी हकीकत में बार-बार नाकाम हो रही हैं। इसका कारण है — सरकारी लापरवाही, जवाबदेही की कमी और भ्रष्टाचार का धुंधलका। 2019 में घोषित 22 करोड़ पौधारोपण लक्ष्य की तरह कई घोषणाएं सिर्फ़ काग़ज़ों पर रह गईं। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि पौधे तो लगाए जाते हैं, लेकिन देखरेख न होने से बड़ी संख्या में सूख जाते हैं, और फंड नौकरशाही की भूलभुलैया में गुम हो जाते हैं।

हरित कार्यकर्ता उंगली उठाते हैं: योजना की कमी: पौधों के लिए पॉलिथीन बैग और गुणवत्तापूर्ण नर्सरी पौधे समय से पहले ही अनुपलब्ध थे, जिससे किसानों को घटिया बीज इस्तेमाल करने पड़े जिनकी जीवन संभावना नगण्य थी।

रखरखाव भी नदारद: 2018 के महाअभियान में एक दिन में 9 करोड़ पौधे लगाए गए, लेकिन थर्ड पार्टी निगरानी के अभाव में ज़्यादातर नष्ट हो गए — “ना रहेगा बाँस, ना बजेगी बाँसुरी”।

भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं: नर्सरी और देखभाल के लिए तय बजट का ग़लत इस्तेमाल हुआ। “कागज़ी पेड़ों” ने सरकारी फाइलों में खूब हरियाली फैलाई, मगर धरातल पर सूखा ही सूखा।

यह सिलसिला जारी है — “सियासी तमाशा हावी है, पर्यावरणीय असर बेअसर।” और भ्रष्टाचार सिर्फ फाइलों में हरियाली उगाता है, धरती पर नहीं। जब तक पारदर्शिता और जन-सहभागिता को प्राथमिकता नहीं मिलेगी, यूपी की हरियाली सिर्फ़ “मृग-मरीचिका” बनी रहेगी।

ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (TTZ) — 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अति-संवेदनशील क्षेत्र में, जहां ताजमहल और अन्य मुग़ल धरोहरें स्थित हैं, वहां हरियाली घटती जा रही है। लाखों पौधे हर साल लगाए जाने के दावों के बावजूद ज़मीन पर जंगल कटते जा रहे हैं। वजह — अंधाधुंध निर्माण, प्रशासनिक उदासीनता, भ्रष्टाचार, और ज़मीन की भारी किल्लत।

रिवर कनेक्ट कैंपेन सदस्य कहते हैं कि ये असफलताएं केवल पर्यावरण के लिए ख़तरा नहीं हैं, बल्कि आगरा की ऐतिहासिक धरोहरों को रेगिस्तानी हवाओं और प्रदूषण से बचाने के संतुलन को भी बिगाड़ रही हैं। बड़ी-बड़ी परियोजनाएं — जैसे एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर, 29.6 किमी लंबा आगरा मेट्रो रेल मार्ग और चौड़े नेशनल हाइवे — ने हरे क्षेत्रों को निगल लिया है। “यमुना और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे” के विस्तार ने जंगलों को छीन लिया है, जिससे ताजमहल अब राजस्थान की धूलभरी हवाओं के निशाने पर है। अवैध बस्तियाँ, यमुना के डूब क्षेत्र में कॉलोनियां, रेलवे ज़मीन की नीलामी — इन सबने शहर की हरियाली को कंक्रीट में बदल डाला है। कभी अग्रवन (वन क्षेत्र) कहलाने वाला शहर अब मात्र 9% से भी कम हरित आवरण के साथ खड़ा है — जो राष्ट्रीय लक्ष्य 33% से बहुत कम है।

वृक्षारोपण अभियानों का नाटक देखिए: 2023 में 45 लाख, 2024 में 50 लाख और 2025 में 60 लाख पौधे लगाए जाने का दावा किया गया — लेकिन ये आंकड़े सिर्फ़ “काग़ज़ी पेड़” हैं। कोई देखरेख नहीं, कोई सुरक्षा नहीं — तो पौधे सूख ही जाते हैं। 2021 में यमुना किनारे, नदी की तलहटी में 12,000 पौधे लगाए गए थे, जो पहली बारिश में ही बह गए — फिर भी ठेकेदार को पूरा भुगतान हुआ। “इससे बड़ा सबूत क्या चाहिए कि व्यवस्था गड़बड़ है?”

उदासीनता का आलम ये है कि सुप्रीम कोर्ट का 1996 का निर्देश कि TTZ में हरित बफर जोन बने — आज भी अनसुना है। चारों तरफ, वृंदावन से लेकर फिरोजाबाद तक पेड़ काटने की खबरें आ रही हैं। बिल्डर्स पेड़ कटवा रहे हैं, अवैध कटाई धड़ल्ले से जारी है।
सूर सरोवर बर्ड सेंक्चुरी और कीठम झील, जो अति महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी क्षेत्र हैं, वो भी अब कॉलोनाइज़रों की गिरफ्त में हैं, बताते हैं डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य।

भूमि की कमी एक बड़ी चुनौती:

फिल्म सिटी, एयरपोर्ट, मॉल — सबने ज़मीन खा ली। 60 लाख पौधों के लिए 5 मीटर की दूरी पर 1.5 लाख हेक्टेयर ज़मीन चाहिए — कहाँ से आएगी? सरकारें 1990 से हर साल करोड़ों पौधे लगाने का दावा करती हैं, पर हरियाली वहीं की वहीं — “नंबरों का घोटाला है ये!”
ग्रीन एक्टिविस्ट्स कहते हैं कि पौधे गलत मौसम और गलत जगहों पर लगाए जाते हैं, देखभाल के अभाव में सूख जाते हैं। आगरा में बंदरों की आबादी एक लाख से ज़्यादा है — प्रशासन इन्हें दोष देता है। लेकिन कार्यकर्ता कहते हैं — बंदर तो बहाना हैं, असली गुनहगार है जवाबदेही की कमी और लालच।
परिणाम भयावह हैं: बढ़ता प्रदूषण, घटती बारिश, जल-स्तर का गिरना, और ताजमहल की संगमरमर पर काले दाग। सिर्फ दयालबाग क्षेत्र में ग्रीन एरिया बढ़ा है, बाकी इलाकों में बढ़ती बसावट ने हरियाली नीली है।

पर्यावरण और हरियाली की मुहिम से जुड़े एक्टिविस्ट्स, TTZ में किए गए सभी वृक्षारोपण अभियानों की स्वतंत्र ऑडिट की मांग कर रहे हैं, ताकि गड़बड़ियाँ उजागर हो सकें और दोषियों को जवाबदेह ठहराया जा सके।

मस्ती-भरा मेरा हिंदुस्तान: उल्टा-सीधा एक समान

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दिल्ली । बीते वर्ष इन्हीं दिनों, साउथ की एक यूनिवर्सिटी में “भारतीय दर्शन और विज्ञान” विषय पर आयोजित एक सेमिनार में, एक ज्ञानी साधु महाराज को लैपटॉप से प्रेजेंटेशन देते देखा, एक हाथ में मोबाइल, दूसरे में रिमोट l वाह, क्या अद्भुत संगम था टेक्नोलॉजी और फिलासफी का!!

एक खबर अगले दिन अखबार में पढ़ी। आष्टांग योग के विख्यात शिक्षक गुरु, हार्ट अटैक की वजह से ICU में इलाज के लिए भर्ती। उधर रॉकेट से अंतरिक्ष में सैटेलाइट सफलता पूर्वक भेजने के लिए हवन, प्रार्थना सभा में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

भारत देश महान है। विसंगतियों और विरोधाभासों को हम विविधता कहकर सम्मान देते हैं। ये हमारा बड़प्पन है कि असफलताओं का क्रेडिट खुद न लेकर सितारों को देते हैं, जबकि सफलता के कई बाप होते हैं। चिमटाधारी चिलमची बाबा को वोही महत्व देते हैं जितना मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर को।
ये पावन भूमि विचित्रताएं का एक ऐसा मेला है जहाँ हर चीज़ “जुगलबंदी” करती है—चाहे वो पुराना हो या नया, पवित्र हो या पगला, सब मिलकर एक रंग-बिरंगी रेनबो कलर की पोर्ट्रेट बनाते हैं, जहां मुंह में राम बगल में छुरी लिए दुश्मन भी दोस्ती का किरदार खूबी से निभाते हैं।

हमारे यहाँ संतों ने मोक्ष पाने के लिए जंगलों में तपस्या की, लेकिन आज के आध्यात्मिक गुरु, बेंगलुरु के टेक पार्क में “मोक्ष” (IPO) की तलाश करते हैं! महात्माओं को जंगल में वृक्ष के नीचे ज्ञान मिला, पर आज के गुरु “लिंक्डइन” पर ज्ञान बाँटते हैं। पैसा कमाओ प्राणायाम से, मोह माया के खिलाफ तकरीर करके।

22 भाषाएँ, 1000 से ज्यादा बोलियाँ, पर जब भारत-पाक मैच होता है, तो सब एक हो जाते हैं! हम सब एक हैं… बस टीवी स्क्रीन तोड़ने के लिए! ट्रेन में बैठकर अगर आप इडली-सांभर ऑर्डर करें, तो तैयार रहें पैंट्री वाला आपको इडली के साथ, सांभर की जगह सब्जी रायता थमा सकता है!
हम मंगल पर मिशन भेजते हैं, लेकिन गाँव में 4G का सिग्नल पकड़ने के लिए लोग पेड़ पर चढ़ जाते हैं! कोविड काल में बहुतों ने ये प्रयोग किया। इसरो ने चंद्रयान भेजा, हमने व्हाट्सएप फॉरवर्ड भेजा! सवेरे उठते ही सभी को धार्मिक संदेश, या देवी देवताओं के आशीर्वाद वॉट्सएप पर फॉरवर्ड करना, एक हेल्थी रिचुअल बन चुका है जिससे देश पर ग्रह नक्षत्र मनमानी नहीं कर पाते।

आवारा कुत्ते, बंदर, गायें सड़क पर राज करते हैं, और हम उनके आगे हॉर्न बजाओ, देश बचाओ वाले नारे लगाते हैं। यातायात नियम? वो क्या होता है? गाय माता जहाँ चलें, वहीं सबको रुकना पड़ता है! साइलेंट जोन में जोर से भोंपू बजाए। जिधर जगह मिले, घुसो, आगे निकलो, चालान आयेगा, देख लेंगे विधायक जी!

आजकल लोग “स्वाइप राइट” करके प्यार ढूँढ़ते हैं, लेकिन शादी तब तक नहीं होती जब तक पंडित जी कुंडली नहीं मिला लेते! रिश्ता शादी की वेबसाइट से, परखा जाएगा पंडितजी की ज्योतिषी चाल से, यजमान हाथ जोड़े नतमस्तक सितारों की गति और दिशा से। यानी अब जन्म कुंडली का मैच कराओ!
अमीरी गरीबी की रेखा मोह माया या मृग तृष्णा है। एक तरफ अंबानी का 27 मंजिला घर, दूसरी तरफ झुग्गी में रहने वाले लोग। ट्रिकल-डाउन इकोनॉमी? जब रोकड़ा प्रथम पायदान पर ही रुक जाए तो समृद्धि का बंटवारा, कभी न खत्म होने वाला सपना ही बना रहता है।

हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, लेकिन नेता वही पुराने खानदान से आते हैं। चुनाव आता है, जाता है… पर नेता वही रहते हैं! ये एक नई जाति व्यवस्था है, जिसमें नेता के बच्चे नेता, डॉक्टर के डाक्टर, सीए के सीए, जजों के जज वकील, आईएस के बच्चे ऑफिसर, एंड सो ऑन। हम फ्लेक्सिटेरियन नहीं, बस थोड़े कन्फ्यूज्ड हैं! मीट खाना गुनाह, दारू पीकर मांसाहारी गाली गलौज तर्क संगत! घर में दादी हल्दी वाला दूध पिलाती हैं, और हम कैफे में “हल्दी लट्टे” के लिए ₹500 देते हैं! पुराना ज्ञान, नया पैकेजिंग! विषमताएं और ढोंग, आडंबर life ko रोचक बनाते हैं । लड़कियां हवाई जहाज उड़ा रही हैं, लेकिन शादी के बाद सबसे पहला सवाल— “रोटी बनाना आता है न? कोई बॉय फ्रेंड तो नहीं है न?”

हम दीये जलाकर अंधेरा भगाते हैं, फिर पटाखों से हवा को इतना जहरीला बना देते हैं कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है! पहले प्रदूषण फैलाओ, फिर एयर प्यूरीफायर खरीदो! पर्सनल या कम्युनिटी हाइजीन की किसे चिंता, बस फ़ोग deo है तो, स्प्रे करते रहो। पाप को धुएं में उड़ाओ, भंडारे में प्रसाद पाओ।

सबका साथ, सबका विकास। हम सबको साथ लेकर चलते हैं… बस चुनाव के लिए ही धर्म याद आ जाता है! “वोट बैंक की पूजा, सबसे बड़ा धर्म!”

भारत को समझना हो तो हार्वर्ड की डिग्री कम पड़ेगी, और अगर समझ आ गया तो पक्का आप बाबा बन जाएंगे! यहाँ विरोधाभास कोई सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हमारी यूएसपी है। जितने फन, उतनी गहनता; जितनी सादगी, उतनी जुगाड़ टेक्नोलॉजी! सच कहें तो हम भारतीयों की खासियत ये है कि हमारी ट्रैजिक ट्रैफिक जाम भी कॉमिक कॉन्सर्ट लगती है।

हमारी संस्कृति ऐसी है कि एक ही व्यक्ति हवन भी करता है और ठेके पर लाइन में भी लगता है। सुबह योग, शाम को जलेबी! मंदिर में मत्था टेकते हैं, और बाहर निकलकर हेलमेट फेंककर ट्रैफिक नियम तोड़ते हैं। जय श्री, बोलते हुए बाइक स्टार्ट करना भी अब इंश्योरेंस का हिस्सा बन गया है। यहाँ हर चीज़ में ड्यूलिटी है। मंदिर में माथा टेकते हैं और पूजा के बाद मोबाइल से वीडियो बनाकर अपलोड भी करते हैं — “जय बाबा वायरलनाथ की!”
हम भारतीय उस थाली की तरह हैं जिसमें सब कुछ होता है — और कभी-कभी कुछ ऐसा जो न तो पकवान है, न पहचान — जैसे “प्याज वाली खीर।”

विकास की दौड़ में परंपरा अक्षुण्ण है विरासत के साथ

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सुभाष चन्द्र

जयपुर । विकास की रफ्तार से दौड़ते शहरों के बीच कभी-कभी कोई दृश्य हमें अपनी जड़ों से जोड़ देता है। ऐसा ही एक दृश्य हाल ही में जयपुर की व्यस्त सड़कों पर देखा गया, जहां एक व्यक्ति कांवड़ प्रसाद को कंधों पर उठाए हुए आगे बढ़ रहा था। जयपुर में इसे “कांवड़ प्रसाद” कहा जाता है, तो वहीं मिथिला में इसे भार-भड़िया कहा जाता है। यह नज़ारा आधुनिकता और परंपरा के सुंदर संगम का प्रतीक बन गया।

मिथिला में अब ऐसे दृश्य कम ही देखने को मिलते हैं। हालांकि, नवरात्रि के दौरान छठे दिन अपराह्न में पालकी दिखाई देती है और सप्तमी की सुबह विशेष आह्वान के साथ मां जगदंबा को बिल्व वृक्ष से दुर्गा पूजा स्थल तक लाया जाता है। यह परंपरा आज भी वहां की सांस्कृतिक स्मृति को संजोए हुए है।

जयपुर के त्रिपोलिया गेट से तीज महोत्सव के दौरान जब मां की स्वर्ण-रजत पालकी निकली, उससे पहले कांवड़ प्रसाद लिए सज्जन को देखकर अतीत की स्मृतियां ताज़ा हो गईं। यह कांवड़, नाम से ही स्पष्ट है, मां के विशेष प्रसाद की सामग्री से युक्त होती है। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक जीवंत सांस्कृतिक परंपरा भी है।

महिलाओं के रंग-बिरंगे पर्व तीज के उपलक्ष्य में राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय तीज महोत्सव-2025 का भव्य शुभारंभ रविवार को हुआ। पहले दिन तीज माता की पारंपरिक शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं, स्थानीय नागरिक, देश-विदेश से आए पर्यटक और जनप्रतिनिधि शामिल हुए।

छोटी चौपड़ पर बने भव्य मंच से राज्यपाल हरिभाऊ बागडे, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, उप मुख्यमंत्री व पर्यटन, कला एवं संस्कृति मंत्री दिया कुमारी, उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, सहित कई गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में तीज माता की महाआरती की गई। यह पहली बार था जब उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी ने स्वयं मंच से तीज माता की आरती की।

इस महोत्सव की विशेष बात रही महिलाओं की झांकी, जिसमें उन्होंने लहरिया साड़ियों में सजकर माथे पर कलश रखकर पारंपरिक नृत्य किया। यह दृश्य न केवल आकर्षक था, बल्कि उसने राजस्थान की सांस्कृतिक गहराई को सजीव कर दिया। इस दौरान महिला पंडितों द्वारा तीज माता की पूजा की गई, जो महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बना।

शाही शोभायात्रा में बिखरा राजस्थानी लोक संस्कृति का रंग
तीज माता की शोभायात्रा ने सिटी पैलेस स्थित जनानी ड्योढ़ी से प्रारंभ होकर त्रिपोलिया गेट, छोटी चौपड़, चौगान स्टेडियम होते हुए तालकटोरा पौंड्रीक पार्क तक नगर भ्रमण किया। इस यात्रा में घोड़े-बग्घियां, हाथी, ऊंट, बैल, बैंड, राजस्थानी झांकियां, और शहनाई-नगाड़ों से सजी एक राजसी झलक देखने को मिली।

शोभायात्रा में करीब 200 लोक कलाकारों ने राजस्थान की विविध सांस्कृतिक विधाओं का प्रदर्शन किया। बनवारीलाल जाट की कच्छी घोड़ी, शेखावाटी का गैर नृत्य, बहुरूपिया कलाकारों के नारद-कृष्ण-शंकर रूप, कालबेलिया नृत्यांगनाएं, चरी नृत्य, हेला ख्याल, और राजू भाट के कठपुतली नर्तन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

आज जब देश डिजिटलीकरण, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है, ऐसे दृश्य यह याद दिलाते हैं कि हमारी असली ताकत हमारी परंपराओं में निहित है। तकनीकी प्रगति जरूरी है, लेकिन अपने संस्कार, अपनी विरासत को सहेजना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

तीज महोत्सव-2025 ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि राजस्थान की परंपरा, रंग और लोक कला देश-दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र है। इस आयोजन ने नारी शक्ति, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता का भव्य मंच प्रस्तुत किया। यह महोत्सव न केवल राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का प्रयास है, बल्कि पर्यटन को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

यही संतुलन हमें एक ऐसा समाज बनाता है, जहां परंपरा और प्रगति दोनों साथ-साथ चलती हैं कृ न तो कोई बोझ बनती है, न ही कोई बाधा। कांवड़ प्रसाद से लेकर स्वर्ण पालकी तक, यह केवल आस्था की झलक नहीं, बल्कि हमारे सांस्कृतिक अस्तित्व की पहचान है। यही पहचान हमें भीड़ से अलग करती है और भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए भी अपनी जड़ों से जोड़े रखती है।

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