खेल के मैदानों से सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म तक:

social-media.jpg

डिजिटल भूलभुलैया से बच्चों को बाहर खींचना, पेरेंट्स के लिए भारी चुनौती

हर नई टेक्नोलॉजी अपने साथ खतरों का एक पूरा पिटारा लेकर आती है। शुरुआत में हर कोई इंटरनेट आधारित गैजेट्स और तकनीकों से इतना विस्मित और मुग्ध हो गया था कि लगा अलादीन का चमत्कारी चिराग हाथ लग गया हो। जैसे जैसे मोबाइल फोन्स सुलभ, सुविधाजनक, और अफोर्डेबल हुए, इंटरनेट के आभासी मकड़जाल ने सबको अपने गिरफ्त में ले लिया। आज एक नया भस्मासुर का अवतार हमारे सम्मुख है, और हमें समझ नहीं आ रहा है इसकी काट क्या है!!

सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ने निस्संदेह बच्चों के संवाद करने, सीखने और अपने साथियों और समुदायों के साथ बातचीत करने के तरीके को बदल दिया है। स्कूल जाने वाले बच्चों के पेरेंट्स के लिए, ये प्लेटफ़ॉर्म चिंता और बेचैनी का एक महत्वपूर्ण सबब बन चुके हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं “सोशल मीडिया का व्यापक प्रभाव अक्सर लत की ओर ले जाता है, जो बच्चों की भलाई और विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। दुनिया भर में विभिन्न सरकारें विनियमन की आवश्यकता को पहचान रही हैं, कुछ सख्त आयु प्रतिबंधों पर विचार कर रही हैं, और भारत भी वर्तमान में ऐसे नियंत्रणों को लागू करने की संभावना पर विचार कर रहा है।”

हमारे जीवन में सोशल मीडिया की सर्वव्यापकता के लिए कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। ऑनलाइन मार्केटिंग प्रभावी रूप से युवा दर्शकों को लक्षित करती है, आकर्षक सामग्री का लाभ उठाती है जो बच्चों को डिजिटल दुनिया में खींचती है। डिलीवरी ऐप, गेमिंग प्लेटफ़ॉर्म और ऑनलाइन ट्यूशन के उदय के साथ, बच्चे स्क्रीन से चिपके हुए काफी समय बिताते हैं, अक्सर आवश्यक सामाजिक या पारिवारिक गतिविधियों की उपेक्षा करते हैं। एक्चुअली, ऑनलाइन मनोरंजन का आकर्षण पारंपरिक शगल को पीछे छोड़ देता है, जिससे पढ़ने की आदतों में गिरावट आती है और हॉबीज में इंटरेस्ट खत्म हो जाता है। जैसे-जैसे बच्चे अपने गैजेट्स में अधिक से अधिक तल्लीन होते जाते हैं, इस डिजिटल जुनून के परिणाम खुद ही सामने आते हैं, स्कूल टीचर हरि दत्त शर्मा जी बताते हैं।

“कई युवा सामाजिक अलगाव और अधिकार वाले लोगों के प्रति अनादर के लक्षण प्रदर्शित करते हैं, आमने-सामने बातचीत करने के बजाय लंबे समय तक चैटिंग करते हैं। वास्तविक जीवन में जुड़ाव की इस निरंतर उपेक्षा ने बड़े होने के साथ-साथ सार्थक संबंध बनाने और सामाजिक गतिशीलता को नेविगेट करने की उनकी क्षमता के बारे में चिंताएँ पैदा की हैं। इसके अलावा, ऑनलाइन घोटालों और साइबरबुलिंग में चिंताजनक वृद्धि बच्चों को खतरनाक वातावरण में धकेलती है, जिससे माता-पिता डिजिटल युग की कठोर वास्तविकता से जूझते हैं,” शर्माजी कहते हैं।

विशेषज्ञों का तर्क है कि सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू करना एक व्यापक समाधान प्रदान नहीं कर सकता है। बच्चे नियमों को दरकिनार करने और वैकल्पिक खाते बनाने के लिए पर्याप्त समझदार हैं, जिससे कोई भी निषेधात्मक उपाय अप्रभावी हो जाता है।

इसके बजाय, एक अधिक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो माता-पिता, शिक्षकों और बच्चों को जिम्मेदार सोशल मीडिया उपयोग के बारे में बातचीत में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करता है। जबकि कई लोग सख्त आयु प्रतिबंध चाहते हैं – जैसे कि सोशल मीडिया एक्सेस के लिए प्रस्तावित न्यूनतम आयु 18 वर्ष – ऐसा माहौल बनाना महत्वपूर्ण है जहाँ बच्चों को ऑनलाइन इंटरैक्शन से जुड़े जोखिमों और जिम्मेदारियों के बारे में शिक्षित किया जाए। माता-पिता का मार्गदर्शन, खुला संचार और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम बच्चों को सोशल मीडिया की जटिलताओं को सुरक्षित रूप से नेविगेट करने में सक्षम बना सकते हैं।

इसके अलावा, माता-पिता को डिजिटल क्षेत्र से परे अपने बच्चों की रुचियों को बढ़ावा देने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। बाहरी गतिविधियों, खेल, रचनात्मक कलाओं और आमने-सामने सामाजिक संपर्कों को प्रोत्साहित करने से संतुलित जीवनशैली विकसित करने में मदद मिल सकती है। पढ़ने की आदतों को बढ़ावा देना और बच्चों को सार्थक शौक में शामिल करना भी जरूरी है।

सोशल मीडिया के उदय ने वास्तव में स्कूल जाने वाले बच्चों के माता-पिता के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं, क्योंकि वे लत, अनादर और समाजीकरण के खोए अवसरों के संभावित खतरों से जूझ रहे हैं। सरकारें विनियामक उपायों का पता लगाने के लिए सही हैं, लेकिन अधिक सक्रिय दृष्टिकोण आवश्यक है। जिम्मेदार उपयोग के बारे में चर्चाओं को बढ़ावा देने और विविध हितों को प्रोत्साहित करने से, परिवार बच्चों को डिजिटल और वास्तविक दुनिया दोनों में पनपने में मदद कर सकते हैं।

“हमारी चिंताएं बिल्कुल जायज़ हैं। आजकल के बच्चे स्मार्टफोन और सोशल मीडिया में इतने खो गए हैं कि उन्हें खेलने-कूदने, परिवार के साथ समय बिताने और अपनी रुचियों को विकसित करने का समय ही नहीं मिल पा रहा है। ये चिंताजनक है क्योंकि इससे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है, सेंट पीटर्स कॉलेज के शिक्षक डॉ अनुभव कहते हैं।

“स्क्रीन टाइम सीमित करें: बच्चों के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करने का समय निर्धारित करें। परिवार के साथ समय बिताएं: साथ में खाना खाएं, बोर्ड गेम्स खेलें, या फिर कहीं घूमने जाएं। नई चीज़ें सीखने के लिए प्रोत्साहित करें: बच्चों को कोई नया शौक सिखाएं, जैसे कि संगीत, पेंटिंग या डांस। यह याद रखना ज़रूरी है कि बच्चों को धीरे-धीरे सोशल मीडिया से दूर करना होगा। उन्हें समझाएं कि असली दुनिया में भी बहुत कुछ करने को है,” सोशल सलाहकार मुक्ता गुप्ता कहती हैं।

नट सम्राट बार बार नहीं जन्मते

1-5.jpeg

सच्चिदानंद जोशी

सन 2015 के अंतिम महीनों की बात है शायद सितम्बर या अक्टूबर रहा होगा। मैं उन दिनों भोपाल में ही पदस्थ था माखनलाल विश्वविद्यालय में।मोबाइल पर काल आया जयंत देशमुख का मुंबई से। “और नंदू इन दिनों क्या कर रहे हो। नाटक वाटक करना है कि नहीं।” मुझे लगा जयंत भाई मुंबई की आपाधापी से तंग आकर कोई नाटक करना चाहते हैं भोपाल में। मनःस्थिति कुछ ठीक नहीं थी और कोई नाटक करने की या रंगयात्री समूह को फिर से जोड़ने की इच्छा नहीं थी। “नहीं यार अभी नाटक वाटक कुछ नहीं। बस ऑफिस और घर।”

” अरे यार नाटक कर नहीं सकते तो लिख ही डालो।” जयंत भाई के स्वर में आग्रह भी था और आदेश भी।
” हां लिखने के बारे सोचूंगा।”
” सोचना नहीं है करना है। मुझे हिंदी में” नट सम्राट ” चाहिए। तुमने कई बार पढ़ा है और मराठी में डायरेक्ट भी किया है। तुम उसका हिंदी कर दो। मैं जानता हूं तुम ही कर सकते हो।”
“नट सम्राट” मराठी के प्रसिद्ध लेखक वि.वा.शिरवाडकर जी की ऐसी अजर अमर कृति है कि उसमें अभिनय करने के लिए बड़े अभिनेता ईश्वर से प्रार्थना करते हैं और अलग अलग अभिनेताओं द्वारा किए अभिनय को देखने के लिए दर्शक आस लगाए बैठते हैं।श्रीराम लागू, यशवंत दत्त, मोहन जोशी, नाना पाटेकर न जाने कितने अभिनेताओं ने उसके कई हजार प्रदर्शन किए है।हमने इसे दिल्ली की स्पर्धा में खेला था और पुरस्कार पाया था।विजय डिंडोरकर जी ने इसमें मुख्य भूमिका की थी। इतना सब होने के बावजूद उसका हिंदी अनुवाद करने का लॉजिक मेरी समझ से परे था।

” उसका हिंदी अनुवाद है न।और फिर जब तक तय नहीं कि नट सम्राट की केंद्रीय भूमिका कौन करेगा ये नाटक उठाने का अर्थ ही नहीं है। और फिर इस पर तो अब हिंदी में फिल्म भी बन चुकी है।”

मैने अपनी तरफ से भरपूर दलीलें दी लेकिन जयंत भाई लगता है मन बना चुके थे।बोले ” मैं वो सब नहीं जानता। जो अनुवाद है वो मुझे नहीं अच्छा लगा और मुझे मालूम है कि तुम्हे भी अच्छा नहीं लगा। नट सम्राट के रोल के लिए आलोक से पूछूंगा। उसने हां कहा तो ठीक नहीं तो किसी और को देखूंगा। लेकिन पहले आलोक से पूछूंगा और वो मना नहीं करेगा।”
आलोक चटर्जी और जयंत देशमुख की पहले गहरी दोस्ती और फिर अनबन के किस्से भोपाल के रंग जगत में चर्चित थे।दोनों ने रंग मंडल छोड़ने के बाद स्वतंत्र थिएटर शुरू किया। जयंत ने हिंदी में शिवाजी सावंत के कालजई उपन्यास मृत्युंजय जो कि कर्ण के जीवन पर आधारित था का हिंदी में नाट्य रूपांतर प्रस्तुत किया था।इसमें कर्ण की केंद्रीय भूमिका आलोक चटर्जी ने की थी।इस नाटक से भोपाल के सभी बड़े नाम जुड़े थे। कई कलाकारों को इसमें ब्रेक भी मिला था। अपनी अत्यंत विशिष्ट निर्देशकीय शैली और बेहद कसे हुए अभिनय के कारण इस नाटक के दस बारह शो हुए। जो भी शो हुए वे हाउस फुल थे और कई दर्शकों को खाली हाथ लौटना पड़ा। हिंदी नाटक जगत का ब्लॉक बस्टर था मृत्युंजय।
लेकिन फिर किसकी नजर लगी पता नहीं निर्देशक और अभिनेता में तना तनी हो गई। मृत्युंजय कुछ समय के लिए बंद हुआ और आलोक ,जयंत की जुगल जोड़ी बिखर गई। बाद में प्रवीण महुवाले ने यह भूमिका हिंदी और मराठी में की।मराठी हिंदी में दुर्योधन की भूमिका करने का अवसर मुझे भी मिला।बाद में यह नाटक 30 -35 शो के बाद बंद हो गया।
इस पृष्ठ भूमि पर मैने जयंत भाई के आग्रह के बारे में सोचा और हामी भरी। मन में एक लालच था कि चलो इस बहाने दोनों दोस्त एक बार फिर एक साथ काम करेंगे।

नट सम्राट का हिंदी अनुवाद इतना आसान भी नहीं था। विशेषकर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हिंदी का व्यावसायिक नाटक जगत मराठी से एकदम अलग है। बहुत सारी बाते सिर्फ मराठी नाटक पर ही फिट बैठती है।नाटक के पीरियड को तय करना भी जरूरी था।

काफी सोच विचार कर और कड़ी मेहनत करके मैने एक अंक लिखा और जयंत भाई को भेजा।उन्हें वो बहुत पसंद आया। विशेषकर वे प्रसंग जो मैने भाषा के बदलाव के कारण अलग तरीके से लिखे थे।कविताएं भी उन्हें अच्छी लगी।
पहला अंक लिख कर मैं थोड़ा सुस्ताने लगा। उस बीच दिल्ली की नौकरी का भी बुलावा आया। मन भी थोड़ा भटक गया।

इसी उधेड़बुन में एक दिन फोन की घंटी घनघनाई।
जयंत भाई का फोन था “कितना हो गया नंदू।”
” कितना!अरे अभी तो दूसरा अंक शुरू ही नहीं किया है।”

” अरे तो कर न यार। उधर वो आलोक तो पागल हो गया स्क्रिप्ट देख कर। उसने तो डायलॉग याद करना भी शुरू कर दिए।मुझसे कह रहा है कि ब्लॉकिंग और कास्टिंग भी शुरू कर दे।”

” लेकिन जयंत भाई अभी थोड़ा तो समय लगेगा” मुझे दिल्ली भी जाना ।”
” अरे यार नंदू तू समझ नहीं रहा।अब आलोक को रोकना मुश्किल है। ये नाटक उसके दिमाग में बुरी तरह घुस गया है। तू तो जैसे जैसे होते जाए वैसे वैसे पेज भेजते जाना। बाकी मैं और आलोक सम्हाल लेंगे।”

फिर क्या था किसी दिन दो किसी दिन चार ऐसा करके पेज जयंत भाई को भेजते रहे।और अन्ततः जून या जुलाई 2016 में उस नाटक का अनुवाद पूरा किया ।

उसके बाद की कहानी इतिहास है और ज्यादातर लोग जानते है। इस नाटक ने हिंदी नाट्य जगत में इतिहास बना डाला।

वैसे मेरी आलोक चटर्जी से बहुत घनिष्ठ मित्रता नहीं रही।एक शानदार अभिनेता के रूप में मेरे मन में उनके प्रति गहरा सम्मान था। इसलिए जब भी मिलते थे परस्पर स्नेह और सम्मान से मिलते थे।

नट सम्राट की कुछ शो होने के बाद एक दिन रात को फोन आया आलोक का।

मैने जैसे ही ” हेलो” कहा आलोक शुरू हो गए” मैं आपको धन्यवाद देना चाहता हूं।आपने एक अभिनेता के रूप में मेरा जीवन सफल कर दिया। मैं सोच ही नहीं सकता कि यदि मैं यह नाटक न करता तो कितना अधूरा रह जाता।” आलोक न जाने कितने देर सिर्फ नाटक के विषय में ही बात करते रहे।बात बात भावुक होते रहे।जयंत भाई को और मुझे बार बार आभार देते रहे।शायद ये कॉल उन्होंने मुंबई के अति भव्य शो के बाद किया था।
वैसे जयंत भाई भी हर दो तीन शो के बीच काल करके नाटक की प्रगति बताते रहते ही थे। फिर रायपुर के शो में प्रत्यक्ष उपस्थित रहने का अवसर मिला।शो के बाद आलोक जिस तरह गले मिले उसका वर्णन करना संभव नहीं है।उसमें प्रेम था, कृतज्ञता थी, प्रसन्नता थी और सबसे बड़ी बात नट सम्राट के प्रमुख पात्र गणपत राव बेलवलकर जी का वात्सल्य था। मेरी भी आंखे सजल हो आई। वापस लौटा तो एक बात का संतोष मन में था वो ये कि हिंदी “नट सम्राट ” नाटक को उसका सुर मिल गया है। साथ ही इस बात की खुशी भी थी कि हिंदी रंग मंच को एक नया ” नट सम्राट ” मिल गया है।

ये लिखते हुए भी उंगलियां कांपती है कि आलोक चटर्जी अब हमारे बीच नहीं हैं।और ये सोचते हुए रूह कांपती है कि अब ” नट सम्राट” नाटक का क्या होगा। नाट्य जगत में आज भी कई श्रेष्ठ अभिनेता हैं और कई होंगे भी ,लेकिन नट सम्राट तो बार बार पैदा नहीं होते।

(सोशल मीडिया से)

जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रही है सरकार: गौतम कुमार

DSC_0223-scaled.jpg

खेती, किसानी और पर्यावरण पर मीडिया सम्मेलन

जयपुर। मीडिया स्कैन और ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में ’खेत, किसान और पर्यावरण के मुद्दे पर मीडिया से जुड़े सवाल’ पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। झालाना सांस्थानिक क्षेत्र स्थित राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति में हुए इस कार्यक्रम में खेती किसानी को मीडिया में अधिक जगह मिले और विचार का मुख्य विषय बने, इस पर चर्चा की गई।

राज्य के सहकारिता विभाग एवं उड्डयन मंत्री ने कहा कि इन मुद्दों पर बात बहुत हो रही हैं। लेकिन ध्यान कम दिया जा रहा है। मीडिया हर बार रासायनिक खाद की कमी पर खबर करता है। लेकिन सरकार जैविक खेती और पर्यावरण पर काम कर रहीं हैं। उसे मीडिया में जगह नहीं मिल रही हैं। सरकार निरंतर काम कर रहीं हैं लेकिन समय लगेगा। सरकार ने 7 करोड़ पौधे लगाएं, इनके लिए वृक्ष मित्रों की भर्ती कर रहीं हैं। मंत्री गौतम कुमार ने सरकार की योजनाओं के बारे में बताया।

कार्यक्रम में वक्ता के रूप में ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन के प्रमोद शर्मा ने कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए कहा कि हमने खेतों और भूमि को प्रदूषित करने का काम किया हैं। हमने भूमि के प्राकृतिक भोजन को खत्म कर दिया है। आज हम रसायनों को खेतों में भर भर के डाल रहे हैं। जिससे खेत, किसान और पर्यावरण को खत्म कर रहे हैं। आज मीडिया हर मोबाइल में है। आज के समाचार पत्रों से खेत, किसान और पर्यावरण का पृष्ठ गायब हो गया है। यह निराशाजनक है। इसे वापस लाया जा सकता है।
मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार हिरेन जोशी ने बताया कि हमारे राज्य ने छप्पनियां अकाल देखा है। लेकिन अब ऐसे अकाल नहीं हो सकते हैं क्योंकि सरकार किसानों के लिए प्रतिबद्ध हैं। आज राजस्थान की सरकार ने केंद्र सरकार के सहयोग से मध्यप्रदेश सरकार के साथ मिलकर ईआरसीपी योजना का समझौता किया। यह योजना खेत, किसान और पर्यावरण के लिए वरदान साबित होगा। पानी के बिना किसान और किसानी की कल्पना करना बेईमानी होगी। इस समझौते से 21 जिलों के 83 विधानसभा क्षेत्रों के किसानों को लाभ देगा। मीडिया ने रामगढ़ बांध पर खबर की कि रामगढ़ बांध मर गया है। खबर का परिणाम यह हुआ कि सरकार ने इस पर काम किया और यह बांध आज जिंदा हो रहा है। सरकार ने राइजिंग राजस्थान के तहत लाखों करोड़ों का समझौता किया है। यह सब किसान के लिए ही हो रहा है। सरकार इन मुद्दों पर काम कर रहीं हैं। सरकार को मीडिया के सहयोग की आवश्यकता है। क्योंकि किसान तक प्रचार प्रसार के माध्यम से पहुंचा जा सकेगा।

लेखराम यादव (करोड़पति किसान) ने बताया कि मैंने नौकरी छोड़ कर, 120 एकड़ भूमि पर खेती शुरू की थी। हम भारतीय खेती से जुड़े ग्रंथों के सूत्रों के सहयोग से मैं 1150 एकड़ तक की खेती पर पहुँच गया हूँ। आज मैं जैविक खेती से 10 गुने तक उत्पादन ले रहा हूँ। किसानों की समस्याओं पर अगर सरकार और मीडिया ध्यान दें तो देश में जैविक खेती को बढ़ावा मिल सकता हैं।
युवा एक्टिविस्ट तनया प्रफुल्ल गडकरी ने बताया कि पर्यावरण के पथ पर अग्रसर होने की आवश्यकता है। आज हम कई खाद्यान्न उत्पादन में विश्व पर प्रथम श्रेणी में है। यह सब मीडिया और सरकार के कार्यक्रम से ही हो पाया है। लेकिन मीडिया नकारात्मक दिशा की आवाज को अधिक उठा रहा है। इसका उदाहरण दिल्ली का किसान आंदोलन है। इन मुद्दों पर कनेक्ट और निरन्तरता की भी जरूरत है। इन मुद्दों पर जन आंदोलन की जरूरत है ताकि यह हर आदमी तक पहुंचे। अगर ऐसा होता है। तो मीडिया भी खबर करेगी।
कार्यक्रम में रमन कांत त्यागी, आदित्य भारद्वाज, विद्यानाथ झा, अंकित तिवारी, राजेश मेठी, सहित कई युवा किसान, पत्रकार, सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता उपस्थित रहें।

विंध्य अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल: हैदराबाद में हुए हिंदू नरसंहार पर बनी फिल्म ‘रजाकार’ से होगी शुरुआत, 23 देशों की कुल 242 फिल्में शामिल

1-4.jpeg

मध्य प्रदेश के सीधी में विंध्य अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का लगातार छठे साल आयोजन होने जा रहा है. 7 से 10 जनवरी तक सीधी के वैष्णवी गार्डन के भव्य परिसर में होने वाले इस फिल्म फेस्टिवल में 23 देशों से 242 फिल्मों ने एंट्री की है. लगातार 5 वर्षों की सफलता के बाद एक बार फिर सीधी शहर, देश-विदेश के फिल्मकारों के स्वागत के लिए तैयार है.

देश-विदेश के स्वतंत्र ​फिल्मकारों के बीच लोकप्रिय हो चुका सीधी का ये फिल्म फेस्टिवल, ब्रिटिश काउंसिल की फिल्म डायरेक्टरी में भी शामिल है.

फेस्टिवल के निदेशक प्रवीण सिंह चौहान ने बताया कि इंडस्ट्री के दिग्गजों की जूरी के सामने सभी फिल्मों की स्क्रीनिंग के बाद अलग-अलग कैटगरी में पुरस्कार के लिए 10 फीचर फिल्मों और 30 शॉर्ट फिल्मों का चयन हुआ है. मध्य प्रदेश के फिल्ममेकर्स की 6 फिल्मों और 6 ट्राइबल फिल्मों को भी पुरस्कार दिया जाना है.

किन देशों की फिल्में शामिल?

प्रवीण चौहान ने बताया कि इस साल भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, बांग्लादेश, बेल्जियम, ब्राजील, कनाडा, चीन, कोलंबिया, फ़िनलैंड, जर्मनी, इटली, मलावी, मेक्सिको, नॉर्वे, पेरू, पुर्तगाल, सर्बिया, स्पेन, स्वीडन और यूक्रेन की फिल्मों ने इस फेस्टिवल में हिस्सा लिया है.

हिंदू नरसंहार पर बनी फिल्म से शुरुआत

इस फेस्टिवल की ओपनिंग फिल्म है, निर्देशक यता सत्यनारायण की फिल्म ‘रजाकार’, जो हैदराबाद में हुए हिंदू नरसंहार की सच्ची घटना पर आधारित है. वहीं, फेस्टिवल की क्लोजिंग, मध्य प्रदेश के ​निर्देशकों की फिल्मों और आदिवासी केंद्रित फिल्मों से होगी. फेस्टिवल के दौरान दिखाई जाने वाली फ़िल्मों के निर्देशकों का आमजन से सीधे संवाद का कार्यक्रम भी रखा गया है. इसके अलावा विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर पैनल डिस्कशन रखा गया है.

गिरिजा शंकर, गीताश्री, अविनाश दास जैसे दिग्गज हैं मेहमान

फिल्म फेस्टिवल के संयोजक नीरज कुंदेर ने बताया कि इस वर्ष सीधी आने वाले मेहमानों में वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर, हिंदी की प्रख्यात लेखिका गीताश्री, फिल्म निर्देशिका देवयानी अनंत के साथ अनारकली ऑफ आरा, शी, रात बाकी है जैसी फिल्मों और वेब सीरीज के निर्देशक अविनाश दास भी शामिल हैं.

विदेशी मेहमानों में इटली से क्रिस्टियानों एसपोसितों, सिमोना पासक्यूएल, स्वीडन से एना भोलमार्क जैसे फिल्मकार शामिल हैं. इनके अलावा कोलकाता से राष्ट्रीय फिल्म पुरुस्कार प्राप्त निर्देशक सोमनाथ मंडल, अबंती सिन्हा, चेन्नई से बी सुरेश कुमार सहित भारत के विभिन्न राज्यों से फिल्मकार अपनी फिल्मों के साथ फेस्टिवल में हिस्सा लेंगे.

आदिवासी गांवों का लोक रंग देखेंगे मेहमान

फिल्म फेस्टिवल के संरक्षक डॉ अनूप मिश्र, इंजीनियर आर बी सिंह और विवेक सिंह चौहान ने कहा कि सीधी शहर स्थानीय दर्शकों और बाहरी मेहमानों के स्वागत के लिए तैयार है. फेस्टिवल के बाद 10 जनवरी को सभी देशी-विदेशी मेहमानों को सीधी के आदिवासी क्षेत्रों में भ्रमण कराया जाएगा. इन गांवों में लोग लोक नृत्य, लोक वाद्यों, लोक गीतों के साथ-साथ स्थानीय खानपान का लुत्फ उठाएंगे.

बिना किसी सरकारी मदद के संरक्षकों और आम जन के सहयोग से ये फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया जाता है, जो देश का इकलौता ऐसा आयोजन है, जिसमें सभी फिल्मकारों को भोजन, आवास और यातायात की नि:शुल्क व्यवस्था की जाती है.

scroll to top