6 अप्रैल 1929 : महाशय राजपाल का बलिदान स्वाभिमान और आर्य संस्कृति की रक्षा के लिये जीवन समर्पित

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रमेश शर्मा

दासता के दिनों में भारतीय अस्मिता पर चौतरफा हमला हुआ है । आक्रांताओं ने केवल सत्ताओं को ही ध्वस्त नहीं किया अपितु भारतीय संस्कृति और साहित्य को भी विकृत करने का प्रयास किया है । एक ओर यदि भारतीय जन स्वाधीनता संघर्ष के लिये आगे आये तो दूसरी ओर भारतीय साहित्य और संस्कृति को सहेज कर संकलित करने वालों की भी एक लंबी श्रृंखला रही है । महाशय राजपाल ऐसे ही बलिदानी थे जिन्होंने आर्य साहित्य को सहेजकर प्रकाशन करने के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया ।

वे आर्य साहित्य के प्रमुख प्रकाशक थे। उन्होंने अपना जीवन आर्य साहित्य के संकलन, युवाओं में संस्कार और भय अथवा लालच से मतान्तरित व्यक्तियों की घर वापसी में लगाया था और यही उनकी हत्या का कारण बना ।

महाशय राजपाल का जन्म आषाढ़ कृष्ण पक्ष पंचमी विक्रम संवत 1942 (2 जुलाई 1885) को अमृतसर में हुआ था।

उनके बचपन का नाम घसीटाराम था।उनके पिता लाला रामदास खत्री एक छोटे व्यवसायी थे । परिवार भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपराओं के प्रति समर्पित था । राजपाल जी बचपन से बहुत संवेदनशील और कुशाग्र बुद्धि थे । पढ़ाई में भी सदैव प्रथम आते । राजपाल जी जब छोटे ही थे, तब अचानक उनके पिता कहीं गायब हो गये । उनकी किसी ने हत्या की या वे स्वयं किसी कारण घर परिवार छोड़कर चले गये यह रहस्य सदैव बना रहा । पिता के चले जाने से परिवार गहन आर्थिक संकट में आ गया । माँ ने भी छोटे मोटे काम किये और राजपाल जी ने भी । इस प्रकार परिवार आगे बढ़ा । इसी संघर्ष में उन्होंने मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण कर काम की तलाश की । उनकी आवश्यकता वैद्य फकीर चंद जी यहाँ पूरी हुई । फकीरचंद जी अमृतसर में एक प्रसिद्ध वैद्य और आर्यसमाज के कार्यकर्ता थे ।

उनको एक सहायक की आवश्यकता थी। और राजपाल जी को काम की खोज थी । अतएव दोनों की आवश्यकता पूरी हुई । राजपाल जी बारह रुपये मासिक पर उनके सहयोगी हो गये । और आर्यसमाज से भी जुड़ गए। अपने कार्य के प्रति समर्पण, जिज्ञासु स्वभाव के चलते उन्होंने न केवल वैद्य जी के हृदय में अपितु आसपास के क्षेत्र में भी अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था । राजपाल नाम इन्हीं वैद्य फकीरचंद जी ने दिया । वे अपने चिकित्सा व्यवसाय के साथ भारत राष्ट्र के मूल्यों और आर्य समाज के सिद्धांतों के प्रति जागरूकता का कार्य करते थे । एक ओर जहाँ युवकों में साँस्कृतिक जागरण का अभियान चलाये हुये थे वहीं 1905 से स्वदेशी आँदोलन भी जुड़ गये । वैद्य जी ने इस काम में राजपाल जी भी जोड़ लिया । राजपाल जी ने युवाओं से संपर्क किया और एक टोली बना ली । यह टोली पूरे नगर में घूम घूम कर युवाओं को संस्कारों से जोड़ने का कार्य करने लगी । इसके लिये सांस्कृतिक और मानवीय विन्दुओं को तार्किक तरीके से लोगों को समझाकर अपने धर्म और परंपरा से जोड़ने का अभियान चला । उन्होंने यह कार्य अमृतसर से लाहौर तक फैलाया। इस अभियान से उन लोगों को कठिनाई हुई जो कुतर्क के आधार पर युवाओं को सनातन परंपरा से तोड़कर मतान्तरण का अभिमान चला रहे थे । कयी बार सार्वजनिक शास्त्रार्थ भी हुये । पर राजपाल जी अध्ययन बहुत करते थे ।

उनकी तार्किक क्षमता भी अद्भुत थी इसीलिए हर बार वे ही भारी पड़ते। उन्होने प्रतिदिन रात्रि आठ बजे युवाओं की एक संस्कार बैठक करने की परंपरा भी आरंभ की और एक संगठन भी बनाया जिसका नाम “सुधार सभा” रखा । राजपाल जी इस सभा में बच्चों और युवाओं को व्यक्तित्व और जीवन निर्माण के लिए संस्कारों के अनुरुप जीवन जीने का संदेश देते थे। इस सभा में मांस-भक्षण, तम्बाकू व मदिरा पान आदि से दूर रहने का आव्हान होता । इस सभा के प्रचार से अनेक युवकों ने दुर्व्यसनों का परित्याग किया। कितने ही युवक कुसंगति से बचे ।समय के साथ विवाह हुआ और राजपाल जी लाहौर आ गये । यहाँ उन्होंने दो संस्थाएँ बनाई एक “आर्य पुस्तकालय और दूसरी “सरस्वती प्रकाशन” । सरस्वती उनकी पत्नि का नाम था । सरस्वती प्रकाशन पत्नि के नाम पर ही रखा था । उन दिनों पंजाब में हिन्दी का प्रचलन बहुत कम था । अधिकतर पुस्तकें उर्दू या पंजाबी में ही प्रकाशित होती थीं। हिन्दी के प्रकाशक भी नगण्य थे । इस बात को भाँप कर राजपाल ने ‘आर्य पुस्तकालय’ तथा ‘सरस्वती आश्रम’ नामों से हिन्दी के प्रचार का अभियान छेड़ा । राजपाल जी ने उन विपरीत परिस्थिति में हिन्दी के स्तरीय प्रकाशन का आयाम स्थापित किया वह अपने आप में एक आश्चर्यजनक है ।उनका सौम्य और आत्मीय व्यवहार सबको प्रभावित करता । यहाँ उन्हें सबलोग महाशय संबोधन से पुकारने लगे । अब उनका नाम महाशय राजपाल हो गया ।

1920 और 1930 के दशक में महाशय राजपाल ने चार भाषाओं में एक साथ स्तरीय पुस्तकें प्रकाशित कीं। हिन्दी और उर्दू में उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 200 से ऊपर थी । वे स्वयं अच्छे लेखक एवं कुशल सम्पादक थे। अनेक पुस्तकें स्वयं लिखीं तथा अन्य लेखकों के लेखों तथा भाषणों का संपादन और प्रकाशन किया। समय के साथ स्वामी श्रद्धानन्द से जुड़े और न केवल स्वामी जी के पत्र ‘सद्धर्म-प्रचारक’ में सहायक सम्पादक बने अपितु स्वामी जी शुद्धीकरण अभियान में सहभागी भी बन गये । । कालान्तर में वे लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक ‘प्रकाश’ के वर्षों सह-सम्पादक रहे। इसी पृष्ठभूमि के साथ उन्होंने राजपाल प्रकाशन संस्था गठित कर पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में भी पदार्पण किया । लाहौर में उन दिनों हिन्दी प्रकाशन आरंभ करना सरल नहीं था । तब इस व्यवसाय में संघर्ष अधिक और पैसा कम था । लगभग पन्द्रह वर्षों के अपने प्रकाशकीय जीवन में उन्होंने अनेक हिन्दी पुस्तकों के प्रकाशन किए और सुदूर देशों में बसे भारतीय मूल के लोगों तक उन्हें पहुंचाने का काम भी किया।

उनके प्रकाशन मॉरिशस, फिजी, पूर्वी अफ्रीका, ब्रिटिश तथा डच गयाना आदि स्थानों पर बड़ी संख्या में जाते थे। पुस्तकों के माध्यम से भारतीय विचारधारा और संस्कृति के संदेशवाहक साहित्य के निर्यात में भी उनकी ऐतिहासिक भूमिका रही थी। स्वामी श्रृद्धानंद जी सानिध्य के कारण वे कुछ कट्टरपंथियों के निशाने पर तो आ ही गये थे । स्वामी श्रृद्धानंद जी की हत्या की उन्होंने कठोर शब्दों में निंदा की और लेख भी लिखे । इससे उनके विरुद्ध गुस्सा और बढ़ा। तभी लाहौर में एक घटना घटीउन्हीं दिनों लाहौर के बाजार में दो पुस्तकें आईं। जिनमें भारतीय मान विन्दुओं पर अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ थीं। एक पुस्तक का नाम ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और दूसरी पुस्तक का नाम ‘उन्नीसवीं सदी का महर्षि’था ।

पहली पुस्तक में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण और दूसरी पुस्तक में महर्षि दयानन्द सरस्वती पर बहुत ही भद्दे और अश्लीलता से भरा कीचड़ उछाला गया था।सनातन परंपरा और उसके आदर्शों पर इस प्रकार कीचड़ बाजी पहली नहीं थी । उन दिनों लाहौर में आम बात थी । इस प्रकार का प्रचार उस समूह की ओर से होता था जो युवाओं के मतान्तरण का अभियान चला रहा था । लेकिन इस बार इसके उत्तर में एक पुस्तक बाजार में आई जिसमें पैगंबर साहब पर टिप्पणियाँ थीं। “रंगीला रसूल” नाम से सामने आई । इस पुस्तक पर लेखक और प्रकाशन का नाम नहीं था पर यह प्रचार हो गया कि इसके प्रकाशक राजपाल जी हैं। पुस्तक को लेकर तनाव हुआ । राजपाल जी से लेखक का नाम पूछा गया । पर उन्होंने अनभिज्ञता व्यक्त कर दी । इस पुस्तक पर गाँधी जी ने भी आपत्तिजनक माना और यंग इंडिया में लेख लिखा । राजपाल जी गिरफ्तार हुये । उनपर मुकदमा चला । उनपर निचली अदालत में कारावास और जुर्माने की सजा हुई । उन्होंने अपील की और हाई कोर्ट से बरी हो गये । उनके बरी हो जाने को से कट्परपंथी समाज में नाराजी बढ़ी।उन्हे जान से मारने की धमकियाँ मिलने लगीं। उन पर हमले भी हुये । वे दो बार के हमलों में बच गये । वे हमलावर पकड़े भी गये पर तीसरी बार का हमला प्राणलेवा बना । वह 6 अप्रैल 1929 का दिन था एक इल्मदीन नामक कट्टरपंथी पुस्तक देखने के बहाने दुकान में घुसा और अवसर देखकर छुरे से हमला बोल दिया । राजपाल जी आर्य वैदिक धर्म तथा सत्य वैदिक साहित्य के प्रकाशन के लिये बलिदान हो गये। हमलावर इल्मदीन को पकड़ लिया गया । उस पर मुकदमा चला और अदालत ने उसे फाँसी की सजा सुनाई ।

राजपाल जी चौथे बलिदानी थे उनसे पहले महर्षि दयानन्द, स्वामी श्रृद्धानंद और पं. लेखराम जी भी वैदिक परंपरा की रक्षा में बलिदान हुए। थे । राजपाल जी एक निर्भीक पत्रकार, लेखक, प्रकाशक और वैदिक संस्कृति के लिये समर्पित थे । उनके बलिदान दिवस पर सादर नमन्

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति mediascan.in उत्तरदायी नहीं है)

लोकसभा चुनावों में विपक्ष को झटके पर झटके

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दिल्ली। लोकसभा चुनाव- 2024 में जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राजग गठबंधन पूरी ताकत के साथ आगे बढ़ता जा रहा है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल अपनी रणनीति को ही अंतिम रूप नहीं दे पा रहे हैं। सभी विरोधी दलों में इतना अधिक भ्रम पैदा हो गया है कि संपूर्ण भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण और दक्षिण से लेकर पूर्वोत्तर तक सभी राज्यों में जिला स्तर तक पार्टियों के कद्दावर नेता व प्रवक्ता पार्टी छोड़ रहे हैं और अपनी ही पार्टी की असलियत उजागर कर रहे हैं। प्रमुख विरोधी दल कांग्रेस की स्थिति तो इतनी अधिक दयनीय हो चुकी है कि उसके पास स्टार प्रचारक और समर्थ प्रत्याशी तक नहीं उपलब्ध हो पा रहे हैं।

एक समय ऐसा था कि पूरा का पूरा फिल्म जगत कांग्रेस के सामने नतमस्तक रहता था। कांग्रेस ने भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को हराने के लिए फिल्म स्टार राजेश खन्ना को चुनावी मैदान में उतार कर चुनावी लड़ाई को रोचक बना दिया था वहींअब एक समय कांग्रेस के सांसद रहे फिल्म अभिनेता गोविंदा शिवसेना शिंदे गुट में शामिल हो चुके हैं और संभव है शिवसेना उन्हें टिकट भी दे दे।

जम्मू कश्मीर के कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने के बाद कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण करने के लिए अयोध्या में दिव्य- भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह बहिष्कार कर दिया लेकिन उसके बाद से कांग्रेस के हालात और खराब हो गये। कांग्रेस के ऐसे -ऐसे नेता पार्टी छोड़ रहे हैं कि विश्वास नहीं होता। वहीं कुछ नेता ऐसे हैं जो फिलहाल तो कांग्रेस में ही हैं किंतु अपने पत्रों / सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से कांग्रेस के मुद्दों की हवा निकाल कर पार्टी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं की सूची हर दिन लंबी होती जा रही है । जिसका असर राज्यसभा चुनावों में दिखा था और हिमांचल की सरकार गिरते -गिरते बाल बाल बची है।

महाराष्ट्र के एक दिग्गज नेता अशोक चव्हाण भाजपा में शामिल होकर राज्यसभा पहुंच गये हैं। महाराष्ट्र के ही युवा नेता मिलिंद देवड़ा और पूर्व गृहमंत्री शिवराज पाटिल की बहू अर्चना भी भाजपा में शामिल हो गई हैं। महा विकास अघाड़ी में जिस प्रकार का तनाव है उससे लग रहा है कि वहां के अभी कई और नेता भाजपा के नेतृतव वाले गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। उधर एक अन्य दिग्गज कांग्रेसी नेता संजय निरुपम भी पार्टी से निकाले जा चुके हैं। ऐसा लगता है पार्टी इससे चिंतित नहीं है क्योंकि जब मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस छोड़ी थी तब राहुल गांधी ने कहा था कि वह चाहते हैं कि मिलिंद जैसे नेता पार्टी छोडकर चले जाएं तो अच्छा होगा।

कांग्रेस के नेताओं के पार्टी छोड़ने के कई कारणों में से प्रमुख है कांग्रेस व इंडी गठबंधन का सनातन विरोधी हो जाना। कांग्रेस के प्रवक्ता आचार्य प्रमोद कृष्णन ने राम के नाम पर कांग्रेस छोड़ दी थी फिर गुजरात व हिमांचल के कई विधायकों, नेताओें ने राम के नाम पर व सनातन विरोध नहीं कर पाने कारण कांग्रेस छोड़ दी।

कांग्रेस के युवा तेजतर्रार नेता प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने कांगेस अध्यक्ष को लिखे पत्र में कहा कि जब मैं पार्टी में शामिल हुआ था तब की पार्टी और अबकी पार्टी में जमीन आसमान का अंतर आ गया है। गौरव ने कहा कि वे अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समरोह में न जाने के कांग्रेस पार्टी के स्टैंड से काफी नाराज थे। वो जन्म से हिंदू और शिक्षक हैं राम का अपमान नहीं सकते। उनका मानना है कि अब पार्टी दिशाहीन हो गयी है, वह दिन भर न तो सनातन को गाली दे सकते हैं और न ही वेल्थ क्रिएटर्स की निंदा कर सकते हैं। गौरव वल्लभ ने 2019 में पहली बार झारखंड से और फिर 2023 में राजस्थान से विधानसभा का चुनाव लड़ा था था और दोनों ही बार उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। गौरव को बहुत पढ़ा लिखा व समझदार व्यक्ति माना जाता रहा है। गौरव अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं।

महाराष्ट्र में पूर्व कांग्रेस नेता संजय निरूपम ने कहा कि वर्तमन समय में कांग्रेस की हालत बहुत अधिक खराब है क्योकि कांग्रेस में कई सेंटर बन चुके हैं जिसमें श्रीमती सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, राहुल गांधी और फिर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का सेंटर बन चुका है। श्रीमती सोनिया गांधी केवल राहुल गांधी को ही आगे बढ़ाना चाहती हैं इस कारण वह किसी और को सुन नहीं पा रही हैं। कांग्रेस पार्टी में घोर निराशा का वातावरण है। कांग्रेस का कार्यकर्ता हताश है क्योंकि वह समझ नहीं पा रहा है कि वह अपनी बात किसके पास रखे। अब तो सोशल मीडिया में लोग यह भी कहने लगे हैं कि आने वाले समय में कांग्रेस में केवल गांधी परिवार ही बचेगा। वायनाड में राहुल गांधी जब पर्चा दाखिल कर रहे थे तब खरगे दिल्ली में थे और उन्हें कोई भाव नहीं दिया जा रहा था। संजय ने कहा कि राहुल और प्रियंका की लॉबी के चलते कई अच्छे नेताओं का सत्यानाश हो गया है।पंजाब में कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण यही गुटबाजी रही। कांग्रेस छोड़ रहे नेताओं का मत है कि कांग्रेस का नेतृत्व मेहनत नहीं करना चाहता।आज की कांग्रेस जनता व कार्यकर्ता दोनों से काफी दूर जा चुकी है। वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी विचारधारा के मामले में भी पूरी तरह से भ्रमित है।

जिन नेताओं ने पार्टी छोड़ी या कांग्रेस से निकाले गये उनमें संजय निरूपम, बॉक्सर विजेंदर, गौरव वल्लभ तो हैं ही बिहार कांग्रेस के अनिल शर्मा सहित कई अन्य नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं। आम लोगों का मत है कि आज की कांग्रेस इतनी अधिक सनातन विरोधी है कि ऐसा कांग्रेसी जिसके मन में भगवान राम, काशी और मथुरा के प्रति जरा सा भी श्रद्धाभाव होगा वह कांग्रेस छोड़ देगा। पिछले दिनों हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के समय तमिलनाडु के नेता लगातार सनातन का उन्मूलन करने जैसे विकृत दे रहे थे जिसकी कांग्रेस की ओर से एक बार भी निंदा नहीं की गयी इसका असर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में स्पष्ट दिखाई पड़ा और कांग्रेस साफ हो गयी।

कुछ दिनों पूर्व कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने कांग्रेस आलाकमान को पत्र लिखकर चेताया था कि जातिगत जनगणना का मुददा कांग्रेस पार्टी को बहुत अधिक नुकसान कर रहा है। उन्होंने अपने पत्र में लिखा था कि किस प्रकार स्वर्गीय इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी जातिगत जनगणना के पक्षधर नहीं थे, एक समय पार्टी का नारा था, “जात पर न पात पर मोहर लगेगी हाथ पर” । अब वही कांग्रेस हर जगह जातिगत जनगणना की बात कह रही है। इससे सिद्ध हो रहा है कि आज की कांग्रेस पूरी तरह से भ्रमित है और यही कारण है किउसके नेता दल छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

जो बोएंगे वही पाएंगे ….

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रामगोपाल

दिल्ली। आजकल एक नया शिगूफा शुरू हुआ है कि बच्चा अपना रास्ता स्वयं चुने। यह शिगूफा एक समस्या बनता जा रहा है। बात केवल नास्तिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शारीरिक पहचान को भी क्षति पहुंचा रही है। बच्चे में जो संस्कार बचपन से भरे जाते हैं, वही आगे बढ़कर बृहत रूप लेते हैं। बचपन में जो बीज बोए जाएंगे वही आगे चलकर पेड़ का रूप लेंगे। अब यह आपके ऊपर है कि आप क्या बीज बोते हैं। यह भी है कि बीज आप स्वयं बोते हैं, या फिर खाली खेत छोड़ देते हैं और कोई और कुछ बोकर चला जाएगा।

प्रकृति का नियम यह है कि वह कहीं शून्य नहीं छोड़ती। यदि आपने अभीष्ट संस्कार नहीं दिए तो उस खाली जगह में आयातित संस्कार भर जाएंगे। यदि आप चाहते हैं कि आपकी संतान सही दिशा में चले तो सही दिशा आपको चुननी पड़ेगी और उस दिशा में संतान को ले जाना होगा। आपकी संतान दो तरीकों से सीखेगी। या तो उसे आप सिखा सकते हैं, या फिर वह स्वयं देखकर सीखेगा। बालमन कच्चा होता है, जरूरी नहीं कि वह आपको देखकर ही सीखे। उसकी नजर जहां तक जाएगी, वह वहां तक सीखेगा।

यदि आप अपने बच्चे को प्रारंभ से धार्मिक कथाएं सुनाते हैं, पूजा पाठ, आध्यात्म की ओर प्रेरित करते हैं तो बड़े होने पर कितना भी भटक जाए, वापस अपने रास्ते पर आ जाएगा।यदि आप बचपन से अपने बच्चे को मारपीट सिखाते हैं तो उसकी प्रवृत्ति यही रहेगी। दबना सिखाते हैं तो ताउम्र दबेगा, दाबना सिखाते हैं ताउम्र दाबेगा। यदि कुछ नहीं सिखाते हैं और यह सोचते हैं कि बड़ा होने पर अपना निर्णय स्वयं लेगा तो सादर क्षमा मांगते हुए कहता हूं कि आप गलत हैं। उसके मस्तिष्क को जो भोजन चाहिए वह लेगा ही। फिर चाहे वह आप उसे दें या कोई और। यदि बचपन में सही राह नहीं दिखाई तो राह से भटकाने का काम आप कर चुके हैं।

इसी क्रम में एक समस्या मैंने प्रत्यक्ष देखी है। अक्सर देखिएगा कि जिस व्यक्ति की केवल बेटियां होती हैं, वह एकाधिक बेटी को बेटा बनाकर पालेंगे। बचपन में तो ये बात बड़ी प्यारी लगती है। लेकिन धीरे धीरे वह शिशु यह समझ बैठता है कि वह वास्तव में लड़का है। शरीर का निर्माण भले माता के गर्भ में होता है, लेकिन विकास तो जन्म के बाद होता है। इसमें मस्तिष्क की अहम भूमिका होती है। मस्तिष्क उन रसायनों का निर्माण सुनिश्चित करता है जो विभिन्न अंगों का विकास सुनिश्चित करते हैं। संभवतः इन्हें ही हार्मोंस कहा जाता है।

विचार करके देखिए कि आपके घर में तोता पलता है जिसे अन्न चाहिए, लेकिन आप समझ रहे हैं कि आपने खरगोश पाल रखा है। ऐसे में क्या होगा? आप घास की मात्रा बढ़ा देंगे और अन्न एकदम नगण्य कर देंगे। आपका तोता कमजोर हो जाएगा। घास खाकर जिंदा तो रहेगा, लेकिन किसी काम का नहीं रहेगा। खरगोश तो बनने से रहा। यह असंभव ही है। यही शरीर करता है। जो हार्मोंस चाहिए वह बनेंगे नहीं, और जो नहीं चाहिए वह बनने लगेंगे। इसके विपरीत प्रभाव पड़ेंगे। शरीर के विभिन्न अंगों का जो विकास होना चाहिए वह नहीं होगा। शरीर तो छोड़िए, मानसिक अवस्था भी ऐसी हो जाएगी कि वह बच्ची स्वयं को आगे चलकर स्त्री नहीं मान पाएगी। स्त्री शरीर में फंसा हुआ एक पुरुष मिलेगा।

इसका उल्टा भी हो सकता है। पुरुष शरीर में फंसी हुई स्त्री भी हो सकती है। लेकिन ऐसे मामले कम आते हैं। कई मामले देखे हैं मैंने जहां विवाह की अवस्था होने पर अभिभावक चाहते हैं कि उनका ‘बेटा’ बेटी बन जाए। लेकिन यह हो नहीं पाता। ऐसे में या तो वह लड़की शादी ही नहीं करती, या फिर कर भी ले तो दांपत्य जीवन समस्याओं से भर उठता है। पति को स्त्री चाहिए होती है, लेकिन शरीर से आधी और मन से पूरा पुरुष उसे प्राप्त हो जाता है।

खैर! मेरा मानना यह है कि लड़की को आप तमाम शक्तियां दें। उसे स्वाबलंबी बनाएं, आत्मनिर्भर बनाएं, स्वतंत्र बनाएं, लेकिन पुरुष न बनाएं। ऐसा कुछ भी नहीं जो एक लड़की होते हुए नहीं पाया जा सकता है।

एक स्कूल ऐसा, जहां अभिभावकों को मिला होम वर्क

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चेन्नई के एक स्कूल ने अपने बच्चों को छुट्टियों का जो एसाइनमेंट दिया वो पूरी दुनिया में वायरल हो रहा है.

वजह बस इतनी कि उसे बेहद सोच समझकर बनाया गया है. इसे पढ़कर अहसास होता है कि हम वास्तव में कहां आ पहुंचे हैं और अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं. अन्नाई वायलेट मैट्रीकुलेशन एंड हायर सेकेंडरी स्कूल ने बच्चों के लिए नहीं बल्कि पेरेंट्स के लिए होमवर्क दिया है, जिसे हर एक पेरेंट को पढ़ना चाहिए.

उन्होंने लिखा-
पिछले 10 महीने आपके बच्चों की देखभाल करने में हमें अच्छा लगा.आपने गौर किया होगा कि उन्हें स्कूल आना बहुत अच्छा लगता है. अगले दो महीने उनके प्राकृतिक संरक्षक यानी आप उनके साथ छुट्टियां बिताएंगे. हम आपको कुछ टिप्स दे रहे हैं जिससे ये समय उनके लिए उपयोगी और खुशनुमा साबित हो.

– अपने बच्चों के साथ कम से कम दो बार खाना जरूर खाएं. उन्हें किसानों के महत्व और उनके कठिन परिश्रम के बारे में बताएं. और उन्हें बताएं कि अपना खाना बेकार न करें.

– खाने के बाद उन्हें अपनी प्लेटें खुद धोने दें. इस तरह के कामों से बच्चे मेहनत की कीमत समझेंगे.

– उन्हें अपने साथ खाना बनाने में मदद करने दें. उन्हें उनके लिए सब्जी या फिर सलाद बनाने दें.

– तीन पड़ोसियों के घर जाएं. उनके बारे में और जानें और घनिष्ठता बढ़ाएं.

– दादा-दादी/ नाना-नानी के घर जाएं और उन्हें बच्चों के साथ घुलने मिलने दें. उनका प्यार और भावनात्मक सहारा आपके बच्चों के लिए बहुत जरूरी है. उनके साथ तस्वीरें लें.

– उन्हें अपने काम करने की जगह पर लेकर जाएं जिससे वो समझ सकें कि आप परिवार के लिए कितनी मेहनत करते हैं.

– किसी भी स्थानीय त्योहार या स्थानीय बाजार को मिस न करें.

– अपने बच्चों को किचन गार्डन बनाने के लिए बीज बोने के लिए प्रेरित करें. पेड़ पौधों के बारे में जानकारी होना भी आपके बच्चे के विकास के लिए जरूरी है.

– अपने बचपन और अपने परिवार के इतिहास के बारे में बच्चों को बताएं.

– अपने बच्चों का बाहर जाकर खेलने दें, चोट लगने दें, गंदा होने दें. कभी कभार गिरना और दर्द सहना उनके लिए अच्छा है. सोफे के कुशन जैसी आराम की जिंदगी आपके बच्चों को आलसी बना देगी.

– उन्हें कोई पालतू जानवर जैसे कुत्ता, बिल्ली, चिड़िया या मछली पालने दें.

– उन्हें कुछ लोक गीत सुनाएं.

– अपने बच्चों के लिए रंग बिरंगी तस्वीरों वाली कुछ कहानी की किताबें लेकर आएं.

– अपने बच्चों को टीवी, मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखें. इन सबके लिए तो उनका पूरा जीवन पड़ा है.

– उन्हें चॉकलेट्स, जैली, क्रीम केक, चिप्स, गैस वाले पेय पदार्थ और पफ्स जैसे बेकरी प्रोडक्ट्स और समोसे जैसे तले हुए खाद्य पदार्थ देने से बचें.

– अपने बच्चों की आंखों में देखें और ईश्वर को धन्यवाद दें कि उन्होंने इतना अच्छा तोहफा आपको दिया. अब से आने वाले कुछ सालों में वो नई ऊंचाइयों पर होंगे.

माता-पिता होने के नाते ये जरूरी है कि आप अपना समय बच्चों को दें.

अगर आप माता-पिता हैं तो इसे पढ़कर आपकी आंखें नम जरूर हुई होंगी. और आखें अगर नम हैं तो वजह साफ है कि आपके बच्चे वास्तव में इन सब चीजों से दूर हैं. इस एसाइनमेंट में लिखा एक-एक शब्द ये बता रहा है कि जब हम छोटे थे तो ये सब बातें हमारी जीवनशैली का हिस्सा थीं, जिसके साथ हम बड़े हुए हैं, लेकिन आज हमारे ही बच्चे इन सब चीजों से दूर हैं, जिसकी वजह हम खुद हैं

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