बांग्लादेश में शेख हसीना की आवामी लीग पार्टी ने प्राप्त किया बहुमत

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बांग्‍लादेश में राष्‍ट्रीय चुनाव में शेख हसीना के नेतृत्‍व वाली अवामी लीग पार्टी ने बहुमत प्राप्‍त कर लिया है। बांग्‍लादेश की जातीय संसद की 299 सीटों के लिए हुए चुनाव की मतगणना में अब तक 224 सीटों के परिणाम मिल चुके हैं। अवामी लीग ने 165 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि जातीय पार्टी के नौ उम्‍मीदवार जीते हैं। 49 निर्दलीय और अन्‍य पार्टियों के एक उम्‍मीदवार को जीत हासिल हुई है। बाकी सीटों की मतगणना जारी है और आज दोपहर तक इनका परिणाम मिल जाएगा।

इस शानदार विजय के साथ मौजूदा प्रधानमंत्री और अवामी लीग की अध्‍यक्ष लगातार चौथी बार सरकार बनाएंगी और पांचवीं बार प्रधानमंत्री बनेंगी। उन्‍होंने गोपालगंज-तीन सीट पर बडे अंतर से जीत दर्ज की। हसीना ने पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया है कि चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद जीत का कोई जलूस न निकाला जाए।

तीन सौ सीटों में से 299 के लिए कल मतदान हुआ। बांग्‍लादेश के चुनाव आयोग के अनुसार संसदीय चुनाव में लगभग चालीस प्रतिशत मतदान हुआ। प्रमुख विपक्षी दल बांग्‍लादेश नेशनलिस्‍ट पार्टी- बी एन पी और उसके सहयोगियों ने चुनाव का बहिष्‍कार किया। इन दलों का आरोप था कि शेख हसीना की सरकार में स्‍वतंत्र और निष्‍पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं।

राष्ट्रवादी मुस्लिम छात्र की कहानी है रंग

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समाज को सिर्फ भाईचारे से ही बचाया जा सकता है। सामाजिक सौहार्द न हो तो हमारी सोसाइटी तार—तार हो जायेगी। उसी कहानी को ताना-बाना में रखते हुए, शॉर्ट फिल्म ‘रंग’ एक सच्ची सीख देती है।

निर्देशक और लेखक ने परिवेश उस समय का रखा है जब मोबाइल युग नहीं था। 90 के दशक में जब लैंड लाइन पाने के लिए भी महीनों टेलीफोन एक्सचेंज के चक्कर लगाने पड़ते थे। उसी दौर की कहानी है रंग।

कहानी है शुरू होती है, एक प्रखंड के अंदर हिंदू मुस्लिम के बीच हुए दंगे से। पहले दंगा हुआ, फिर कर्फ्यू लगा। कुछ दिनो तक कर्फ्यू रहा, फिर उसे हटाया गया। ऐसे माहौल में एक मुस्लिम गांव के एक बच्चे की जिद है स्कूल जाने की। पिता अशरफ डरा हुआ है कि ऐसे माहौल में कैसे जाऊं?

बेटे की जिद के आगे वह मान जाता है और अगले दिन बेटे को लेकर स्कूल के लिये सुबह निकलता है। रास्ते में हिंदुओं का गांव आता है और मुस्लिमों का गांव आता है तो वो आत्मसुरक्षा के लिये अलग अलग रंग के कागज के झंडे का इस्तेमाल करता है। हिन्दूओं के लिए गुलाबी और मुसलमानों के लिए हरा।

जब स्कूल पहुचता है तो अशरफ परेशान है कि जिस मकसद के लिये इतनी कठीनाई उठाकर स्कूल तक आए। वो तो पूरा ही नहीं होगा। दरअसल वे झंडा लाना भूल गया था। फिर पिता गुलाबी और हरे रंग के कागज की मदद से झंडा बनाकर बेटे को देता है, जब झंडा वाला दृश्य सामने आता है फिर दर्शक जान पाते हैं कि वास्तव में वह बच्चा 26 जनवरी के दिन स्कूल की परेड में शामिल होना चाहता था। हाथों में तिरंगा लेकर जन, गन, मन… गुनगुना चाहता था।

– निर्देशक सुनील पाल की शॉर्ट फिल्म रंग एक पिता और बेटे के जरिए इमोशन के ताने बाने के साथ बुनी हुई कहानी है, जो कम समय में आपको उस दुनिया में ले जाती है— जहां से बाहर निकल पाना आसान नहीं।

14 मिनट की फिल्म आज भगवा और हरे के बीच बंट चुके सामाजिक माहौल में उन्हीं दो रंगो को एक साथ लाकर तिरंगे में ढाल देने की बात करती है। ऐसी कहानियां आज के समय की जरूरत है, जिसके जरिए समाज में सौहार्द और एकता का अलख जगाकर दुनिया को और खूबसूरत बनाया जा सके।

हिंदू मुस्लिम दंगे के बीच एक बेटे और उसके पिता की घर से बाहर निकलकर स्कूल तक जाने की जद्दोजहद कहानी का मूल भाव है। निर्देशक सुनील पाल का काम वाकई काबिले तारीफ है।

फिल्म में पिता की भूमिका में अभिनेता मानवेंद्र त्रिपाठी ने किरदार की आत्मा को बड़ी खूबसूरती से पर्दे पर उकेर दिया है। भावनात्मक दृश्यों में चेहरे का भाव संप्रेषण मानवेंद्र के संजीदा अभिनय का प्रमाण देता है। बेटे की भूमिका में बाल कलाकार कामरान ने भी कमाल किया है। मां का किरदार अनुरेखा और हैदर की भूमिका रानू ने निभाई है।

फिल्म का एक और पक्ष जो तारीफ का हकदार है वह है इसका खूबसूरत सिनेमैटोग्राफी। डीओपी पीपीसी चक्रवर्ती ने कैमरे से शाम और सुबह के दृश्यों को अच्छा बनाया है। शॉट फिल्म की पटकथा जितेन्द्र नाथ जीतू की है।

नदी सिंदूरी, शहर और शहरी सभ्यता से दूर एक गोंड बहुल गाँव की कहानी है, जिसके अंदर कई सारी कहानियाँ हैं

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शिरीष खरे

‘नदी सिंदूरी’ शहर और शहरी सभ्यता से दूर एक गोंड बहुल गाँव की कहानी है, जिसके अंदर कई सारी कहानियाँ हैं। सिंदूरी मध्य-भारत की बड़ी नदी नर्मदा की सहायक नदी है, जिसके किनारे मदनपुर नाम का एक छोटा-सा गाँव बसा है। शहर भोपाल से करीब 200 किलोमीटर दूर मदनपुर सन् 1842 और 1857 के गोंड राजा ढेलन शाह के विद्रोह के कारण इतिहास के पन्नों में दर्ज है। लेकिन, ‘नदी सिंदूरी’ की कहानी अब दर्ज हुई है। ये संस्मरण, ये कथाएँ सिंदूरी के बीच फेंके गए पत्थर के कारण नदी के शांत जल की तरंगों जैसी हैं।

भोगवाद के शहरी नजरिए के चलते छोटी नदियों के किनारे की गाँव-संस्कृति उजाड़ दी गई है तब यह कहानी उस देहाती दुनिया में ले जाती है जहाँ नदी को देख रोया, गाया या हँसा जा सकता है, जहाँ नदी सिर्फ संसाधन नहीं है, न सिर्फ गाँव का भूगोल तय करती है, बल्कि एक समुदाय रचती है, जिसमें लोकरीति, लोकनीति, किस्से और कहावतों का ताना-बाना है, जो अब तार-तार हो रहा है। दरअसल, उदारीकरण के बाद गाँवों ने बड़े पैमाने पर पलायन का दंश झेला है और कई गाँवों की शक्ल बदल चुकी है तब बचपन से किशोरावस्था की एक स्मृति-यात्रा उस दौर से गुजरती है।

इस यात्रा में कल्लो नाम की एक गाय से जुड़ा मर्मस्पर्शी संस्मरण है तो आल्हा, राई, बंबुलिया जैसे लोक-गीत और रामलीला का स्थानीय संस्करण भी हैं। रामलीला के इसी स्थानीय संस्करण से एक ऐसी आह निकलती है जिसमें समान लिंग के प्रति आकर्षण, प्रेम और प्रेम-विरोधी मान्यताओं के प्रति विद्रोह है। नदी सिंदूरी में लोक-कलाकार, नर्तकी, चोर, ठग, साधु हैं, प्रगतिशील पुजारी, आदर्शवादी मास्साब, दलित विद्रोही युवक है, उजड्ड बस कंडक्टर, सैलून वाला, टेलर, सामंती, दलित महिला बस की मालकिन, पिछड़े वर्ग का नेता, नदी की बाढ़ में बहा गोताखोर और उसकी पत्नी और दर्जनों पात्र हैं, राजनीति, कस्बे आने-जाने वाली बसों के किस्से, कस्बाई आकर्षण है, कस्बाई दबंगई का विरोध और जातीय विरोधाभास भी है।

गाँव की महिलाएँ और कस्बे की एक लड़की है, चोरी-छिपे और सतह तक आईं गाँव की प्रेम-कहानियाँ हैं, साथ ही कस्बाई लड़की के लिए प्रेम से जुड़ी एक स्मृति है। कुल मिलाकर, सभी कहानियों में लड़ाइयों के समानांतर प्रेम एक स्थायी तत्व है, प्रेम नाम का यही स्थायी तत्व आखिर में सारी कहानियों को मिलाता है।
मदनपुर गाँव काफी हद तक उत्तर-मध्य हिन्दी-पट्टी के कई दूसरे भारतीय गाँवों की तरह है, लेकिन कहीं-कहीं उनसे भिन्न भी। एक हजार की आबादी का इतना छोटा गाँव जहाँ की दुनिया मशीनों से दूर ऐसी तासीर लिए हुए है, जिसमें जीवंतता और विविधता है। विद्रूपता और मानवीयता दोनों हैं। जातीय ताने-बाने में जर्जर हो रही पारंपरिक जड़ता है तो कुछ ऐसी ध्वनियाँ भी हैं जो लोगों को आपस में एक-दूसरे से बाँधती हैं।

अक्सर इतिहास और साहित्य में बड़ी नदियों और उन नदियों के तट पर विकसित नगरीय सभ्यता पर तो खूब चर्चा करते हैं, पर कहीं-न-कहीं किसी छोटी नदी और उसकी गोद में किसी गाँव की संस्कृति हाशिये पर ही छूट जाती है। ऐसे में ‘नदी सिंदूरी’ की गोद में आकार लेती मदनपुर जैसे एक गाँव की उपस्थिति परिधि में है।

भारत में गाँवों का दायरा बहुत व्यापक और विविधता लिए हुए है। सारे गाँव समान होते हुए भी एक-दूसरे से भिन्न हैं। इसलिए जब मैं साहित्य में ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़ा कुछ पढ़ता था तो यह लगता था कि एक गाँव का पूरा अंचल छूटा हुआ है। जब कभी मौका मिलेगा तो इस अंचल को साहित्य में जरूर दर्ज कराना चाहूँगा। इसी सोच से ये तेरह कहानियाँ निकली हैं।

‘राजपाल एंड संज़’ से प्रकाशित इस किताब की ये कहानियाँ वर्ष 1993-94 से शुरु होती हैं, जब गाँव के महज दो-एक मकानों में ही हिन्दी के अखबार आते थे, दोपहर बारह की भोपाल से आने वाली प्राइवेट खटारा बस से, जबकि इन कहानियों को लिखा गया है वर्ष 2022 में यानी व्हाट्सएप, ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के दौर में।

नब्बे के दशक में राजीव गांधी की हत्या, पिछड़ा वर्ग से जुड़े मुद्दों और गठबंधन की राजनीति के उदय से लेकर अयोध्या में विवादित ढांचे का विध्वंस तथा साम्प्रदायिक दंगे हुए। इसी दशक में नवीन आर्थिक नीतियों के जरिए उदारीकरण को बढ़ावा दिया गया। ऐसे में ‘नदी सिंदूरी’ अतीत से संवाद करके उसके छूटे सिरे पर खुद को जोड़ती है, जिस पर एक नया बाजार आकार ले चुका है और विकास ने कई छोटी नदियों को मार डाला है।

इन कहानियों को लिखने का विचार कोरोना महामारी के पहले लॉकडाउन के दौरान आया, जब लाखों की संख्या में उत्तर भारतीय प्रवासी मजदूर मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों से पैदल ही अपने गाँवों की ओर चल पड़े थे। घर वापसी की पीड़ादायक यात्राओं से जुड़ी मार्मिक तस्वीरों ने हर संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर कर रख दिया था। कई किसी तरह गाँव की सीमा तक पहुँचे भी थे तो उन्हें अछूत जान कर बाहर रोके रखा गया। कई तो रेल की पटरियों पर ही कट कर मर गए थे।

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रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दिन दीपावली मनाने के लिए उत्साह

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पांच सौ वर्षों के सतत संघर्ष और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकृत व दूषित मनोवृत्ति की राजनीति के कारण सर्दी,गर्मी व बरसात में भी फटे टेंट में सब प्रकार के कष्ट झेलने वाले प्रभु श्रीरामलला अब अपने दिव्य एवं भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित होने जा रहे हैं । जैसे जैसे प्राण प्रतिष्ठा की तिथि 22 जनवरी 2024 निकट आ रही है भारत के पूर्वी से पश्चिमी और उत्तर से दक्षिणी छोर तक समस्त सनातनी रामभक्तों का उत्साह भी बढ़ता जा रहा है। सभी प्रभु श्रीरामलला के आगमन के आनन्दोत्सव में डूबना चाह रहे हैं। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी विगत अयोध्या यात्रा में रामभक्तों के मन में भी धैर्य का भाव जगाना पड़ा । उन्होंने 30 दिसंबर को अयोध्या की भूमि से सम्पूर्ण भारत को संबोधित करते हुए कहा कि हम सभी ने अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर के लिए 500 वर्षों से भी अधिक समय से प्रतीक्षा की है और संघर्ष किया है और अब बस कुछ दिन ही और धैर्य रखना है।
इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2024 को अपने अपने घरों में राम ज्योति जलाने व दीपावली मनाने का आहवान भी किया ।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हर किसी की प्राण प्रतिष्ठा में सम्मिलित होने की इच्छा है लेकिन ऐसा संभव नहीं है । उन्होंने देश के सभी रामभक्तों से प्रार्थना की कि वे 22 जनवरी को विधि विधान से कार्यक्रम संपन्न हो जाने के बाद 23 जनवरी के बाद अपनी सुविधानुसार अयोध्या आयें। इससे पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भव्य रोड शो निकाला और अत्याधुनिक महर्षि वाल्मीकि एयरपोर्ट और अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन का उद्घाटन किया, उत्सव के वातावरण में वंदे भारत व अमृत भारत ट्रेनों को हरी झण्डी दिखाकर अयोध्या के विकास पथ का भव्य श्रीगणेश किया।

2014 के पूर्व भारत की धर्मप्राण जनता ने सपने में भी नहीं सोचा था कि अयोध्या में इतना दिव्य एवं भव्य मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा या फिर कोई प्रधानमंत्री अयोध्या को विश्व की सर्वश्रेष्ठ नगरी बनाने का कार्य करेगा क्योंकि एक समय था जब देश का कोई भी नेता अयोध्या का नाम तक लेने से हिचकता था। अब समय बदल चुका है और अयोध्या, काशी और मथुरा सहित सनातन के सभी आस्था केन्द्रों का व्यापक दृष्टिकोण से विकास हो रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर व महाराज विक्रमादित्य की छवि स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रही है क्योंकि इन दोनों ही महान विभूतियों ने हिंदू मंदिरों का जीर्णेद्धार करवाया था और प्रधानमंत्री मोदी भी उन्हीं का कार्य आगे बढ़ा रहे हैं। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व महाराज विक्रमादित्य ने रामनगरी को संवारा था उसके पश्चात् महारानी अहिल्याबाई होलकर ने और अब 1528 में बाबर के सेनापति के अयोध्या विध्वंस के बाद आधुनिक विक्रमादित्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों अयोध्या का कायाकल्प हो रहा है।

प्रधानमंत्री ने अपनी 30 दिसंबर की अयोध्या यात्रा में जनसभा को संबोधित करने से पूर्व 15 हजार 709 करोड़ रुपये की योजनाओें का लोकार्पण व शिलान्यास किया। जिसमें महर्षि वाल्मीकि एयरपोर्ट व व अयोध्या धाम जंक्शन तो था ही, रामपथ-भक्तिपथ-धर्मपथ के लिए भी विभिन्न योजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास भी था । जिसके अंतर्गत जौनपुर- अयोध्या- बाराबंकी रेलवे लाइन का दोहरीकरण, 200 किमी लम्बी रेल लाइन का विद्युतीकरण, महर्षि दशरथ मेडिकल कालेज, अयोध्या रेलवे स्टेशन का प्रथम फेज, एनएच 27 बाईपास से रामजन्मभूमि हाइवे ,74.25 किमी लम्बा बड़ी बुआ रेलवे ब्रिज शामिल है। इसके अतिरिक्त ग्रीन फील्ड टाउनशिप की विभिन्न योजनाओं सहित अन्य जिलों से सम्बंधित विभिन्न योजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 वंदे भारत व दो अमृत भारत ट्रेनों के संचालन को हरी झंडी दिखाकर एक इतिहास ही रच दिया है।
प्रधानमंत्री ने जिस एयरपोर्ट व रेलवे स्टेशन का उद्घाटन किया है वह भी बाहर से मंदिर और अंदर से भव्यता का पर्याय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी अयोध्या यात्रा के माध्यम से धर्मपथ से होते हुए राजपथ को थाम लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चिरपरिचित अंदाज में सरकारी योजनाओ की एक लाभार्थी मीरा मांझी के घर पहुंच गये और उनके परिजनों का हालचाल पूछा साथ ही मीरा के हाथो बनाई चाय को पीकर सभी को अचंभित कर दिया। मीरा उज्जवला योजना की दस करोड़वीं लाभार्थी होने के साथ एक निषाद परिवार से हैं । यहाँ प्रधानमंत्री ने पीडीए की राजनीति करने का दावा करने वाले सभी राजनैतिक दलों को साफ संदेश दिया कि इस बार लोकसभा चुनावों में मंडल और कमंडल सभी हमारे साथ आने जा रहे हैं।प्रधानमंत्री अपने स्वभाव के अनुरूप बच्चों से भी मिले और उनका उत्साहवर्धन किया।

यह एक कटु सत्य है कि 2014 और फिर 2017 से पूर्व वर्तमान अयोध्या की कल्पना किसी ने भी नहीं की थी। हवाई अड्डा, इतना बड़ा और सुविधा संपन्न रेलवे स्टेशन, रामपथ-धर्मपथ-भक्तिपथ जैसे मार्ग कल्पनामात्र ही थे। सूर्यस्तंभ की तो किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। अब प्रधानमंत्री नरेंद मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ये सभी कल्पनाएँ साकार हो रही हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि आगामी दस वर्षों में अकेले अयोध्या में ही 80 हजार करोड़ से अधिक विकास कार्य संपन्न कराये जायेंगे।अयोध्या विश्व की सबसे विशाल सांस्कृतिक राजधानी बनने की ओर अग्रसर हो रही है। चार ऐतिहासिक प्रवेशद्वारों के संरक्षण एवं सुंदरीकरण योजना के मूर्तरूप लेने के बाद अयोध्या और भी अधिक शोभायमान हो जाएगी। सरयू नदी पर राम की पैड़ी से राजघाट तक राजघाट से भगवान श्रीराम के मंदिर तक श्रद्धालु भ्रमण पथ का सुदृढ़ीकरण एवं जीर्णोद्धार पूर्ण होने के बाद अयोध्या में श्रद्धालुओं की राह और भी अधिक सुगम होगी अतः इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि 22 जनवरी 2024 के बाद आने वाला समय अयोध्या का है, सनातन संस्कृति के उत्थान का है।

आज संपूर्ण विश्व के रामभक्त अयोध्या आकर प्रभु श्रीराम के दर्शन करने के लिए आतुर हो रहे हैं। सभी रामभक्त कम से कम एक बार वंदे भारत और अमृत भारत ट्रेनों में बैठकर प्रभु श्रीराम के दर्शन करने के लिए आना चाह रहे हैं। महर्षि वाल्मीकि एयरपोर्ट को देखने के लिए निकटवर्ती गोंडा, सुलतानपुर व अंबेडकरनगर लोग केवल एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन देखने के लिए भारी संख्या में अयोध्या पहुँच रहे हैं ओर सेल्फी का आनंद उठा रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि आगामी दिनों में एयरपोर्ट में अभी 10 लाख यात्री प्रतिवर्ष आयेंगे लेकिन जब यह पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाएगा तो यहां पर प्रतिवर्ष 60 लाख यात्री आयेंगे वहीं अयोध्या धाम का स्टेशन सपूंर्ण हो जाने के बाद प्रतिदिन 60 हजार यात्री आयेंगे। अब अयोध्या वैश्विक जगत में आध्यात्मिक नक्षत्र के रूप में उभरने जा रही है। यही कारण है कि आज सम्पूर्ण विश्व में जहां जहां सनातन हिंदू संस्कृति का परिपालन करने वाला एक भी रामभक्त उपस्थित है वह 22 जनवरी के शुभ मुहूर्त की उसी प्रकार से प्रतीक्षा कर रहे हैं जैसे कि प्रभु श्रीराम के भाई भरत ने श्री राम के वनवास से लौटने के लिए करी थी।अक्षत कलश यात्रा के प्रारम्भ होने के साथ ही अब उत्साह लगातार बढ़ता जा रहा है। चाय -पान की नुक्कड़ की दुकानों तक में 22 जनवरी की तैयारियों पर चर्चा हो रही है।

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