प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर विश्व भर के सनातनियों के लिए एक राष्ट्र मंदिर होगा

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पूज्य भगवान श्रीराम हमें सदैव ही मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में दिखाई देते रहे हैं। पूरे विश्व में भारतीय नागरिकों को प्रभु श्रीराम के वंशज के रूप में जानने के कारण, आज पूरे विश्व में हर भारतीय की यही पहचान भी बन पड़ी है। लगभग हर भारतीय न केवल “वसुधैव कुटुंबकम”, अर्थात इस धरा पर निवास करने वाला प्रत्येक प्राणी हमारा परिवार है, के सिद्धांत में विश्वास करता है बल्कि आज लगभग हर भारतीय बहुत बड़ी हद्द तक अपने धर्म सम्बंधी मर्यादाओं का पालन करते हुए भी दिखाई दे रहा है। भारत में भगवान श्रीराम धर्म एवं मर्यादाओं के पालन करने के मामले में मूर्तिमंत स्वरूप माने जाते हैं। इस प्रकार वे भारत की आत्मा है।

विशेष रूप से आज जब पूरे विश्व में आतंकवाद अपने पैर पसार रहा है एवं जब विकसित देशों में भौतिकवादी विकास सम्बंधी मॉडल के दुष्परिणाम, लगातार बढ़ रही मानसिक बीमारियों के रूप में दिखाई देने लगे हैं, ऐसे में पूरा विश्व ही आज भारत की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा है कि ऐसे माहौल में केवल भारतीय सनातन संस्कृति ही विश्व को आतंकवाद से मुक्ति दिलाने में सहायक होगी एवं भारतीय आध्यात्मवाद के सहारे मानसिक बीमारियों से मुक्ति भी सम्भव हो सकेगी। इसी कारण से आज विशेष रूप से विकसित देशों यथा, जापान, रूस, अमेरिका, दक्षिणी कोरीया, फ्रान्स, जर्मनी, ब्रिटेन, कनाडा, इंडोनेशिया आदि अन्य देशों की ऐसी कई महान हस्तियां हैं जो भारतीय सनातन धर्म की ओर रुचि लेकर, इसे अपनाने की ओर लगातार आगे बढ़ रही हैं।

भारत में सनातन धर्म का गौरवशाली इतिहास पूरे विश्व में सबसे पुराना माना जाता है। कहते हैं कि लगभग 14,000 विक्रम सम्वत् पूर्व भगवान नील वराह ने अवतार लिया था। नील वराह काल के बाद आदि वराह काल और फिर श्वेत वराह काल हुए। इस काल में भगवान वराह ने धरती पर से जल को हटाया और उसे इंसानों के रहने लायक बनाया था। उसके बाद ब्रह्मा ने इंसानों की जाति का विस्तार किया और शिव ने सम्पूर्ण धरती पर धर्म और न्याय का राज्य कायम किया। सभ्यता की शुरुआत यहीं से मानी जाती है। सनातन धर्म की यह कहानी वराह कल्प से ही शुरू होती है। जबकि इससे पहले का इतिहास भी भारतीय पुराणों में दर्ज है जिसे मुख्य 5 कल्पों के माध्यम से बताया गया है। यदि भारत के इतने प्राचीन एवं महान सनातन धर्म के इतिहास पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि हिन्दू सनातन संस्कृति एवं सनातन वैदिक ज्ञान वैश्विक आधुनिक विज्ञान का आधार रहा है। इसे कई उदाहरणों के माध्यम से, हिन्दू मान्यताओं एवं धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हुए, समय समय पर सिद्ध किया जा चुका है। सनातन वैदिक ज्ञान इतना विकसित था, जिसके मूल का उपयोग कर आज के आधुनिक विज्ञान के नाम पर पश्चिमी देशों द्वारा वैश्विक स्तर पर फैलाया गया है। दरअसल, सैकड़ों सालों के आक्रमणों और ग़ुलामी ने हमें सिर्फ राजनीतिक रूप से ही गुलाम नहीं बनाया गया था बल्कि मानसिक रूप से भी हम ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़े गए थे। अंग्रेजों के शासन ने हमें हमारी ही संस्कृति के प्रति हीन भावना से भर दिया था। जबकि हमारे ही ज्ञान का प्रयोग कर वे संसार भर में विजयी होते रहे और नाम कमाते रहे। अब जरूरत है कि हम अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर को जाने और इस पर गर्व करना भी सीखें।

इसी क्रम में पूरे विश्व में निवास कर रहे हिन्दू सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जिनके नाम से आज विश्व में भारत की पहचान होती है, का एक भव्य मंदिर भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में बनाया जाना शाश्वत प्रेरणा के साथ साथ एक आवश्यकता भी माना जाना चाहिए। चूंकि बाबर एवं मीर बाकी नामक आक्रांताओं ने भगवान श्रीराम के मंदिर का विध्वंस कर उस स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण कर लिया था अतः पुनः इस स्थान को मुक्त कराने हेतु प्रभु श्रीराम के भक्तों को 492 वर्षों तक लम्बा संघर्ष करना पड़ा है। अतीत के 76 संघर्षों में 4 लाख से अधिक रामभक्तों ने बलिदान दिया है एवं लगभग 36 वर्षों के सुसूत्र ऋंखलाबद्ध अभियानों के फलस्वरूप सम्पूर्ण समाज ने लिंग, जाति, वर्ग, भाषा, सम्प्रदाय, क्षेत्र आदि भेदों से ऊपर उठकर एकात्मभाव से श्रीराम मंदिर के लिए अप्रतिम त्याग और बलिदान किया है। अंततः उक्त बलिदानों के परिणामस्वरूप 9 नवम्बर 1989 को श्रीराम जन्मभूमि पर अनुसूचित समाज के बन्धु श्री कामेश्वर चौपाल ने पूज्य संतों की उपस्थिति में शिलान्यास सम्पन्न किया था। परंतु, प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर निर्माण करने हेतु जमीन के स्वामित्व सम्बंधी कानूनी लड़ाई अभी भी समाप्त नहीं हुई थी। इस प्रकार आस्था का यह विषय न्यायालयों की लम्बी प्रक्रिया (सत्र न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय तक) में भी फंस गया था। अंत में, पौराणिक-साक्ष्यों, पुरातात्विक-उत्खनन, राडार तरंगों की फोटो प्रणाली तथा एतिहासिक तथ्यों के आधार पर उच्चत्तम न्यायालय की 5 सदस्यीय पीठ ने 9 नवम्बर 2019 को सर्व सम्मति से एकमत होकर निर्णय देते हुए कहा “यह 14000 वर्गफीट भूमि श्रीराम लला की है।” इस प्रकार सत्य की प्रतिष्ठा हुई, तथ्यों और प्रमाणों के साथ श्रद्धा, आस्था और विश्वास की विजय हुई। तत्पश्चात, भारत सरकार ने 5 फरवरी 2020 को “श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र” नाम से न्यास का गठन कर अधिग्रहीत 70 एकड़ भूमि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र को सौंप दी। तदुपरांत 25 मार्च, 2020 को श्री राम लला तिरपाल के मन्दिर से अपने अस्थायी नवीन काष्ठ मंदिर में विराजमान हुए।

अंततः 5 अगस्त 2020 को सदियों के स्वप्न-संकल्प सिद्धि का वह अलौकिक मुहूर्त उपस्थित हुआ। जब पूज्य महंत नृत्य गोपाल दास जी सहित देश भर की विभिन्न आध्यात्मिक धाराओं के प्रतिनिधि पूज्य आचार्यों, संतो, एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूजनीय सर संघचालक डा0 मोहन भागवत जी के पावन सानिध्य में भारत के जनप्रिय एवं यशस्वी प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भूमि पूजन कर मंदिर निर्माण का सूत्रपात किया। इस शुभ मुहूर्त में देश के 3000 से भी अधिक पवित्र नदियों एवं तीर्थों का जल, विभिन्न जाति, जन जाति, श्रद्धा केंद्रों तथा बलिदानी कार सेवकों के घर से लायी गई रज (मिट्टी) ने सम्पूर्ण भारत वर्ष को आध्यात्मिक रूप से “भूमि पूजन” में उपस्थित कर दिया था। आज, प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर बनकर अब अपनी सम्पूर्णता की ओर तेजी से अग्रसर है और इस विशाल एवं भव्य मंदिर का शुभारम्भ भारत के यशस्वी प्रधान मंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी 22 जनवरी 2024 को परम पूज्य संत मंडल एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूजनीय सर संघचालक श्री मोहन जी भागवत के सानिध्य में करने जा रहे है।

भारत में पूज्य संतों ने यह आह्वान किया है कि श्रीराम जन्म भूमि में भव्य मंदिर बनने के साथ साथ जन जन के हृदय मंदिर में श्रीराम एवं उनके नीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा भी होनी चाहिए। श्रीराम 14 वर्षों तक नंगे पैर वन वन घूमें। समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। उन्होंने वंचित, उपेक्षित समझे जाने वाले लोगों को आत्मीयता से गले लगाया, अपनत्व की अनुभूति कराई, सभी से मित्रता की। जटायु को भी पिता का सम्मान दिया। नारी की उच्च गरिमा को पुनर्स्थापित किया। असुरों का विनाश कर आतंकवाद का समूल नाश किया। राम राज्य में परस्पर प्रेम, सद्भाव, मैत्री, करुणा, दया, ममता, समता, बंधुत्व, आरोग्य, त्रिविधताप विहीन, सर्वसमृद्धि पूर्ण जीवन सर्वत्र था। अतः हम सभी भारतीयों को मिलकर पुनः अपने दृढ़ संकल्प एवं सामूहिक पुरुषार्थ से पुनः एक बार ऐसा ही भारत बनाना है।

प्रभु श्रीराम की जन्म स्थली अयोध्या में केवल एक भव्य मंदिर बनाने की परिकल्पना नहीं की गई है बल्कि भव्य मंदिर के साथ साथ विशाल पुस्तकालय, संग्रहालय, अनुसंधान केंद्र, वेदपाठशाला, यज्ञशाला, सत्संग भवन, धर्मशाला, प्रदर्शनी, आदि को भी विकसित किया जा रहा है, ताकि आज की युवा पीढ़ी को प्रभु श्रीराम के काल पर अनुसंधान करने में आसानी हो। प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर को राष्ट्र मंदिर इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि यहां आने वाले हर व्यक्ति को यह मंदिर भारतीय सनातन संस्कृति की पहचान कराएगा। पूरे विश्व में यह मंदिर हिन्दू सनातन धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के लिए आस्था का केंद्र बनने जा रहा है अतः यहां पूरे विश्व से सैलानियों का लगातार आना बना रहेगा। यह मंदिर पूरे विश्व में हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए एक महत्वपूर्ण आस्था का केंद्र बनने के साथ साथ पर्यटन के एक विशेष केंद्र के रूप में भी विकसित होने जा रहा है, इसलिए प्रभु श्रीराम की कृपा से करोड़ों व्यक्तियों की मनोकामनाओं की पूर्ति के साथ साथ लाखों लोगों को रोजगार के अवसर भी प्रदत्त होंगे।

अपने आधारभूत अधिकारों के लिए आवाज उठाना छात्रों का संवैधानिक अधिकार, तानाशाह हो चला जेएनयू प्रशासन : अभाविप जेएनयू

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन ने हाल ही में छात्रों के लिए एक आचार संहिता जारी की है, जिसमें कुछ तानाशाह और वामपंथियों को सहयोग करने वाले नियम भी शामिल हैं । इस संहिता के कई प्रावधानों ने छात्रों के मौलिक अधिकारों जैसे अपने अधिकारों की मांग करते हुए धरना प्रदर्शन करने आदि पर प्रतिबन्ध एवं जुर्माना लगाया है। अभाविप इस आचार संहिता को छात्रों के मौलिक अधिकारों का हनन और अपनी संवैधानिक मांगों के लिए छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज को दबाने का प्रयास मानती है। इस नियमावली में यह भी कहा गया है की देश विरोधी नारे लगाने पर दस हजार रुपये का जुर्माना लगाया जायेगा, जिसपर अभाविप का मानना है की क्या दस हजार रुपये देकर इतने गंभीर आपराधिक कृत्य को जेएनयू प्रशासन माफ़ कर देगा, क्या इस राशि का भुगतान कर देशविरोधियों को देश के विरुद्ध नारे लगाने की स्वतंत्रता दे देगा जेएनयू प्रशासन? इस प्रकार की नियमावली जेएनयू प्रशासन और वामपंथियों के बीच साठगांठ का भी खुला संकेत देती है।

अभाविप का स्पष्ट मत है की है की छात्रों की संवैधानिक मांगों के साथ अपनी आवाज उठाना और प्रदर्शन करना छात्रों का मौलिक अधिकार है, इस प्रकार तानाशाही पूर्ण नियमावली लाने से उन्हें अपने अधिकारों के विषय में पक्ष रखने का उचित माध्यम नहीं मिलेगा। साथ ही अभाविप का मानना है की देश विरोधी नारे लगाने जैसे अत्यंत ही गंभीर अपराध की बहुत सामान्य बना देने का प्रयास जेएनयू प्रशासन द्वारा इस नियमावली के माध्यम से किया गया है जो जेएनयू प्रशासन वामपंथ के सांठ गांठ की भी दर्शाता है।

अभाविप जेएनयू के अध्यक्ष उमेश चन्द्र अजमीर का कहना है कि यह आचार संहिता छात्रों के हित में नहीं है। यह छात्रों के सकारात्मक और संवैधानिक अधिकारों एवं मांगों के लिए संगठित होने और अपनी आवाज उठाने से रोकता है जो की पूर्णतया असंवैधानिक है। साथ ही देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त व्यक्तियों पर गंभीर दंड नियमावली बनाने की आवश्यकता है जब की प्रशाशन ने इस देश की सुरक्षा से जुड़े अपराध को धन उगाही का साधन बना लिया है और इससे सामान्य अपराधों की श्रेणी में डाल है। अभाविप प्रशासन से आचार संहिता को वापस लेने की मांग करता है जो लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान नहीं करती और छात्रों के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय उसका हनन करती है।

वहीं इकाई मंत्री विकास पटेल का कहना है, “यह संहिता स्पष्ट रुप से यह दर्शाता है कि कैसे जेएनयू प्रशासन देशद्रोही नारा लगाने वाले छात्राें का समर्थन कर रही है। जहां पर देशद्रोही नारे लगाने पर छात्रों को यूनिवर्सिटी से बाहर कर देना चाहिए, एवं उनपर न्यायिक जांच करवानी चाहिए, वहीँ पर यह तानाशाह जेएनयू प्रशासन उनसे देशद्रोही नारे लगाने का शुल्क वसूल कर उन्हें माफ़ कर दे रही है और ऐसे अपराध दोबारा कर पाने की छूट दे रही है। अभाविप यह मांग करता है कि इस नियमावली को वापस लेते हुए सुधार करने चाहिए तथा देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों पर कठोर दंडात्मक प्रक्रिया के साथ न्यायिक मुकदमा दर्ज करने आदि के नियम जारी करने चाहियें।”

भाजपा ने मुख्यमंत्री चयन के माध्यम से हैरान किया तीनों राज्यों से मिले बड़े राजनैतिक संकेत

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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में तीन प्रमुख राज्यों में भाजपा को अप्रत्याशित विजय मिली। भाजपा ने ये चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में लड़ा था और राज्य में किसी भी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया था। विपक्ष के लिए ये भी हैरान करने वाली बात थी कि कई सांसदों को भी जिनमें कुछ तो मंत्री थे पार्टी ने विधानसभा का चुनाव लड़ने का आदेश दिया था। कई बड़े चेहरे जीते तो मुख्यमंत्री कौन होगा ? भाजपा की विजय के साथ ही मुख्य धारा और सोशल मीडिया के सूत्र अटकलें लगाने लगे। मुख्यमंत्री चयन की प्रक्रिया में देरी, राजस्थान में वसुंधरा के घर हलचल और मध्य प्रदेश में शिवराज जी की दिल्ली न जाने की घोषणा ने राजनैतिक विश्लेषकों और भविष्यवक्ताओं को काम पर लगा रखा था । मीडिया के सूत्र प्रतिदिन सुबह से शाम तक चार-पांच  नाम चलाते और पीछे करते रहते थे। इन्हीं अटकलों के बीच जब भाजपा ने तीनों प्रान्तों के लिए पर्यवेक्षकों की घोषणा की तो मीडिया उसमें भी कथा कहानी ढूँढने लगा किन्तु उनका भी कोई आधार नहीं था।

अब जब तीनों प्रान्तों के विधायक दलों की बैठक हो चुकी है और उनको नए मुख्यमंत्री तथा उप मुख्यमंत्रियों के नाम मिल चुके हैं मीडिया और विपक्ष दोनों ही हैरान खड़े हैं । ये नाम कहीं भी किसी भी चर्चा में दूर दूर तक नहीं आए थे। उनके विषय में बताने के लिए टी वी चैनल गूगल का सहारा ले रहे थे। विपक्षी खेमे हड़कंप मचा हुआ है कि बिना किसी गुटबाजी के भाजपा अपने नये चेहरे कैसे चुन रही है। सभी टीवी चैनलों पर कौन बनेगा मुख्यमंत्री पर तरह तरह के विष्लेषण चल रहे थे किंतु अब सभी विष्लेषक हैरान हो गये हैं और यह भी चर्चा करने लग गये हे कि वो लोग टी वी पर जिस  भी चेहरे को आगे कर देते हैं भाजपा में वह चेहरा पीछे छूट जाता है और फिर एकदम नया चेहरा सामने आ जाता है। अब देश के मीडिया जगत के बड़े नामों को यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि वर्तमान समय की भारतीय राजनीति में यदि कोई सबसे बड़ा चुनावी सर्वे करने वाला और राजनीतिक भविष्यावाणी करने कोई व्यक्ति है तो वह प्रधानंमत्रीं नरेंद्र मोदी ही हैं।बेहद विपरीत परिस्थितियों के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व व उनके धुआधांर प्रचार की बदौलत ही भाजपा की तीनों राज्यों में जोरदार वापसी हुई है।

छतीसगढ़: भारतीय जनता पार्टी ने सबसे पहले छत्तीसगढ़ में एक बड़े आदिवासी नेता विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाकर चौंकाया और फिर अरूण साव और विजय शर्मा को उपमुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा गया।  वहीं पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को विधानसभा अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव करके सभी प्रकार की अटकलों पर विराम लगा दिया गया ।आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली आदरणीय द्रौपदी मुर्मू जी को राष्ट्रपति बनाने का लाभ भाजपा को छत्तीसगढ़ में मिला और वहां की आदिवासी बहुल क्षेत्रों की अधिकांश सीटों पर भाजपा को विजयश्री प्राप्त हुई। सबसे बड़ी बात यह है कि आदिवासी बहुल राज्य छत्तीसगढ़ में राज्य का गठन हेने के बाद से एक आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग की जा रही थी जिसे अब भाजपा ने विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाकर पूरा कर दिया है।

 छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आदिवासी हैं और किसान परिवार से है। वह कुनकुरी विधानसभा सीट से जीते हैं वहीं वह 1999 से 2014 तक रायगढ़ लोकसभा सीट से सांसद भी रहे। वह पूर्व में प्रदेश  भाजपा अध्यक्ष भी रहे हैं । चुनाव प्रचार के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने जनता से अपील की थी कि आप साय को जितायें तो हम उन्हें बड़ा आदमी बना देंगें। अब साय मुख्यमंत्री  बन गये हैं।

यदि समग्र दृष्टि डाली जाये तो यह पता चलता है  कि बिना किसी चेहरे को आगे किये चुनाव लड़ रही भाजपा ने प्रचार के दौरान ही यह तय कर लिया था कि अगर सरकार बनती है वह राज्य की कमान किसे सौपेगी। साय का नाम भी किसी टीवी चैनल की डिबेट में नहीं चल रहा था। यहां पर भाजपा ने बिना किसी विशेष तैयारी के चुनाव लड़ा फिर भी शानदार विजय प्राप्त की और चुनावों  के बाद रमन सिंह जी के प्रभाव से मुक्ति भी पा ली है हालांकि भाजपा ने रमन सिंह जी को दरकिनार नहीं किया है और उन्हें विधानसभा अध्यक्ष जैसा पद देकर उनका सम्मान बनाए रखा है। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि साय का परिवार संघ से  जुड़ा रहा है । उनके पिता और दादा भी संघ के स्वयंसेवक रहे हैं तथा राम मंदिर आंदोलन के आरंभिक दिनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

मध्य प्रदेश – विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक विजय के बाद भारतीय जनता पार्टी ने भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के स्थान पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक  रहे उज्जैन दक्षिण के  विधायक डॉ मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर सभी को हैरान कर दिया है। मध्य प्रदेश में यह माना जा रहा था कि चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  को उनके परिश्रम का प्रतिफल दिया जा सकता है और संभवतः वे लोकसभा चुनावों तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे  किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ और मामा जी को एक नए चेहरे के लिए अपनी दावेदारी से पीछे हटना ही पड़ा। मध्य प्रदेश में विरोधी प्रचार करने में जुट गये थे कि भाजपा में गुटबाजी के कारण नेता चयन में देरी हो रही है  किंतु जब मोहन यादव के नाम का ऐलान हुआ तो सभी लोग हैरान रह गये। उत्तर प्रदेश और बिहार में यादव समाज के बड़े नेता परेशान हैं  कि अब आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा एक यादव मुख्यमंत्री के सहारे अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने जा रही है। मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं जिसमें पहला यह है  कि अब मध्य प्रदेश में बीजेपी को एक नया चेहरा मिल चुका है विगत चुनावों के दौरान कांग्रेस मामा जी पर भ्रष्टाचार व घोटालों के आरोप लगा रही थी और चुनाव प्रचार के दौरान 40 प्रतिशत कमीशन खाने वाली सरकार कहकर बीजेपी को घेरने का प्रयास कर रही थी अतःअब ऐसे सभी आरोपों से फिलहाल राहत मिल गयी है।

दूसरा भाजपा ने मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर उत्तर प्रदेश व बिहार के यादव मतदाताओं  को साधने का जोरदार प्रयास किया है। राजनैतिक विश्लेषकों  का अनुमान है कि मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाये जाने के कारण यूपी में सपा के लिए चुनौती बढ़ने जा रही है। यह बात समाजवादी नेता भी मान रहे हैं कि  यूपी, बिहार व हरियाणा के यादव मतदाताओं को लुभाने की रणनीति के तहत ही मोहन यादव को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया है। उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या 10- 12 प्रतिशत, बिहार में 14.26 प्रतिशत और हरियाणा में 10 प्रतिशत के आसपास है। अभी तक यूपी में अखिलेश यादव और बिहार मे लालू यादव ही अपने आपको यादवों का एकमात्र बड़ा नेता घोषित करते आ रहे थे किंतु अब भाजपा के पास भी एक यादव नेता है और वह है मोहन यादव। मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर व उनके साथ दो उपमुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने राज्य के मतदाताओं के बीच गजब की सोशल इंजीनियरिंग की है पिछली सरकार में जहां नरोत्तम मिश्रा ब्राह्मण चेहरा थे वहीं अब मोहन यादव की सरकार में राजेंद्र शुक्ल ब्राह्मण चेहरा बनकर उभरे हैं। वहीं जगदीश देवड़ा को उपमुख्यमंत्री बनाया गया जबकि पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मध्य प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष बनाये गये हैं।

मोहन यादव काफी पढ़े लिखे हैं और उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले से उनका सम्बंध है।  जब मोहन यादव के नाम की घोषणा हुई तब उनके ससुराल सुल्तानपुर में भी उत्सव मनाया गया। मोहन यादव प्रख्यात संत एवं रामघाट स्थित  सीताराम आश्रम के संस्थापक स्वामी आत्मानंददास  उर्फ  नेपाली बाबा के शिष्य  हैं। 2016 में उज्जैन महाकुंभ के दौरान नेपाली  बाबा ने मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनने का आशीर्वाद दिया था।

राजस्थान – लंबी बैठकों, मीडिया में महारानी की पार्टी तोड़ने की अफवाहों और तरह- तरह की अटकलों  के बाद राजस्थान को भी नया चेहरा मिल गया है और वहां भी महारानी वसुधंरा राजे का राज अब समाप्त हो चुका है। वहां पर एक ब्राह्मण चेहरे भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने सभी राजनैतिक पंडितों को बुरी तरह से चौंका दिया है और वे सब टीवी चैनलों पर बैठकर अपना सिर खुजला रहे हैं कि आखिर भजन लाल शर्मा जी का नाम कैसे दौड़ में आ गया, वे  पहली बार विधायक बने हैं और राज्य के मुख्यमंत्री बन गये। भजन लाल शर्मा जी के बारे में कहा जा रहा है कि वह संघ के करीबी हैं, चार बार महामंत्री रहे तथा संगठन में काफी सक्रिय रहे हैं। भजन लाल जी एक ब्राह्मण और नयी उर्जा से भरा चेहरा हैं । राजस्थान में करीब 12 प्रतिशत ब्राह्मण आबादी है जो संपूर्ण राज्य में फैली है । ब्राह्मण शांत मतदाता माना जाता है। राजस्थान की राजनीति में अभी तक केवल जाट, गुर्जर, दलित, मीणा आदि को लेकर ही चर्चाएं होती थीं किंतु अब भाजपा ने ब्राह्मण मुख्यमंत्री बनाकर सवर्ण समाज को संदेश दिया है क्योंकि उत्तर भारत की राजनीति में सवर्ण मतदाता भी अहम भूमिका निभाते हैं।राजस्थान में श्रीमती दिया कुमारी और प्रेमचंद बैरवा को उपमुख्यमंत्री बनाया है। वासुदेव देवनानी जो चार बार के विधायक रहे हैं उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाकर  राज्य के सिंधी और मारवाड़ी समाज को भी साधने का सफल प्रयास किया गया  है।

भाजपा ने तीनो ही राज्यों में एक नया चेहरा देकर दूसरी पीढ़ी के नेताओं को पार्टी की बागडोर सौंपने का  सामर्थ्य दिखाया है, इस पीढ़ी के नेता इसे बड़ा मन दिखाकर या फिर अनुशासनबद्ध होकर स्वीकार कर रहे हैं जो भाजपा की अगले कई चुनावों तक सत्ता में रहने की इच्छाशक्ति को दिखाता है । भाजपा ने यह भी बता दिया है जो भी कार्यकर्ता शांत रहकर समर्पण से कार्य करता रहता है संगठन उसका ध्यान रखता है और कोई भी साधारण से साधारण व्यक्ति ऊंचे पद पर बैठाया जा सकता है। संगठन में अब किसी भी स्तर पर गुटबाजी का दौर नहीं चलने दिया जाएगा । टीवी चैनलों पर या सोशल मीडिया के माध्यम से जो लोग अपना प्रचार कर रहे  थे वो  सभी लोग मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर कर दिए गए हैं । भाजपा ने जातिवाद की राजनीति को ध्वस्त करने के लिए जोरदार सोशल इंजीनियरिंग की है और विपक्ष हिंदू समाज को बांटने के लिए जातिगत जनगणना की जो रट लगाये था उस पर भी नियंत्रण करने का सफल प्रयास किया है। ये भाजपा के भविष्य की तैयारी है।

भारत और दक्षिण अफ्रीका का पहला टी20 मैच रद्द हो गया

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रविवार को लगातार बारिश के कारण डरबन में मेजबान दक्षिण अफ्रीका और टीम इंडिया के बीच शुरुआती टी20 मैच रद्द कर दिया गया।

तीन मैचों की श्रृंखला का पहला टी20 मैच भारतीय समयानुसार शाम 7:30 बजे शुरू होने वाला था, लेकिन टॉस अनिश्चित काल के लिए विलंबित हो गया और अंपायरों ने अंततः फैसला किया कि गीले तटीय शहर में खेल की कोई संभावना नहीं है।

यह मैच भारत के दक्षिण अफ्रीका के सभी प्रारूपों के दौरे पर पहला मैच था। अगला मैच मंगलवार को गकेबरहा में निर्धारित है, इसके बाद गुरुवार को जोहान्सबर्ग में अंतिम टी20 मैच होगा।

इन टी20 मुकाबलों के बाद, टीमें 17-21 दिसंबर तक तीन एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में प्रतिस्पर्धा करेंगी, जिसके बाद टेस्ट श्रृंखला होगी। पहला टेस्ट 26 दिसंबर को प्रिटोरिया में और दूसरा मैच 3 जनवरी को केपटाउन के न्यूलैंड्स में होगा।

 

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