हिमाचल की जीत के बाद भी कांग्रेस में मातम का सन्नाटा

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आशीष कुमार ‘अंशु’ 

आम आदमी पार्टी को अब राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलने वाला है। ऐसे में कांग्रेस को ही यह तय करना होगा कि उसे जमीन पर पहली लड़ाई किससे लड़नी है? भाजपा से या फिर आम आदमी पार्टी से

कांग्रेस के अंदर हिमाचल प्रदेश चुनाव परिणाम की सुखद खबर के बाद जहां देश भर के कार्यकर्ताओं में उत्साह दिखाई देना चाहिए। हर तरफ से कांग्रेस पार्टी के लिए आ रही बुरी खबर के बीच इस अच्छी खबर का स्वागत नहीं हो रहा।
यह हिमाचल के मतदाताओं के उस विश्वास का सम्मान नहीं है, जो उन्होंने कांग्रेस पर जताया है लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों से इस समय कांग्रेस की कुछ अलग ही तस्वीर सामने आ रही है। हिमाचल प्रदेश की बात की जाए तो वहां आधा दर्जन नेता मीडिया के माध्यम से अपनी-अपनी मुख्यमंत्री की दावेदारी पेश कर रहे हैं। जैसे देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के अंदर अब कोई अनुशासन बचा ही ना हो। बात सिर्फ हिमाचल प्रदेश की नहीं है। हिमाचल के साथ साथ कांग्रेस में गुजरात, राजस्थान, दिल्ली चारो तरफ घमासान मचा हुआ है।गुजरात में कांग्रेस पार्टी की हार के बाद पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष एवं नवनिर्वाचित वडगाम विधायक जिग्नेश मेवाणी के अनुसार कांग्रेस ने उनकी क्षमताओं का सही उपयोग नहीं किया। जब उनके जैसा चेहरा कांग्रेस के पास था, जिसमें सात करोड़ गुजरातियों की कल्पना को पकड़ने की क्षमता है, जो गुजरात के अंदर कांग्रेस का एक विश्वसनीयता चेहरा है, जो भाजपा विरोधी है और उसके अनुयायी अच्छी संख्या में हैं, तो कांग्रेस पार्टी ने उनसे राज्य भर में जनसभाओं को संबोधित क्यों नहीं कराया? मेवाणी की शिकायत है कि वे पूरे गुजरात में कांग्रेस के लिए जनसभा करना चाहते थे लेकिन पार्टी ने उनसे प्रचार का काम सही तरह से नहीं लिया।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जिग्नेश ने बयान देकर एक साथ दो तीर चलाए हैं। पहला गुजरात की हार से अपना पल्ला झाड़ लिया। इस बयान के बाद गुजरात हार के लिए जिग्नेश मेवाणी को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। दूसरा, इस बयान के माध्यम से उन्होंने अपनी आवाज 10 जनपथ तक पहुंचा दी  है।कहने के लिए चाहे मलिकार्जून खडगे को कांग्रेस में अध्यक्ष का पद दे दिया गया हो लेकिन यह बात कांग्रेस के लोग जानते हैं कि पार्टी से शिकायत हो या पार्टी में किसी नेता की तरक्की, यह सब 10 जनपथ से ही तय होता है। 10 जनपथ कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी का आवास है।हिमाचल में कांग्रेस ने बहुमत हासिल किया है। वहां सरकार बनाने की कवायद की जगह मुख्यमंत्री बनने की खींचतान शुरू हो गई है। दो नामों की लड़ाई में आधा दर्जन कांग्रेस के विजयी हुए नेता अपने लिए संभावना तलाशने में जुट गए हैं। हिमाचल में एक तरफ़ दिवंगत वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह हैं और दूसरी तरफ़ दूसरे ठाकुर नेता सुखविंदर सिंह सुक्खू हैं। इन दोनों के बीच प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए घमासान मचा है लेकिन इस बार असंतुष्ट नेताओं को लेकर कांग्रेस अतिरिक्त सतर्कता बरत रही है। उसके पास महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश का अनुभव है। जब 18 विधायकों के साथ सुक्खू ने अपना मोबाइल बंद कर लिया था। उनका संपर्क अचानक हिमाचल में कैम्प कर रहे कांग्रेस के बड़े नेता राजीव शुक्ला, भूपेश बघेल और भूपेन्द्र हुड्डा से कट गया। उसके बाद थोड़े समय के लिए कयासों का बाजार गर्म हो गया था। इतनी मुश्किल से एक हिमाचल प्रदेश में सरकार बन रही है। वहां भी कहीं विपक्ष ने सेंध लगा ली तो देश भर में बहुत कीरकीरी होगी। वैसे शाम तक सुक्खू लौट आए लेकिन सीएम के नाम पर कांग्रेस के तीन वरिष्ठ नेता वहां आम सहमति नहीं बना पाए। अब तय हुआ है कि मुख्यमंत्री का नाम दिल्ली से तय होगा। मतलब सीएम के नाम वाला लिफाफा अब 10 जनपथ में खुलेगा।कांग्रेस की घमासान यहां थमती नहीं बल्कि राजस्थान से जहां शांति के संकेत पहले आ चुके थे। वहां गुजरात चुनाव परिणाम के बाद फिर से एक बाद बयानबाजी का सिलसिला प्रारंभ हो गया। बयानबाजी होनी भी थी क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस को प्रदेश में 77 सीटें मिली थीं। उसका श्रेय राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हिस्से गया था। वे गुजरात में पार्टी की तरफ से सक्रिय थे। इस बार सीटें 77 से सीधे 17 पर आ गई हैं तो राजस्थान में कांग्रेस के अंदर अशोक गहलोत के प्रतिद्वन्दी समझे जाने वाले नेता सचिन पायलट की तरफ से इस हार पर एक बयान बनता था। गुजरात के नतीजों पर उनका बयान भी आया। परिणाम कांग्रेस पार्टी की उम्मीदों से बेहद कम हैं। उन्होंने कहा कि हमारा आँकड़ा बहुत नीचे चला गया है। वे इतना कहकर अपनी बात समाप्त कर देते तो इस बयान के राजनीतिक मायने इस तरह नहीं निकाले जाते लेकिन सचिन पायलट ने अपनी बात में यह भी जोड़ा कि ”हिमाचल प्रदेश के चुनावी नतीजे बताते हैं कि अगर कांग्रेस सही रणनीति, कैम्पेन और तरीक़े से अपनी बात रखें तो हम भाजपा को हर हाल में हरा सकते हैं।” गौरतलब है कि इस चुनाव में अशोक गहलोत के पास गुजरात के चुनाव का अभियान था और सचिन पायलट हिमाचल प्रदेश के चुनाव का प्रबंधन देख रहे थे। उसके बाद चुनाव परिणाम से संबंधित इस बयान के राजनीतिक मायने तो निकाले ही जाएंगे। वैसे गुजरात हार का सारा ठीकरा गुजरात के स्थानीय नेताओं के सिर पर फोड़ दिया गया है। वहां हुई हार के लिए दिल्ली के नेता नहीं बल्कि गुजरात के ही नेता जिम्मेवार हैं। ऐसा संदेश गुजरात कांग्रेस को जा चुका है। हार की इस जिम्मेवारी को लेने से गुजरात कांग्रेस के युवा नेता जिग्नेश मेवाणी ने इंकार भी कर दिया है।कांग्रेस की स्थिति दिल्ली में भी बिगड़ी है। दिल्ली प्रदेश के उपाध्यक्ष मेहदी, दो नवनिर्चाचित पार्षदों सबिला बेगम और नाजिया खातून के साथ आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए हैं।आने वाले समय में कांग्रेस को सबसे पहले यह तय करना है कि कांग्रेस को आने वाले समय में मैदान में किससे पहली लड़ाई लड़नी है, भारतीय जनता पार्टी से या उसकी जमीन पैरों के नीचे से खींचने वाली आम आदमी पार्टी से। कांग्रेस इस देश में अपने अस्तित्व की लड़ाई को लड़ रही है। जहां जहां कांग्रेस का पतन हुआ है, उसकी मिट्टी से ही आम आदमी पार्टी को खाद पानी मिला है। दिल्ली, पंजाब के बाद अब गुजरात का उदाहरण सामने है। आम आदमी पार्टी को अब राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलने वाला है। ऐसे में कांग्रेस को ही यह तय करना होगा कि उसे जमीन पर पहली लड़ाई किससे लड़नी है? भाजपा से या फिर आम आदमी पार्टी से।

विधानसभा चुनाव में मोदीमय हुआ गुजरात

डॉ. सौरभ मालवीय 

प्रधानमंत्री बनने के पश्चात उन्होंने ‘गुजरात मॉडल’ को पूरे देश में लागू करने का प्रयास किया, जिसे सराहा जा रहा है। विशेष बात यह भी है कि नरेंद्र मोदी को ईश्वर ने ऐसा विशेष गुण दिया है कि वह नकारात्मकता में भी सकारात्मक गुण खोज लेते हैं

गुजरात में भाजपा की प्रचंड विजय गुजरात की जनता की भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति अटूट विश्वास की जीत है। यह उनके प्रति जनता के असीम स्नेह की विजय है। गुजरात विधानसभ चुनाव में भाजपा की विजय ने यह सिद्ध कर दिया है कि जनता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात मॉडल पसंद आ रहा है। इसलिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का विजय रथ निरंतर आगे बढ़ रहा है।

गुजरात विधानसभा के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात की जनता से कहा था कि इस बार उनका रिकॉर्ड टूटना चाहिए। गुजरात की जनता ने उनकी बात का पूर्ण रूप से मान रखते हुए भाजपा को गुजरात के इतिहास का सबसे प्रचंड जनादेश देकर नया इतिहास रच दिया। गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 182 में से 156 सीटों पर विजय प्राप्त की है। पिछले विधानसभा चुनाव में गुजरात में भाजपा ने 99 सीटें प्राप्त की थीं, जबकि कांग्रेस ने 77 सीटें जीती थीं। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के पश्चात भी कांग्रेस गुजरात में कुछ विशेष नहीं कर पाई, अपितु हानि में ही रही। कांग्रेस अब 77 से केवल 17 सीटों पर सीमित होकर रह गई है। 

वर्ष 1995 से भाजपा ने गुजरात में किसी भी चुनाव में पराजय का मुंह नहीं देखा है। यह सब नरेंद्र मोदी के विराट व्यक्तित्व का ही चमत्कार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात से विशेष लगाव है। इसलिए उन्होंने 6 नवंबर से 2 दिसंबर तक गुजरात में 52 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रचार करके पार्टी प्रत्याशियों के लिए समर्थन मांगा था। इस दौरान उन्होंने 34 रैलियां तथा चार रोड शो किए थे। इन 52 सीटों में से भाजपा को 46 पर विजय प्राप्त हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ भूपेन्द्र पटेल, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सीआर पाटिल तथा विजय रूपाणी सहित अन्य पार्टी नेताओं ने भी भाजपा को विजयी बनाने के लिए दिन-रात कड़ा परिश्रम किया।  

 गुजरात नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है। उन्होंने गुजरात से ही अपना राजनीतिक जीवन प्रारम्भ किया था। उन्होंने पार्टी संगठन को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। परिणामस्वरूप गुजरात के गठन के पश्चात से प्रथम बार भाजपा को अहमदाबाद नगरपालिका में बड़ी विजय प्राप्त हुई। गुजरात में निरंतर तीन वर्ष अकाल पड़ा। तत्कालीन सरकार पूर्ण रूप से असफल सिद्ध हुई। वर्ष 1987 में नरेंद्र मोदी ने न्याय यात्रा निकाली, जो गुजरात की 115 तहसीलों के लगभग 15 हजार ग्रामों में गई। इस यात्रा से पार्टी का जनाधार बढ़ा। इसके साथ ही नरेंद्र मोदी की ख्याति भी दिन प्रतिदन बढ़ने लगी। इस यात्रा की सफलता के पश्चात 1989 में उन्होंने लोक जनशक्ति यात्रा निकाली। इस यात्रा ने भी भाजपा का जनाधार बढ़ाने के साथ-साथ नरेंद्र मोदी को राजनीतिक रूप से मजबूत करने का कार्य किया।  

उन्होंने ऐतिहासिक रथयात्रा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने 11 दिसंबर 1990 से 26 जनवरी 1992 तक कन्याकुमारी से लाल चौक तक की एकता यात्रा भी निकाली। 1991 में उन्हें भाजपा राष्ट्रीय चुनाव समिति का सदस्य मनोनीत किया गया। दसवें लोकसभा चुनाव में भाजपा को गुजरात में 26 में से 20 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। इसे नरेंद्र मोदी का प्रभाव माना गया। 1995 में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को 182 में से 121 सीटों पर विजय प्राप्त हुई तथा 14 मार्च को केशुभाई पटेल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। नरेंद्र मोदी ने 28 सितंबर को प्रदेश भाजपा के महासचिव पद से त्यागपत्र दिया। इसके पश्चात 20 नवंबर को उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय सचिव मनोनीत किया गया। उन्हें जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ का प्रभारी बनाकर संगठन को मजबूत करने का दायित्व दिया गया। उन्होंने अपनी कुशलता का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। परिणामस्वरूप वर्ष 1998 में उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया। इसी वर्ष गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव का दायित्व नरेंद्र मोदी को दिया गया। उन्होंने पार्टी को सत्ता दिलाने के लिए कड़ा परिश्रम किया। राज्य में भाजपा सत्ता में आई तथा केशुभाई पटेल फिर से मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1999 में भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए की सरकार बनी। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें केशूभाई पटेल के स्थान पर गुजरात के मुख्यमंत्री पद का कार्यभार सौंपा। इस प्रकार वह 7 अक्टूबर 2001 को प्रथम बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने तथा 22 मई 2014 तक इस पद पर बने रहे। वह 24 फरवरी 2002 को राजकोट विधानसभा क्षेत्र से चुनाव में विजय प्राप्त कर विधायक बने। भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दिसंबर 2002 के विधानसभा चुनाव में 182 में से 128 सीटों पर विजय प्राप्त कर सत्ता में वापसी की। उन्होंने 22 दिसंबर को द्वितीय बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और विजय प्राप्त की। उन्होंने 25 दिसंबर को तृतीय बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और सत्ता संभाली। भाजपा ने वर्ष 2012 का विधानसभा चुनाव भी उनके नेतृत्व में लड़ा। भाजपा को 182 में से 115 प्राप्त हुईं। उन्होंने 26 दिसंबर को चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।      

उन्होंने गुजरात के विकास के लिए अनेक जन कल्याणकारी योजनाएं प्रारम्भ कीं। इनमें पंचामृत योजना, सुजलाम् सुफलाम, कृषि महोत्सव, चिरंजीवी योजना, मातृ वंदना, बेटी बचाओ, ज्योतिग्राम योजना, कर्मयोगी अभियान, कन्या कलावाणी योजना, बालभोग योजना, मोदी का वनबन्धु विकास कार्यक्रम आदि सम्मिलित हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात को विश्व भर से अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए, जिनमें आपत्ति व्यवस्थापन के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा सासाकाव पुरस्कार, कॉमनवेल्थ एसोसिएशन फॉर पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एंड मैनेजमेंट तथा यूनेस्को पुरस्कार आदि सम्मिलित हैं। उन्हें लोगों का स्नेह एवं आशीर्वाद प्राप्त हुआ। उन्होंने गुजरात में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए वर्ष 2003 में वाइब्रेंट गुजरात समिट कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इससे विश्वभर के निवेशों के लिए गुजरात में निवेश करने के द्वार खुले। वर्ष 2005 से गुजरात सरकार द्वारा प्रत्येक दो वर्ष पर वाइब्रेंट गुजरात समिट का आयोजन किया जाता है। नरेंद्र मोदी के गुजरात के पश्चात राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कुशलता का परिचय दिया। उन्हें 9 जून 2013 को भाजपा चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष मनोनीत किया गया। इसके पश्चात सितंबर में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 282 सीटें प्राप्त हुईं। इस प्रकार वह 26 मई 2014 को देश के प्रधानमंत्री बने। इसके पश्चात वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को 330 सीटें प्राप्त हुईं। वह 30 मई 2019 को लगातार द्वितीय बार प्रधानमंत्री बने। 

प्रधानमंत्री बनने के पश्चात उन्होंने ‘गुजरात मॉडल’ को पूरे देश में लागू करने का प्रयास किया, जिसे सराहा जा रहा है। विशेष बात यह भी है कि नरेंद्र मोदी को ईश्वर ने ऐसा विशेष गुण दिया है कि वह नकारात्मकता में भी सकारात्मक गुण खोज लेते हैं। मोरबी घटना के पश्चात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां का दौरा किया तथा पीड़ित परिजनों से भेंट कर उन्हें सांत्वना दी थी. इसके अतिरिक्त उन्होंने तुरंत कार्रवाई करने के लिए निर्देश दिए थे। विरोधी पार्टियों ने उनके विरुद्ध दुष्प्रचार किया तथा उन्हें अपशब्द कहे। इसके पश्चात भी उन्होंने संयम एवं धैर्य बनाए रखा, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि जनता ही उनके विरोधियों का इसका उत्तर देगी। वास्तव में जनता ने भाजपा को प्रचंड बहुमत देकर विरोधियों को उत्तर दे दिया।

वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी चुनाव को छोटा नहीं मानते। वह निकाय चुनाव, विधानसभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक में पूर्ण योजनाबद्ध तरीके से कार्य करते हैं। उनके  साथ राजनीति के चाणक्य अमित शाह भी हैं, जो पराजय को विजय में परिवर्तित करना जानते हैं। ये दोनों ही नेता बूथ स्तर पर पार्टी संगठन को सुदृढ़ बनाने पर कार्य करते हैं, जो इनकी विजय का मार्ग प्रशस्त करता है। अब भाजपा को लोकसभा चुनाव के लिए भी इसी प्रकार पूर्ण निष्ठा एवं लगन से कार्य करना होगा।  

(लेखक – राजनीतिक विश्लेषक एवं मीडिया प्राध्यापक हैं)

2022 : हालिया चुनाव नतीजे पर एक रिपोर्ट

अमित श्रीवास्तव 

विपक्ष में सभी पार्टियों को ज्ञात है कि राहुल गांधी का चेहरा हार की गारंटी है। अतः विपक्ष राहुल गांधी के साथ खड़ा न था और न होगा

हालिया आए चुनाव परिणाम भविष्य की राजनीति का सूचक है। इसे शब्द संरचना से  नहीं आंकड़ों व तथ्यों के आधार पर समझने का प्रयास करते हैं। 

हिमाचल जहाँ कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है वहां भाजपा ऒर कांग्रेस को मिले मतों का अंतर महज एक प्रतिशत से भी कम है। मात्र कुछ हजार का ही अंतर है। गुजरात में बंपर मत प्रतिशत के साथ भाजपा बड़ी पार्टी है।  कॉंग्रेस और आपा के मत प्रतिशत के कुल योग से भी भाजपा की स्थिति बढ़िया है। 

बिहार के कुढ़नी विधानसभा उप चुनाव में नीतीश -लालू के महागठबंधन को पटकनी देते हुए भाजपा अकेले जीत गई। महागठबंधन को ताकत माना जा रहा था किन्तु पहले लालू के घर गोपालगंज में और आज कुढ़नी की जीत बता रही है कि जनता की पहली पसंद है भाजपा। 

2024 के लिए कांग्रेस की राह मुश्किल

उत्तर प्रदेश उप चुनाव में मुलायम सिंह की मृत्यु उपरांत सेंटीमेंट वोट के साथ मैनपुरी में सपा की जीत हुई जो मुलायम का गढ़ रहा है जैसे बरेली कांग्रेस का। किंतु सपा का दूसरे किले रामपुर में भाजपा की जीत बड़ी तस्वीर प्रस्तुत करती है। जैसे भाजपा कांग्रेस के अभेध किले अमेठी को जीत कर राहुल गांधी को केरल भागने पर मजबूर कर दी थी रामपुर की जीत के मायने उससे कम भी नहीं है। 

दिल्ली में जहाँ भाजपा लगातार बढ़ती जा रही है वहीं आप के जीत के बाद भी 14% मत कम मिले हैं। 2015 विधानसभा चुनाव में जहाँ आम आदमी पार्टी दिल्ली में 54% वोट के साथ सत्ता में आई थी वहीं 2020 में आप को 52% वोट मिले थे जो इस नगर निगम चुनाव में घट कर 42% तक रह गई है वहीं भाजपा 2015 में मात्र 32% मत ही ले पाई थी जो इस नगर निगम चुनाव में 39% तक बढ़ गई है।  आम आदमी पार्टी को जहां 12% की हानि हुई है जबकि भाजपा को 7% का फायदा हुआ है। ये आंकड़े बताने में सक्षम है कि भाजपा की ताकत बढ़ रही है वहीं केजरीवाल के प्रति लोगों का विश्वास कम हो रहा है। 

 भाजपा का बढ़ना और केजरीवाल का गिरना अनवरत जारी है। जो ये बताने में स्पष्ट है कि भाजपा ही जनता की पहली पसंद है। राहुल गांधी पंजाब नहीं गए थे कांग्रेस जीत गई। हिमाचल नहीं गए पार्टी जीत गई। लोग गांधी परिवार से कितने नाराज है और राहुल गांधी को अक्षम व राजनीति के लायक नहीं मानते फिर से साबित हो गया। उनकी चिरकालिक अनवरत विफलता का प्रमाण ये है कि भारत जोड़ों यात्रा की आधी अवधि बीत जाने के बाद  भारत जोड़ो यात्रा की असफलता का प्रमाण मिल गया इस कारण ही कांग्रेस अब  हाथ जोड़ो यात्रा करने जा रही है। 

अब 2024 के लिए कांग्रेस की राह कितनी मुश्किल है इसे समझें। विपक्ष में सभी पार्टियों को ज्ञात है कि राहुल गांधी का चेहरा हार की गारंटी है। अतः विपक्ष राहुल गांधी के साथ खड़ा न था और न होगा। 

और कॉंग्रेस में अघोषित राजतंत्र का असर है कि समर्थक और पार्टी नेहरू परिवार की दास थी, है और बनी रहेगी।  राहुल गांधी बार बार फूंके हुए कारतूस साबित हो रहे हैं और कॉंग्रेस के दास राहुल गांधी को नेता बता उनका बोझ माथे पर लादे घूम रहे हैं। 

वहीं इन चुनावों ने बता दिया कि मोदी को गाली देना जनता से दुश्मनी करना है। गुजरात में मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाली कांग्रेस की सफाई ऒर मोदी को गाली देने वाले आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री चेहरा इशुदान और अध्यक्ष गोपाल इटालिया की बुरी तरह से हार का अर्थ है जनता का प्यार मोदी को मिलता था, मिलता है और आगे भी मिलता रहेगा। 

उत्तर प्रदेश उपचुनाव  परिणाम के निहितार्थ, सभी दलों को मिला सन्देश  

मृत्युंजय दीक्षित 

उप्र में मैनपुरी लोकसभा व खतौली तथा रामपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव परिणाम आ चुके हैं । राजनीति के पंडित इनका विश्लेषण कर रहे हैं  जबकि राजनैतिक दल इनके आधार पर अपनी भविष्य की रणनीति का संकेत दे रहे हैं।मैनपुरी लोकसभा उचुपनाव में समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार और सपा मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद उपजी सहानुभूति के चलते  क्षेत्र के मतदाताओं का स्नेह प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है। मुजफ्फरनगर के खतौली सीट में  सपा -रालोद गठबंधन प्रत्याशी मदन भैया ने अपनी नई सोशल इंजीनियरिंग और  रालोद नेता जयंत चौधरी के  क्षेत्र में लगातार कैंप करने के कारण ये सीट भाजपा से  छीन ली है। रामपुर से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार आकाश सक्सेना चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं। भाजपा ने पहली बार यह सीट जीतकर  सपा के कद्दावर मुस्लिम नेता आजम खां की राजनैतिक जमीन को गहरा झटका दिया  है। 

उपचुनाव परिणामों  से सबसे बड़ा लाभ समाजवादी पार्टी के मनोबल को मिला है जबकि भारतीय जनता पार्टी को अब अति आत्मविश्वास से बचकर जनता के बीच रह कर काम करना पड़ेगा। यद्यपि समाजवादी पार्टी को मैनपुरी में  सफलता का स्वाद बहुत आसानी से नहीं मिला है जबकि वहां पर स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के प्रति सहानुभूति की लहर दौड़ रही थी। मैनपुरी में सपा प्रत्याशी डिंपल यादव को विजयी बनाने के लिए सम्पूर्ण यादव परिवार ने एकजुट होकर जोर लगाया और सपा नेता अखिलेश यादव ने घर- घर जाकर मतदाता सम्पर्क किया। मैनपुरी में यह पहली बार देखा गया कि सपा के पक्ष में हवा बह रही थी और सहानुभूति लहर के कारण उनकी जीत तय थी तब भी यह लोग चुनावों में मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए प्रशासन पर चुनावों में धांधली करने का आरोप लगा रहे थे। सपा मुखिया ने चाचा शिवपाल का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मंच पर ही सबके सामने उनके पैर छुए जिसका सकारात्मक प्रभाव  पड़ा। मैनपुरी का चुनाव जीतने के लिए सपा पर इतना अधिक दबाव था कि सपा मुखिया और चाचा शिवपाल यादव 20 दिनों तक मैनपुरी में डेरा डाले रहे। 

मैनपुरी में भाजपा प्रत्याशी रघुराज सिंह शाक्य भले ही मुकाबले में कहीं नजर नहीं आए लेकिन उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए एक मार्ग खोल दिया हैं।यहां पर चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने यादव बनाम अन्य का समीकरण बनाने का प्रयास किया है और अब भविष्य में भाजपा अपनी इसी रणनीति को आगे बढ़ाने का काम करेगी।

उपचुनाव परिणामों ने समाजादी पार्टी व रालोद गठबंधन को एक नई संजीवनी प्रदान करने का काम किया है।चाचा शिवपाल यादव की पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का सपा में विलय हो गया है और अब उनकी गाड़ी में सपा का झंडा फिर से लग गया है। 

माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी के नेताओं की इस एकजुटता व चुनाव में मिली संजीवनी का असर नगर निगम व निकाय चुनावें में भी देखने को मिल सकता है क्योंकि अब सपा परिवार में दूरियां समाप्त हो चुकी हैं जिसका असर सपा के बिखरे संगठन व कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा है। लेकिन यह भी सच है कि इन उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच सीधा मुकाबला था जबकि आगामी चुनावों में बसपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी सहित कई अन्य छोटे दल व उनका गठबंधन भी चुनावी मैदान में अपनी ताकत के साथ उतरेगा और कहीं न कहीं समाजवाद व उनकी एकजुटता को को सीधी टक्कर  देंगे।चुनावी मैदान में ओवैसी की पार्टी भी होगी और सभी दल मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति भी करेंगे। 

वहीं आगामी चुनावों में मुस्लिम बहुल रामपुर में मिली विजय को आधार बनाकर भाजपा पसमांदा मुसलमानों  के बीच अपनी पैठ और मजबूत बनाएगी।प्रदेश की राजनीति में चाचा शिवपाल की वास्तविक अहमियत का पता आने वाले निकाय  चुनावों में चल जाएगा। सपा के लिए अभी सबसे बड़ी समस्या 19 प्रतिशत मुसलमानों के बीच एक नया मुस्लिम चेहरा खोजने की भी रहेगी क्योंकि रामपुर में अब आजम खां की राजनीति का सूरज ढल चुका है। 

मुजफ्फरनगर की खतौली सीट पर भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी की पराजय भाजपा को परेशान करने वाली है।यहां पर दलित समाज, मुस्लिम, जाट मतदाता के मजबूत समीकरण ने भाजपा को हरा दिया।नोएडा के चर्चित त्यागी प्रकरण के कारण त्यागी समाज की नाराजगी का असर भी दिखाई दिया ।दलितों की आजाद समाज पार्टी ने भी रालोद प्रत्याशी मदन भैया को वोट देकर विजयी बना दिया। 

रामपुर – रामपुर विधानसभा उपचुनाव में 71 सालों के बाद मुस्लिम  बहुल इलाके में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे के बल पर भाजपा प्रत्याशी आकाश सक्सेना चुनाव जीतने में कामयाब रहे। रामपुर में मात्र 33 फीसदी मतदान के बावजूद आकाश सक्सेना 34 हजार मतों से चुनाव जीतने में सफल रहे। रामपुर सीट जीतने के बाद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का मनोबल ऊंचा हुआ है। आने वाले समय में भाजपा रामपुर की रणनीति को नई धार देगी यह तय है।मुस्लिम बहुल सीट जीतकर भाजपा ने अब यह संकेत दे दिया है कि वह अब मुसलमानों के लिए अछूत नहीं रह गई है। रामपुर को अपना बनाकर भाजपा सबका साथ , सबका विकास, सबका प्रयास और सबका विश्वास  के मूलमंत्र को चरितार्थ करने का सन्देश भी देने में सफल रही है। 

रामपुर की सफलता भाजपा के लिए सबसे बड़ी इसलिए है क्योंकि यहां पर 22 साल से आजम खां के परिवार का कब्जा था 10 चुनावों  में आजम खां और एक बार उनकी पत्नी डॉ. तंजीन फात्मा विजयी रही हैं।वर्ष 2002 के बाद यह पहला अवसर था जब उनके परिवार से यहां पर कोई उम्मीदवार नहीं था। ।मैनपुरी व खतौली की पराजय के बाद जहां भाजपा  नई रणनीति पर काम करने जा रही है वहीं दूसरी ओर अब वह रामपुर की जीत को आधार बनाकर पसमांदा मुस्लिम समाज के बीच अपनी उपस्थिति को गहनता के साथ दर्ज कराने का अभियान प्रारंभ  करने जा रही है और मुस्लिम बहुल सीटों विशेषकर जहां पर पसमांदा मुस्लिम समाज की संख्या अधिक है व वहां पर कुछ मुस्लिम चेहरों  को भी मैदान में उतार सकती है। 

वैसे भी अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि आगामी निकाय चुनाव या 2024 के लोकसभा चुनावों पर अथवा  भविष्य की राजनीति पर क्या असर होगा, न ही इन उपचुनावों  के आधार पर 2024 की राजनीति और समीकरणों को लेकर कोई भविष्यवाणी की जा सकती है ।अतीत में गोरखपुर, फूलपुर,कैराना और नूरपुर सीटों पर भी उपचुनाव में हार के बावजूद 2019 के लोकसभ चुनावों में भाजपा को बड़ी ऐतिहासिक सफलता मिली। 2024 में अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण भी पूरा हो चुका होगा और काशी में ज्ञानवापी विवाद पर कुछ स्थिति साफ हो चुकी होगी। 

इसमें संशय नहीं है कि उपचुनावों के परिणामों ने भाजपा को सावधान होने का संकेत अवश्य  दे दिया है। भाजपा को संगठन और सरकार के अंदर और बाहर हर तरह से सतर्क रहना  है। मैनपुरी में ही सपा मुखिया ने दोनो उपमुख्यमंत्रियों  से कहा था कि आप सौ विधायक लेकर आयें हम आपको मुख्यमंत्री बना देंगे।अब राजनीति के खाली समय में चाचा और भतीजा मिलकर योगी सरकार को गिराने की साजिशें तेज कर सकते हैं। भाजपा को जमीनी धरातल पर चाचा -भतीजा के षड्यंत्रों  से बचकर रहना होगा।

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