सम्पन्न हुआ संस्कार भारती का सदानीरा उत्सव -2022

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जलज अनुपम

इसके बाद भोजपुरी कथा पाठ का आयोजन ‘यायावरी वाया भोजपुरी’ की ओर से सुधीर कुमार मिश्र ने किया। जिसमें उन्होनें सर्वेश तिवारी श्रीमुख की कहानी ‘अंतिम प्रार्थना’ का पाठ किया। जिसका भोजपुरी अनुवाद अनुराग रंजन ने किया था। इस भावुक प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया और सारे लोग अपनी आंखें पोंछते दिखे

इसके बाद भोजपुरी कथा पाठ का आयोजन ‘यायावरी वाया भोजपुरी’ की ओर से सुधीर कुमार मिश्र ने किया। जिसमें उन्होनें सर्वेश तिवारी श्रीमुख की कहानी ‘अंतिम प्रार्थना’ का पाठ किया। जिसका भोजपुरी अनुवाद अनुराग रंजन ने किया था। इस भावुक प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया और सारे लोग अपनी आंखें पोंछते दिखे।

संस्कार भारती, बिहार द्वारा आयोजित सदानीरा उत्सव-2022, 26 मार्च को गोपालगंज के करवतही गाँव में सम्पन्न हो गया। ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय हित का चिंतन और मनन करने वाले लोगों का यह समूह वेद वाक्य ‘उप सर्प मातरं भूमिम्।’ अर्थात जैसे भी हो मातृभूमि की सेवा कर का भाव रखकर कार्य करता है।

गोपालगंज, बिहार के जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर करवतही गाँव जहाँ दस वर्ष पहले तक गूँजती थी गोलियों की गड़गड़ाहट वहाँ पर सदानीरा उत्सव का सम्पन्न होना और उसमें लेखन के समक्ष चुनौतीयाँ और हिन्दू इकोसिस्टम के बहाने बदलती तस्वीर जैसे विषयों पर विमर्श का होना इसको विशिष्ट बनाता है। प्रो. अरुण भगत जैसे बुद्धिजीवी लोगों के साथ महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश और बिहार के अनेक जिलों से युवा राष्ट्रवादी लेखकों के साथ साथ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और प्रयागराज विश्वविद्यालय से शोधार्थी युवा बच्चों की आयी भीड़ यह बताने के लिए काफी थी कि हिन्दुस्तान गाँवों तक पहुँचने लगा है।

सदानीरा उत्सव -2022 के स्मारिका का लोकार्पण

इस मौके पर साहित्य अकादमी समेत देश के अनेक बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य प्रो अरुण कुमार भगत, गोपालगंज के विधान पार्षद श्री आदित्य नारायण पाण्डेय, पूर्व विधायक मिथिलेश तिवारी, पूर्व प्रमुख श्री रवि प्रकाश मणि त्रिपाठी, संस्कार भारती के संगठन मंत्री श्री वेद प्रकाश, प्रान्त मंत्री दिवाकर राय,अनिल कुमार मिश्रा, जिला पार्षद ओमप्रकाश सिंह और संस्कार भारती गोपालगंज ईकाई के अध्यक्ष सर्वेश तिवारी श्रीमुख उद्घाटन सत्र में शामिल हुए। प्रो. अरुण कुमार ने बोलते हुए कहा कि साहित्य संवेदना के धरातल पर पुष्पित, पल्लवित और फलित होता है, हमें अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए सबसे पहले मानवीय संवेदना की रक्षा करनी होगी।” ऐसे आयोजन समाज को सशक्त और समृद्ध करने की दिशा में कदम‌ होते हैं। सर्वेश तिवारी श्रीमुख ने कहा कि हम सभी इसके लिए प्रयासरत हैं कि सिर्फ एक समूह और विचारधारा का कब्जा साहित्य और कला जगत में न हो! गाँव से गाँव लिखना ही सुखद है।कार्यक्रम का सन्चालन चंपारण के प्रसिद्ध युवा साहित्यकार जलज कुमार अनुपम ने किया।

उद्घाटन सत्र के बाद मंच से हिन्दी के उभरते युवा लेखक कृपा शंकर मिश्र की बेस्टसेलर हॉरर उपन्यास ‘मधुबाला’ के दूसरे संस्करण, सूर्यांश द्विवेदी ‘मिहिर’ के आने वाले उपन्यास “कैम्पस वाला प्यार” का आवरण पृष्ठ और उसके साथ सदानीरा उत्सव -2022 के स्मारिका का भी लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर पतरकी और बाला सेक्टर जैसे बेस्टसेलर उपन्यास के युवा लेखक आशीष त्रिपाठी को सदानीरा सम्मा‌न -2022 से सम्मानित किया गया!

साहित्य को शहरों के वातानुकूलित कमरों से निकाल कर खेतों की मेड़ तक ले जाने के उद्देश्य से प्रारम्भ हुए इस आयोजन में देश के अलग अलाग कोने से राष्ट्रवादी लेखक और कवि सम्मिलित हुए। कार्य्रकम के वैचारिक सत्र के दौरान ‘नए रचनाकारों के समक्ष चुनौतियाँ’ युवा साहित्यकार विकास कुमार, आशीष त्रिपाठी, अमृता प्रकाश ने अपने अपने विचार रखे इस सत्र में संचालक की भूमिका में सिद्धार्थ अरोड़ा ‘सहर’ रहे।

इसके बाद भोजपुरी कथा पाठ का आयोजन ‘यायावरी वाया भोजपुरी’ की ओर से सुधीर कुमार मिश्र ने किया। जिसमें उन्होनें सर्वेश तिवारी श्रीमुख की कहानी ‘अंतिम प्रार्थना’ का पाठ किया। जिसका भोजपुरी अनुवाद अनुराग रंजन ने किया था। इस भावुक प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया और सारे लोग अपनी आंखें पोंछते दिखे।

कार्यक्रम के अगले पड़ाव पर ‘हिन्दू इकोसिस्टम के बहाने हिन्दुस्तान की बदलती तस्वीर’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन हुआ जिसमें वक्ता के तौर पर जलज कुमार अनुपम और आनंद कुमार शामिल थे।

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें देर रात तक काव्यधारा बहती रही। मंच से कविताओं, गीतों का गायन होता रहा और मुग्ध श्रोता झूमते और वाह वाह करते रहे। कवि सम्मेलन का प्रारम्भ बस्ती, उत्तरप्रदेश की प्रसिद्ध कवयित्री शिवा त्रिपाठी सरस ने माता सरस्वती की वंदना “हे माँ विराजो कंठ में सूचि ज्ञान को विस्तार दो” से किया । उसके बाद प्रशान्त सौरभ ने संस्कृत में काव्यपाठ कर के मंच को ऊंचाई दी। प्रशांत ने संस्कृत और भोजपुरी मिला कर जो “नागेन्द्र हाराय त्रिलोचनाय…” का पाठ किया उसने लोगों को वाह वाह करने पर विवश कर दिया! उसके बाद अवध की धरती से आये वरिष्ठ कवि ज्ञान प्रकाश आकुल ने भगवान राम और भरत के भातृत्व पर छन्द पढ़कर कवि सम्मेलन को अगले स्तर पर पहुँचाया। गोरखपुर की धरती से आये संदीप सिंह श्रीनेत ने अपनी कविता “छोटा सा शहर हूँ मगर छोटा किरदार नही” पढ़कर खूब वाहवाही बटोरी। जिले के वरिष्ठ कवि संजय मिश्र संजय ने अपना प्रसिद्ध गजल ‘मैं समझता था कि वो किस्सा पुराना हो गया” पढ़ कर समा बांधा, तो बनारस से आये सुशांत शर्मा ने अपने खण्डकाव्य जटायु से “भक्त से नाता छूटे भगवान के, छूटे न भाई से भाई के नाता” सुना कर श्रोताओं को भाव विह्वल कर दिया। इनके अतिरिक्त छपरा के कवि निर्भय नीर, दिल्ली से आये नित्यानन्द नीरव, बलिया से आये अशोक तिवारी और आलोक पाण्डेय और जिले के कवि सत्यप्रकाश शुक्ल ने अपनी कविताओं से लोगों को झुमाया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता गोपालगंज जिले के वरिष्ठ कवि सुभाष संगीत ने की और इस सत्र का मंच संचालन संजय मिश्रा संजय ने किया।

सम्मानित हुए हरियाणा के वीरेंद्र देव शर्मा

मीडिया स्कैन संवाददाता

करनाल हरियाणा में द मिराज डा मंगलसैन आडिटोरियम में देव मानव सेवा ट्रस्ट के ट्रस्टी वीरेंद्र देव शर्मा (देव) को समाजसेवा के लिए द ग्रेट खली के द्वारा नैशनल डायमंड अवार्ड से सम्मानित किया गया।

वीरेंद्र देव शर्मा समाजसेवा के लिए हुए द ग्रेट खली के हाथों सम्मानित

समाजसेवा, पर्यावरण, गरीब लड़कियों के सामूहिक विवाह,झुगी बस्तीयों में भोजन व वस्त्र वितरण, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कटिंग, टेलरिंग, फैशन डिजाइनिंग व ब्यूटी पार्लर की ट्रेनिंग व रोजगार उपलब्ध करवाने व लॉक डाउन के समय 2460 परिवारो को सूखा राशन वितरण, महिलाओं व लड़कियों के लिए मुफ्त आत्मरक्षा कैम्प आयोजन आदि कार्यों को देखते हुए, उन्हें नैशनल डायमंड अवार्ड से सम्मानित किया गया।

कुल 51 लोगों को सम्मान दिया गया। इस अवार्ड सेरेमनी के आयोजक सतीश राणा ने वीरेंद्र देव शर्मा को अवार्ड के लिए नामांकित किया।

हिजाब प्रकरण : अलग दिखने की जिद क्यों 

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डॉ. सौरभ मालवीय

मंगलवार को कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज कर दिए जाने के पश्चात यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है

भारत एक लोकतांत्रिक देश है. यहां सभी धर्मों और संप्रदायों के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं. सभी को अपने-अपने धर्म के अनुसार धार्मिक कार्य करने एवं जीवन यापन करने का अधिकार प्राप्त है. परन्तु कुछ अलगाववादी शक्तियों के कारण देश में किसी न किसी बात को लेकर प्राय: विवाद होते रहते हैं. इन विवादों के कारण जहां शान्ति का वातावरण अशांत हो जाता है, वहीं लोगों में मनमुटाव भी बढ़ जाता है. ताजा उदाहरण है हिजाब प्रकरण. कर्नाटक के उडुपी से प्रारंभ हुआ हिजाब प्रकरण थमने का नाम ही नहीं ले रहा है.

डॉ. सौरभ मालवीय

मंगलवार को कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज कर दिए जाने के पश्चात यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है. कर्नाटक उच्च न्यायालय का कहना है कि छात्रों को स्कूलों में हिजाब नहीं, यूनिफॉर्म पहननी होगी. न्यायालय का कहना है कि हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है. हिजाब मामले में राज्य के एडवोकेट जनरल प्रभुलिंग नवादगी ने कर्नाटक उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के सामने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं है और इसके उपयोग पर रोक लगाना संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन नहीं है। उन्होंने कहा कि हिजाब धर्म के पालन के अधिकार के अंतर्गत दिखावे का भाग है. पूर्ण पीठ में न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ऋतुराज अवस्थी, न्यायाधीश जेएम काजी एवं न्यायाधीश कृष्णा एम दीक्षित सम्मिलित हैं. एडवोकेट जनरल ने कहा कि सरकार का आदेश संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) का उल्लंघन भी नहीं करता. यह अनुच्छेद भारतीय नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है. उन्होंने यह भी कहा कि यूनिफॉर्म के बारे में सरकार का आदेश पूरी तरह शिक्षा के अधिकार कानून के अनुरूप है और इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है. उन्होंने कहा कि उडुपी के सरकारी प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज में यूनिफॉर्म का नियम वर्ष 2018 से लागू है, परन्तु समस्या तब प्रारंभ हुई जब विगत दिसंबर में कुछ छात्राओं ने प्राचार्य से हिजाब पहनकर कक्षा में जाने की अनुमति मांगी. इस पर उनके अभिभावकों को कॉलेज में बुलाया गया और यूनिफॉर्म लागू होने की बात कही गई, परन्तु छात्राएं नहीं मानीं और उन्होंने विरोध आरंभ कर दिया. जब मामला सरकार के संज्ञान में आया, तो उसने मामले को तूल न देने की अपील करते हुए एक उच्च स्तरीय समिति बनाने की बात कही. किन्तु छात्राओं पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ. जब मामला बढ़ गया, तो सरकार ने 5 फरवरी को आदेश देकर ऐसे किसी भी वस्त्र को पहनने से मना कर दिया, जिससे शांति, सौहार्द्र एवं कानून व्यवस्था प्रभावित हो रही हो.

विशेष बात यह भी है कि उच्च न्यायालय ने पर्दा प्रथा पर भीमराव आंबेडकर की टिप्पणी का भी का उल्लेख करते हुए कहा- “पर्दा, हिजाब जैसी चीजें किसी भी समुदाय में हों तो उस पर बहस हो सकती है। इससे महिलाओं की आजादी प्रभावित होती है। यह संविधान की उस भावना के विरुद्ध है, जो सभी को समान अवसर प्रदान करने, सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने और पॉजिटिव सेक्युलरिज्म की बात करती है।“

भारत में व्याप्त अनेक कुप्रथाओं ने महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा है. पर्दा प्रथा भी उनमें से एक है. इस प्रथा के कारण महिलाओं को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ा. उन्हें घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया गया. पुनर्जागरण के युग में समाज सुधारकों ने इन कुप्रथाओं के विरोध में जनजागरण आन्दोलन चलाया. इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले. समय के साथ-साथ समाज में परिवर्तन आया. हिन्दू व अन्य समुदायों के साथ-साथ मुसलमान भी अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने लगे, परन्तु उनका अनुपात अन्य समुदायों की तुलना में बहुत ही कम है, जो चिंता का विषय है. देश में सबको समान रूप से अधिकार दिए गए हैं. शिक्षण संस्थानों में भी सबके साथ समानता का व्यवहार किया जाता है. प्रश्न यह है कि कुछ लोग स्वयं को दूसरों से पृथक क्यों रखना चाहते हैं?   

वास्तव में हिजाब प्रकरण मुस्लिम समाज की लड़कियों को शिक्षा से दूर रखने का एक षड्यंत्र है. चूंकि शिक्षा ही मनुष्य को अज्ञानता के अंधकार से निकाल कर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती है, इसलिए रूढ़िवादी मानसिकता के लोग महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखने के लिए ऐसे षड्यंत्र रचते रहते हैं, ताकि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज न उठा सकें. मुस्लिम समाज में महिलाओं की जो स्थिति है, वह किसी से छिपी नहीं है. जब मुस्लिम बहन-बेटियों के हक में भाजपा सरकार ‘तीन तलाक’ पर रोक लगाने का कानून लाई थी, तो शिक्षित और जागरूक मुस्लिम महिलाओं ने इसका खुले दिल से स्वागत किया था. उस समय भी रूढ़िवादी लोगों ने जमकर इसका विरोध किया था, परन्तु उनकी एक न चली. इस कानून ने मुस्लिम महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने का कार्य किया. अब कोई भी व्यक्ति ‘तीन तलाक’ कहकर अपनी पत्नी को घर से नहीं निकाल सकता. ऐसा करने पर उसे दंड दिए जाने का प्रावधान है.

उल्लेखनीय है कि यूरोप के अनेक देशों ने हिजाब अर्थात बुर्का पहनने पर आंशिक या पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाया हुआ है, जिसमें ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड एवं स्विट्जरलैंड आदि सम्मिलित हैं। इटली और श्रीलंका में भी बुर्का पहनने पर प्रतिबंध है. इन सभी देशों में आदेश का उल्लंघन करने पर भारी आर्थिक दंड दिए जाने का प्रावधान है.

कुछ लोग हिजाब के मामले में कुरआन की दुहाई देते हुए कहते हैं कि इसमें कई स्थान पर हिजाब का उल्लेख किया गया है, परन्तु वे इस बात पर चुप्पी साध लेते हैं कि ड्रेस कोड के संदर्भ में ऐसा कुछ नहीं कहा गया. इस्लाम के पांच मूलभूत सिद्धांतों में भी हिजाब सम्मिलित नहीं है. वास्तव में धर्म का संबंध आस्था एवं विश्वास से होता है, जबकि वस्त्रों का संबंध क्षेत्र विशेष एवं आवश्यकताओं से होता है. उदाहरण के लिए किसी भी ठंडे स्थान पर रहने वाले लोग जो भारी भरकम गर्म वस्त्र पहनते हैं, वे किसी गर्म क्षेत्र में रहने वाले लोग नहीं पहन सकते. ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि भारत में कहीं भी हिजाब अथवा बुर्का पहनने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, परन्तु जिन संस्थानों में ड्रेस कोड लागू है, वहां हिजाब पहनने की जिद क्यों की जा रही है ?

अब तो सारा देश है मोदी

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कुमारी अन्नपूर्णा

पीसीएस की परीक्षा में सवाल आया, देश की पहली महिला मोदी का नाम बताएं? सीबीएसई बोर्ड में प्रश्न था, देश के पहले मोदी कौन थे? समाचार पत्रों में छपा, राहुल गांधी क्या कभी नहीं बन पाएंगे देश के ‘मोदी’। क्या केजरीवाल हो सकते हैं देश के अगले मोदी।

कुमारी अन्नपूर्णा

यह दिसम्बर 2039 की कोई दोपहर थी। मीडिया में उत्साह था कि नोएडा फिल्म सीटी में विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘एक थी कांग्रेस’ फिल्म के प्रीमियर पर महाराजजी मीडिया से मिलेंगे। मीडिया की शिकायत थी कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठने के बाद एक बार भी मीडिया से नहीं मिले। आज वे प्रेस से मिलने वाले थे। आज मीडिया के पास सवाल के लिए एक गर्मा-गर्म विषय भी था।  जिस पर विपक्ष लगातार हंगामा कर रहा था। वह संसद नहीं चलने दे रहा था।

हुआ यूं था कि महाराजजी ने लोकतंत्र की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठते ही उसका नाम ‘मोदी’ रख दिया। यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया। पूरे देश में एक बहस चली कि मोदी ने देश को इतना दिया, अब देश का उनके प्रति सम्मान समर्पित करने का समय है।

कुर्सी का नाम मोदी हो, यह सुझाव सोशल मीडिया की एक वेबसाइट पर अपलोड हुए एक वीडियो से आया। इस वीडियो को जिस हैंडल से शेयर किया गया था, उसका नाम हर्षवर्धन था। इस हैंडल को हर्षवर्धन टी नाम के एक पत्रकार चलाते हैं।

देखते ही देखते करोड़ो व्यूज और लाखों बार यह शेयर कर दिया गया। अखबार और चैनलों पर बहस प्रारंभ हो गई। उसके बाद ही महाराजजी ने रेफरेंडम कराने का निर्णय लिया। इस रेफरेंडम का आयडिया भी मुख्य विपक्षी पार्टी की तरफ से आया था। पार्टी के नेता ने अपने वेरिफाइड अकाउंट से लिखा — ”जनमत संग्रह कराना सबसे सही विकल्प होगा। यदि भारत की जनता ऐसा चाहती है तो हमें कोई एतराज नहीं है।”

यह संयोग था कि देश भर से जनमत संग्रह में आए मतों में अस्सी फीसदी लोगों का मानना था कि प्रधानमंत्री की कुर्सी का नाम मोदी रखना चाहिए। इससे उस कुर्सी पर बैठने वाले को हमेशा यह नाम कुर्सी की मर्यादा का ध्यान कराता रहेगा। वोटिंग में शामिल बीस फीसदी आबादी नहीं चाहती थी कि इस कुर्सी का नाम मोदी रखा जाए। उसे यह निर्णय लोकतंत्र पर खतरा नजर आ रहा था।

तबसे 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में दिए गए सोलहवें मोदी महाराजजी के बयानों की क्लिप मीडिया में छाई हुई है। सोशल मीडिया पर यही ट्रेंड कर रहा है, दूरदर्शी महाराजजी। कांग्रेस चाहकर भी इस समय विरोध की स्थिति में नहीं है। आम आदमी पार्टी के सुझाव पर रेफरेंडम हुआ। वह कुछ बोल नहीं पा रही। आदित्य ठाकरे और अभिषेक बनर्जी देश के अगले मोदी बनने के लिए संघर्ष में हैं। दोनों ने मिलकर दो साल पहले गोवा में सरकार बनाई है। वह भी इस बहस में उलझना नहीं चाहते। उन्हें लगता है कि जनभावनाओं का सम्मान करना ही सही राजनीति है। 

पीसीएस की परीक्षा में सवाल आया, देश की पहली महिला मोदी का नाम बताएं? सीबीएसई बोर्ड में प्रश्न था, देश के पहले मोदी कौन थे? समाचार पत्रों में छपा, राहुल गांधी क्या कभी नहीं बन पाएंगे देश के ‘मोदी’। क्या केजरीवाल हो सकते हैं देश के अगले मोदी।

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार एंकर प्राइम टाइम में बता रहे हैं, केजरीवाल की पार्टी गर्त में जा रही है। यह पार्टी अन्ना आंदोलन से निकली है। उस आंदोलन का मैं भी हिस्सा हुआ करता था। आज यह पार्टी किस रास्ते पर जा रही है?

चैनल पर फूटेज चलती है, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता केजरीवाल का मुखौटा लगाकर नारा लगा रहे हैं— ”मैं भी मोदी, तू भी मोदी। अब तो सारा देश हैं मोदी।”

केजरीवाल की बाइट चलती है— हमारी पार्टी मानती है कि हमारी पार्टी से मोदी चुनने का मतलब एक ही है, देश का एक—एक नागरिक सत्ता में भागीदार होगा। एक—एक नागरिक मोदी होगा। पूरा देश मोदी होगा। यह बात मैं एक सौ पचास करोड़ भारतीयों की तरफ से कह रहा हूं।

रवीश कुमार एंकर आगे कहते हैं— ”ऐसे बयान देकर केजरीवाल क्या सोचते हैं कि वे रवीश का साथ पा लेंगे। ऐसे तो साथ नहीं पा सकेंगे। कांग्रेस की वापसी देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए बहुत जरूरी है। वैसे आप लोग टीवी देखना बंद क्यों नहीं कर रहे?”

अरविन्द केजरीवाल ने बरखा दत्त को इंटरव्यू देने से इंकार कर दिया है। उनके झारखंड वाले पंडितजी ने कहा है कि उनकी कृपा इसी इंटरव्यू में अटकी है। बरखा की जगह सुशांत सिन्हा को इंटरव्यू दो। कृपा आएगी।

द प्रिंट में शेखर गुप्ता का एक लेख छपा है, जिसमें वे लिख रहे हैं कि देश के वर्तमान मोदी महाराजजी अब वह महाराजजी नहीं रहे जो गोरखपुर के मठ में थे। उनमें बहुत परिवर्तन हुआ है। उनमें जिस तरह का संयम देखने को मिलता है, यकिन नहीं होता कि ये 40 साल पहले वाले महाराजजी हैं। लेकिन उप मोदी हिमंत बिस्वा सरमा के कई बयान ना सिर्फ आपत्तिजनक हैं, बल्कि देश को तोड़ने वाले हैं। ऐसा लगता नहीं कि यह पार्टी अटलजी की लीगेसी को संभाल पा रही है।

अब देखिए ना बीस साल गुजर गया, 2019 के चुनाव को। इतने सालों के बाद भी कुछ बदला क्या? यह बंद आंखों का नहीं बल्कि खुली आंख का सपना है। सबकुछ साफ—साफ दिख रहा है। कुछ बदला क्या?

 (उंगलबाज.कॉम, हमारी विश्वसनीयता संदिग्ध है)

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