जयपुर । देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ ही जेन – जी का छात्र आंदोलन समाप्त हो गया ! यह अलग बात और शोध का विषय है कि इस आंदोलन में कितने छात्रों ने भाग लिया ? हालांकि यह बात जरूर है कि *इस आंदोलन में आए युवाओं ने जिस प्रकार की भाषा और संस्कार का प्रदर्शन किया वो उनके शिक्षकों और परिजनों पर जरूर यह सवाल उठाता है कि इन युवाओं में शैक्षिक अनुशासन और पारिवारिक संस्कार कहाँ और किस मोड़ पर पीछे छूट गए ?* यह प्रश्न सरकारी शिक्षा व्यवस्था से भी पूछा ही जाना चाहिए कि क्या छात्रों को दी जाने वाली शिक्षा उनको जिम्मेदार और नैतिक नागरिक बनाने की दिशा में प्रेरित भी करती है ? यह आंदोलन अपने पीछे कुछ सवाल छोड़ गया है।
पहला सवाल तो सरकार के सामने ही है कि *देश में एक ऐसा युवा वर्ग भी है जिसके सामने जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। वह सोशल मीडिया में अपना भविष्य देख रहा है। सरकार द्वारा उस वर्ग को साधने के लिए चलाई गई नीतियाँ चाहे वो स्किल इंडिया हो या प्रधानमंत्री मुद्रा योजना क्या वो अपने उद्देश्य में सफल रही ?* इसी के साथ यह भी पूछा ही जाना चाहिए कि ऐसे युवाओं को साधने के लिए सरकार किस योजना पर काम कर रही है जिससे इनमें व्याप्त निराशा को आशा में बदला जा सके, क्योंकि *यह याद रखा ही जाना चाहिए कि ऐसे युवाओं की संख्या लगातार बढ़ती ही जाने वाली है। आज तो सरकार ने इनका आंदोलन खत्म करा दिया परंतु किसी ठोस निदान के अभाव उनको फिर आंदोलन करने के लिए प्रेरित ही करेगा।*
दूसरा सवाल जो *नई पीढ़ी के शिक्षकों और परिजनों को चुनौती दे रहा है, वो ये है कि क्या उनमें और बच्चों में संवादहीनता आ रही है ? क्या बच्चे अपनी बात अपने परिवार या शिक्षकों से नहीं कर पा रहे हैं ? क्या हमने उन्हें इस भीड़ में अकेला छोड़ दिया है ?* जहाँ वो अपने प्रश्नों और समस्याओं के लिए नितांत अपरिचित लोगों और सोशल मीडिया के बीच खड़ा है और वो इसको जैसा बताते हैं वो वैसा ही कर रहा है ?
तीसरा सवाल विशेष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों को चौंकाता ही होगा कि *बदलते और आगे बढ़ते भारत के इस नव युवा वर्ग के लिए नए कार्यक्रमों की रचना करना और उनको सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारा में जोड़ना कितना जरूरी काम है ! यह ऐसा वर्ग है जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विरोधी वामपंथी और अर्बन नक्सल विचार ने तेजी से अपनी पकड़ बनाई है।* जिसका प्रदर्शन पूरी दुनिया ने पिछले महीने जंतर मंतर पर देखा।
चौथा और अंतिम सवाल का जवाब निश्चित रूप से भाजपा को ही खोजना पड़ेगा कि क्या कारण है कि *देश का वंचित वर्ग हिंदू होने के बाद भी भाजपा के अस्तित्व विरोधी बहुसंख्य मुस्लिम समाज और धर्मांतरण में लिप्त ईसाई समाज के साथ लय मिला लेता है लेकिन वह भाजपा के साथ पूरे मन से खड़ा नहीं होता।* उनकी इसी कमजोरी का फायदा भाजपा विरोधी दलों को मिलता रहा है।
इन सबके अलावा एक सबक जो भारत विरोधी ताकतों के लिए है कि भारत को श्रीलंका, नेपाल या बांग्लादेश समझने की भूल उनके हर षड्यंत्र और सामरिक रणनीति को ही विफल करेगी। कुछ युवाओं के अराजक और उत्पाती हो जाने से या राजनेताओं की कुंठाओं को हवा दे देने से भारत को दबाया या झुकाया नहीं जा सकता।



