आपातकाल को याद रखना जरूरी है

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सुरेंद्र चतुर्वेदी, जयपुर

जयपुर : आज की रात जब यह लेख लिख रहा हूँ, तब याद आता है कि इक्यावन साल पहले आज ही की रात देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा कर लोकतंत्र को गंभीर रूप से घायल कर दिया था। *यह काम उस डरे हुए राजनेता का था जिसे बरसों बरस इतिहास में लौह महिला या आयरन लेडी के रूप में महिमा मंडित किया गया।*

लोकतंत्र में विरोध और समर्थन तो चलता ही रहता है लेकिन इंदिरा गांधी, जॉर्ज फर्नांडीज की अगुवाई में हुई रेलवे की हड़ताल और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे छात्र आंदोलन से उपजे असंतोष से सहमी हुई थी, उस पर राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्याधिपति जगमोहन लाल सिन्हा ने जब इंदिरा गांधी के 1971 में हुए निर्वाचन को अवैध घोषित करते हुए अगले छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक की सजा दे दी, तो इसका मतलब यह हुआ कि उनका 1976 का निर्वाचन भी निरस्त हो गया। इंदिरा गांधी ने इसे अपमान की तरह माना और देश को आपातकाल के अंधे कुएँ में धकेल दिया।

प्रश्न यह है कि अब जब आधी सदी बीत चुकी है तो क्या इस दुर्घटना को याद करना समीचीन होगा ? भारत जैसे विविध राजनीतिक विचारों, मान्यताओं, परंपराओं और व्यवहार जैसे सतरंगी देश में ऐसे कुत्सित विचारों और प्रयासों को हमेशा याद रखा जाना चाहिए, जिससे राजनीतिक दल और सत्ता हमेशा सावधान रहे कि भारत जैसे लोकतंत्र में जनमानस के प्रति दुर्भावनापूर्ण व्यवहार और आचरण को कभी माफ नहीं किया जाता और ना ही भूला जाता है।

तब से लेकर अब तक राजनीति बहुत बदल गई है। उस समय कांग्रेस ही एक मात्र राष्ट्रीय पार्टी थी जो निर्बाध रूप से सत्तासीन थी। यह सोचना भी मुश्किल था कि देश में कोई ऐसा दल या समूह सामने आएगा जो कांग्रेस के स्वामित्व को चुनौती देगा। जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा कहें या छात्र आंदोलन से उपजा अवसर कि ग़ैर कांग्रेसी सभी राजनीतिक अपनी विचारधारा को पीछे रखते हुए एक साथ आ गए और जनता पार्टी के रूप में एक कांग्रेस का विकल्प खड़ा करने की कोशिश की। *1977 में आपातकाल हटने के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी को सत्ता तो मिली लेकिन आपसी अविश्वास, संदेह और सत्ता के लालच ने जनता पार्टी के कुनबे को तिनके तिनके की तरह बिखेर दिया। यदि हम ध्यान से देखें तो पाएंगे कि जनता पार्टी का शासन भी कांगेसी संस्कारों से अलग नहीं था। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई कांग्रेस से ही निकले थे। उनकी प्राथमिकता इंदिरा गांधी को हटाने की थी ना कि कांग्रेस का विकल्प बनने की।* इसलिए वो जनता पार्टी को एक नहीं रख पाये और चरण सिंह ने उनका स्थान ले लिया। अंतत: 1980 में जनता पार्टी तिरोहित हो गई और कांग्रेस के राष्ट्रीय विकल्प की संभावना धुंधली पड़ गई।

तो उस आपातकाल ने दो बातें स्पष्ट की या सीख दी कि लोकतंत्र में जनभावनाओं का दमन एक ऐसा श्राप है जो दशकों बीत जाने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता और दूसरा आपसी अविश्वास, सत्ता का लालच और अहंकार किसी को भी सत्ता के केंद्र से बाहर फेंक सकता है। चाहे वो इंदिरा गांधी हों या मोरारजी देसाई !!

(लेखक

सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जयपुर से संबद्ध हैं)

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