प्रवीण जैन
दिल्ली । के बाद से इन 24 वर्षों में बहुत कुछ परिवर्तित हो गया है, भारत शासन ने इसी वर्ष प्रिंट मीडिया में सबसे पहले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी थी और एक प्रकार से हिन्दी समाचार पत्रों व हिन्दी के समाचार चैनलों में रोमन लिपि व अंग्रेजी शब्दावली को थोपने का शुभारंभ करने की अनुमति भी दी थी, यह वर्ष था जब समाचार-पत्रों से हिन्दी के देवनागरी अंकों को हकाला गया था क्योंकि रोमन व अंग्रेजी अंक सरल होते हैं और इसी वर्ष से समाचार-पत्रों के पृष्ठों पर रोमन और अंग्रेजी शब्दावली ने अपने चमक बिखेरना प्रारंभ कर दिया था।
2026 आते-आते देश के हर हिन्दी समाचार-पत्र में अंग्रेजी और रोमन लिपि का इतना अधिक प्रयोग किया जा रहा है कि उन्हें ‘हिन्दी समाचार-पत्र’ कहने में भी सही नहीं है। देश में अब एक भी हिन्दी समाचार-पत्र या हिन्दी समाचार चैनल नहीं बचा है, सबको हिंग्लिश निगल चुकी है और अब हिंग्लिश मीडिया देसी अंग्रेजी मीडिया में बदलने को आतुर हैं। देसी अंग्रेजी एक ऐसी भाषा है जिसकी वाक्य रचना तो हिन्दी व्याकरण से प्रेरित है पर आत्मा और शब्द अंग्रेजी और उर्दू के होते हैं जैसे कि बॉलीवुड की फिल्मों की भाषा, जो बिकती तो हिन्दी के नाम पर हैं परंतु 2 घंटे की फिल्म में हिन्दी के 20 शब्द भी हिन्दी के सुनाई नहीं पड़ते हैं इसीलिए कुछ लोग हिन्दी फिल्मोद्योग को उर्दूवुड के नाम से पुकारते हैं तो यह उचित ही है।
मैंने मूल रूप से यह लेख 2011 में लिखा था, तब केवल 2-3 बड़े समाचार समूह अंग्रेजी थोप रहे थे और कुछ पत्रकार व संपादक इसका विरोध कर रहे थे।
देशभर में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा ने गाँव-2 तक पैर पसार लिए हैं, भाषा माध्यम के स्कूल बंद हो गए, हिन्दी के प्रकाशनों के पाठक घट चुके हैं, फिल्मों और टीवी में अंग्रेजी का वर्चस्व पूरी तरह स्थापित हो गया। एक उदाहरण से समझिए, गूगल की सेवाओं में 2007 में ही हिन्दी का विकल्प आ गया था। तब गूगल की सेवाओं में नाम हिन्दी में रखे गए थे जैसे आज का गूगल मैप तब गूगल मानचित्र हुआ करता था, जीमेल में प्राथमिक, प्रचार, सामाजिक और नवीनतम जैसे विकल्प दिखाई देते थे, अब उन बेचारों ने भी उर्दूकरण व अंग्रेजीकरण की नकल प्रारंभ कर दी है।
मैंने 2010 से ही कई संपादकों व पत्रकारों से यह आग्रह किया गया कि अपने हिन्दी समाचार माध्यमों को अर्द्ध-अंग्रेजी का स्वरूप न दें, परन्तु इन माध्यमों के संचालकों को न तो अपने पाठकों से कोई सम्बन्ध है और न ही हिन्दी भाषा से। इनके लिए हिन्दी केवल धनार्जन का एक माध्यम है। अब समाचार पत्र केवल एक माल या कमोडिटी बन चुका है जिसे बेचकर लाभार्जित करना ही एकमात्र लक्ष्य है। 1826 में प्रारंभ हुई हिन्दी पत्रकारिता 2026 आते-2 अब हिंग्लिश पत्रकारिता में परिवर्तित हो जाएगी, किसी ने सोचा न था। अंग्रेजी व उर्दू शब्दावली का मैं विरोधी नहीं हूँ पर इनके शब्दों का हिन्दी में प्रयोग आटे में नमक की तरह आवश्यकता पड़ने पर ही होना चाहिए परंतु अब तो आटे की मात्रा कम और नमक की मात्रा बहुत अधिक हो चुकी है, क्या आप ऐसी कनक से बनी रोटी खा सकते हैं, उत्तर है नहीं।
उस समय मैंने कामना की थी कि यह निश्चित है कि आगामी समय में उन्हें अपनी त्रुटि का भान अवश्य होगा, क्योंकि सामान्य दर्शक और पाठक के लिए हिन्दी उनकी अपनी भाषा है, मातृभाषा है पर जब पूरे कुँए में ही भाँग पड़ी हो तो क्या आशा की जा सकती है।
कतिपय लोग हिन्दी को नष्ट करने में संलग्न हैं
आज विश्वभर के लोग हिन्दी के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। विश्व के कई विश्वविद्यालय, संस्थाएं और राजनेता हिन्दी के प्रति अपनी रुचि प्रदर्शित कर रहे हैं, परन्तु भारत के ही कतिपय लोग हिन्दी और भारत की संस्कृति का हनन करने में संलग्न हैं क्योंकि उनकी वैचारिक क्षमता कुंठित हो चुकी है। दूसरी ओर, इन समाचार माध्यमों के संचालक धनार्जन तो हिन्दी से करते हैं, परन्तु गुणगान अंग्रेजी का करते हैं।
हिन्दी को प्रोत्साहन देने अथवा इसके प्रयोग का विस्तार करने में इन्हें लज्जा का अनुभव होता है। इनके दृष्टिकोण में भारत के उच्च वर्ग (हाई सोसाइटी) में हिन्दी का कोई स्थान नहीं है, और ये सब हिन्दी की कमाई के बल पर उसी उच्च वर्ग का अभिन्न अंग बन चुके हैं। इसलिए बार-बार कुछ ‘नया’ करने के भ्रम में ये हिन्दी का पतन करने में लगे हुए हैं।
प्रारम्भ में देवनागरी के अंकों (१,२,३,४,५,६,७,८,९,०) को टीवी और मुद्रण से निष्कासित किया गया। दुर्भाग्यवश, ये अंक आज इतिहास का भाग बन चुके हैं। अब रोमन लिपि की घुसपैठ की बारी है, जो सुनियोजित ढंग से आरम्भ हो चुकी है, ताकि देवनागरी लिपि को भी धीरे-धीरे समाप्त किया जा सके। कई समाचार-पत्र और चैनल आज न तो पूरी तरह हिन्दी के रह गए हैं और न ही पूर्णतः अंग्रेजी के। इन्हें आप केवल एक ‘मिश्रित भाषा’ कह सकते हैं।
ऐसा करने वाले समाचार माध्यम अत्यंत गर्वित अनुभव करते हैं। उन्होंने अपने नए आदर्श वाक्य चुन लिए हैं जैसे- ‘नये ज़माने का अखबार’, ‘यंग इण्डिया-यंग न्यूज़पेपर’, ‘नेक्स्ट-ज़ेन न्यूज़पेपर’, ‘इण्डिया का नया टेस्ट’ इत्यादि। ऐसा प्रतीत होता है मानो हिन्दी का प्रयोग पिछड़ेपन का प्रतीक हो। यदि वे ऐसा ही मानते हैं, तो अपने हिन्दी माध्यमों को बंद क्यों नहीं कर देते? उनका सारा अहंकार समाप्त हो जाएगा, क्योंकि हम सभी भली-भांति जानते हैं कि हिन्दी मीडिया समूहों द्वारा प्रारम्भ किए गए अंग्रेजी माध्यमों की क्या स्थिति है।
वैधानिक दृष्टि से देखा जाए तो सरकारी नियामकों को इनके पंजीयन/लाइसेंस रद्द कर देने चाहिए, क्योंकि इन्होंने ये अनुज्ञप्तियां ‘हिन्दी भाषा’ के नाम पर प्राप्त की हैं। परन्तु इसके लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम पाठक और दर्शक इसके विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाएं और सम्बंधित सरकारी संस्था अथवा मंत्रालय के समक्ष अपनी शिकायत दृढ़ता से दर्ज करवाएं। कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि “इससे क्या अंतर पड़ता है? आधुनिकता के साथ चलें, भाषा अब कोई विषय नहीं है।”
यह विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए कि आज के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की शक्ति ‘हिन्दी’ के कारण ही है। भारत के कई बड़े समाचार चैनल और पत्रिकाएं हिन्दी के कारण ही अरबों की संपत्ति और ख्याति अर्जित कर सके हैं। परन्तु इन सबके उपरांत भी आधुनिकता और सरलता के नाम पर, प्रचलित हिन्दी शब्दों और लिपि को त्याग कर निर्बाध रूप से रोमन लिपि का प्रयोग किया जा रहा है।
हिन्दी के शब्दों का अवमूल्यन
हिन्दी में ‘न्यूज़’ के लिए एक अत्यंत सुन्दर शब्द है— ‘समाचार’, जिसका प्रयोग 2011 तक दूरदर्शन को छोड़कर किसी भी निजी चैनल पर वर्जित सा प्रतीत होता था और 2026 में तो दूरदर्शन ने भी समाचार शब्द पर रोक लगा दी है। इसी प्रकार सैकड़ों सुसंस्कृत हिन्दी शब्दों (यथा: समय, दर्शक, न्यायालय, उच्च शिक्षा, कारावास, असीमित, सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, विराम, अधिनियम, ज्वार-भाटा, मार्ग, विमानतल, वायुयान, मंत्री, विधायक, समिति, आयुक्त, न्यायाधीश, न्यायमूर्ति, भारतीय, अर्थदंड, विभाग, स्थानीय, हथकरघा, ग्रामीण, परिवहन, महान्यायवादी, अधिवक्ता, डाकघर, पता, सन्देश, अधिसूचना, प्रकरण, लेखा-परीक्षा, लेखक, महानगर, संवेदी सूचकांक, डिब्बाबंद खाद्यपदार्थ, उत्पाद, भागीदारी संस्था, संस्थान, बहुराष्ट्रीय, खुदरा, थोक, व्यापार, व्यवसाय, प्रयोगशाला, प्राथमिक शाला, परीक्षा-परिणाम, कार्यालय, पृष्ठ, मूल्य इत्यादि) को विलुप्त किया जा रहा है और उनके स्थान पर नवीन अंग्रेजी शब्द थोपे जा रहे हैं। मंत्रालयों, विभागों, शासकीय निगमों और संस्थाओं के नाम अब हिन्दी में नहीं बल्कि अंग्रेजी में ही लिखे जाते हैं।
क्या हम किसी अंग्रेजी चैनल पर हिन्दी शब्दों और देवनागरी लिपि के प्रयोग की कल्पना भी कर सकते हैं? कदापि नहीं। फिर हिन्दी समाचार चैनलों पर रोमन लिपि और अनावश्यक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग क्यों? क्या वास्तव में हिन्दी इतनी दुर्बल और दरिद्र है? नहीं, पूर्णतः नहीं।
हमारी भाषा विश्व की सर्वश्रेष्ठ और अंग्रेजी की तुलना में सहस्र गुना अधिक वैज्ञानिक भाषा है। आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी भाषी इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। आज की स्थिति को देखकर यह आशंका होती है कि भारत की हिन्दी भी फिजी की हिन्दी के समान कुछ ही वर्षों में मीडिया के कारण केवल रोमन में ही लिखी जाने लगेगी।
हिन्दी से आत्मीयता होने के कारण अत्यधिक पीड़ा और क्रोध उत्पन्न होता है। यह भय भी सताता है कि कहीं हिन्दी अंकों (१,२,३…) की भांति हमारी लिपि को भी निष्कासित न कर दिया जाए। यद्यपि आज हिन्दी अंक इतिहास बन चुके हैं, परन्तु तकनीकी जगत (जैसे गूगल) का धन्यवाद किया जाना चाहिए जिसने इन्हें डिजिटल रूप में पुनर्जीवित किया है।
हिन्दी संक्षेपाक्षरों की महत्ता और उपेक्षा
हिन्दी संक्षेपाक्षर (शब्द के लघु रूप) सदियों से प्रयोग में आते रहे हैं। मराठी भाषा में तो आज भी संक्षेपाक्षरों का प्रचुर प्रयोग किया जाता है और नए संक्षेपाक्षरों का निर्माण भी होता है। परन्तु आज का हिन्दी मीडिया इनसे बच रहा है और देवनागरी के स्थान पर रोमन लिपि का उपयोग कर रहा है। मीडिया हिन्दी लिपि एवं हिन्दी संक्षेपाक्षरों के प्रयोग को प्रगति में बाधक मानता है, जो पूर्णतः निराधार और भ्रामक है।
यह सत्य है कि बोलचाल की भाषा में हिन्दी संक्षेपाक्षरों की एक सीमा हो सकती है, परन्तु लेखन की भाषा में इनके प्रयोग को अवश्य प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। जब सरल हिन्दी संक्षेपाक्षर उपलब्ध हों अथवा निर्मित किए जा सकते हों, तो अंग्रेजी संक्षेपाक्षरों का प्रयोग सर्वथा अनुचित है।
नए और सरल हिन्दी संक्षेपाक्षरों का निर्माण कर उनका प्रचुर प्रयोग किया जाना चाहिए। यहाँ कुछ हिन्दी संक्षेपाक्षरों की सूची प्रस्तुत है। इनमें से अनेक पूर्व से ही प्रचलन में हैं, परन्तु उनके प्रसार की आवश्यकता है। प्रारम्भ में कुछ शब्द अटपटे प्रतीत हो सकते हैं, परन्तु जब हम एक विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के सैकड़ों जटिल शब्दों और व्याकरण को स्वीकार कर सकते हैं, तो अपनी मातृभाषा के संक्षेपाक्षरों को आत्मसात करने में केवल मानसिक दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है।
हिन्दी हमारी अपनी भाषा है, इसके विकास का उत्तरदायित्व हम सभी पर है, और इसमें मीडिया का उत्तरदायित्व सर्वोपरि है। हमारी मातृभाषा के ही पैरोकार उसे बाज़ारवाद के नाम पर दयनीय और हीन बना रहे हैं। यह समझना आवश्यक है कि हिन्दी का चैनल अथवा समाचार-पत्र हिन्दी में समाचार ग्रहण करने के लिए होता है, न कि अंग्रेजी के लिए। अंग्रेजी के लिए पर्याप्त विकल्प पूर्व से ही उपलब्ध हैं।
हिन्दीभाषी साथियों की ओर से मीडिया से विनम्र निवेदन:
१. हिन्दी चैनल, समाचार-पत्र, पत्रिका अथवा आधिकारिक वेबसाइट में अंग्रेजी के अनावश्यक शब्दों का प्रयोग पूर्णतः बंद होना चाहिए।
२. जहाँ अत्यंत आवश्यक हो, अंग्रेजी के शब्दों को केवल ‘देवनागरी’ लिपि में ही लिखा जाए, रोमन में कदापि नहीं।
३. सभी हिन्दी माध्यमों और आधिकारिक वेबसाइटों पर हिन्दी संक्षेपाक्षरों के प्रयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।



