दिल्ली । “मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित। चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।” कवि रामावतार त्यागी की ये अमर पंक्तियां प्रखर संपादक, राष्ट्रभक्त चिंतक और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के शिखर पुरुष माणिकचंद्र वाजपेयी उपाख्य ‘मामाजी’ के सम्पूर्ण जीवन दर्शन को यथार्थ रूप में अभिव्यक्त करती हैं। मामाजी ने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को राष्ट्र, समाज और भारतीय संस्कृति की सेवा में होम कर दिया। सादगी, बौद्धिक प्रामाणिकता और निश्छल आचरण के प्रतिमूर्ति मामाजी ने अपनी प्रखर लेखनी से हिन्दी पत्रकारिता के परिदृश्य में भारतीय मूल्यों, स्वाभिमान और राष्ट्रीय विचारधारा को दृढ़ता से प्रतिष्ठित किया।
मामाजी उन दुर्लभ विभूतियों में अग्रणी थे, जिन्होंने पत्रकारिता को व्यवसाय या आजीविका का साधन न मानकर सदैव राष्ट्रीय मिशन समझा। स्वतंत्रता के पश्चात जब देश में एक बड़ा बौद्धिक वर्ग छद्म धर्मनिरपेक्षता और तुष्टीकरण के प्रभाव में आकर भारतीयता के मूल स्रोतों की उपेक्षा कर रहा था, तब मामाजी ने समाज को वैचारिक भटकाव से उबारने का बीड़ा उठाया। उन्होंने आपातकाल, राष्ट्रीयता, कश्मीर समस्या, स्वदेशी, श्रीराम जन्मभूमि, सामाजिक समरसता, कन्वर्जन, शिक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर बेबाकी से लेखन किया। दैनिक ‘स्वदेश’ में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध लेखमालाएं- जैसे ‘केरल में मार्क्स नहीं महेश’, ‘आरएसएस अपने संविधान के आईने में’ और ‘समय की शिला पर’- आज भी हिन्दी वैचारिक साहित्य में मील का पत्थर मानी जाती हैं।
चार दशक की पत्रकारीय यात्रा :
मामाजी का सक्रिय पत्रकारीय जीवन लगभग चार दशकों तक विस्तृत रहा। उनकी पत्रकारीय यात्रा का आरंभ मध्य प्रदेश के भिंड से हुआ, जहाँ उन्होंने स्थानीय स्तर पर ‘देश-मित्र’ समाचारपत्र का संपादन और संचालन किया। किंतु एक युगप्रवर्तक संपादक के रूप में उनकी राष्ट्रव्यापी पहचान ‘स्वदेश’ समाचारपत्र से जुड़ने के उपरांत बनी। वर्ष 1966 में विजयादशमी के पावन पर्व पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक के. सी. सुदर्शन जी की प्रेरणा से इंदौर में दैनिक ‘स्वदेश’ की स्थापना हुई। पत्र के शीर्ष दायित्व हेतु मामाजी के नाम पर सर्वसम्मति बनी और 1968 में उन्होंने विधिवत संपादक का पदभार संभाला। अगले 17 वर्षों तक उनके कुशल संपादन में ‘स्वदेश’ मध्य प्रदेश में जन-आंदोलन का मुख्य स्वर बन गया। ग्वालियर में राजमाता विजयाराजे सिंधिया की प्रेरणा से दैनिक ‘हमारी आवाज’ का प्रकाशन हो रहा था। 1970 में इंदौर प्रवास के दौरान स्वदेश के वैचारिक प्रभाव को देखकर राजमाता ने प्रस्ताव रखा कि इसे ग्वालियर से भी प्रकाशित किया जाए। इसके बाद ‘हमारी आवाज’ को ‘स्वदेश’ में परिवर्तित किया गया, जहाँ मामाजी से प्रशिक्षित प्रखर संपादक राजेंद्र शर्मा के नेतृत्व में पत्र ने अद्वितीय लोकप्रियता हासिल की। कालांतर में भोपाल संस्करण का भी शुभारंभ हुआ।
भारतीय ‘स्व’ की पुनःप्रतिष्ठा :
स्वदेश (ग्वालियर) की रजत जयंती स्मारिका में मामाजी ने तत्कालीन बौद्धिक परिवेश का विश्लेषण करते हुए लिखा था कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद भी भारत का अपना ‘स्व’ तिरस्कृत रहा। जिस तुष्टीकरण के कारण विभाजन की विभीषिका उपजी, उसी को प्रगतिशीलता का आवरण पहनाया जा रहा था। पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग गांधी, तिलक, अरविंद, दीनदयाल और दादा माखनलाल चतुर्वेदी की राष्ट्रीय धारा से विमुख हो चुका था। ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में मामाजी ने ‘स्वदेश’ के माध्यम से राष्ट्रत्व के पक्ष में बिना किसी संकोच के खड़े रहने का संकल्प लिया। जब 1966 में दिल्ली में गो-हत्या पर प्रतिबंध की मांग कर रहे साधु-संतों पर गोलियां चलाई गईं और मुख्यधारा की पत्रकारिता ने उन्हें सांप्रदायिक घोषित करने का प्रयास किया, तब मामाजी ने निर्भीकता से गो-भक्तों की आवाज उठाई। इसी का परिणाम था कि मध्य प्रदेश में गोवंश संरक्षण का कड़ा कानून बना। इसी प्रकार इंदौर में हिंद केसरी मास्टर चंदगीराम के सम्मान में आयोजित शोभायात्रा पर हुए उपद्रव का सच सामने लाना हो या श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पर वामपंथी आख्यानों का प्रतिकार करना हो, मामाजी ने हमेशा तथ्यों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के बल पर प्रहार किया।
आपातकाल का दमन और जेल से संपादन :
वर्ष 1975 में जब तत्कालीन सरकार ने नागरिकों के मौलिक अधिकार छीनकर देश पर आपातकाल थोपा, तब अधिकांश प्रतिष्ठित समाचारपत्रों की धार कुंद हो गई थी। मामाजी ने सत्ता के दबाव के आगे झुकने से स्पष्ट इनकार कर दिया। सरकार ने ‘स्वदेश’ के कार्यालय को सील कर दिया और मामाजी को मीसा के अंतर्गत बंदी बनाकर जेल भेज दिया। लेकिन जेल में रहते हुए भी उनकी कलम रुकी नहीं। उन्होंने बंदियों को शिक्षित करना शुरू किया और हाथ से लिखकर ‘मीसा समाचार पत्र’ का गुप्त वितरण आरंभ कर दिया। जब उच्च न्यायालय के आदेश पर स्वदेश का ताला खुला, तब मामाजी ने जेल की सलाखों के पीछे से ही अपने अग्रलेख बाहर भिजवाने की व्यवस्था की। आपातकाल के दौरान लोकतंत्र के रक्षकों पर हुए अमानवीय अत्याचारों का प्रामाणिक दस्तावेजीकरण करते हुए उन्होंने कालजयी पुस्तक ‘आपातकाल की संघर्षगाथा’ की रचना की, जो आज भी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ है।
युवा पत्रकारों के संरक्षक और आदर्श गुरु :
वर्ष 1978 से 1980 तक मामाजी इंदौर प्रेस क्लब के अध्यक्ष रहे। उनके कार्यकाल में प्रेस क्लब बौद्धिक विमर्श और पत्रकारिता प्रशिक्षण का जीवंत केंद्र बना। उन्होंने पुराने, अनुपयोगी कानूनों को निरस्त करने की मांग को मुखर किया और पत्रकारों के व्यावसायिक कौशल संवर्धन के लिए निरंतर कार्यशालाएं आयोजित कीं। मामाजी युवा पत्रकारों के लिए चलती-फिरती पाठशाला थे। वे संपादक के लिए आरक्षित निजी कक्ष में बैठने के बजाय न्यूजरूम में उप-संपादकों और प्रशिक्षुओं के बीच बैठना पसंद करते थे। वे अपनी लिखी संपादकीय टिप्पणियां युवा पत्रकारों को प्रूफ सुधारने के लिए देते और उन्हें पूरी स्वतंत्रता देते कि यदि कोई भाषाई दोष या तथ्यगत सुधार दिखे तो वे बेझिझक संशोधन कर सकें। वे किसी भी ज्वलंत घटना पर युवाओं से संवाद छेड़ते, उनके तर्क सुनते और अंत में स्वाभाविक रूप से उनका प्रबोधन करते। उन्होंने किसी पर कभी अपनी विचारधारा थोपी नहीं, बल्कि आचरण और तर्कों से उन्हें दिशा दी।
मामाजी का बहुत सम्मान करते थे अटल जी :
मामाजी का जन्म 7 अक्टूबर, 1919 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में यमुना किनारे स्थित ऐतिहासिक बटेश्वर गांव में हुआ था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी इसी पावन भूमि की संतान थे और बटेश्वर में दोनों मनीषियों के पैतृक घर आमने-सामने स्थित थे। वर्ष 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री आवास पर मामाजी के सम्मान में ‘अमृत महोत्सव’ का भव्य आयोजन किया गया। उस ऐतिहासिक क्षण में भारत के प्रधानमंत्री ने भरे मंच पर अपनी आँखें छलछलाते हुए मामाजी के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया। यह दृश्य किसी पद या सत्ता का नहीं, बल्कि शुचिता, निष्ठा और ध्येयनिष्ठ साधना के प्रति भारत की राजसत्ता का नतमस्तक होना था।



