हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले की कैफ़ियत – 1

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दयानंद पांडेय

दिल्ली । अपनी एक टिप्पणी में विष्णु नागर जी ने मुझे इंगित करते हुए कहा है कि इसी लिए आपको इन्हीं सब कारणों से गंभीरता से नहीं लिया जाता। विष्णु जी कृपया मुझे यह पूछने की अनुमति दीजिए कि हिंदी पट्टी ही नहीं दुनिया भर में अब हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले के लेखकों को गंभीरता से कौन लेता है भला ! मैं तो नहीं ही लेता। कोई नहीं लेता। कोई लेता हो तो कृपया मुझे भी बताएं। मान्यता न मिलने की पीड़ा का भी ज़िक्र किया है विष्णु जी ने। बड़ी विनम्रता से कहना चाहता हूं कि हम किसी हिप्पोक्रेट वामपंथी कबीले के लेखक नहीं हैं , न उन से किसी मान्यता की तलब है ! क्या राहुल गांधी और कांग्रेस की दरबानी करने वाले वामपंथी हिप्पोक्रेट लेखकों की समाज में कोई हैसियत रह भी गई है ? कि वह किसी को मान्यता भी दे सकें ?

पश्चिम बंगाल को वामपंथियों ने जिस तरह ख़ूनी हिंसा में झोंका है , लोकतंत्र का खात्मा किया है और इस सब पर चुप रह जाने वाले हिप्पोक्रेट वामपंथी लेखकों की फ़ज़ीहत अब पुरानी बात हो चली है। लेकिन सवाल खत्म नहीं हुआ है। पश्चिम बंगाल में भद्रलोक के नाम पर जगह-जगह रवींद्रनाथ टैगोर की मूर्तियां तोड़ने वाले हिप्पोक्रेट अब किस मुंह से लेखकों की बात करते हैं। कविता लिखने वालों ने , कहानी लिखने वालों ने क्या बंगाल का वह मंज़र कभी याद किया , किसी रचना में कि जिस में बेटों को मार कर उन के ख़ून में भात सान कर खिलाया ? स्त्रियों से वामपंथियों ने सामूहिक बलात्कार किया। किसी रचना में आया कभी ? दिल्ली के सिख दंगों में कांग्रेसियों ने सिखों की हत्या की , लूटपाट की , किसी वामपंथी लेखक की रचना में आया ? क्या कोलकाता , मुंबई और कानपुर जैसे शहरों के उद्योगों को तबाह कर ख़त्म करने वाले वामपंथियों और इस पूरे मसले पर हिप्पोक्रेट वामपंथी लेखकों , बुद्धिजीवियों की ख़तरनाक चुप्पी आज भी उन के कोढ़ की शिनाख़्त करती है। मुंबई में बिल्डरों के दल्ले वामपंथियों ने कैसे तो तमाम कारखानों को हड़ताल कर-कर बंद करवा कर तमाम बहुमंज़िले अपार्टमेंट खड़ा करवा दिए उन कारखानों की ज़मीनों पर , यह तथ्य तो पुलिस में आन रिकार्ड है। मज़दूरों का हितैषी बन कर वामपंथियों ने कैसे तो लाखों मज़दूरों के घरों के चूल्हे ठंडे करवा दिए। वामपंथियों की मज़दूरों से दुश्मनी की अनूठी मिसाल है यह।

बाल ठाकरे नाम के भस्मासुर को इंदिरा गांधी ने खड़ा ही किया था वामपंथियों की इसी अराजकता और दुश्मनी के मद्देनज़र। हड़ताल दर हड़ताल से आजिज आ गई थीं। इस के पहले नेहरू भी वामपंथियों से आजिज आ गए थे ख़ास कर चीन से पराजय के बाद वामपंथियों के ख़िलाफ़ मुहिम चला दी थी। इतना कि साहिर लुधियानवी जैसे लोग मारे डर के सार्वजनिक रूप से कहते फिर कि मैं कम्युनिस्ट नहीं हूं। क्यों कि इस के पहले मज़रूह सुल्तानपुरी को नेहरू जेल भेज चुके थे। इस लिए कि मज़रूह नेहरू के ख़िलाफ़ एक नज़्म लिखने की हिमाकत कर बैठे थे : मन में जहर डॉलर के बसा के / फिरती है भारत की अहिंसा / खादी के केंचुल को पहनकर / ये केंचुल लहराने न पाए / अमन का झंडा इस धरती पर / किसने कहा लहराने न पाए / ये भी कोई हिटलर का है चेला / मार लो साथ जाने न पाए / “कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू” / मार ले साथी जाने न पाए। तो बंटवारे में पाकिस्तान जा कर वहां की जेल से बच कर भाग कर भारत आए बिचारे साहिर लुधियानवी भारत में नेहरू की जेल में नहीं जाना चाहते थे।

पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगूर मसले पर हिप्पोक्रेट वामपंथियों ने जो अत्याचार किसानों-मज़दूरों के साथ किया , वह तो अब राजनीतिक इतिहास है। पार्टी लाइन के चक्कर में तमाम हिप्पोक्रेट वामपंथी लेखकों की इस पर आज तक ख़तरनाक क़िस्म की चुप्पी है। क्यों है ? विष्णु जी कभी इस पर भी बात होनी चाहिए। क्यों कि आप तो अशोक वाजपेयी कैंप के हैं। अशोक वाजपेयी की पहचान सीरीज के हैं। अशोक वाजपेयी घोषित रूप से लगभग कांग्रेसी हैं , वामपंथी नहीं। इस आधार पर मान लेता हूं कि आप भी वामपंथी नहीं हैं। वामपंथियों से मित्रता हो सकती है , हो। मेरी भी कई वामपंथियों से मित्रता है।

बहरहाल अब विष्णु नागर जी आप ने मुझ से यह कहा है , लिख कर कहा है तो निश्चित ही मुझे इस पर विचार करना चाहिए। विचार किया। ठीक से विचार किया। संयत हो कर किया। सो अब बात कर रहा हूं। और फिर से पूछ रहा हूं कि विष्णु नागर जी से , बहुत आदर भाव से पूछ रहा हूं कि वह कौन लोग हैं जो मुझे गंभीरता से नहीं लेते ? क्या वही सो काल्ड वामपंथी। हिप्पोक्रेट वामपंथी ? राहुल गांधी और कांग्रेस की दरबानी करने वाले वामपंथी हिप्पोक्रेट ?

विष्णु नागर जी , 1981 से हमारे आदरणीय मित्र हैं। हितैषी हैं। दिल्ली में हमारे संघर्ष के दिनों के साथी हैं। उन दिनों के उन के स्नेह-सहयोग को आज भी याद करता हूं तो मन भावुक हो जाता है। मन हरियरा जाता है। इब्बार रब्बी और विष्णु नागर दोनों ही उन दिनों सांध्य टाइम्स में थे। नवभारत टाइम्स के दफ़्तर पहुंचते ही , दोनों आदरणीय की आंखों में मेरे लिए स्नेह की चमक आ जाती थी। कैसे भूल सकता हूं भला उन दिनों की। रब्बी जी से अब भी कभी-कभार बात होती है। विष्णु जी अब भी स्नेह करते हैं। लखनऊ आते हैं तो कभी भेंट भी हो जाती है। विष्णु जी उसी स्नेह भाव से मिलते हैं। लेकिन अभी फ़ेसबुक पर प्रेमचंद पर मेरी एक टिप्पणी से वह इतना विचलित हुए , इतना दबाव में आ गए कि मेरे प्रति एक अप्रिय टिप्पणी लिख बैठे। सहमति-असहमति फ़ेसबुक पर आम बात है। पर संबंधों में भी इस की गांठ पड़े , इस का हामीदार मैं नहीं हूं। कभी नहीं रहा। कभी नहीं होऊंगा।

संयोग से जब 2014 का लोकसभा चुनाव चुनाव आया। बतौर पत्रकार मुझे स्पष्ट दिख रहा था कि भाजपा स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। नरेंद्र मोदी क्लीयरकट प्रधान मंत्री बनते हुए दिख रहे थे। और मैं लिख रहा था। हिप्पोक्रेट वामपंथी गिरोह ने सहसा मुझे भाजपाई और संघी कहना शुरू कर दिया। मुझे इस की कोई परवाह नहीं थी। मैं सच लिख रहा था। जो दिख रहा था लिख रहा था। बतौर पत्रकार और लेखक मैं एजेंडाधारी नहीं हूं। ऐसा मेरा कोई कमिटमेंट किसी से भी नहीं है कि समय की दीवार पर लिखी इबारत को मिटा कर अपनी इबारत लिखने का पाखंड करूं। लगभग उन्हीं दिनों बहुत से लेखक , कलाकार , पत्रकार बनारस पहुंचे थे। नरेंद्र मोदी को हराने की रणनीति बनाने के लिए। विष्णु खरे भी गए थे। बनारस से लौट कर विष्णु खरे ने साफ़ लिखा था कि आख़िर मैं बनारस गया ही क्यों था ? लेख श्रृंखला ही लिखी थी। विष्णु खरे ने भी नरेंद्र मोदी की जीत और प्रधान मंत्री का ऐलान चुनाव से पहले कर दिया था ? विवादित और सो काल्ड सेक्यूलर पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी। और भी बहुतों ने। तो क्या विष्णु खरे और राजदीप सरदेसाई आदि-इत्यादि भी संघी और भाजपाई हो गए थे ? ऐसा हुआ भी तो क्या पूरा देश संघी और भाजपाई हो गया है ?

विष्णु जी आप ने भी कुछ समय तक राजनीतिक रिपोर्टिंग की है। लोकसभा कवर किया है। भाजपा से तमाम असहमतियों और नापसंदगी के बावजूद ख़बर लिखते समय क्या लोकसभा से भाजपा का पक्ष हटा देते थे ? कोई बिल या विधेयक पास हो जाता और आप अख़बार की ख़बर में उसे गुम कर देते थे ? ज़बरदस्ती अपनी तरफ से कुछ और लिख देते ? फ़ेसबुक तो नहीं है न अख़बार या न्यूज़ चैनल कि अपने मन की ही लिखें और अपने मन का ही निर्णय लिख दें। मनोकामना ही लिखें। लिख ही रहे हैं कुछ लोग। लेकिन मैं ऐसा नहीं लिख पाता। कभी नहीं लिख पाऊंगा। बशीर बद्र का एक मिसरा है : ये ज़बाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है। मुझ पर अभी तक लागू नहीं है। आगे भी लागू नहीं होगा। बकौल फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे / बोल ज़बाँ अब तक तेरी है का क़ायल हूं। रहूंगा। इस लिए भी कि मेरा कोई एजेंडा नहीं है। किसी गिरोह , किसी कबीले का सदस्य नहीं हूं। किसी से कोई फंडिंग या कोई सुविधा नहीं लेता। निजी राय और ख़बर दोनों दो बात है। लिखने के मामले में कबीर का हामीदार हूं : कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर, / ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर। निष्पक्षता हमारी थाती है। हमारी आदत है। जिस दिन कामरेडों की सरकार बनती दिखेगी , खुल कर लिखूंगा कि कामरेडों की सरकार बन रही है। कामरेड जिस कांग्रेस की दरबानी में संलग्न हैं , उस कांग्रेस की सरकार बनती दिखेगी तो यह भी धूम-धड़ाके से लिखूंगा। अभी तो लेकिन ऐसा किसी सूरत नहीं दिख रहा तो कैसे लिख दूं ? अभी तो इंडिया नाम का गठबंधन जली माचिस की तीली सरीखा ही है। आप को या और किसी और को इस माचिस की तीली में आग की कोई संभावना दिखती हो तो ज़रूर बताएं। मनोकामना नहीं , तथ्य और तर्क की बुनियाद पर। मनोकामना से समय नहीं चलता , न राजनीति। न जनता जनार्दन। बिलकुल अभी तो ऐसा ही है। आगे कुछ बदल जाए तो अच्छी बात है।

पर देखता हूं कि फ़ेसबुक पर तमाम मित्र मोदी समर्थन , मोदी विरोध को ले कर अपनी बरसों की मित्रता में आग लगा बैठे हैं। संबंधों को स्वाहा कर बैठे हैं। यह ठीक नहीं है। वैचारिकी , प्रतिबद्धता , राजनीतिक समझ , राजनीतिक दृष्टि से संबंध नहीं चलते। फिर हम तो लेखक और पत्रकार हैं। जो राजनीतिक परिदृश्य सामने है , वैचारिकी के नाम पर उसे कैसे ढंक सकते हैं ? राजा का बाजा बजाने वाले हम नहीं हैं। न भाजपा का बाजा बजाते हैं , न कांग्रेस का , न कम्युनिस्ट का , न सपा , बसपा आदि-इत्यादि का। सिर्फ़ समय की दीवार पर लिखी इबारत को बांच देता हूं। गोरख पांडेय की कविता याद आती है :

राजा बोला रात है
रानी बोली रात है
मंत्री बोला रात है
संतरी बोला रात है
यह सुबह सुबह की बात है

तो हम वैचारिकी के नाम पर , कमिटमेंट के नाम पर , किसी एजेंडे के तहत सुबह को रात कहने के हामीदार नहीं हैं। न कभी होंगे। पाखंडी लोग कहते रहें , कुछ भी। संघी , भाजपाई। पार्टी लाइन पर चलने वाली भेड़ों की भीड़ में हम शामिल नहीं हैं। लोग चाहे जो कह दें। एक स्वतंत्रचेता पत्रकार और लेखक होने के नाते मेरे लिए यह बहुत ज़रूरी है। रचनाओं में ऐसी कोई बात हो तो कोई बताए भी। विष्णु जी आप ने अपनी टिप्पणी में मुझे प्रखर वामपंथ विरोधी लिखा है। कृपया मुझे यह कहने की अनुमति दीजिए कि आप ने यह ग़लत लिखा है। क्यों कि वामपंथ तो क्या मैं किसी पंथ का विरोधी नहीं हूं। मैं तो नाथ पंथ का भी ख़ूब सम्मान करता हूं। पंथ कोई भी ख़राब नहीं होता। पथ ख़राब होता है।

हां , वामपंथियों में अब अधिकांश पथभ्रष्ट हैं। हिप्पोक्रेट हैं। हां , मैं इन पथभ्रष्टों और हिप्पोक्रेटों का प्रखर विरोधी हूं। रहूंगा। सर्वदा रहूंगा। आप को मालूम नहीं है क्या कि क्रांति के नाम पर कितने वामपंथी कहलाने वाले लेखक एन जी ओ चलाते हैं ? यहां-वहां से फंड बटोरते रहते हैं। यह जो तमाम सेमीनार होते हैं , व्याख्यान होते हैं , क्या आपसी चंदे से होते हैं ? तो शोषकों , वंचितों की लड़ाई लड़ने वाले को एयर टिकट , शानदार होटल आदि का इंतज़ाम करता कौन है ? बड़ी-बड़ी गाड़ियों से चलते कैसे हैं ? कारपोरेट के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वालों के बच्चे करोड़ों रुपए के पैकेज पर कारपोरेट की गुलामी क्यों करते हैं ? बाहर रोज लाल सलाम , घर में रोज घंटी बजा कर पूजा और आरती। ऐसी बहुतेरी बातें हैं। जिन का कोई अंत नहीं है। लेकिन मैं ऐसे ही हिप्पोक्रेट वामपंथियों का प्रखर और प्रबल विरोधी हूं। लाल सलाम बोल कर मोदी विरोध की घटिया कविता लिख कर ही अगर कवि हो जाना है , लेखक हो जाना है तो तौबा-तौबा ! ऐसे ही लोग तो आज की तारीख़ में वामपंथी लेखक , कवि हैं। वामपंथी कबीले में जगह-जगह ऐसे शोरूम सजे मिलते हैं। एन जी ओ चला कर क्रांति हो सकती है ? बदलाव हो सकता है ? तब तो एक समय फोर्ड फाउंडेशन से प्रति वर्ष बारह करोड़ पाने वाले गुजराती लेखक जी गणेश अब तक गुजरात में दशकों से चल रही भाजपा की सरकार को उखाड़ फेंके होते। यही तो लक्ष्य है उन का। समाज बदलता है लोगों के बीच काम करने से , एन जी ओ और सेमीनार से नहीं। किसान , मज़दूर धुरी हैं किसी समाज के बदलाव में। और वामपंथी अपने पाखंड के कारण यहीं से अनुपस्थित हैं। सिरे से अनुपस्थित हैं। बस गाल बजाने में आचार्य हैं।

अच्छा क्या हिंदी हिंदुओं की भाषा है , कि उर्दू मुसलमानों की भाषा , कि अंगरेजी अंगरेजों की भाषा , कि संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा है ? सी पी आई के महासचिव डी राजा ने कुछ साल पहले सार्वजनिक रुप से हिंदी दिवस के दिन कहा था कि हिंदी , हिंदुओं की भाषा है ! आन रिकार्ड कहा। आप समेत किसी लेखक या वामपंथी लेखक ने डी राजा के इस हिंसक और अश्लील बयान की कभी भूल कर भी निंदा की ? दबी जुबान भी प्रतिकार किया ? क्यों नहीं किया ? क्या लेखक भी पोलित ब्यूरो से संचालित होते हैं , जो सब के सब सिरे से ख़ामोश रहे ? फिर यह कैसे लेखक हैं ? अच्छा एक मासूम सा सवाल पूछता हूं। क्या प्रेमचंद कम्युनिस्ट थे ? एक प्रगतिशील लेखक संघ की अध्यक्षता कर लेने से प्रेमचंद कम्युनिस्ट कैसे हो गए भला ? ज़रा बताइएगा। मैं समझता हूं प्रगतिशील लेखक संघ में प्रेमचंद का वह अध्यक्षीय भाषण ज़्यादातर वामपंथियों ने पढ़ा ही नहीं है। पढ़ा होता तो ऐसा कहने की ज़ुर्रत न करते कि प्रेमचंद कम्युनिस्ट थे। प्रेमचंद ने तब अपने भाषण में कहा था कि हर लेखक प्रगतिशील होता है।

वैसे भी हम तो प्रेमचंद को गांधीवादी के नाते जानते और पहचानते हैं। गोरखपुर में गांधी को ही सुन कर प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी छोड़ी थी , कार्ल मार्क्स को पढ़ कर नहीं। गोरखपुर में सरकारी नौकरी छोड़ कर कंधों पर खादी कपड़ों का गट्ठर लाद कर घूम-घूम कर बेचते थे प्रेमचंद। गीता प्रेस के महावीर प्रसाद पोद्दार उन की बहुत मदद करते थे। पोद्दार भी खादी के कपड़े कंधे पर लाद कर बेचते थे। गांधी और उन के खादी का जूनून था यह। गांधी अहिंसा के हामीदार थे। प्रेमचंद भी। प्रेमचंद के विचारों और रचनाओं में कहीं भी हिंसा के लिए जगह नहीं है। और गांधी के बारे में कम्युनिस्टों की क्या राय है , यह भी किसी से छुपा है क्या ? गांधी अहिंसा के पुजारी हैं , मार्क्स हिंसा के पैरोकार हैं। सशत्र क्रांति के पैरोकार।

प्रेमचंद तो कहते थे साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। फिर प्रेमचंद को वामपंथी कहने वाले हिप्पोक्रेट वामपंथी , राजनीति के पीछे-पीछे चलने के लिए अभिशप्त क्यों हो गए हैं ? गो कि प्रेमचंद गांधीवादी थे , वामपंथी नहीं। लेकिन हिप्पोक्रेट वामपंथियों ने प्रेमचंद को वामपंथी ही नहीं , गोर्की को उन के बराबर खड़ा कर दिया।

कृपया मुझे यह कहने की अनुमति दीजिए कि गोर्की अच्छे लेखक हैं पर प्रेमचंद के आगे नहीं ठहरते। एक मुहावरे में कहूं कि कहां प्रेमचंद , कहां गोर्की ! वामपंथ धर्म को अफीम मानता है। लेकिन प्रेमचंद के गो – दान का नायक होरी तो ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखता है और भाग्यवादी भी है। नामवर सिंह ने कहा था कि ‘होरी एक हिंदू किसान है और वह हिंदू किसान ही हिंदू प्रेमचंद है। प्रेमचंद गाय-बैल, खेत खलिहान, गोबर मिट्टी की बात करते हैं।‘ प्रेमचंद अपनी अंतिम कहानी रहस्य में मनुष्य में देवत्व की बात करते हैं। प्रेमचंद के उपन्यास प्रेमाश्रम में बलराज को भी जांच लेना चाहिए। प्रेमचंद वामपंथी हिप्पोक्रेटों की जैसे ख़बर लेते हैं गो-दान में। गो-दान का एक प्रमुख पात्र ‘मेहता’ ‘राय साहब’ के इसी ढकोसले को उद्घाटित करते हुए कहता है कि “मुझे उन लोगों से ज़रा भी हमदर्दी नहीं है जो बातें तो करते हैं कम्युनिस्टों की-सी मगर जीवन है रईसों का सा, उतना ही विलासमय, उतना ही स्वार्थ से भरा हुआ।” आगे वह और भी कहता है कि “मैं तो केवल इतना जानता हूँ, हम या तो साम्यवादी हैं या नहीं हैं। हैं तो उसका व्यवहार करें, नहीं हैं, तो बकना छोड़ दें। मैं नकली ज़िंदगी का विरोधी हूँ। ” अच्छा गो – दान नाम से छपा उपन्यास अब गोदान कैसे और क्यों हो गया ? कोई बताएगा भी ? आप ही बता दीजिए।

ख़ैर। तो बकौल डी राजा क्या सचमुच हिंदी , हिंदुओं की भाषा है ? फिर तो आप जैसे तमाम आदरणीय मित्रों को हिंदी में लिखने का अपराध अब और नहीं करना चाहिए। मैं ऐसे ही पाखंडियों का प्रखर विरोधी हूं।

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