अक्षय शर्मा
नोएडा । महिला अधिकारों और समानता की बात आज पूरी दुनिया में हो रही है, और होनी भी चाहिए। क्योंकि जिस महिला के योगदान से परिवार, समाज और सृष्टि का जीवन चक्र आगे बढ़ता है, उसके सम्मान और अधिकारों पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। लेकिन आज बात अधिकारों की नहीं, बल्कि उस सामाजिक बदलाव की है जिस पर चर्चा शायद असहज लगे, पर आवश्यक है।
देश के बड़े महानगर हों या छोटे शहर, महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं। यह परिवर्तन स्वागत योग्य है और एक विकसित समाज की पहचान भी। लेकिन इसी बदलाव के बीच एक ऐसी प्रवृत्ति तेजी से सामान्य होती जा रही है, जिस पर शायद हम खुलकर बात करने से बचते हैं।
आज सार्वजनिक जीवन में गाली-गलौज और अभद्र भाषा को कई बार “बोल्डनेस”, “बिंदासपन” और “कूल” होने का प्रतीक बना दिया गया है। चाय की दुकानों से लेकर मॉल, कैफे, दफ्तरों और सोशल मीडिया तक सामान्य बातचीत में अपशब्दों का इस्तेमाल अब असामान्य नहीं रहा।
यह लेख किसी एक वर्ग को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास नहीं है। गालियां कभी केवल पुरुषों तक सीमित नहीं थीं और न आज किसी एक वर्ग की समस्या हैं। लेकिन चिंता इस बात की है कि जिस व्यवहार को कभी गलत माना जाता था, उसे अब सामान्य और स्वीकार्य समझा जाने लगा है।
हमारे समाज में एक समय ऐसा भी था जब परिवार, माता-बहन या बुजुर्गों की मौजूदगी में लोग शब्दों की मर्यादा का विशेष ध्यान रखते थे। अभद्र भाषा को शालीनता के विपरीत माना जाता था। आज स्थिति बदलती दिख रही है,पुरुष और महिलाएं दोनों ही कई बार सामान्य बातचीत में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं, जिन्हें कभी सार्वजनिक संवाद का हिस्सा नहीं माना जाता था।
यहां सवाल महिलाओं या पुरुषों को नियंत्रित करने का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या समानता का अर्थ हर अच्छी और बुरी आदत को समान रूप से अपनाना है? क्या आधुनिकता का मतलब संवाद की गरिमा को पीछे छोड़ देना है? और क्या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि शब्दों की मर्यादा अप्रासंगिक हो जाए?
भारत केवल भौगोलिक सीमाओं से बना देश नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों का संगम है। आधुनिक होना आवश्यक है, लेकिन यदि आधुनिकता शालीनता और संवाद की गरिमा को कमजोर करने लगे, तो उस पर विचार होना चाहिए।
समाज की पहचान केवल उसकी तकनीक, आर्थिक विकास या जीवनशैली से नहीं होती, बल्कि उसकी भाषा और व्यवहार से भी होती है। इसलिए बदलाव की शुरुआत किसी कानून या अभियान से पहले स्वयं से होनी चाहिए। पुरुष हो या महिला,यदि हम सार्वजनिक जीवन और पारिवारिक वातावरण में भाषा की गरिमा बनाए रखने का संकल्प लें, तो शायद आने वाली पीढ़ियों को संवाद का एक बेहतर संस्कार दे सकें।



