गलत नंबर, छूटी ट्रेन और फिसला संतरा: जब कामदेव ने किस्मत की पटकथा लिखी

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मथुरा । प्रेम रस, प्रेम रोग या प्रेम का बीज आखिर कैसे अंकुरित होता है?

क्या प्रेम गुलाब का फूल लेकर दरवाजे पर दस्तक देता है? क्या चांदनी रात में कोई मधुर संगीत बजने लगता है? क्या आसमान से फूल बरसते हैं?

फिल्में और धारावाहिक तो यही दिखाते हैं। लेकिन जिंदगी की पटकथा कुछ और ही होती है।

असल जीवन में प्रेम अक्सर बिना सूचना के आता है। कभी गलत नंबर बनकर फोन करता है। कभी भीड़ भरी ट्रेन में बगल की सीट पर बैठ जाता है। कभी किसी मामूली दुर्घटना में छिपा होता है। और कभी किसी ऐसी घटना में, जिसे याद करके इंसान पहले शर्मिंदा होता है और बाद में मुस्कुराता है।

लगता है प्रेम के देवता कामदेव को सीधे रास्ते पसंद ही नहीं हैं।

भारतीय मिथकों में भी प्रेम की राहें बड़ी टेढ़ी रही हैं। राजा दुष्यंत शिकार खेलने निकले थे, विवाह करने नहीं। लेकिन वन के एक आश्रम में शकुंतला से भेंट हुई और इतिहास बदल गया। नल और दमयंती ने पहले एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। संदेशवाहक हंसों ने दोनों के बीच प्रेम का पुल बनाया। भगवान शिव की तपस्या भंग करने भेजे गए कामदेव स्वयं भस्म हो गए, लेकिन प्रेम का बीज बो गए।

शायद तभी से प्रेम संयोगों का सबसे बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है।

आगरा के एक अध्यापक राज की कहानी सुनिए। एक बरसाती शाम वे अपने एक सहयोगी को फोन मिलाने की कोशिश कर रहे थे। जल्दबाजी में नंबर गलत लग गया। दूसरी तरफ से एक महिला की आवाज आई। “उम्मीद है आप कोई टेलीमार्केटिंग वाले नहीं हैं।” राज हंस पड़े। बातचीत शुरू हुई। दस मिनट एक घंटे में बदल गए। फिर रोज बात होने लगी। फोन के उस पार ऋषिकेश की शिक्षिका अनीता थीं। आवाज पहचान बनी, पहचान अपनापन बनी और अपनापन रिश्ते में बदल गया। एक गलत नंबर ने सही जीवनसाथी दिला दिया।

लखनऊ की नेहा की प्रेम कहानी तो एक फिसलन से शुरू हुई। सुपरमार्केट का फर्श गीला था। पैर फिसला और संतरे पूरे गलियारे में बिखर गए। नेहा शर्म से भर उठीं। तभी एक युवा इंजीनियर अर्जुन उनकी मदद के लिए दौड़े। दोनों संतरे समेटते रहे और साथ-साथ हंसते रहे।
बाद में कॉफी हुई। फिर मुलाकातें। और फिर शादी। आज भी दोनों मजाक में कहते हैं कि उनकी शादी में सबसे बड़ा योगदान संतरे का था।
मथुरा के करण गोविंद की कहानी भारतीय रेलवे की सौजन्य से शुरू हुई। मुंबई जाने वाली ट्रेन में वह इतनी गहरी नींद में सो गए कि अपना स्टेशन ही पार कर गए। पहले तो उन्हें गुस्सा आया, लेकिन अगले कुछ घंटे उन्होंने सहयात्री अदिति के साथ बातचीत में बिताए। किताबों, यात्राओं, सपनों और संघर्षों पर चर्चा होती रही। सुबह तक मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान हो चुका था। दो साल बाद सात फेरे भी हो गए।
बेंगलुरु मेट्रो में रोहित ने एक युवती को अपनी सीट देने की पेशकश की। युवती ने मना कर दिया। रोहित ने फिर आग्रह किया। उसने फिर मना कर दिया। कुछ ही देर में दोनों के बीच यह बहस छिड़ गई कि आखिर सीट पर बैठने का ज्यादा अधिकार किसका है। पूरी बोगी मुस्कुरा रही थी। बहस बातचीत में बदली, बातचीत दोस्ती में और दोस्ती प्रेम में। कुछ वर्षों बाद वही दोनों विवाह के मंडप में थे।
पुणे की मीरा को नहीं मालूम था कि जन्मदिन पर मंगाया गया पिज्जा उनकी जिंदगी बदल देगा। मूसलाधार बारिश में भीगते हुए डिलीवरी बॉय समीर पिज्जा लेकर पहुंचे। दोस्तों ने उन्हें अंदर बुला लिया। चाय पिलाई, बातें हुईं और नंबरों का आदान-प्रदान हो गया। अगले दिन पिज्जा का डिब्बा कूड़े में चला गया, लेकिन रिश्ता बचा रहा।
चेन्नई के दो मेडिकल छात्रों अनन्या और विकी की कहानी और भी अलग है। उनकी पहली मुलाकात किसी पार्क या कैफे में नहीं हुई थी। एनाटॉमी लैब में घंटों साथ पढ़ते-पढ़ते दोनों के बीच दोस्ती हुई। फॉर्मेलिन की गंध, मोटी किताबों और कठिन परीक्षाओं के बीच प्रेम ने चुपचाप अपनी जगह बना ली।
आज दोनों डॉक्टर हैं, पति-पत्नी हैं और दो बच्चों के माता-पिता भी।
गुरुग्राम की पूजा की प्रेम कहानी एक छोटी-सी कार दुर्घटना से शुरू हुई।
पार्किंग करते समय उनकी कार दूसरे वाहन से हल्की-सी टकरा गई। नुकसान कम हुआ लेकिन बातचीत ज्यादा हो गई। बीमा की जानकारी साझा हुई, फिर कॉफी हुई, फिर मुलाकातें शुरू हुईं। कार का डेंट कुछ दिनों में गायब हो गया। रिश्ता नहीं।
और शायद सबसे खूबसूरत कहानी अहमदाबाद के हरीश और सुनीता की है। दोनों साठ वर्ष की आयु पार कर चुके थे। एक सार्वजनिक पुस्तकालय में मरम्मत का काम चल रहा था। हरीश को अपनी नियमित सीट छोड़नी पड़ी। खाली कुर्सी केवल सुनीता जी के पास थी। पहले अखबारों पर चर्चा हुई। फिर किताबों पर। फिर जीवन की स्मृतियों पर।
धीरे-धीरे अकेलापन साथ में बदल गया। दोनों ने विवाह कर लिया। प्रेम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसे कैलेंडर पढ़ना नहीं आता।
इन सभी कहानियों में एक बात समान है। जिंदगी अपने सबसे बड़े मोड़ों की घोषणा नहीं करती। न कोई बिगुल बजता है, न कोई चेतावनी मिलती है। बस एक साधारण-सा पल आता है और चुपचाप जीवन की दिशा बदल देता है।
एक गलत नंबर। एक छूटी हुई ट्रेन।एक बिखरा हुआ संतरा। एक छोटी-सी टक्कर। या फिर पुस्तकालय की एक खाली कुर्सी।
फिल्में परफेक्ट प्रेम कहानियां गढ़ने पर करोड़ों रुपये खर्च करती हैं। जिंदगी वही काम मुफ्त में कर देती है।
शायद इसलिए हमारे पूर्वजों ने कामदेव को पुष्प-बाणधारी कहा था। उनके बाण दिखाई नहीं देते। कोई आवाज नहीं करते। लेकिन कब किसे लग जाएं, कोई नहीं जानता।
कभी वे दुष्यंत को शकुंतला तक ले जाते हैं। कभी नल और दमयंती के बीच हंसों को संदेशवाहक बना देते हैं। और कभी आगरा के किसी अध्यापक से एक गलत नंबर डायल करा देते हैं।
हजारों वर्षों से प्रेम की लीला यही है।
सिर्फ माध्यम बदल गए हैं।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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