दिल्ली । केट मिलेट ने 1970 में एक किताब लिखी – ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’। दुनिया में आग लग गई। उसने कहा – प्यार धोखा है, शादी जेल है, पति मालिक है, परिवार पिंजरा है। औरत को आजाद होना है तो ये सब तोड़ना पड़ेगा।
अमेरिका की औरतों ने तालियां बजाईं। टाइम मैगजीन ने उसे कवर पर छापा – “स्त्री मुक्ति की माओ”।
पहला चरण:घर टूटा
केट का अपना घर था। पति था, फुमियो योशिमुरा। 17 साल से साथ खुश पर आंदोलन को एक शादीशुदा हीरोइन नहीं चाहिए थी। उसे लेस्बियन हीरोइन चाहिए थी।
एक मीटिंग में घेर कर पूछा गया – तू लेस्बियन है?
केट ने कहा दिया – हाँ। अगले दिन अखबार में छप गया। पति सामान लेकर निकल गया। उसकी सगी बहन मैलोरी ने बाद में लिखा, ये एक गलती केट को जिंदगी भर सालती रही। वह मरते दम तक उस टूटे हुए घर को याद करती रही।
दूसरा चरण : खुद की लिखी किताब सेक्सुअल पॉलिटिक्स से नफरत
जिस किताब ने उसे भगवान बनाया, उसी किताब से उसे नफरत हो गई। उसने लिखा, ये प्रसिद्धि नहीं, बेइज्जती है। लोग उसे पढ़ते नहीं थे, उसे इस्तेमाल करते थे।
तीसरा चरण: पागलखाना
क्रांति के बाद क्या बचा?
पति नहीं, बच्चा नहीं, परिवार नहीं।
यदि कुछ बचा तो बचा डिप्रेशन, पागलखाना, लिथियम की गोलियां, बिजली के झटके।
उसने अपनी आखिरी किताब ‘द लूनी-बिन ट्रिप’ में लिखा, पागलखाना जेल से भी गंदा है। वहाँ ताले हैं, जंजीरें हैं, और कोई सुनने वाला नहीं।
आखिरी बात
केट ने औरतों को सिखाया – परिवार को जहर समझो, पर्दा फाड़ दो।
पर पिछले तीस से प्रताड़ित होते होते आखिरी दिन जब वह 83 साल की होकर पेरिस में मरी, तो कमरे में अकेली थी। कोई बेटा नहीं, कोई बेटी नहीं, कोई पोता नहीं।
उसकी ही साथी औरतें बाद में पूछने लगीं, “हमने सब तोड़ दिया, पर हाथ में क्या आया?”
केट मिलेट का जीवन इसका जवाब है नारे में क्रांति थी, आंखों में सिर्फ पछतावा।



