जौहर की आग या दाम्पत्य की चुप्पी: स्वरा की जुबान पर आजादी का सवाल

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दिल्ली। स्वरा भास्कर का हालिया बयान एक बार फिर चर्चा में है। ‘वुमन लाइफ फ्रीडम’ कार्यक्रम में उन्होंने पद्मावत के जौहर दृश्य को याद करते हुए कहा कि रेप पीड़िता को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि इज्जत बचाने के लिए जान दे देना ही बहादुरी है। उन्होंने पूछा—क्या बलात्कार महिला की जिंदगी का अंत है?

यह बात सैद्धांतिक रूप से सही लगती है। लेकिन कई श्रोता उसी क्षण एक और सवाल पूछ रहे हैं। स्वरा ने जिसे पहले ‘भाई’ कहा, उसी व्यक्ति को जीवनसाथी क्यों चुना? निकाह के पीछे डर या समझौता तो नहीं था? और जौहर की कहानी सुनाते हुए वे कहीं अपना व्यक्तिगत दर्द तो नहीं बयान कर रही थीं?

स्वरा और फहद अहमद की शादी 2023 में हुई। उससे पहले स्वरा ने सोशल मीडिया पर फहद को भाई कहकर संबोधित किया था। कुछ लोगों के लिए यह मजाक था, कुछ के लिए रिश्ते की अनिश्चितता का संकेत। अंतरधार्मिक विवाह पहले से ही सामाजिक दबाव में रहता है। ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक लगती है कि ‘आजादी’ का नारा अब केवल स्वरा की जुबान तक सीमित तो नहीं रह गया।

मां-बाप के घर में स्वरा ने जिस स्वतंत्रता का आनंद लिया, वह विवाह के बाद कितनी बची—यह सवाल निजी है। फिर भी सार्वजनिक व्यक्तित्व जब बार-बार आजादी, सम्मान और जीवित रहने के अधिकार की बात करते हैं, तो लोग उनके जीवन से उसकी तुलना करते हैं। जौहर के संदर्भ में स्वरा ने कहा कि कई बार दिल मर जाना चाहता है, लेकिन जीना पड़ता है। कुछ श्रोताओं को यह वाक्य फिल्म से ज्यादा निजी लगता है।

इतिहास में जौहर एक विशिष्ट परिस्थिति का निर्णय था। उसे आज के संदर्भ में रेप सर्वाइवर से सीधे जोड़ना विवादास्पद है। स्वरा का तर्क यह है कि किसी भी पीड़िता को यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि जीना कायरता है। यह बात सही है। लेकिन जब वही व्यक्ति अपने विवाह को लेकर उठे सवालों का जवाब नहीं देतीं, तो लोग इशारों में छिपा हुआ अर्थ ढूंढने लगते हैं।

व्यक्तिगत जीवन का आकलन बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकते। स्वरा की शादी खुशहाल हो सकती है, समझौते पर आधारित भी हो सकती है। दोनों संभावनाएं निजी हैं। सार्वजनिक चर्चा का हक केवल उनके कथनों पर है। यदि वे सच में आजादी की बात कर रही हैं, तो उन्हें अपने जीवन में भी वही स्वतंत्रता दिखानी चाहिए—डर के बिना, समझौते के बिना।

अभी तक स्वरा ने इन आशंकाओं का सीधा जवाब नहीं दिया है। जब तक नहीं देतीं, तब तक जौहर की कहानी और उनके निकाह के बीच का फासला लोगों के मन में बना रहेगा। आजादी सिर्फ जुबान की नहीं, जीवन की भी होनी चाहिए।

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आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

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