डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में सुधारों को लेकर आज पूरी दुनिया में चर्चाएं तेज हैं। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के उच्च स्तरीय सप्ताह के दौरान 100 से अधिक वैश्विक नेताओं ने खुलकर माना कि इस 15 सदस्यीय निकाय का वर्तमान स्वरूप आउटडेटेड हो चुका है। भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्यावाला देश है, एक अग्रणी आर्थिक महाशक्ति है और वैश्विक शांति अभियानों का सबसे मजबूत स्तंभ है। इसके बावजूद, यह कड़वी और अपरिवर्तनीय सच्चाई हमारे सामने है कि वर्तमान व्यवस्था के रहते भारत कभी भी सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन सकता।
अब भले ही मॉरीशस, पुर्तगाल और रूस जैसे देश वैश्विक मंचों पर भारत का कितना भी समर्थन कर लें, यूएन का कानूनी और रणनीतिक ढांचा इस तरह तैयार किया गया है कि भारत की राह हमेशा के लिए बंद दिखाई देती है। हो सकता है कि इस कथन एवं तथ्य के प्रकाश में कुछ लोग आलोचना भी कर सकते हैं कि इस नकारात्मक बातें आखिर करना ही क्यों चाहिए ? किंतु किसी के कहने या नहीं कहने से सत्य नहीं बदलनेवाला है, इसलिए यह अपरिहार्य हो जाता है कि हम सभी सत्य का साक्षात्कार करें और आगे की प्रभावी रणनीति बनाएं ताकि कोई रास्ता निकल सके।
भारत के प्रति समर्थन का दिखावा और छिपे हुए पेंच
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर कई देशों ने बड़े-बड़े बयान दिए, लेकिन इन बयानों के पीछे छिपी कूटनीति इस बात पर मुहर लगाती है कि स्थायी सीट मिलना एक असंभव सपना है। वस्तुत: रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने स्थायी सीट के लिए भारत और ब्राजील की उम्मीदवारी का समर्थन तो किया, किंतु साथ ही उन्होंने एक बड़ा अड़ंगा भी लगा दिया। रूस ने जर्मनी और जापान जैसे पश्चिमी देशों को कोई भी अतिरिक्त स्थायी सीट देने का कड़ा विरोध किया और उन्हें “सैन्यवाद और प्रतिशोध की राह पर चलने वाला” बताया। चूंकि भारत, जर्मनी और जापान के साथ मिलकर ‘जी-4’ समूह के तहत सामूहिक दावेदारी कर रहा है, इसलिए रूस के इस रुख ने भारत की संयुक्त रणनीति को बड़ा झटका दिया है।
यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि मॉरीशस के विदेश मंत्री धनंजय रामफुल और पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने भारत के पक्ष में आवाज उठाई। मार्शल द्वीप समूह की राष्ट्रपति हिल्डा हेइन ने भी समर्थन दोहराया। जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और घाना के राष्ट्रपति जॉन ड्रामानी महामा ने यूएन की विश्वसनीयता के लिए सुधारों को जरूरी बताया। सिएरा लियोन के राष्ट्रपति जूलियस माडा बायो ने भी दर्द बयां किया कि 1.6 अरब से अधिक लोगों का घर होने के बावजूद पूरे अफ्रीका को कोई स्थायी सीट नहीं मिली है, पर सच्चाई यह है कि ये सभी देश मिलकर भी भारत को सुरक्षा परिषद की दहलीज पार नहीं करा सकते।
यह दावा क्यों सच है कि भारत कभी स्थायी सदस्य नहीं बन सकता?
वस्तुत: इस निराशाजनक निष्कर्ष के पीछे कोई कयास नहीं लगाए जा रहे हैं, इसके पीछे के जो सत्य तथ्य हैं उसी के आधार पर यह कहा जा रहा है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के कइ्र अचूक नियम हैं जिन्हें तोड़ना किसी के वश में नहीं है। सुरक्षा परिषद का विस्तार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के मूल संविधान (यूएन चार्टर) को बदलना होगा। अनुच्छेद 108 के तहत इस संशोधन को लागू करने के लिए दो ऐसी शर्तें हैं जो भारत कभी पूरी नहीं कर पाएगा। एक- महासभा के दो-तिहाई देशों (129 देश) का बहुमत और दो- वर्तमान के सभी पांच स्थायी सदस्यों (पी5- अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) की अनिवार्य और व्यक्तिगत सहमति। इन पांचों देशों को अपनी-अपनी संसदों से इस कानून को पास कराना होगा।
फिर एक बार को माल भी लिया जाए कि अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस को भारत ने अपने पक्ष में मना भी लिया, तब भी चीन हमेशा की तरह आगे भी भारत की स्थायी सीट का विरोध करेगा ही। जैसा कि उसका अब तक का चरित्र हमेशा से रहता आया है। एक तरह से देखा जाए तो भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने उचित ही कहा है कि “संयुक्त राष्ट्र सुधारों का विरोध करने वाले लोग इस वैश्विक संस्था का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें इसकी परवाह नहीं है।” यहाँ सीधा निशाना चीन पर है।
यानी कि यदि भारत दुनिया के 190 देशों को अपने पक्ष में कर ले और अमेरिका, रूस, फ्रांस तथा ब्रिटेन भी भारत के पक्ष में दस्तखत कर दें, तब भी अकेले चीन के पास यह ताकत है कि वह इस पर वीटो कर दे। चीन सुरक्षा परिषद में एशिया का एकमात्र स्थायी सदस्य है और वह कभी नहीं चाहेगा कि उसका पड़ोसी और प्रतिद्वंदी भारत उसके बराबर की कुर्सी पर बैठे। चीन का एक अकेला ‘ना’ बाकी पूरी दुनिया के ‘हां’ को कचरे के डिब्बे में डाल देता है।
पी5 देशों का दोहरा खेल
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश जानते हैं कि चीन कभी भी भारत के नाम पर सहमति नहीं देगा, इसलिए वे भारत को खुश रखने और भारत के बड़े बाजार के साथ अरबों डॉलर के रक्षा सौदे करने के लिए खुलकर भारत का समर्थन करने का नाटक करते हैं। वे जानते हैं कि उन्हें अपनी जेब से कुछ नहीं देना है, क्योंकि अंत में चीन अपने वीटो से इस प्रस्ताव को रोक ही देगा। यहां विचारणीय है कि अब ऐसी परिस्थिति में भारत को आखिर क्या करना चाहिए, स्वभाविक है कि इस कड़वे सच के बावजूद भारत को कुछ रणनीतिक कदम उठाने चाहिए, जिसमें कि अगर भारत को यह मान भी लेना पड़े कि मौजूदा नियमों के तहत वह कभी स्थायी सदस्य नहीं बन सकता, तो भी हाथ पर हाथ धरकर बैठने के बजाय भारत को वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने वाले निम्न आक्रामक कदम उठाने चाहिए-
जी-4 समूह की बैसाखी छोड़ना
भारत अब तक जापान, जर्मनी और ब्राजील के साथ मिलकर सामूहिक लड़ाई लड़ रहा था। लेकिन रूस द्वारा जर्मनी और जापान का कड़ा विरोध करने के बाद यह स्पष्ट है कि इस समूह के साथ रहने से भारत का नुकसान हो रहा है। भारत को जी-4 से अलग होकर केवल अपनी “स्वतंत्र दावेदारी” पेश करनी चाहिए और दुनिया को बताना चाहिए कि भारत का मामला बाकी देशों से बिल्कुल अलग और ऐतिहासिक रूप से न्यायसंगत है।
‘एज़ुलविनी सर्वसम्मति’ के जरिए अफ्रीका का नेतृत्व करना
अफ्रीका महाद्वीप के 54 देश मिलकर यूएन में सबसे बड़ा वोट बैंक हैं। वे ‘एज़ुलविनी सर्वसम्मति’ के तहत अपने लिए दो स्थायी सीटें मांग रहे हैं। भारत को खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ का मसीहा साबित करते हुए अफ्रीकी देशों के साथ एक मजबूत मोर्चा बनाना चाहिए। जब 54 अफ्रीकी देश और भारत मिलकर संयुक्त राष्ट्र के भीतर एक समानांतर ब्लॉक खड़े करेंगे, तो पी5 देशों के लिए वैश्विक शासन चलाना असंभव हो जाएगा।
वीटो रहित स्थायी सदस्यता का अंतरिम विकल्प स्वीकार करना
यदि चीन के वीटो के कारण पूर्ण अधिकारों के साथ स्थायी सीट मिलना नामुमकिन है, तो भारत को ‘बिना वीटो पावर की स्थायी सदस्यता’ या ‘लंबे कार्यकाल वाली नवीकरणीय सीटों’ (लॉन्ग-टर्म रिन्यूएबल सीट्स) के प्रस्ताव का समर्थन कर देना चाहिए। एक बार जब भारत सुरक्षा परिषद के भीतर स्थायी रूप से प्रवेश कर जाएगा, तो उसकी वैश्विक स्वीकार्यता इतनी बढ़ जाएगी कि आने वाले दशकों में वीटो का अधिकार भी स्वतः मिल जाएगा।
बहुपक्षीय मंचों से यूएन को अप्रासंगिक बनाना
यदि संयुक्त राष्ट्र भारत को उसका हक नहीं दे सकता, तो भारत को संयुक्त राष्ट्र को ही कमजोर करने की रणनीति अपनानी चाहिए। भारत को ब्रिक्स और जी-20 जैसे वैकल्पिक मंचों को इतना शक्तिशाली बना देना चाहिए कि दुनिया के बड़े फैसले सुरक्षा परिषद के बजाय इन मंचों पर होने लगें। जब चीन और अन्य पी5 देशों को लगेगा कि यूएनएससी अपनी ताकत खो रहा है, तब वे भारत को रोकने की जिद छोड़ सकते हैं।
वस्तुत: यहां कहना यही है कि कभी भारत सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बनेगा का मतलब सीधा एवं साफ है, वह यही है कि भले ही किसी को ऐसा कहना निराशाजनक लगे, किंतु यह आज की निर्दयी वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा सच है। 1945 में महाशक्तियों ने जो वीटो का चक्रव्यूह रचा था, उसकी चाबी आज चीन जैसे देशों के हाथों में सुरक्षित है। भारत आज एक ऐसी वैश्विक शक्ति है जिसे किसी बैज या सुरक्षा परिषद की मुहर की जरूरत नहीं है। भारत को अब सुरक्षा परिषद की सदस्यता की तरफ टकटकी लगाकर देखने के बजाय, विश्व की अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति पर अपना ऐसा नियंत्रण स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जोकि संयुक्त राष्ट्र को खुद घुटनों के बल चलकर भारत को शामिल करने की भीख मांगने पर मजबूर कर सके।



