वेनिस: गोंडोला, गलियाँ, गपशप और हिंदुस्तानियों से 

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वेनिस (इटली) : गोंडोला पानी पर ऐसे खामोशी से सरक रही थी, जैसे वेनिस के पुराने राज़ों को जगाना नहीं चाहती हो। संकरी नहर के दोनों ओर सदियों पुरानी इमारतें खड़ी थीं। नाव कभी दीवारों को छूती-छूती निकलती, तो कभी किसी पुराने पुल के नीचे से ऐसे गुजरती, जैसे इतिहास की किसी गुप्त सुरंग में दाखिल हो रही हो।
नाविक अपने लंबे चप्पू को बड़े इत्मीनान से चलाता रहा। लगता था, बरसों से इन नहरों से बहस करता आया है और हर बार जीतकर निकला है।
वेनिस अपनी उम्र छिपाने की कोई कोशिश नहीं करता। पुरानी दीवारों पर सीलन के निशान थे। जंग लगे पाइप इमारतों से ऐसे चिपके थे, जैसे किसी पुराने रिश्ते को छोड़ने को तैयार न हों। कुछ दीवारें ऐसी लगती थीं, मानो सदियों से रो रही हों। पानी की लकीरें इमारतों के चेहरे पर नीचे तक उतर आई थीं। बालकनियाँ नहर के ऊपर झुकी हुई थीं, जैसे पानी के पार चल रही गपशप सुनने को बेताब हों।
पद्मिनी अय्यर ने खूबसूरती पर अपनी टिप्पणी की, “इस बूढ़ी होती सुंदरता में भी गजब का आकर्षण है। वाकई, वेनिस अपनी झुर्रियाँ छिपाता नहीं है, बल्कि उन्हें शान से दिखा रहा है।”
सचमुच, वेनिस की खूबसूरती किसी मेकअप की मोहताज नहीं। यहाँ उम्र भी एक आभूषण है और जर्जरता (टूट-फूट की हालत) भी कला का हिस्सा लगती है।
गोंडोला कभी तीखे मोड़ लेती, कभी छत वाले पुलों के नीचे से गुजरती। कहीं दो इमारतें इतनी करीब दिखतीं, जैसे पानी के ऊपर एक-दूसरे के कान में कोई राज़ फुसफुसा रही हों। हर मोड़ पर एक नया नज़ारा सामने आ जाता, पुरानी खिड़की, छोटी-सी बालकनी, चर्च का गुंबद या नहर के बिल्कुल किनारे खुलता कोई रहस्यमय दरवाज़ा।
यह सिर्फ नाव की सैर नहीं थी। यह इतिहास के पन्नों पर धीरे-धीरे चलने जैसा अनुभव था।
और फिर शुरू हुआ हिंदुस्तानी प्रतिक्रियाओं का सिलसिला!
कैमरे बाहर आ गए। बातचीत शुरू हो गई। किसी ने किसी इमारत की ओर उंगली उठाई। दूसरे ने उसकी जानकारी दी। तीसरे ने दोनों की तस्वीर खींच ली।
आखिर हम हिंदुस्तानी हैं। हम केवल जगहों को देखने नहीं जाते। उनसे रिश्ता बनाते हैं, एक-दूसरे से बातचीत करते हैं और जरूरत पड़े तो बिल्कुल अनजान लोगों से भी दोस्ती कर लेते हैं।
पदोवा से वेनिस का सफर फेरी (यात्री नाव) से शुरू हुआ था। वेनिस के करीब पहुँचते ही नज़ारा जादुई हो गया। सड़कें पीछे छूट गईं और पानी ने उनकी जगह ले ली। बसों की जगह नावें दिखाई देने लगीं। पूरा शहर ऐसा लग रहा था, जैसे आसमान और समंदर के बीच तैर रहा हो।
हमारी टूर मैनेजर मार्था हमें वेनिस के मशहूर चौक तक ले गईं। चारों तरफ शानदार वास्तुकला, पुरानी इमारतें और हजारों पर्यटक थे। वेनिस खूबसूरत भी था, व्यस्त भी और इस बात का आदी भी कि लोग उसे लगातार घूरते रहें।
लेकिन हमारे लिए एक और सवाल अहम था।
खाना कहाँ मिलेगा?
वेनिस की खूबसूरती अपनी जगह, मगर पेट की पुकार भी कोई मामूली चीज़ नहीं!
भारतीय रेस्तराँ गांधी वन ने हमारी मुश्किल आसान कर दी। शाकाहारी खाना, जाने-पहचाने स्वाद और सबसे बढ़कर: छाछ!
कई दिनों की यूरोपीय भोजन-यात्रा के बाद छाछ का एक गिलास ऐसा लगा, जैसे किसी दूर देश में अचानक परिवार का कोई सदस्य मिल गया हो। एक घूंट में घर, आँगन और भारतीय रसोई की याद लौट आई।
शाम को पदोवा के रेस्तराँ में खाना मेजों पर परोसा गया। हमारी टोली के बाराती खुश हो गए। चेहरे खिल उठे और खाने के साथ-साथ बातचीत का दौर भी जम गया।
असली मनोरंजन तो बस की यात्रा के दौरान शुरू हुआ।
पद्मिनी ने बिल्कुल सही कहा, “भारतीय पर्यटकों का समूह ज्यादा देर तक सिर्फ पर्यटकों का समूह नहीं रह सकता। हमें एक बस और कुछ घंटे साथ दे दीजिए, वह बारात बन जाती है। लोग बातें करने लगते हैं, खाना बाँटते हैं, अपने अनुभव सुनाते हैं और एक-दूसरे का हाल पूछते हैं।”
फिर शुरू होते हैं भजन और अंताक्षरी।
बस यूरोप से गुजर रही होती है, लेकिन माहौल ऐसा बन जाता है जैसे वह सीधे भारत की किसी शादी में जा रही हो। कोई भजन छेड़ता है, कोई अंताक्षरी में सुर लगाता है और कोई पीछे से अपनी टिप्पणी कर देता है।
खुशकिस्मती से हमारी बारात में कोई रूठे हुए फूफाजी नहीं थे। वरना उनका मनाना भी यात्रा कार्यक्रम का हिस्सा बन जाता!
भारतीय समाज की यह गर्मजोशी हमारी सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है। दिल्ली हो, मुंबई, आगरा या लंदन: पता बदल जाए, पासपोर्ट बदल जाए, पेशा बदल जाए, लेकिन देसी दिल की कुछ आदतें आसानी से नहीं बदलतीं।
मसलन, एक सवाल हर जगह जीवित रहता है:
“खाना खा लिया?”
यह सिर्फ सवाल नहीं, अपनापन है। कई बार तो यह भारतीय प्रेम की सबसे सरल और सबसे भरोसेमंद भाषा बन जाता है।
हमारी यात्रा में बुजुर्ग यात्रियों का ख्याल रखने की परंपरा भी साफ दिखाई दी। कोई सामान उठाने में मदद करता। कोई बैठने के लिए जगह देता। कोई पूछता कि पानी चाहिए या कुछ खाने को।
यह छोटी-छोटी मददें यात्रा को आसान बनाती हैं और दिल में एक भरोसा पैदा करती हैं कि हम अकेले नहीं हैं।
हमारी अथक (बिना थके काम करने वाली) गाइड मार्था ने इस जिम्मेदारी को एक अलग ही स्तर पर पहुँचा दिया। वह हमें उत्साहित करतीं, हौसला बढ़ातीं और पूरी टोली को साथ रखने में जुटी रहतीं।
उनकी कोशिश रहती कि कोई भी यात्री उनकी जीपीएस सीमा से बाहर न निकल जाए।
वेनिस के पास नहरें, गोंडोला और पुल थे। मार्था के पास अपना नेविगेशन सिस्टम था: भारतीय पर्यटकों को नियंत्रण में रखना!
कहना पड़ेगा, हमारी टोली भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं थी।
पदोवा में हमारे रात के ठहराव, ब्लू ड्रीम होटल, ने यूरोपीय आतिथ्य का एक दूसरा पहलू सामने रखा।
कमरा काफी बड़ा था। जगह की कोई कमी नहीं थी। लेकिन जरूरी सुविधाओं और व्यक्तिगत सेवा की कमी महसूस हुई। बड़ा कमरा हमेशा बेहतर अनुभव की गारंटी नहीं देता। कभी-कभी एक छोटी-सी मदद, एक मुस्कान और किसी का पूछ लेना कि “आपको कुछ चाहिए?” ज्यादा मायने रखता है।
यहीं भारतीय और यूरोपीय आतिथ्य के बीच एक दिलचस्प फर्क दिखाई देता है।
भारत में सेवा का मतलब अक्सर यह होता है कि कोई आपके माँगने से पहले ही आपकी जरूरत समझ ले। यूरोप में कई बार आपसे उम्मीद की जाती है कि आप अपना काम खुद करें।
इसे वे स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और मानवीय गरिमा कहते हैं।
ठीक है, अपनी जगह सही है।
लेकिन किसी बुजुर्ग यात्री से पूछिए, जो भारी सामान लेकर चल रहा हो, कि मदद का एक हाथ उसकी गरिमा को चोट पहुँचाता है क्या? हो सकता है, उसका दर्शन कुछ अलग हो।
गरिमा सिर्फ अपने काम खुद करने में नहीं, बल्कि जरूरत के समय मदद स्वीकार करने में भी हो सकती है।
यूरोप ने अपनी सेवा व्यवस्था में ऑटोमेशन (मशीनों से काम करवाने की व्यवस्था) को तेजी से अपनाया है। मशीनें चेक-इन करती हैं, मशीनें भुगतान लेती हैं और मशीनें जानकारी देती हैं।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि जल्द ही मशीनें हमसे यह भी पूछ लेंगी, “आपका ठहराव कैसा रहा? कृपया पाँच सितारा रेटिंग देना न भूलें!”
कई भारतीय यात्रियों को यह कार्यकुशलता थोड़ी बेजान लग सकती है। हम बातचीत, व्यक्तिगत ध्यान और इंसानी स्पर्श के आदी हैं।
भारत में होटल का कर्मचारी कभी-कभी सिर्फ सेवा नहीं देता, बल्कि बातचीत भी कर लेता है। वह पूछ लेता है कि सफर कैसा रहा, खाना ठीक था या नहीं और अगली यात्रा के लिए कुछ चाहिए क्या।
यूरोप में व्यवस्था अधिक स्वचालित और व्यवस्थित हो सकती है। भारत में कई बार सेवा के साथ रिश्ते की गर्माहट भी जुड़ जाती है।
दोनों व्यवस्थाओं के अपने फायदे और अपनी सीमाएँ हैं।
वेनिस खुद एक अद्भुत विरोधाभास है।
शहर की वास्तुकला सदियों पुरानी है, लेकिन उसे जीवित रखने वाला आधुनिक ढाँचा लगातार काम करता रहता है। पुराने पत्थर और आधुनिक इंजीनियरिंग एक साथ दिखाई देते हैं। सदियों पुरानी इमारतों के बीच आज की व्यवस्थाएँ इस तैरती दुनिया को संभालती हैं।
गोंडोला की सैर ने इस विरोधाभास को और स्पष्ट कर दिया।
खूबसूरती और जर्जरता साथ-साथ मौजूद थीं। भव्य महलों के पास टूटती दीवारें खड़ी थीं। खूबसूरत अग्रभागों (इमारत के सामने के हिस्से) के बगल में जंग लगे पाइप दिखाई देते थे। पानी का रिसाव शानदार वास्तुकला से जैसे मुकाबला कर रहा था।
लेकिन वेनिस की खासियत यही है कि वह अपनी कमियों को भी खूबसूरत बना देता है।
शायद यही इस शहर का सबसे बड़ा हुनर है।
उसे संपूर्ण होने की जरूरत नहीं।
उसे बस वेनिस होना है।
जब हमारी गोंडोला धीरे-धीरे आगे बढ़ी और वेनिस की पुरानी इमारतें पीछे छूटने लगीं, तो हमारे साथ सिर्फ तस्वीरें नहीं थीं।
हम हँसी लेकर लौटे। गीत लेकर लौटे। साझा भोजन की यादें लेकर लौटे। एक-दूसरे की चिंता और मदद का एहसास लेकर लौटे।
और सबसे बढ़कर, वह पहचान साथ रही कि हिंदुस्तानी जहाँ भी जाते हैं, अपने साथ थोड़ा-सा हिंदुस्तान जरूर ले जाते हैं।
हमारे पास अलग-अलग शहरों के पते हो सकते हैं। हमारे पास अलग-अलग पासपोर्ट हो सकते हैं। लेकिन साथ बैठकर गाना गाने, खाना बाँटने और किसी बुजुर्ग साथी का हाल पूछने की आदतें हमें जोड़ती रहती हैं।
वेनिस ने हमें गोंडोला दी।
हमने उसे अपनी बारात दे दी!

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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