– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल। किसी भी राष्ट्र, सभ्यता या संस्कृति की नियति उसके भूगोल से अधिक उसके जनसांख्यिकीय ताने-बाने (Demographic Fabric) से तय होती है। अब भले ही वैश्विक स्तर पर भारत को एक ‘युवा देश’ के रूप में विज्ञापित किया जाता है, जिसकी 60 फीसद से अधिक जनसंख्या कार्यशील आयु वर्ग (15-59 वर्ष) में है, पर भविष्य का भारत कैसा होगा, उसने अभी से सभी के होश उड़ा दिए हैं।
दरअसल, भारत की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी की जन्मदर (टोटल फर्टिलिटी रेट– टीएफआर) में इतनी तीव्र गिरावट आई है कि यह जनसंख्या स्थिरता के आवश्यक मानक (रिप्लेसमेंट लेवल) से बहुत नीचे जा चुकी है। यहां ज्ञात हो कि यह स्थिति पश्चिमी देशों या सुदूर पूर्व के देशों (जैसे जापान और दक्षिण कोरिया) से बिल्कुल अलग है। वे देश बूढ़े होने से पहले आर्थिक रूप से समृद्ध और ‘विकसित’ बन चुके थे, जबकि भारत अपनी प्रति व्यक्ति आय के निम्न और मध्यम स्तर पर रहते हुए ही “अमीर होने से पहले बूढ़ा” (एजिंग बिफोर बिकमिंग रिच) होने की राह पर अग्रसर है।
इसके साथ ही इससे जुड़ा एक दूसरा संकट भी सामने आ खड़ा हुआ है। ये संकट इतना बड़ा है कि हिन्दुओं की पहचान को ही अल्पसंख्यक बना सकता है! उल्लेखनीय है कि जब किसी राष्ट्र की बहुसंख्यक और मूल सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी जनसंख्या तेजी से संकुचित और वृद्ध होने लगती है, तब उस राष्ट्र की सांस्कृतिक, धार्मिक और सभ्यतागत पहचान के लिए एक अस्तित्वगत खतरा (एग्जिस्टेंशियल थ्रेट) बन जाता है। फिलहाल जो नजारा दिखाई दे रहा है, वह इसी भविष्य की ओर संकेत करता है।
‘हम दो, हमारा एक’, हिन्दू समाज में जन्मदर का नया ट्रेंड
भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी किए जाने वाले राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े पिछले तीन दशकों में हिन्दू समाज के भीतर आए एक व्यापक व्यावहारिक और सांस्कृतिक बदलाव को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं। यदि हम 1990 के दशक की शुरुआत से तुलना करें, तो हिन्दू समाज के भीतर बच्चों के जन्म को लेकर प्राथमिकताओं में क्रांतिकारी बदलाव आया है।
एनएफएचएस -1 (1992-93) की अवधि में भारत में हिन्दू समुदाय की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 3.3 थी। इसका अर्थ था कि औसतन एक हिन्दू महिला अपने जीवनकाल में तीन से अधिक बच्चों को जन्म दे रही थी, जोकि जनसंख्या वृद्धि और निरंतरता के लिए पर्याप्त था। इसके बाद एनएफएचएस -4 (2015-16) तक यह दर तेजी से गिरकर 2.1 पर आ गई, जो जनसंख्या को स्थिर रखने का आधिकारिक स्तर (रिप्लेसमेंट लेवल) है, लेकिन नवीनतम आधिकारिक आंकड़ों (एनएफएचएस -5, 2019-21) के अनुसार, हिन्दू समुदाय की जन्मदर और अधिक गिरकर 1.94 पर पहुँच चुकी है।
यहां समझें कि 2.1 से नीचे की प्रजनन दर का सीधा और वैज्ञानिक मतलब यह है कि आने वाली पीढ़ियों में वर्तमान आबादी को प्रतिस्थापित (रिप्लेस) करने के लिए पर्याप्त बच्चे पैदा नहीं हो रहे हैं। दीर्घकाल में, यह दर आबादी के क्रमिक संकुचन का कारण बनती है। भारत के शहरी केंद्रों और विशेष रूप से शिक्षित हिन्दू परिवारों में अब ‘हम दो, हमारे दो’ का नारा भी पुराना पड़ चुका है। इसकी जगह अब ‘हम दो, हमारा एक’ का नया सामाजिक मानदंड बन गया है।
जन्मदर में गिरावट के सामाजिक-आर्थिक कारण
महानगरीय और मध्यवर्गीय हिन्दू परिवारों में ‘एकल संतान’ की मानसिकता बढ़ने का सबसे पहला कारण शिक्षा और पालन-पोषण की अत्यधिक उच्च लागत है। दूसरा प्रमुख कारण तीव्र शहरीकरण और कामकाजी जीवनशैली है। तीसरा कारण युवाओं के विवाह की औसत आयु बढ़ना है जोकि 28 से 35 वर्ष की आयु पर जा पहुंची है। अब देरी से विवाह होने के कारण जैविक रूप से भी महिलाओं के लिए प्रसव की अवधि सीमित हो जाती है। चौथा कारण जो सबसे ज्यादा अहम है, वह कल्चरल मार्क्सिज्म का वैचारिक ढांचा पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं को तोड़कर व्यक्ति को अत्यधिक अति-व्यक्तिवाद और ‘माई बॉडी, माई चॉइस’ जैसे नारों की ओर प्रेरित कर रहा है।
वस्तुत: यह वैचारिक दृष्टिकोण यह मानता है कि व्यक्ति जन्म से स्वतंत्र है, लिंग, जाति, धर्म और यौन अभिविन्यास के आधार पर ‘शोषक’ और ‘शोषित’ में विभाजित किया गया है।पारंपरिक संस्थाओं में परिवार, विवाह, धर्म और समुदाय दमनकारी व्यवस्था हैं, जिसे तोड़ना आवश्यक है। यहां उल्लेखित है कि जब कोई ‘माई बॉडी, माई चॉइस’ और सामाजिक अलगाव से प्रभावित होता है, तो ‘सामूहिक जिम्मेदारी’ का स्थान ‘पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ ले लेती है।
पारिवारिक निरंतरता पर प्रहार
पारंपरिक रूप से शरीर और जीवन को व्यक्ति की निजी संपत्ति न मानते हुए उसे परिवार, आने वाली पीढ़ी और समाज की एक धरोहर माना जाता है, पर ‘माई बॉडी, माई चॉइस’ के अति-प्रयोग ने विवाह और संतानोत्पत्ति को एक ‘बोझ’ या व्यक्तिगत करियर में ‘बाधा’ के रूप में देखना शुरू कर दिया है। अति-व्यक्तिवाद विचार के तहत व्यक्ति यह मानने लगता है कि उसके निर्णयों का समाज या परिवार के प्रति कोई दायित्व नहीं है। इसके कारण लोग विवाह से दूरी (जैसे लिव-इन या सिंगल रहना) और एकल संतान या ‘चाइल्ड-फ्री’ जीवनशैली को आधुनिकता का प्रतीक मानकर अपना रहे हैं।
जिसमें कि आज का आधुनिक कॉर्पोरेट बाजार (पूंजीवाद) इस कल्चरल मार्क्सिज्म का सबसे बड़ा समर्थक बन गया है, क्योंकि एक अकेला या बिना बच्चों वाला व्यक्ति अपनी आय का 100 फीसद तुरंत उपभोग (जीवनशैली, यात्रा, गैजेट्स) पर खर्च करता है। दूसरी ओर एक संयुक्त परिवार या दो बच्चों का परिवार अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा भविष्य के लिए बचाता है, इसलिए बाजार ‘माई बॉडी, माई चॉइस’ और ‘लीव योर लाइफ ऑन योर ओन टर्म्स’ जैसे नारों को विज्ञापनों के जरिए बढ़ावा दे रहा है। अकेला हुआ व्यक्ति बाजार के लिए सबसे बड़ा और आसान उपभोक्ता है।
स्वभाविक है, इस वैचारिक बदलाव का सीधा असर जन्मदर पर पड़ रहा है। जब समाज की मूल सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा युवा वर्ग अपनी शारीरिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानकर पारिवारिक दायित्वों से पीछे हटता है, तो समाज में जनसांख्यिकीय शून्यता पैदा होना स्वभाविक है। अंततः यह स्थिति समाज को तेजी से बूढ़ा होने और अपनी सांस्कृतिक निरंतरता खोने की ओर धकेलती हुई हमें आज दिखाई दे रही है। जिससे अनजाने में या योजनाबद्ध तरीके से एकल संतान का चलन बढ़ता जा रहा है।
धार्मिक असंतुलन और जनसांख्यिकीय संक्रमण का गणित
जनसंख्या विज्ञान (डेमोग्राफी) में यह तो महत्वपूर्ण होता ही है कि देश की कुल आबादी बढ़ रही है या घट रही है, किंतु इससे अधिक यह भी महत्व रखता है कि देश के भीतर अलग-अलग समुदायों की आंतरिक वृद्धि दर क्या है। भारत के संदर्भ में, जन्मदर में आई यह गिरावट सभी समुदायों में समान नहीं है, जिससे एक बड़ा जनसांख्यिकीय असंतुलन (डेमोग्राफिक इम्बैलेंस) पैदा हो रहा है। कई वैश्विक शोध सामने आ चुके हैं, जिनके निष्कर्ष हैं कि भारत में मुस्लिम समुदाय की प्रजनन दर 2.36 (एनएफएचएस -5) है । यह दर जनसंख्या स्थिरता के मानक (2.1) से ऊपर है, जिसका अर्थ है कि उनकी आबादी अभी भी बढ़ रही है।
एनएफएचएस -5 के अनुसार, हिंदुओं (1.94) और मुस्लिमों (2.36) की जन्मदर में लगभग 0.42 का अंतर है। पहली नजर में यह अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन जनसंख्या के संचयी प्रभाव (कम्पाउंड इफेक्ट) के कारण दो से तीन पीढ़ियों (50 से 75 वर्ष) के भीतर यह अंतर किसी भी राष्ट्र के पूर्ण जनसांख्यिकीय भूगोल को बदलने की क्षमता रखता है। वर्ष 1951 की पहली जनगणना में भारत में हिंदुओं की आबादी लगभग 84.1 फीसद थी, जो 2011 की जनगणना तक घटकर 79.8 फीसद रह गई।
ऐसे में दीर्घकालिक अनुमानों के निष्कर्ष यही है कि वर्ष 2050 तक भारत की कुल जनसंख्या में हिंदुओं की हिस्सेदारी घटकर लगभग 76.7% होने की संभावना है, जबकि मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी बढ़कर 18.4 फीसद से अधिक होने का अनुमान है। यह जनसांख्यिकीय बदलाव भारत के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे केरल, असम, पश्चिम बंगाल) में और भी अधिक तीव्र है।
अमीर होने से पहले बूढ़ा होता भारत और विकसित देश
हम अभी देख रहे हैं, पश्चिमी यूरोप के देशों, जापान और हाल ही में दक्षिण कोरिया ने तीव्र जनसांख्यिकीय गिरावट का सामना किया है। आज जापान दुनिया का सबसे बुजुर्ग देश बन चुका है और दक्षिण कोरिया की जन्मदर (0.72) दुनिया में सबसे कम है, तब भारत और इन विकसित देशों के बीच एक बहुत बड़ा बुनियादी अंतर है।जब जापान या यूरोप की आबादी बूढ़ी होनी शुरू हुई (1980 और 1990 के दशक में), तब तक वे देश औद्योगिक रूप से पूरी तरह विकसित हो चुके थे। उनकी प्रति व्यक्ति आय (पर कैपिटा इनकम) $30,000 से $40,000 से अधिक थी।
उनके पास नागरिकों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं, सुदृढ़ पेंशन योजनाएं और उन्नत सामाजिक सुरक्षा ढांचा मौजूद था। इसके विपरीत, भारत वर्तमान में एक विकासशील, निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था है, जहां प्रति व्यक्ति आय लगभग $2,500 के आसपास है। भारत सरकार ने वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने का संकल्प लिया है। मगर आर्थिक विकास के इस ऊंचे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत के पास सिर्फ अगले 15 से 20 वर्षों का समय (डेमोग्राफिक विंडो ऑफ अपॉर्च्युनिटी) ही बचा है।
यदि भारत के युवा इस सीमित समय में उच्च-मूल्य वाले उद्योगों, नवाचार और विनिर्माण में रोजगार पाकर देश को समृद्ध नहीं बना पाते हैं, तो भारत ‘मध्यम-आय जाल’ (मिडिल-इनकम ट्रैप) में फंस जाएगा। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की ‘इंडिया एजिंग रिपोर्ट’ के भयावह अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2046 तक भारत में बुजुर्गों (60+) की संख्या बच्चों (0-14 वर्ष) की संख्या को पार कर जाएगी। वर्ष 2050 तक भारत की कुल आबादी का 20.8 प्रतिशत (लगभग 34.7 करोड़ लोग) बुजुर्ग होंगे।
इसका आर्थिक परिणाम यह होगा कि देश में कमाने वाले और टैक्स देने वाले हाथ कम होंगे, जबकि पेंशन और मुफ्त इलाज पर आश्रित बुजुर्गों की एक विशाल फौज खड़ी होगी। वर्तमान में भारत में हर 1 बुजुर्ग पर लगभग 9.8 कामकाजी लोग (सहयोग अनुपात) हैं, जो 2050 तक घटकर आधे (लगभग 5 से भी कम) रह जाएंगे। यानी कमाने वाले हाथ कम होंगे और आश्रित बुजुर्गों की संख्या दोगुनी होगी। एक गरीब या विकासशील देश के लिए इतने बड़े पैमाने पर वृद्ध कल्याण पर खर्च करना उसकी आर्थिक कमर तोड़ सकता है।
चीन की केस स्टडी : ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ की ऐतिहासिक भूल
जब हम कम जन्मदर और तेजी से बूढ़ी होती आबादी के खतरों की बात करते हैं, तो भारत के पड़ोसी देश चीन का उदाहरण एक जीवंत और भयावह चेतावनी के रूप में सामने आता है। चीन ने साल 1979 में अपनी कुख्यात ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ लागू की थी। उस समय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का मानना था कि जनसंख्या पर नियंत्रण करके वे देश को तेजी से अमीर बना सकेंगे। भले ही यह सच है कि आर्थिक रूप से चीन ने अभूतपूर्व प्रगति की, किंतु यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जनसांख्यिकीय रूप से उसने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।
चीन की आबादी अब अपने चरम को पार कर सिकुड़ना शुरू हो चुकी है। चीन में आज युवा पीढ़ी ‘4-2-1 संकट’ से जूझ रही है, जहां एक इकलौते कामकाजी युवा पर दो माता-पिता और चार दादा-दादी/नाना-नानी की देखभाल का भारी वित्तीय बोझ है। चीन ने अपनी गलती को सुधारने के लिए पहले ‘टू-चाइल्ड’ और फिर ‘थ्री-चाइल्ड पॉलिसी’ लागू की और अब वहां सरकारें बच्चों के जन्म पर भारी आर्थिक सब्सिडी दे रही हैं, इसके बावजूद, चीनी युवा अधिक बच्चे पैदा करने को तैयार नहीं हैं।
अत: इसी आधार पर जनसंख्या विज्ञानी ‘निकोलस एबरस्टाड’ का अपने शोधों से स्पष्ट निष्कर्ष निकला कि एक बार जब कोई समाज एकल-संतान की संस्कृति को अपनी जीवनशैली बना लेता है, तो कोई भी सरकारी नीति या वित्तीय लालच उसे वापस पुरानी जन्मदर पर नहीं ला सकता, इस घटना से भारत के लिए आज सबक यह है कि यदि देश के बहुसंख्यक समाज में ‘एकल संतान’ की यह मानसिक ग्रंथि स्थायी हो गई, तो भविष्य में इसे बदलना असंभव होगा।
सांस्कृतिक, धार्मिक और सभ्यतागत पहचान पर संकट
इसके साथ एक तथ्य जैसा कि पूर्व में संकेत भी दिया गया, जनसंख्या किसी भी सभ्यता की जीवंत वाहक भी होती है। जब किसी विशिष्ट जीवन-पद्धति, दर्शन और संस्कृति को मानने वाली मूल आबादी सिकुड़ने लगती है, तब फिर उस संस्कृति का अवसान भी निश्चित हो जाता है। भारतीय सभ्यता की मूल चेतना उसकी पारिवारिक व्यवस्था और हिन्दू संस्कार, परम्परा में निहित रही हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना का प्रारंभ भारतीय परिवारों के भीतर से होता था, पर जब हिन्दू परिवारों में ‘एकल संतान’ के बढ़ते चलन को देखा जाता रहेगा तो इसके कारण आने वाले समय में रिश्तों का विलोपन होना तय है।
जब किसी परिवार में केवल एक ही बच्चा होगा, तो आने वाली पीढ़ी के पास न तो कोई भाई होगा, न बहन, न चाचा, न बुआ, न मामा, और न मौसी। भारतीय समाज में जो रिश्ते सामाजिक सुरक्षा, मानसिक संबल और उत्सवों का आधार होते थे, वे पारिवारिक वृक्ष से पूरी तरह गायब हो जाएंगे। बच्चा एक अत्यंत एकाकी परिवेश में बड़ा होगा।
इसके अतिरिक्त, भारत में पारंपरिक रूप से बुजुर्गों की देखभाल परिवार के भीतर ही सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में की जाती थी, किंतु भविष्य में, जब एक कामकाजी दंपत्ति स्वयं अकेले होंगे और उनके ऊपर चार वृद्ध माता-पिता (दोनों के माता-पिता) की देखभाल की जिम्मेदारी होगी, तो यह व्यवस्था पूरी तरह ढह जाएगी। इसके परिणामस्वरूप ओल्ड-एज होम्स (वृद्धाश्रमों) की बाढ़ आएगी, जो भारतीय संस्कृति के मूल मूल्यों के विपरीत है।
दूसरी ओर लोकतंत्र में संख्या बल ही सबसे बड़ी शक्ति होती है। यदि किसी विशिष्ट भूभाग में बहुसंख्यक हिन्दू जनसंख्या तेजी से वृद्ध होकर निष्क्रिय होती है और युवाओं का अनुपात घटता है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से वहां की राजनीतिक और सांस्कृतिक सत्ता का संतुलन बदलना स्वाभाविक है। इस संदर्भ में विश्व के कई देशों के उदाहरण भी आज मौजूद हैं जो यह बताते हैं कि जब किसी समाज में युवाओं की संख्या कम हो जाती है, तो उसकी सांस्कृतिक आक्रामकता, कला, संगीत, त्योहारों का उत्साह और अपनी विरासत को संरक्षित करने की जिजीविषा भी क्षीण होने लगती है। भारत की सनातन पहचान, जो हजारों वर्षों के विदेशी आक्रमणों के बाद भी अक्षुण्ण रही, उसे आज इस आंतरिक जनसांख्यिकीय शून्यता (Demographic Vacuum) से सबसे बड़ा खतरा है।
महत्वपूर्ण अकादमिक संदर्भ और वैश्विक विचार
वस्तुत: यहां उठाए गए प्रश्नों और चिंताओं की पुष्टि वैश्विक विद्वानों और विचारकों के अकादमिक सिद्धांतों से भी होती है, यहां कुछ के विचार प्रमुखता से दिए जा रहे है-
अपनी पुस्तक ‘द स्ट्रेंज डेथ ऑफ यूरोप: इमिग्रेशन, आइडेंटिटी, इस्लाम’ में ब्रिटिश लेखक डगलस मरे ने विश्लेषण देते हुए स्वष्ट किया है कि कैसे यूरोपीय देशों ने अपनी गिरती जन्मदर के कारण पैदा हुई जनसांख्यिकीय शून्यता को भरने के लिए बड़े पैमाने पर प्रवासन (इमिग्रेशन) की अनुमति दी। मरे लिखते हैं कि “जब कोई सभ्यता अपने भविष्य (बच्चों) में निवेश करना बंद कर देती है, तो वह आत्मसमर्पण की स्थिति में आ जाती है।” यूरोप के मूल निवासी बूढ़े हो रहे हैं और उनकी जन्मदर बहुत कम है, जिसके कारण वहां की जनसांख्यिकी और संस्कृति पूरी तरह बदल रही है। यहां आज भारत के संदर्भ में यह चेतावनी अत्यंत प्रासंगिक है।
इस संबंध में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री दीपक लाल के विचार भी बहुत प्रासंगिक हैं, वे अपनी पुस्तक ‘द हिन्दू इक्विलिब्रियम’ में भारतीय इतिहास के आर्थिक और सांस्कृतिक स्थायित्व का बहुत गहराई से विश्लेषण करते हैं। वे बताते हैं कि भारत की प्राचीन व्यवस्था ने अपनी सांस्कृतिक निरंतरता (Cultural Continuity) को इसलिए बनाए रखा क्योंकि उसका सामाजिक और पारिवारिक ढांचा अत्यधिक सुदृढ़ और जनसांख्यिकीय रूप से आत्मनिर्भर था, परन्तु आधुनिक आर्थिक दबाव और सांस्कृतिक बदलाव इस ‘हिन्दू संतुलन’ को बुनियादी तौर पर तोड़ रहे हैं।
यहां अमेरिकी जनसांख्यिकी विशेषज्ञ निकोलस एबरस्टाड की पुस्तक ‘द डेमोग्राफिक फ्यूचर’ को भी देखा जा सकता है, जोकि अपने शोधों में सिद्ध करते हैं कि कैसे “कम प्रजनन दर का जाल” (Low Fertility Trap) एक ऐसा चक्र है जिससे बाहर निकालना किसी भी समाज के लिए लगभग असंभव हो जाता है।
अब बात नीतिगत रोडमैप की है
भारत के सामने खड़ा यह जनसांख्यिकीय संकट कहना होगा कि एक सभ्यतागत चुनौती है। इससे निपटने के लिए बहुआयामी और दीर्घकालिक रणनीतियों की आवश्यकता है। जिसमें कि सबसे पहले, भारत को अब सिर्फ ‘जनसंख्या नियंत्रण’ की पुरानी घिसी-पिटी नीतियों से बाहर निकलकर ‘जनसंख्या स्थिरीकरण और पर ध्यान केंद्रित करना होगा। ऐसे राज्यों और समुदायों में जहां जन्मदर खतरनाक रूप से नीचे जा चुकी है, वहां परिवारों को दो बच्चे पैदा करने के लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
फ्रांस और नॉर्डिक देशों की तरह भारत को भी ‘प्रो-फैमिली’ नीतियां अपनानी चाहिए, जहां कामकाजी महिलाओं के लिए पेड मैटरनिटी लीव, किफायती डे-केयर सेंटर्स और टैक्स में छूट देकर दो बच्चों और इससे अधिक बच्चों के परिवारों को प्रोत्साहित किया जाए। दूसरा, चूँकि साल 2050 तक बुजुर्गों की संख्या 34.7 करोड़ होनी तय है, इसलिए भारत को अभी से ‘सिल्वर इकोनॉमी’ और जेरियाट्रिक केयर में निवेश बढ़ाना चाहिए। सेवानिवृत्ति की आयु को क्रमिक रूप से बढ़ाने और वरिष्ठ नागरिकों को उनकी शारीरिक क्षमता के अनुसार आंशिक रोजगार देने की व्यवस्था करनी होगी, ताकि वे देश की अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह आश्रित न रहें।
तीसरे उपाय के रूप में इसके साथ ही समाज और सांस्कृतिक विचारकों को आधुनिक युवाओं के बीच ‘पारिवारिक निरंतरता’ के महत्व को पुनर्स्थापित करना होगा। अत्यधिक करियरवाद और पश्चिमी शैली के अति-व्यक्तिवाद के मुकाबले भारतीय सभ्यता की कोर वैल्यू यानी कि परिवार और संतानोत्पत्ति को एक पवित्र सामाजिक कर्तव्य मानना के पुनरुत्थान मिशन के रूप में आवश्यक अभियान चलाने होंगे। अब यदि यह सब नहीं किया जाता तो फिर इतना तय है कि वह विकसित होने के पहले ही बूड़ा हो जाएगा, जोकि लाखों साल की सभ्यता के बाद आज तक भारत में नहीं हुआ, वह 21वीं सदी में हो जाएगा!
कुल मिलाकर इस संदर्भ में सामने आ रहे सभी तथ्य और साक्ष्य स्पष्ट चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वर्तमान रुझान जारी रहे, तो भारत वर्ष 2050 तक एक ऐसे संकट में घिर जाएगा जहां उसके पास न तो आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए पर्याप्त युवा कार्यबल होगा, और न ही अपनी प्राचीन सनातन संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए जनसांख्यिकीय संबल।
(लेखक फिल्म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)



