कमाल! जितना लिखा, सच उससे अधिक निकला।

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संत समीर

दिल्ली। मैंने किसी पोस्ट में नेहा बोरा की बात करते हुए स्वतन्त्र भारद्वाज की बात कर दी थी, तो कुछ लोग इतने परेशान हुए कि उनकी शिकायत अभी तक बनी हुई है कि मैंने स्वतन्त्र भारद्वाज के साथ नेहा बोरा की तुलना क्यों कर दी। लेकिन कल की घटना का क्या कहूँ, जिसके बाद नेहा बोरा नाम की ये वामपन्थी बिटिया मुझे और गई-गुज़री लगने लगी हैं।

अभी तक मैं बस इतना समझता था कि नेहा विचारधारा की बीमार हो सकती हैं, पर जुनून वाली हैं, लेकिन कल की घटना से लगा कि ये भरपूर शातिर और झूठ बोलने में माहिर भी हैं। आइसा के पूरे इतिहास में इतना निर्लज्ज झूठ बोलने वाला शायद ही कोई और अध्यक्ष कभी रहा होगा।
कल की घटना यह है कि नेहा बोरा ने रील बनाकर प्रचार किया कि जब वे मन्दिर मार्ग पुलिस स्टेशन गईं तो वहाँ पचास-साठ गुण्डे उनके ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे और माइक पर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे कि नेहा बोरा यहाँ आएँगी तो हम देख लेंगे कि उन्हें हमसे कौन बचाएगा।
अब समझिए कि सच क्या है। साथ ही यह भी बताता चलूँ कि सच का पता मुझे इसलिए है कि सौभाग्य या दुर्भाग्य से आन्दोलनकारियों और आन्दोलन-विरोधियों, दोनों के ही कुनबे में मेरे दो-चार परिचित और मित्र हैं ही। भाँति-भाँति की विचारधारा वाले लोगों से परिचय का यह लाभ और हानि है कि सङ्कट के समय हमारे जैसे लोगों को दोनों ही ओर के मित्रों की मदद की कोशिश करनी पड़ सकती है।
तो एक ओर का सच यह है कि नेहा बोरा ने परसों की रात में तय किया कि उन्हें मन्दिर मार्ग पुलिस स्टेशन पहुँचना है, जबकि दूसरी ओर का सच यह है कि जिन लोगों पर वे आरोप लगा रही हैं, वे पचास-साठ नहीं पाँच सौ से कुछ अधिक थे और उनका मन्दिर मार्ग पुलिस स्टेशन पर प्रार्थना-पत्र देने का एक कार्यक्रम हफ़्ते भर पहले से तय था। वे गुण्डे नहीं, बल्कि कई राज्यों से आए पढ़े-लिखे वकील, डॉक्टर, इञ्जीनियर आदि थे। जो लोग वहाँ थे, वे हफ़्ते भर पहले अपने नाम का रजिस्ट्रेशन करवाकर पहुँचे थे। पहले से तय था कि उन्हीं लोगों को आना है, जिनका पहले से रजिस्ट्रेशन रहेगा।
अब प्रश्न हो सकता है कि ऊपर की इक्का-दुक्का बातों की बात अलग है, लेकिन इतना सब कुछ इतनी बारीक़ी से आख़िर मुझे कैसे पता! उत्तर यह है कि उस कार्यक्रम में ऐसे भी लोग थे, जिन्हें मैं जानता हूँ। इसके अलावा उसमें शामिल होने की बात मेरे सामने भी आई थी, लेकिन पिछले कुछ समय से समर्थन और विरोध, दोनों ही तरह के आयोजनों में शामिल होना मैंने बन्द कर रखा है।
यह कार्यक्रम लखनऊ के अधिवक्ता रिज़वान अहमद ने आयोजित किया था। वही रिज़वान अहमद, जिनके सामने तर्क-वितर्क करने से विरोधी लोग आमतौर पर बचते रहते हैं। हफ़्ते भर पहले से हर दिन का अपडेट रिज़वान के यूट्यूब चैनल ‘फेस टू फेस’ (FACE TO FACE) पर आप देख सकते हैं। जो लोग सच को समझना चाहते हैं, उन्हें ज़रूर देखना चाहिए।
बात यह है कि मौक़ा देख नेहा बोरा ने जानबूझकर निर्लज्ज सफ़ेद झूठ बोला। रिज़वान अहमद का नाम हो सकता है इसलिए न लिया हो कि कहीं मुसलमान नाम आते ही एक वर्ग में असमञ्जस की स्थिति न बनने लगे। सङ्ख्या भी पचास-साठ तक कहना सुविधाजनक है, क्योंकि इतने लोगों के लिए ‘गुण्डा’ नाम देना आसान है, जबकि पाँच-छह सौ लोगों को सीधे गुण्डा कह देना अविश्वसनीय लगता है।
अब यह भी देखिए कि नेहा बोरा ख़ुद को फँसता हुआ देखकर कैसे पैंतरे बदलना शुरू करती हैं। पहले इन्होंने 50-60 गुण्डों की बात की और इनके रील बनाने के बाद जब रिज़वान अहमद की प्रतिक्रिया सामने आ गई तो घण्टे भर बाद ही ये मोहतरमा बात बदल 80-90 व्हाट्स एप अङ्कल बोल-बोलकर रील बनाने लगीं। इन्होंने अपनी आँखों से जिन गुण्डों को प्रत्यक्ष देखा था, वे अब व्हाट्स एप अङ्कल हो गए। वैसे एक सूचना यह भी है कि नेहा को पता चला था कि मन्दिर मार्ग थाने पर 24 अक्टूबर को कुछ लोग आने वाले हैं, जो ख़तरनाक नहीं हैं, तो उसी वक़्त वहाँ पहुँच कर नैरेटिव फैलाने का काम किया जा सकता है।
एक मज़ेदार सवाल यह भी है कि आज के ज़माने में सौ-दो सौ मीटर दूर से तमाम गुण्डे आपके विरोध में लाउड स्पीकर पर चिल्लाते नज़र आने लगें तो क्या आप या आपके साथी उन गुण्डों की हरकतों की तसवीरें फटाफट नहीं खींचेंगे या वीडियो नहीं बनाएँगे, ताकि शासन-प्रशासन या लोगों को प्रमाणस्वरूप दिखाया जा सके।
जो भी हो, रिज़वान अहमद आसानी से पिण्ड छोड़ने वाले व्यक्ति हैं नहीं, तो आगे देखिए कि नेहा बोरा के बयान और क्या-क्या बदलते हैं।
नवभक्तों को कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन बाक़ी लोग सोच सकते हैं कि ऐसे आन्दोलनकारी यदि महात्मा गान्धी और भगत सिंह का नाम लेते हैं, तो इनके चाल-चरित्र को क्या नाम देना चाहिए?

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