13 देशों के 101 संगठनों के सीक्रेट नेटवर्क का खुलासा

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०उमेश चतुर्वेदी

दिल्ली। अमेरिकी न्यूज़ चैनल #फॉक्स न्यूज की एक खोजी रिपोर्ट के खुलासे ने भारत में चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी,विपक्ष और #प्रशान्त भूषण जैसे अराजकतावादी जमात के तख्ता पलट अभियान पर नया खुलासा किया है। फॉक्स न्यूज की पत्रकार हैं असरा क्यू नोमानी। उन्होंने फ्रांस, डेनमार्क, स्पेन, इटली ,भारतऔर अल्बानिया आदि में चल रहे जनांदोलनों को लेकर एक खोजी रिपोर्ट तैयार की है।

“ग्लोबल केओस इंक ग्रोज़ टू 101 ग्रुप्स”
(वैश्विक अराजकता का तंत्र 101 समूहों तक फैला)

नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोप में मौजूदा दौर में चल रहे जनांदोलनों के पीछे निश्चित तौर पर कुछ स्थानीय कारण मसलन शिक्षा के बजट की कटौती और महंगाई आदि है। लेकिन इसकी आड़ में 13 देशों के 101 संगठनों का एक समूह दंगों और अराजकता को भड़काने की सफल कोशिश कर रहा है। असरा नोमानी की रिपोर्ट के तथ्य भारत में चल रहे छात्र व राजनीतिक प्रदर्शनों के पीछे भी इसी संगठन का हाथ होने की तसदीक करते हैं। इन संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय ‘सीक्रेट नेटवर्क’ तैयार किया है। जो ग्लोबल प्रोटेस्ट इको-सिस्टम के तौर पर काम कर रहा है। असरा क्यू नोमानी की इस पड़ताल के अनुसार, यह नेटवर्क बेहद शातिर ढंग से काम कर रहा है। यह स्थानीय स्तर की समस्याओं को चिन्हित कर रहा है, फिर उसके खिलाफ उठी आवाजों की पहचान करके उनके साथ अपने नेटवर्क के लोगों को जोड़कर दंगों, आगजनी और हंगामे को हवा दे रहा है।

असरा क्यू नोमानी की खोज रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल प्रोटेस्ट इको-सिस्टम में दुनियाभर के 101 संगठनों का सिंडिकेट काम कर रहा है। इस तंत्र में वामपंथी संगठन, छात्र गुट, ट्रेड यूनियनें और एडवोकेसी नेटवर्क और के

#एनजीओ शामिल हैं। दिलचस्प यह है कि इनमें उन सभी देशों के स्थानीय संगठनों को भी जोड़ा गया है, जिनकी सोच वामपंथी हैं, जो एलजीबीटीक्यू और समलैंगिकता आदि के नाम पर कथित आजादी का समर्थक है। फिर इन सबका सिरा हर उस देश के आंदोलनकारी तत्वों के पीछे की ताकतों से जुड़ता है। असरा तो दावे के साथ कहती हैं कि फ्रांस और भारत के आंदोलनों का सिरा आपस में इस नेटवर्क के जरिए जुड़ा हुआ है। असरा ने अपनी खोजी रिपोर्ट की शुरुआत में अपनी जांच फ्रांस के अशांत इलाकों में फैली हिंसा को लेकर सिर्फ 50 संगठनों पर ध्यान केंद्रित किया था। लेकिन जैसे-जैसे उनकी जांच आगे बढ़ी, संगठनों की संख्या 101 तक जा पहुंची, जो 13 देशों में फैले हुए हैं। नोमानी की रिपोर्ट में ये दावा किया गया है ये फ्रांस और भारत में हो रहे प्रदर्शनों के संदेशों को जोड़ने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा ये संगठन मैनहट्टन में पीपल्स फोरम से साथ भी रिश्ता रखता है।

०कृषि कानूनों से शुरू हुआ टूल किट सिस्टम०

भारत में जब पांच साल पहले तीन कृषि कानूनों के विरोध की आड़ में जब किसान आंदोलन हुआ था, तब एक शब्द प्रचलन में आया था टूलकिट। #टूलकिट यानी आंदोलन की पूरी रूपरेखा। याद कीजिए, तब अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग का भी नाम सामने आया है। स्वीडन की इस पर्यावरण कार्यकर्ता ने किसान आंदोलन के समर्थन और भारत की मोदी सरकार के विरोध में आवाज उठाए थे। अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और भारत विरोधी टूलकिट का एक उदाहरण प्रधानमंत्री मोदी की नार्वे यात्रा के दौरान भी दिखा था, जब वहां की एक अनाम-सी पत्रकार हेला लेंग ने प्रधानमंत्री से सवाल पूछकर सनसनी फैलाने की कोशिश की थी। फॉक्स न्यूज की पत्रकार असरा क्यू नोमानी की यह खोज रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा ग्लोबल नेटवर्क और इको सिस्टम ने भी बाकायदा टूलकिट बनाया है और उसकी अपनी रणनीति भी है। इसके जरिए वह भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में स्थानीय नाराजगी वाले मुद्दों को हवा देकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, ये संगठन विरोध-प्रदर्शनों के एजेंडे को आपस में साझा कर इन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला रहे हैं। इसमें नेविल रॉय सिंघम से जुड़े सूत्रों व कुछ अन्य समूह भी शामिल हैं। यह रिपोर्ट एक तरह से इन पूरे आंदोलनों का मास्टर माइंड साबित करती है।

#नेविल राय सिंघम का कनेक्शन०

असरा की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसे #शंघाई चीन में रहने वाले अमेरिकी मूल के तकनीकी क्षेत्र के ताकतवर उद्योगपति नेविल रॉय सिंघम ना सिर्फ आर्थिक मदद कर रहे हैं, बल्कि उसे समर्थन भी दे रहे हैं। नेविल रॉय सिंघम विवादास्पद शख्सियत रहे हैं। नेविल रॉय सिंघम का जिक्र होने से असरा की रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर चर्चित हो चुकी है। पर्दे के पीछे से इन आंदोलनों की आड़ में नेविल के समर्थन और आर्थिक सहयोग की बात को समर्थन 14 अक्टूबर को ब्रेकथ्रू न्यूज के में छपे नेविल रॉय सिंघम की पत्नी और कोडपिंक की सह संस्थापक जोडी इवांस के इंटरव्यू से मिलता है। इस इंटरव्यू में जोडी इवांस ने फ्रांस, स्पेन और भारत में हो रहे विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा है कि वह चाहती हैं कि लोग फ्रांस, स्पेन और भारत की ओर देखें और खुद से सवाल करें कि वे कहां हैं और वे सड़कों पर क्यों नहीं हैं। जोडी इवांस एक तरह से वैश्विक स्तर पर लोगों को उकसा रही हैं कि वे आंदोलनों के सड़कों पर उतरें और अराजकता को बढ़ावा दें। यहां याद करना जरूरी है कि जुलाई 2026 में अमेरिकी कांग्रेस ने सिंघम से जुड़े कई ट्रस्टों और संस्थाओं को गैर-लाभकारी फंडिंग के गलत इस्तेमाल व विदेशी एजेंडे के तहत समन भी भेजा था।

०ब्रेकथ्रू न्यूज #कोडपिंक……
कम्युनिस्ट आंदोलन भले ही बराबरी की स्थापना की बात करे, लेकिन उसकी पूरी सोच के मूल में हिंसा है। दुनियाभर के कम्युनिस्ट आंदोलनों को देखेंगे तो उनमें खून-खराबा ही नजर आता है। भारत में उन्हें लेकर एक छवि रही है कि वे काफी पढ़े-लिखे होते हैं। लेकिन हालिया जंतर-मंतर के प्रदर्शन में जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अभद्र और असभ्य गालियों का प्रदर्शन हुआ, गालियों वाले पोस्टर लहराए गए, युवाओं ने मोदी को गंदी-गंदी गालियां दीं, उसे कथित कम्युनिस्ट विचारकों ने जमकर सराहा। उसका न सिर्फ बचाव किया, बल्कि यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी इसी के काबिल हैं। एक कम्युनिस्ट पूर्व प्रोफेसर ने गालियों के समर्थन में तर्क दिया कि बचपन में वह अपने पिता के दोस्तों को खूब गालियां देता था। बहरहाल हिंसा, बदसलूकी और गालियां कम्युनिस्ट आंदोलन का चेहरा रही हैं। असरा क्यू नोमानी की रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती है। असरा की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यूरोप में हो रहे प्रदर्शनों और उसकी वजह से हुई अशांति को कम्युनिस्ट-समर्थक संगठनों का एक नेटवर्क भी बढ़ावा दे रहा है। इसमें ‘ब्रेकथ्रू न्यूज़’, ‘कोडपिंक’ और ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ जैसे वामपंथी संगठन शामिल हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार, प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल नामक एक अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद विरोधी संगठन ने 16 अक्टूबर को अपनी वेबसाइट पर एक ब्रीफिंग के दौरान फ्रांस, स्पेन, भारत और अल्बानिया में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को एक साथ जोड़कर पेश किया। इसी ब्रीफिंग में सवाल उठाया गया कि ये नए विद्रोह संगठित होकर क्या इतना ताकतवर हो सकते हैं कि उन हालात को बदल दें, जिनके चलते ये विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

०आईएपी और ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल गठजोड़०

असरा की खोजी रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला नाम आया है फ्रांस स्थित संगठन ‘इंडियन अलायंस पेरिस’ यानी आईएपी का। #IAP . यह संगठन फ्रांस में स्थित भारतीय छात्रों, शोधकर्ताओं और प्रोफेशनल्स का एक ग्रुप है। इस संगठन ने फ्रांसीसी दंगों के साथ ही भारत में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों, मसलन चुनाव आयोग के खिलाफ हालिया प्रदर्शन व छात्र असंतोष को एक ही धागे में पिरोने की भूमिका निभाई है। असरा नोमानी की खोजी रिपोर्ट में ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल’ नामक एक रिसर्च इंस्टीट्यूट का भी जिक्र है, जिसका नेतृत्व विजय प्रशांत करते हैं। इस रिपोर्ट में विजय प्रशांत के 18 अक्टूबर को ‘X’ (ट्विटर) पर लिखी एक पोस्ट का भी हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने पेरिस, नई दिल्ली और ब्यूनस आयर्स में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच समानताएं बताईं हैं। इस पोस्ट में विजय प्रशांत ने आगे लिखा है कि गुस्से को अपना समय लेने दें, क्योंकि गुस्सा ताकत बन सकता है। असरा की रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि अशांति फैलाने वाले इस नेटवर्क की पहुंच सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नेटवर्क फ्रांस में आगे के प्रदर्शनों और 20 नवंबर को समूचे यूरोप में व्यापक युवा आंदोलन की तैयारी कर रहा है। साफ है कि अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर जारी प्रदर्शनों के पीछे बड़ा वैश्विक नेटवर्क काम कर रहा है।

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