कार्यकर्ता विकास वर्ग, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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नागपुर । इस इन्फोपैक में विकास वर्ग की विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें इसकी शुरुआत और बाद के इतिहास को भी शामिल किया गया है। डॉ. हेडगेवार जी से लेकर पूजनीय गुरुजी और वर्तमान समय में इसके स्वरूप की जानकारी इस इन्फोपैक में शामिल है। साथ ही, विगत वर्षों में आए शिक्षार्थियों की संख्या भी बताई गई है। एक क्रोनोलॉजी भी दी गई है, जो कार्यकर्ता विकास वर्ग के इतिहास की व्यापकता को स्पष्ट करती है।

 

कब शुरुआत हुई थी?

संघ शिक्षा वर्ग की शुरुआत 1927 में नागपुर में हुई थी। उसदौरान यह तीन सप्ताह तक चले थे और इन्हें ग्रीष्मकालीन वर्गकहा गया। फिर कुछ वर्षों बाद इनका नाम ‘अधिकारी शिक्षावर्ग’ हो गया। बाद में वर्ष 1950 में इन वर्गों को ‘संघ शिक्षा वर्ग’ के नाम से जाना जाने लगा।

संघ में कार्यकर्ता के प्रशिक्षण की व्यवस्था प्रारम्भ से ही रही है। अन्य प्रशिक्षण-प्रयासों के साथ ही संघ शिक्षा वर्ग, जो पहले“ऑफिसर ट्रेनिंग कैम्प” के नाम से जाने जाते थे। इसके महत्त्वका अनुमान हम इसी बात से कर सकते हैं कि पूजनीयसरसंघचालक का एक बार का देशभर का प्रवास इसी निमित्तहोता है।

कई वर्षों तक प्रारंभिक व्यवस्था में भोजन आसपास के घरों सेआता था और स्थानीय पाठशालाओं में शिक्षार्थियों का निवासरहता था। जैसे नागपुर के लोकांचीशाला, धनवटे नगरविद्यालय (निलसिटी विद्यालय) और न्यू इंग्लिश स्कूल केभवन। यह सभी निशुल्क उपलब्ध होते थे। इसके अलावा वर्गोंके दौरान चिकित्सा, बिजली, जल इत्यादि के खर्चों के लिए वर्गमें शामिल शिक्षार्थियों से शुल्क भी लिया जाता था।

इन वर्गों की सफलता के लिए डॉ. हेडगेवार को अन्ना सोहनीऔर मार्तंडराव जोग का सहयोग मिला। शुरूआती वर्गों मेंशारीरिक कार्यक्रम समाप्त होने पर डॉ. हेडगेवार वर्ग में आयेसभी स्वयंसेवकों को चिटणीसपुरा की एक बावड़ी पर तैरने केलिए ले जाया करते थे। आगे चलकर संख्या बढ़ने पर बावड़ीपर जाना बंद हो गया।

1939 के आसपास यह वर्ग हेडगेवार स्मृति मंदिर रेशिमबाग, नागपुर में आयोजित होने लगे। तब से अब तक यह संघ शिक्षावर्ग यही लगते हैं। यह भूमि डॉ. हेडगेवार ने ₹700 में खरीदीथी।

कार्यक्रम की संरचना

प्रातः पांच से रात नौ बजे तक वर्ग के शारीरिक और बौद्धिककार्यक्रम चलते थे। शुरुआत में सुबह के दो-ढाई घंटे और शामका डेढ़ घंटा शारीरिक प्रशिक्षण के लिए दिया गया था। दोपहरसाढें बारह बजे से पांच बजे तक का समय विश्राम, वार्तालाप, चर्चा और स्वयंसेवकों द्वारा टिप्पणियां लिखकर रखने के लिएरखा गया था।

नागपुर के बाद विस्तार

नागपुर में वर्गों की सफलता के बाद यह 1934 में पुणे मेंआयोजित होने लगे। फिर अगले साल से पुणे में प्रथम औरद्वितीय वर्ष के वर्ग शुरू हो गये। ग्रीष्मकालीन छुट्टियों के सुविधाके अनुसार पुणे का वर्ग 22 अप्रैल से 2 जून तक और नागपुरका वर्ग 1 मई से 10 जून तक हुआ करता था। डॉ. हेडगेवार 15 मई तक पुणे में और उसके बाद नागपुर में प्रवास करते थे।

पुणे के बाद यह वर्ग नासिक में शुरू हुए। साल 1942-43 में इनवर्ग में हिस्सा लेने वाले स्वयंसेवकों की संख्या पौने तीन हजारतक पहुंच गयी थी। इस बीच 1938 में महाराष्ट्र से बाहर लाहौरमें भी वर्गों की शुरुआत हुई। इसके बाद जैसे-जैसे कार्य बढ़तागया, अन्य प्रान्तों में प्रथम और द्वितीय वर्ष के संघ शिक्षा वर्गआयोजित होने लगे। अब केवल तृतीय वर्ष की शिक्षा के लिएस्वयंसेवकों का नागपुर में आना अनिवार्य किया गया।

देशव्यापी विस्तार

1940 के नागपुर में हुये संघ शिक्षा वर्ग में उत्तर से लेकर दक्षिणतक और पूर्व से लेकर पश्चिम तक के सब प्रान्तों से शिक्षार्थीस्वयंसेवक उपस्थित थे। दुर्भाग्यवश इसी साल के शिक्षा वर्गकी समाप्ति के केवल कुछ दिनों के बाद ही यानी 21 जून 1940 को संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार का देहावसान हो गया।

मई-जून में ही क्यों?

विद्यालयों और महाविद्यालयों का इन महीनों में ग्रीष्मावकाशरहता है। परीक्षाएं भी समाप्त होने के चलते विद्यार्थी मुक्त रहतेहै। इसलिए इन महीनों में युवाओं को संघ की कार्यविधि सेपरिचय करवाने के लिए संघ शिक्षा वर्ग शुरू हुए थे। तभी सेयह व्यवस्था आजतक कायम है।

इस निरंतर प्रवाह में रुकावटें

इस दौरान 1948-1949 में संघ पर प्रतिबंध और 1976-1977 में आपातकाल के दौरान प्रतिबंध, 1993 में प्रतिबंध और 1991 में विशेष राष्ट्रीय परिस्थितियों (पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी कीहत्या और लोकसभा चुनाव) के दौरान यह वर्ग अवरुद्ध हुए थे। बीते सालों में कोरोना महामारी के दौरान 2020-2021 में भी इनशिक्षा वर्गों को स्थगित करना पड़ा था।

 

शिक्षार्थियों की संख्या

वर्ष

संघ शिक्षा वर्गों में सम्मिलित स्वयंसेवक

2012

प्रथम वर्ष – 10,623 शिक्षार्थी 7078 स्थानों से

द्वितीय वर्ष – 2581 शिक्षार्थी 2116 स्थानों से

तृतीय वर्ष नागपुर में – 923 शिक्षार्थी 859 स्थानों से

2013

प्रथम वर्ष – 12549 शिक्षार्थी 7408 स्थानों से

द्वितीय वर्ष – 3063 शिक्षार्थी 2320 स्थानों से

तृतीय वर्ष नागपुर में – 1003 शिक्षार्थी 923 स्थानों से

2015

प्रथम वर्ष – 17835 शिक्षार्थी 10540 स्थानों से

द्वितीय वर्ष – 3715 शिक्षार्थी 2812 स्थानों से

तृतीय वर्ष नागपुर में – 875 शिक्षार्थी 804 स्थानों से

2017

प्रथम वर्ष – 15716 शिक्षार्थी 9734 स्थानों से

द्वितीय वर्ष – 3796 शिक्षार्थी 2959 स्थानों से

तृतीय वर्ष नागपुर में – 899 शिक्षार्थी 834 स्थानों से

2019

तृतीय वर्ष नागपुर में – 828 शिक्षार्थी

2022

40 वर्ष से कम आयु के 18,981 और 40 वर्ष से अधिक आयु के 2925 शिक्षार्थियों ने वर्गों में सहभागिता की

प्रथम, द्वितीय व तृतीय वर्ष के 101 वर्गों में कुल 21,906 शिक्षार्थी रहे

2023

तृतीय वर्ष, नागपुर – 682 शिक्षार्थी

2024

कार्यकर्ता विकास वर्ग-2, नागपुर – 936 शिक्षार्थी

2025

कार्यकर्ता विकास वर्ग-2, नागपुर – 840 शिक्षार्थी

2026

कार्यकर्ता विकास वर्ग-2, नागपुर – 880 शिक्षार्थी

वर्ष 2024 से वर्गों के प्रारूप में परिवर्तन किया गया है। अबप्रारंभिक वर्ग- 3 दिन का, प्राथमिक शिक्षा वर्ग -7 दिन का, संघशिक्षा वर्ग –15 दिन तथा कार्यकर्ता विकास वर्ग-1(इस वर्ग कोपहले संघ शिक्षा वर्ग द्वितीय वर्ष के नाम से जाना जाता था) 20 दिन का और कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 (इस वर्ग को इससे पूर्वसंघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष कहते थे) 25 दिन का होगा।

कार्यकर्ता विकास वर्ग-2 समापन समारोह, नागपुर

वर्ग 40 दिनों के होते थे और रविवार को अवकाश होता था। रविवार को शिक्षार्थी बाहर भी जा सकते थे। परंतु शीघ्र ही रविवार अवकाश हटाकर इसे सतत 30 दिनों वाला वर्ग बना दिया गया। तभी प्रांत में वर्ग के पश्चात नागपुर वर्ग आने की परंपरा प्रारंभ हो गई थी।

संघ शिक्षा वर्ग के दो प्रकार हैं – (1) 18 से 40 वर्ष आयु केसामान्य वर्ग, और 41 से 65 वर्ष की आयु के विशेष वर्ग। 65 वर्ष से ऊपर प्रवेश नहीं होता।

वर्तमान में 25 दिनों के दौरान संघ शिक्षा वर्ग के प्रतिभागियोंद्वारा संघ के पूर्ण गणवेश में पथ संचलन भी निकाला जाता है। वर्ग के समारोप का कार्यक्रम नागपुर शहर द्वारा आयोजित होताहै। साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक काउद्बोधन होता है जोकि तात्कालिक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीयविषयों पर संघ के दृष्टिकोण का सारगर्भित विवरण होता है। इनका सामाजिक मुद्दों जिनसे भारत और उसके नागरिकों कासीधा सरोकार होता है, उसपर सरसंघचालक द्वारा संघ कीरूपरेखा पेश की जाती है। इसमें संघ के स्वयंसेवकों को भीव्यापक दृष्टि प्राप्त होती है।

मुख्य अतिथि

इस दौरान मुख्य अतिथि के तौर पर किसी विशिष्ट व्यक्ति कोविशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है। बीतें एक दशक में आयेमुख्य अतिथियों की सूची इस प्रकार है –

 

 

 

साल

अतिथि

2012

दैनिक पंजाब केसरी के संचालक व संपादक, अश्वनी कुमार

2013

आदिचुनचुनगिरी मठ, कर्नाटक के प्रधान पुजारी, श्री श्री श्री निर्मलानंदनाथमहास्वामी

2014

आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक, श्री श्री रवि शंकर

2015

धर्मस्थल कर्नाटक के धर्माधिकारी पद्मविभूषण, डॉ. विरेन्द्र हेगडे

2016

साप्ताहिक ‘वर्तमान’ (कोलकाता) के संपादक, रंतिदेव सेनगुप्त

2017

नेपाल के पूर्व आर्मी प्रमुख जनरल, रूक्मांगद कटवाल

2018

भारत के पूर्व राष्ट्रपति, प्रणब मुखर्जी

2022

श्रीरामचंद्र मिशन, हैदराबाद के अध्यक्ष, दाजी उपाख्य कमलेश पटे

दिसंबर 2022*

श्री काशी महापीठ, वाराणसी के १००८ जगद्गुरु डॉ. मल्लिकार्जुन विश्वाराध्यशिवाचार्य महास्वामी

2023

श्री सिद्धगिरी संस्थान मठ, कणेरी, कोल्हापुर के अदृश्य काडसिद्धेश्वर स्वामी

2024

श्री रामगिरी जी महाराज, पीठाधीश श्री क्षेत्र गोदावरी धाम, बेट सराला

2025

श्री अरविन्द जी नेताम (पूर्व केन्द्रीय मंत्री, भारत सरकार)

2026

पद्मभूषण, कुमारमंगलम बिड़ला (उद्योगपति)

* वर्ष 2022 में मई और दिसंबर महीनों में दो बार तृतीय वर्ष वर्ग का आयोजनकिया गया था।

वर्गों की विशेषता

• सामाजिक समरसता का भाव – इस दौरान देशभर से बिनाकिसी जातीय और रंगरूप भेदभाव के शिक्षार्थी एकत्रितहोते हैं।
• सामूहिक भोजन – वर्गों में स्वयंसेवक एकसाथ भोजन करतेहै। इसमें भी किसी तरह से भेदभाव नहीं होता।
• सामूहिक जीवन का भाव जागृत – एक साथ मिलकर रहनाऔर वर्गों की सभी गतिविधियों में एकसाथ सहभागिताकरना।
• अखिल भारतीय दृष्टि का व्यापक बोध होता है।
• अनुशासन के प्रति जागरूकता पैदा होती है।
• विविध जानकारियों का ज्ञान – संघ की भौगोलिक रचनाओंऔर संरचनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
• समाज और राष्ट्र के समक्ष पैदा हुई चुनौतियों के समाधानका बोध होता है।
• स्वयंसेवकों में कार्यकुशलता का निर्माण होता है।
• संगठन का भाव – सबके प्रति अपनापन की भावना पैदाहोती है।
• स्वावलंबन – वर्गों के दौरान सभी स्वयंसेवक अपने कार्यस्वयं करते है जिससे उनमें अपने कार्यों को स्वयं करने काभाव पैदा होता है।

 

सरसंघचालक जी के कथन

श्री मोहन भागवत – “यह सब प्रशिक्षण क्यों चल रहा है? इसलिए चल रहा है क्योंकि भारत माता की जय सारे विश्व मेंकरानी है। क्यों करानी है? हम विश्व विजेता बनना चाहते हैंक्या? नहीं, हम विजेता बनने की आकांक्षा नहीं रखते हैं। हमेंकिसी को जीतना नहीं है। हमें सबको जोड़ना है। संघ का कार्यभी किसी को जीतने के लिए नहीं चलता, जोड़ने के लिए चलताहै। भारतवर्ष भी दुनिया में आदिकाल से जीता रहा है तो किसीको जीतने के लिए नहीं, सबको जोड़ने के लिए।“(नागपुर, तृतीय वर्ष, 6 जून 2022)

“हमारे प्राथमिक शिक्षा वर्ग होते हैं। दो-तीन वर्ष संघ में आनेवालों में से चुने हुए स्वयंसेवकों को इस वर्ग में प्रवेश दिया जाताहै। प्रति वर्ष हजारों स्वयंसेवक इन वर्गों में आते हैं। उनकीऔसत आयु 30 वर्ष होती है और उनमें भी 90 प्रतिशत 20 से25 आयु समूह के होते हैं।“ (लोकसत्ता-आयडिया एक्सचेंज – 22 अक्टूबर 2012)

श्री गुरुजी – “शिक्षा वर्ग के सारे कार्यक्रम सोच-समझकरस्वीकार किए गए हैं। ये सब ऐसे कार्यक्रम हैं, जो अपने लिएबहुत उपयोगी हैं। केवल मन को प्रसन्न करनेवाले कार्यक्रमों काउपयोग नहीं होता।“ (गुरुजी समग्र, खंड 4, पृष्ठ 247)

“आप यहाँ संघ की शिक्षा लेकर जा रहे हैं। कार्यकर्ता बनकरजा रहे हैं अर्थात्‌ अपना कर्तव्यक्षेत्र बढा रहे हैं।“ (गुरुजी समग्र, खंड 4, पृष्ठ 16)

“संघ समाज में एकता की भावना निर्माण कर उसे अपने पैरोंपर खडा रहने की शिक्षा देता है।“ (गुरुजी समग्र, खंड 4, पृष्ठ16)

 

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के पत्रों में संघ शिक्षा वर्ग

परममित्र श्री दादाराव परमार्थ से पत्राचार सम्वाद दिनाँक 31/8/1939 नागपुर नगर में डॉ. हेडगेवार जी बताते हैं कि इस वर्ष सभी स्थानों पर संघ कार्य में एक विशेष चैतन्य दिखाई दे रहा है। पंजाब, संयुक्त प्रांत, बिहार बंगाल और कराची से भी उत्साहवर्धक समाचार प्राप्त हो रहे हैं। लाहौर के इस ओ.टी.सी.में कुल 30 स्थानों से डेढ़ सौ से अधिक लोग आये हुए हैं और इस वर्ष पंजाब में सर्वत्र संघ का वातावरण गुंजायमान करने का उनका निश्चय है। (एन. एच. पालकर, डॉ. हेडगेवार पत्ररूप-व्यक्तिदर्शन, पृष्ठ 70)

परममित्र श्री बापूराव वाकणकर के साथ पत्राचार सम्वाद दिनाँक 15-3-1937 में डॉ. हेडगेवार जी कहते हैं कि आगामी मई महीने में होने वाले ऑफिसर्स ट्रेनिंग केम्प की सम्पूर्ण व्यवस्था करने हेतु मैं और 4-5 दिन यहाँ रहूँगा और बाद में फिर प्रवास पर जाऊँगा। (एन. एच. पालकर, डॉ. हेडगेवार पत्ररूप-व्यक्तिदर्शन, पृष्ठ 78)

दिनाँक 17-1-1936, नागपुर नगर से परममित्र श्री वैजापूरकर के साथ पत्र सम्वाद करते हुए डॉ. साहब कहते हैं कि इस पत्र के साथ नागपुर आफिसर्स ट्रेनिंग केम्प के क्रमांक 30 के छपे हुए पत्रक (10) आपको भेज रहे हैं। उन्हें अपने जिले की सभी शाखाओं को तुरन्त भेज दें और ट्रेनिंग केम्प में आपके जिले से अधिकाधिक सुयोग्य और चुने हुए स्वयंसेवक आयें ऐसी व्यवस्था करें। यह कार्य सफलता के साथ सम्पन्न करने के लिए आपको अपने जिले के सभी शाखाओं में प्रवास करना पड़ेगा और जिन स्थानों पर नई संघ शाखाएँ स्थापित करने की आपकी इच्छा हो उन उन स्थानों पर भी आपको जाना पड़ेगा।इस प्रवास के लिए आवश्यक निधि एकत्रित किये बिना आपसे यह कार्य नहीं हो पाएगा। निधि थोड़ा भी लग रही होगा तब भी अभी से आप प्रयास में जुटें। धन के अभाव में कार्य रह गयाऐसा बाद में कहने का प्रसंग न आवे इसकी चिन्ता करें। भेजिये।  (एन. एच. पालकर, डॉ. हेडगेवार पत्ररूप-व्यक्तिदर्शन, पृष्ठ 34)

दिनाँक 12-7-1936 को डॉ. हेडगेवार जी, श्री दामोदरपन्त भटजी से पत्रों में चर्चा करते हुए उनका आभार प्रकट करते हैं और कहते हैं कि दि. 20-5-36 और दि. 3-6-36 के आपके कृपा पत्र मिले। परन्तु उस समय मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर में चल रहे ऑफिसर्स ट्रेनिंग केम्प में पूर्णतः व्यस्त थाइसलिए आपके पत्रों के उत्तर देना मेरे लिए सम्भव नहीं हुआ इसके लिए मुझे क्षमा करें। अब कार्य का भार किंचित कम होने के कारण आपको यह पत्र लिख रहा हूँ। आपके मन में मेरे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विषय में जो अत्यन्त उत्कट प्रेम, और आदर है उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। (एन. एच पालकर, डॉ. हेडगेवार पत्ररूप-व्यक्तिदर्शन, पृष्ठ 39)

 

संघ शिक्षा वर्ग : प्रमुख घटनाक्रम ​

तिथि

विषय

1927

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने 1927 में नागपुर में पहलाप्रशिक्षण शिविर शुरू किया, जिसे संघ शिक्षा वर्ग के नाम से जानाजाता है। जो तीन सप्ताह तक चलते थे। समय के साथ, यह विकसितहुए और उनका नाम बदलकर ‘अधिकारी शिक्षा वर्ग’ कर दिया गया।

मई 1929

ओ.टी.सी (अधिकारी शिक्षा वर्ग) के नाम से प्रशिक्षण वर्ग का प्रारंभहुआ जो लगभग तीन सप्ताह चला होगा। इसमें 17 प्रतिभागी रहे। प्रातः 5 से 9 सैन्य प्रशिक्षण व 12:30 से सांय 5 बजे तक चर्चा आदिरहते थे।

मई 1933

कार्यवृद्धि के परिणामस्वरूप इस वर्ष का अधिकारी शिक्षा वर्ग दोस्थानों पर लगा- नागपुर और मेहकर

अप्रैल 1935

नागपुर के बाहर प्रथम अधिकारी शिक्षा वर्ग का पुणे में प्रारंभ हुआ। इसमें पुणे से 20, कोल्हापुर से 10, चिपलून से 6, सांगली से 2 एवंअन्य ऐसे कुल 50 स्वयंसेवक सम्मिलित थे। डॉक्टर जी जा नहीं सके, लेकिन पत्र लिखकर संगठन, अनुशासन एवं सहकार्य का विषयलिखा।

1937

1937 में नागपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में दिल्ली से 4 स्वयंसेवक श्री टेकचन्द जी व उनके भाई बालकृष्ण, रामजीदास तथाशिवचरण जी सम्मिलित हुए।

10 जून 1938

नागपुर के संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में श्री गुरुजी के बौद्धिकके समय प. पू. डॉक्टर जी मंच पर विराजमान थे। स्वयंसेवकों कोसंबोधित करते हुए सर्वाधिकारी श्री गुरुजी ने जानकारी दी कि मुंबई, बरार, नागपुर, महाकौशल, उत्तर हिन्दुस्तान तथा पंजाब इत्यादि प्रांतोंके तथा भिन्न-भिन्न रियासतों की संघ शाखाओं के लगभग 525 स्वयंसेवकों ने कैंप में भाग लिया है। यहाँ श्री गुरुजी ने कहा कि डॉ. जी ध्येय देव की साकार मूर्ति हैं। अपने व्यक्तित्व को पूर्णतः भूलना हीसंगठन है तथा अपना व्यक्तित्व राष्ट्र में मिलाने से स्वयं राष्ट्र बन जातेहैं। संघ के अच्छे स्वयंसेवक का हृदय ही संघ की विचारधारा व पद्धतिकी अच्छी पुस्तक है।

15 अगस्त 1938

नागपुर व पुणे के अतिरिक्त भाई परमानन्द जी के प्रयासों से लाहौर मेंभी अधिकारी शिक्षा वर्ग लगाया गया। इस वर्ग में बसंत राव मुख्यशिक्षक थे। 15 अगस्त को डॉक्टर जी ने बाबासाहेब आप्टे और श्रीगुरुजी के साथ काशी व दिल्ली होते हुए लाहौर ओटीसी के लिएप्रस्थान किया। इसमें भाई परमानन्द जी के द्वारा डॉक्टर जी केपरिश्रम व संघ की प्रशंसा की गई तथा मध्य प्रांत में 35000 स्वयंसेवक होने की बात कही गई। लाहौर से प्रथम प्रचारक राजपालपुरी जी थे, जो बाद में सिंध के प्रांत प्रचारक बने।

अगस्त 1939

लाहौर में 1939 के संघ शिक्षा वर्ग में केवल श्री गुरुजी ही आए। इसमेंउनके तीन बौद्धिक हुए जिनमें उन्होनें कहा कि संस्कारों के पश्चातव्यक्ति द्विज अर्थात उसका दूसरा जन्म हुआ है, ऐसा माना जाता है। संघ की प्रतिज्ञा के बाद ही मनुष्य का दूसरा जन्म होता है। जिसउद्देश्य को लेकर संघ चला है, उसके लिए आवश्यक है कि हम अपनेआपको नए रूप में ढालें।

1940

1940 में पंजाब से बालवीर जी संघ शिक्षा वर्ग हेतु नागपुर आए जहांउनका भरपूर स्वागत हुआ। बाद में वे तृतीय वर्ष कर शारीरिक प्रमुखबने। उन्हें भेजने की प्रेरणा बाबा साहब आप्टे जी व माधवराव जी कीथी।

23 अप्रैल से 27 मई, 1942

पुणे के नूतन मराठी हाईस्कूल में संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन हुआजिसमें लगभग 1100 स्वयंसेवकों ने भाग लिया तथा इनमें से चुने हुएकुछ स्वयंसेवकों को विशेष शारीरिक एवं मानसिक प्रशिक्षण दियागया। श्री गुरुजी के कहने पर 20 संघचालकों को इस वर्ग में बुलायागया और अंग्रेजों के विरुद्ध हल्ला बोल का आह्वान किया गया। नासिक के संघचालक श्री राजाभाऊ साठे तथा श्री गुरुजी का भाषणभी हुआ। 90 नए विस्तारक कार्य विस्तार हेतु निकले।

1943

रज्जू भैय्या काशी संघ शिक्षा वर्ग में गए। इस वर्ग में बिहार व बंगालसे भी स्वयंसेवक आए थे। यहाँ के प्रचारक बापुराव दिवाकर व विट्ठलराव पतकी थे तथा पांडुरंग क्षीरसागर बंगाल से आए थे।

1946

संघ शिक्षा वर्ग के दीक्षांत समारोह के बौद्धिक में श्री गुरुजी ने कहाकि कर्तव्य निर्माण में ज्ञान और आत्मविश्वास आवश्यक हैं।

1947

मध्य प्रदेश के सागर में हुए संघ शिक्षा वर्ग में 2500 स्वयंसेवकउपस्थित थे। यह कार्य वहाँ के प्रचारक श्री एकनाथ रानडे जी कीकार्यकुशलता से ही संभव हो पाया

जुलाई व अगस्त, 1947

जुलाई-अगस्त 1947 में पंजाब प्रांत में 7 विभाग एवं 31 जिले थे। 1947 में जुलाई के तीसरे सप्ताह में फगवाडा और संगरूर में संघशिक्षा वर्ग शुरू किए गए, जिसमें 3700 स्वयंसेवकों ने भाग लिया। देश की परिस्थिति के कारण इन्हें 6 दिन पूर्व, 12 अगस्त के स्थान पर6 अगस्त को पूर्ण किया गया। यह अखंड भारत का अंतिम वर्ग था। श्री गुरुजी इसके तुरंत बाद श्रीनगर के लिए चल दिए।

1951

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि- बिहार के स्वयंसेवकों ने एकसमय का भोजन छोड़कर घोष हेतु 325 रुपए एकत्रित किए। 1940 मेंडॉक्टर जी के स्वर्गवास के पश्चात गुरुदक्षिणा की राशि एकदम सेबढ़ी। मेहनत, मजदूरी करके व अपना पेट काटकर स्वयंसेवकों द्वारागुरुदक्षिणा की राशि समर्पित की गई। स्वयंसेवक का अर्थ है दृढ़ता।

1952

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी का बौद्धिक हुआ जिसमें उन्होंने कहा किभारत का राष्ट्र जीवन हिन्दुत्व की शक्ति पर ही केंद्रित है। संघ ने राष्ट्रजीवन के इसी सनातन सत्य को आधार बनाया है। एकात्म, एकरस, एकरूप विचारों के लिए शाखा आवश्यक है। संस्कार की नियमितताआवश्यक है। अनुशासनबद्ध समाज निर्मिती में शाखा सिद्ध है।

1953

संघ शिक्षा वर्ग के सार्वजनिक समारोप में श्री गुरुजी का बौद्धिक हुआजिसमें उन्होंने कहा कि यहाँ छोटे में भारत का स्वरूप दिखता है।

1954

बरेली में संघ के शिक्षा वर्ग में उत्तर प्रदेश के 500 स्वयंसेवकों ने भागलिया। इसके समापन में पंजाब के प्रथम प्रांत संघचालक लालाहंसराज जी गुप्त ने भाषण दिया और श्री एकनाथ रानडे ने भीस्वयंसेवकों को संबोधित किया।

1955

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि व्यक्तिगत चरित्र के लिएपौरुष व धैर्य चाहिए। डॉक्टर जी ने नागपुर की जगह बरार सेसत्याग्रह किया। बाद में वहाँ भी संघ कार्य का बीजारोपण हुआ। कार्य करने से कर्तृत्व उत्पन्न होता है और अपना स्थान बनता है। राष्ट्रकार्य का अखंड व्रत सदैव अपने जीवन में जागृत रहे।

1956

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि वासना के कारण सुख-दुखहै। ऐहिक जगत से परे श्रेष्ठ, उच्च दिव्य स्थिति, जिसे आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, निर्वाण या मोक्ष कहा गया है, भारत का आदर्श त्याग है। अगले जन्मों को ध्यान में रखकर जीवन लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।

1957

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि आंतरिक बाधाओं पर विजयप्राप्त करना, अपने राष्ट्र जीवन की स्पष्टता व हिन्दू के बारे में भ्रमनिवारण आवश्यक है। सभी के हृदय में ‘यह राष्ट्र मेरा है, मैं इसकाघटक हूं’ की आवाज रोम-रोम से आना आवश्यक है।

1958

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि अनुशासन, योग्य व्यवहार, बंधुत्व की भावना आवश्यक है, दर्शन से दृष्टि बदलती है। अच्छीशाखा अनेक प्रश्नों का स्वयं हल है।

1959

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि आज विज्ञान के युग में धरतीको माँ कहना पिछड़ापन लगने लगा है। जीवसृष्टि में मनुष्य सर्वश्रेष्ठहै। भूमि को माँ मानना हमारे सात्विक विकास का लक्षण है।

1960

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि छोटी छोटी चीजों को भी ठीकसे करना चाहिए। तत्व व व्यवहार आपस में जुड़े हुए हैं। डॉक्टर जीयथाशक्ति नहीं अपितु तन, मन, धनपूर्वक तथा विधिपूर्वक संघ कास्वयंसेवक बनकर कार्य करने हेतु कहते थे।

1961

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि भारत का विश्व के साथप्राचीन समय से ही संपर्क है। मुसलमानों ने विश्व के कई भागों परकब्जा कर लिया। विगत 100 वर्षों में अंग्रेजों ने हमारे ‘स्व’ से हमेंसफलतापूर्वक दूर किया। हम स्वार्थ व राष्ट्र भाव की कमी के कारणपराभूत हुए। स्वतंत्रता हमारा स्वभाव है और तुष्टीकरण की नीतिघातक है। दासत्व से ही दीनता का भाव जागृत हुआ।

1963

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि शरीर से अधिक मन कीशक्ति प्रबल होती है। स्वत्व को भुलाने हेतु ईसाईकरण करने काषड्यन्त्र रचा गया जिसके फलस्वरूप जाति, पंत, मत, भाषा भेद खड़ेहो गए

1964

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि अनेक विविधताओं के होतेहुए भी हिंदुओं के लिए श्रद्धा स्थान भारत माता ही है। स्वयंसेवकों केलिये मातृभूमि, हिन्दू समाज व राष्ट्र जीवन यही त्रिविध भक्ति केआधार हैं। इसे स्मरण रखते हुए हम पुनः भारत मत को अखंड करनेका व्रत लें।

1965

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गूरुजी ने कहा कि सीखने में मन लगने से अनपढ़भी पढ़ सकता है। संघ के तत्व को सीखना व आत्मसात करनाआवश्यक है। संघ किसी का पिछलग्गू नहीं अपितु स्वतंत्र है। संघ काविचार सत्य आधारित है, उसके पास इच्छा व शक्ति दोनों है।

1966

संघ शिक्षा वर्ग में श्री गुरुजी ने कहा कि- राष्ट्र की रक्षा हेतु प्रत्येक कोआगे आना चाहिए

1968

1968 में जयप्रकाश नारायण जी दिल्ली के संघ शिक्षा वर्ग में आएऔर स्वयंसेवकों से चर्चा भी की।

1970

बिहार के वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता श्री श्यामा प्रसाद सिंह ने मुंगेर में संघशिक्षा वर्ग के समापन समारोह पर संघ के प्रति अपनी अनुभूति प्रकटकरते हुए कहा कि कांग्रेस के सेवा दल के मुकाबले संघ के स्वयंसेवकसच्चे अनूठे और अनुशासित हैं।

1971

नागपुर में संघ के शिक्षा वर्ग के समारोप में डॉक्टर अंबेडकर जी केअन्यय सहयोगी श्री रेवाराम कबाडे ने अध्यक्ष पद से अपना भाषणदिया जिसमें उन्होंने कहा संघ राष्ट्रीय एकता का उपासक है।

1972

1972 के संघ शिक्षा वर्ग के समापन पर देश सेवा के लिए बाबूजयप्रकाश नारायण ने पटना में संघ की भूरि भूरि प्रशंसा की।

1973

20 जून 1973 को नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग में बाला साहब देवरससरसंघचालक के रूप में पधारे।

1974

5 जून 1974 को उड़ीसा के कालाहांडी जिले में कांग्रेस के कुछ गुंडो नेसंघ शिक्षा वर्ग पर हमला किया और पंडाल को तोड़ दिया।

1975

कालीकट संघ शिक्षा वर्ग में बाबू जयप्रकाश नारायण जी आए।

आपातकाल का दौर व संघ पर प्रतिबंध

1977

पटना के संघ शिक्षा वर्ग के समापन में सार्वजनिक रूप से बाबूजयप्रकाश नारायण ने संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए संघके सेवा कार्यों, गांधी जी के प्रातः स्मरण में नाम जोड़ने, भारत को पुनःएक करने के संकल्प तथा गांधी जी के छुआछूत मुक्त हिन्दू समाज केनिर्माण के संकल्प की प्रशंसा की।

1978

बंगलौर में आरएसएस शिविर में समाजवादी नेता अच्युत पटवर्धन नेकहा कि आरएसएस कार्यकर्ता बहुत भाग्यशाली हैं। उन्होनें कर्नाटकसंघ शिक्षा वर्ग को संबोधित करते हुए कहा कि भौतिक विकास कीविसंगतियों का सामना आत्मज्ञान से ही संभव है।

1980

आरएसएस का अर्थ है “निःस्वार्थ सेवा के लिए तत्पर”, यह बातइंडियन एक्सप्रेस के बंगलौर  संस्करण के संपादक श्री वी. एन. नारायणन ने 1 जून 1980 को कर्नाटक के आरएसएस के संघ शिक्षावर्ग के समापन समारोह में अपने अध्यक्षीय भाषण में कही थी।

1981

संघ शिक्षा वर्ग नागपुर, जून 1981 के समापन समारोह में महाराष्ट्रविधान परिषद के अध्यक्ष तथा अखिल भारतीय रिपब्लिक पार्टी केअध्यक्ष श्री आर. सी गंवई शामिल हुए। उन्होंने स्वयंसेवकों कोसंबोधित करते हुए कहा कि जातिगत विषमता का विनाश राष्ट्रवाद केजागरण से ही संभव है। वहाँ श्री बाला साहब देवरस जी भी उपस्थितथे 

1985

रामकृष्ण मिशन के स्वामी चिदभवानन्द ने तमिलनाडु के संघ शिक्षावर्ग के शिक्षार्थीयों से कहा कि संघ में मानव निर्माण का जैसाप्रशिक्षण आप प्राप्त कर रहे हैं, ठीक वैसी ही संकल्पना स्वामीविवेकानंद की भी थी।

2018

तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी संघ शिक्षा वर्ग के तृतीय वर्ष केसमापन कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे

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