पुनीत बिसारिया
दिल्ली । अनेक मित्रगण आदेशित कर रहे थे कि धुरंधर फ़िल्म के बारे में कुछ लिखूँ, किन्तु मुझे लगता था कि जब तक इसके दोनों भाग न देख लूँ, तब तक इसके बारे में लिखना अनुचित होगा।
अब दोनों भाग देखने के बाद मुझे लगता है कि बीते तीन दशक के भारत और इसके पड़ोसी देश के बीच के ख़ुफ़िया तंत्र के बीच की उठापटक को समझने के लिए यह फ़िल्म बहुत महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ समय में ऐसी अनेक फ़िल्में आई हैं, जिन्होंने इसी समयावधि की कुछ बेहद भयावह घटनाओं को उकेरने का काम किया है और यह फ़िल्म इनसे आगे बढ़कर आज के दौर में अज्ञात भारत मित्रों द्वारा भारत के दुश्मन आतंकवादियों के अड्डों में घुसकर उन्हें यमराज तक पहुँचाने की आज की कहानी भी बयान करती है; साथ ही मक्की और अतीक अहमद जैसे आतंकवादियों को मिट्टी में मिलाने और दाऊद इब्राहीम को ठिकाने लगाने की कोशिशों की कहानी भी बयान करती है और इन सबका केंद्रबिंदु बनता है कराची के पास स्थित ल्यारी नामक कस्बा,जहाँ के कुख्यात अपराधियों के बीच वर्चस्व की जंग के बीच में भारत के तीन जासूस ख़ुद को स्थापित करते हुए भारत पर होने वाले हमलों को रोकने में सफल होते हैं और आतंकवादियों को निपटाने का काम भी बखूबी करते जाते हैं।इस फ़िल्म के पहले भाग के गाने भी चर्चित हुए थे और भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी शादी विवाहों में लोग उसके बोलों पर थिरक रहे थे।
यह फ़िल्म वास्तव में भारत विरोधी बॉलीवुड फिल्मकारों के कफ़न में आख़िरी कील ठोंकने का काम करती है क्योंकि भारत की जानता अब इस बात को अच्छी तरह से समझ चुकी है कि वामपंथी एजेंडे के फ़िल्मकार केवल मनोरंजन नहीं परोसते, बल्कि अपने भारत विरोधी और सनातनद्रोही एजेंडे को भी फ़िल्मों के माध्यम से धार ओ देने का काम करते हैं। इसीलिए अब दबे मुँह से ही सही ऐसे फ़िल्मकार भी इस फ़िल्म तथा ऐसी अन्य फ़िल्मों की प्रशंसा करने के लिए विवश हैं। यहाँ यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिये कि वामियों ने रणबीर सिंह के अभिनय की प्रशंसा करने की जगह उनके बहिष्कार का निकृष्ट प्रयास किया जिसमें वे बुरी तरह विफल रहे और उन्हें इस अभिनेता के आगे झुकना पड़ा। मेरे विचार से फ़िल्मकार आदित्य धर ने कई कालजयी फ़िल्में बनाई हैं, जिनमें उनकी अब तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म धुरंधर है एल, जिसे एक बार अवश्य देखना चाहिए, किन्तु यह आरम्भ है अंत नहीं।



