डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल। मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला परिसर को लेकर वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद जब न्यायालयों ने हिंदू पक्ष के दावों को महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया, तब व्यापक धारणा बनी कि यह भारतीय सभ्यता की एक ऐतिहासिक स्मृति की पुनर्स्थापना है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय के ताजा अंतरिम निर्देश, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लिए विवादित परिसर से सटी भूमि पर जुमे की नमाज की व्यवस्था करने को कहा गया है, ने इस पूरे घटनाक्रम को एक नया मोड़ दे दिया है।
न्यायालय के अंतिम निर्णय पर प्रश्न उठाना न तो उचित है और न ही संवैधानिक परंपरा के अनुरूप, लेकिन किसी निर्णय के संभावित सामाजिक प्रभावों पर विचार करना लोकतांत्रिक विमर्श का स्वाभाविक हिस्सा अवश्य है, इसलिए इस पर विचार करना अनिवार्य हो जाता है।
उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार को परिसर से सटी दरगाह की जमीन (खसरा नंबर 596) पर मुस्लिम समुदाय के लिए जुमे की नमाज की व्यवस्था करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम समुदाय हर शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक इस स्थान पर नमाज अदा कर सकेगा और राज्य सरकार आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करेगी।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था अंतरिम है और अंतिम निर्णय तक लागू रहेगी। साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि निर्धारित स्थान उपयुक्त न लगे तो दोनों पक्षों की सहमति से निकटवर्ती किसी अन्य स्थान का चयन किया जा सकता है। न्यायालय का उद्देश्य स्पष्ट रूप से दोनों समुदायों के धार्मिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या विवादित परिसर से सटी हुई भूमि पर नमाज की व्यवस्था वास्तव में भविष्य के तनाव को कम करेगी या फिर नए विवादों की संभावना को जीवित रखेगी?
यहां ध्यान रखने योग्य यह है कि किसी भी लंबे धार्मिक विवाद का सबसे बड़ा लक्ष्य सिर्फ कानूनी समाधान होने तक सीमित नहीं होता, स्थायी सामाजिक शांति स्थापना हो सके, इसमें एक हेतु यह भी रहता है। भोजशाला का संघर्ष भी दशकों तक इसलिए चला क्योंकि दोनों समुदाय उस स्थल को अपनी-अपनी आस्था का केंद्र मानते रहे, किंतु जितनी भी पुरातात्विक एवं एतिहासिक साक्ष्य मिले, प्राय: वह हिन्दू पक्ष में ही गए, तब जाकर न्यायालय ने अपना निर्णय हिन्दू पक्ष में सुनाया और यह माना कि भोजशाला ज्ञान की हिन्दू वाग्देवी मां सरस्वती का साधना स्थल है।
अब यदि विवादित परिसर के बिल्कुल निकट ही दूसरी मजहबी गतिविधि नियमित रूप से संचालित होगी, तो हर शुक्रवार सुरक्षा, प्रशासनिक व्यवस्था और संभावित तनाव का प्रश्न फिर सामने खड़ा होगा, और एक बार नहीं, यह बार-बार होता रहेगा। क्या यह व्यवस्था भविष्य में विवाद की पुनरावृत्ति को रोक पाएगी? वास्तव में आज सुप्रीम न्यायालय को इस बारे में सोचने की आवश्यता महसूस होती है। हालांकि यह सच है कि उन्होंने सोचा हो! किंतु यह ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर समय ही देगा! यदि कोई घटना-दुघटना भविष्य में घटती है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा! अत: इस पक्ष पर भी गहराई से आज विचार करने की आवश्यकता है।
वास्तव में, यदि किसी पक्ष को वैकल्पिक धार्मिक स्थल उपलब्ध कराना ही उद्देश्य था, तो क्या कुछ अधिक दूरी पर, पर्याप्त सुविधाओं और सम्मानजनक व्यवस्था के साथ स्थायी समाधान नहीं खोजा जा सकता है? इससे एक ओर मुस्लिम समुदाय को स्वतंत्र रूप से मजहबी (धार्मिक) क्रिया-कलाप करने का अवसर मिलता और दूसरी ओर भोजशाला परिसर के आसपास बार-बार उत्पन्न होने वाली संवेदनशील स्थिति से भी बचा जा सकता है। सामाजिक दृष्टि से देखें तो कभी-कभी कानूनी रूप से सही प्रतीत होने वाला समाधान व्यवहारिक स्तर पर नई जटिलताएं भी उत्पन्न कर सकता है।
यह भी समझना होगा कि धार्मिक विवाद कोई भूमि के टुकड़े का विवाद नहीं होता, उनसे भावनाएं, इतिहास और पहचान जुड़ी होती है। ऐसे में यदि दोनों समुदायों की धार्मिक गतिविधियां अत्यंत निकट स्थानों पर समान समयावधि में संचालित होंगी, तो प्रशासन पर हर सप्ताह अतिरिक्त दबाव रहेगा। कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी लगातार चुनौतीपूर्ण बनी रहेगी, इसलिए यह आशंका पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकती कि भविष्य में किसी छोटी घटना को लेकर भी तनाव उत्पन्न हो सकता है।
न्यायालय ने अपने आदेश में अलग मार्ग और पृथक व्यवस्था की बात भी कही है, जो निश्चित रूप से एक सकारात्मक पहलू है, किंतु यह भी तय है कि अलग रास्ता बना देना ही पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता। वास्तविक प्रश्न मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्वीकार्यता का है। यदि किसी समुदाय को यह महसूस होता रहे कि वह उसी विवादित स्थल के आसपास अपनी धार्मिक पहचान बनाए रखने का प्रयास कर रहा है, तो पराजय या असंतोष की भावना समाप्त होना आसान नहीं होगा। यही भावना भविष्य के तनाव की पृष्ठभूमि भी बन सकती है।
यह सच है कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान धार्मिक स्वतंत्रता देता है और उसका सम्मान प्रत्येक नागरिक का दायित्व है, पर इसके साथ एक सच यह भी है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक शांति, इन दोनों को साथ लेकर चलना भी उतना ही आवश्यक है, जितना की लोकतंत्र को सफल बनाए रखना है। सर्वोत्तम समाधान वही माना जाता है, जिसमें अधिकारों के साथ-साथ भविष्य की सामाजिक स्थिरता भी सुनिश्चित हो। अत: इस निर्णय के संबंध में यही प्रतीत होता है कि एक बार सवोच्च न्यायालय इस संदर्भ में भी विचार अवश्य करे।



