क्यूं न वीआईपी बन बौराएं

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संजय स्वामी

दिल्ली । आओ वीआईपी बने। किसी ऊंचे दर्जे के नेता के दुम छल्ले बन उनकी दुम पकड़ सहलाने से शुरुआत करें। किसी घिसे हुए चमचे से शेखी बघारने की महारत हासिल करें। गाली और लाते खाने के आदी इज्जतदार से खींसे निपोरने की कला सीखें। ऊंचे दर्जे के गुरु घंटाल की नित्य प्रातः सांय घंटी बजाएं। फाइल उठाएं। कुछ न बन पाए तो पहुंचे हुए चमचे के अगल बगल चक्कर काटे। सभासद पति से ही दोस्ती गांठ इतराएं। उसके दफ्तर को व्यवस्थित करें। आगे पीछे घूम गणेश परिक्रमा करने वालों की सूची में नाम दर्ज करवाएं। नेताजी के दौरे में गाड़ी रुकने से पहले बदहवास पीछे दौड़ते, भागते, हांफते कार का द्वार खोलें। पैयां पड़े। पादुका उठा व्यवस्थित करें। भृकुटी टेढ़ी हो तो गिड़गिड़ाएं। कृपा बरसे तो बलैया ले, फोटो खिंचवा फेसबुक, इंस्टाग्राम पर अपलोड करें।

आजकल बीजेपी में पद अलंकरण समारोह चल रहा है। नितिन भी नबीन भए रायसीना की अट्टालिकाओं से दूर दराज गांव मोहल्ले तक राष्ट्रीय स्तर के पद उड़ेल रहे हैं। दुबे जी पद पा छब्बे हुए बौरा रहे हैं। दर्जनों पदों और सैंकड़ों पदाधिकारियों की फेहरिस्त में भी जो मुख्य फ्रेम में गर्दन फंसवाने से वंचित रह गए, इधर उधर कुछ और पाने की आस में चक्कर लगा रहे हैं। फिर आप तो ठहरे खांटी नेता अलबत्ता जुगाड भिड़ा मोर्चा केसरी का पद ही पा जाएं।

रामलीला उत्सव से पूर्व कहीं संभव न हो पाया, धैर्य रखें; दीपावली मिलन समारोहों में ही किसी जात बिरादरी के मंच से केसरिया पगड़ी और हनुमान जी की गदा से अलंकृत हो सम्मान प्राप्ति का फोटो अपलोड करवा इंटरनेट, सोशल मीडिया में छा जाएं।

यदि लुटियन जोंस में दाल न गले तो यूपी में तावड़े के पीछे ताबड़तोड़ दौड़ लगावें।

धूल मिश्रित भ्रमित हवा तो टिप्पू (अखिलेश) भइया भी उड़ा रहे हैं। उनके रथ के पीछे अपनी साइकिल की मरम्मत करवा दौड़ लगा किस्मत आजमाने में कौन इज्जत खराब होत है। अनुशासित दल की स्वस्थ सुप्रीमो माया दीदी भी ताल ठोकने की फिराक में है। पता नहीं फरवरी में ऊंट किस करवट बैठ जाए ! सियासत में रावण से भी दोस्ती करने में नुकसान नहीं। जब कहीं दाल न गले, कोई किसी भाव ने पूछे तो अपने चेले-चपेटों को इकट्ठा करके कोई छोटा-मोटा दल, मोर्चा बना दीवारों पर इश्तहार लगा निर्दलीय ही खंभ ठोक देने में भी कोई हर्ज नहीं। कोई न कोई तो मनाने आएगा ही। क्या पता सरकार बन जाए तो बाद में कहीं किसी निगम, आयोग की कृपा बरस जाए। वोट तंत्र में चिराग भी सूर्य सम दमकता है। अठन्नी गांधी बनी इठला रही है। गठबंधन के युग में व्यक्तिवादी क्षेत्रीय राजनीति सोने सी दमक रही है। संगठन निष्ठा गंगासागर में गोते लगा रही है। दल बदलुओं की बढ़ती अहमियत से ही चांदी भाव खा रही है।

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