दिल्ली: दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को हुई इंडिया गठबंधन की रैली के बाद मीडिया एक्सेस को लेकर जो विवाद उभरा, उसमें साक्षी जोशी का ट्वीट केंद्र में है। उन्होंने लिखा कि कांग्रेस ने करीब 1200 मीडिया पास प्रिंट कराए थे और जो पत्रकार गेट पर पास नहीं लेकर घुसने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें पत्रकारिता का बेसिक सेंस नहीं है। उन्होंने खुद एक दिन पहले AICC जाकर पास लिया था। यह दावा तार्किक लग सकता है, लेकिन इसमें कई गहरे सवाल छिपे हैं।
पहला सवाल संख्या का है। रैली की भीड़ को लेकर बीजेपी ने 10 लाख के दावे को फ्लॉप बताया और कहा कि 28,000 कुर्सियों में से हजारों खाली रहीं। यदि कुल उपस्थिति 10-15 हजार के आसपास रही हो, तो 1200 मीडिया पास का आंकड़ा असामान्य रूप से बड़ा है। क्या कांग्रेस ने इतने पास इसलिए जारी किए कि सोशल मीडिया वाले, कंटेंट क्रिएटर्स और पार्टी-सहानुभूति रखने वाले लोग बड़ी संख्या में शामिल हों? या यह रैली की ‘मीडिया कवरेज’ दिखाने का एक तरीका था?
दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल पारदर्शिता का है। कांग्रेस इन 1200 पास धारकों की सूची जारी क्यों नहीं करती? बिना सूची के यह दावा कि “1200 पत्रकारों” को पास मिले, केवल आंकड़ा बनकर रह जाता है। कई मुख्यधारा के चैनलों और अखबारों से जुड़े पत्रकारों का कहना है कि उन्हें पास नहीं मिला, जबकि कुछ ऐसे नाम चर्चा में आए हैं जो पारंपरिक पत्रकारिता से अलग भूमिका में हैं।
इतिहासकार या राजनीतिक कमेंटेटर से लेकर कंटेंट क्रिएटर तक खुद को पत्रकार कहने लगे हैं। जब ‘कांग्रेसी पत्रकार’ की परिभाषा ही इतनी लचीली हो जाए, तो 1200 का आंकड़ा कैसे सत्यापित होगा?
साक्षी जोशी का यह कहना कि उन्होंने खुद जाकर पास लिया, व्यक्तिगत रूप से सही हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि पास वितरण की प्रक्रिया क्या थी? AICC में किस आधार पर किसे पास मिला और किसे नहीं? यदि प्रक्रिया पारदर्शी थी तो सूची जारी करने में क्या आपत्ति है? जब किसी राजनीतिक दल द्वारा इतनी बड़ी संख्या में मीडिया पास जारी किए जाएं और उनमें से कई ऐसे लोगों को मिलें जिन्हें ‘पत्रकार’ मानने पर बहस हो, तो पक्षपात या व्यवस्था में ‘लोचा’ का आरोप स्वाभाविक है।
यह मुद्दा सिर्फ साक्षी जोशी या किसी एक व्यक्ति का नहीं है। यह इस बात का है कि राजनीतिक आयोजनों में मीडिया एक्सेस अब कितना संस्थागत है और कितना व्यक्तिगत/पार्टी-समर्थक नेटवर्क पर आधारित। जब मुख्यधारा के पत्रकारों को पास न मिले और अन्य को मिल जाएं, तो ‘पत्रकारिता’ का दावा कमजोर पड़ता है। कांग्रेस और साक्षी जोशी दोनों को इस पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। सूची जारी करें। प्रक्रिया बताएं। वरना 1200 पास सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि पारदर्शिता के अभाव का प्रतीक बन जाएंगे।



