लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर

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लखनऊ। लोकतंत्र को विश्व की सर्वाधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूल अवधारणा अत्यंत सरल और आकर्षक है—सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है, सरकार बनाती है और अंततः वही शासन की अंतिम स्वामिनी होती है। आधुनिक लोकतंत्र का पूरा ढाँचा इसी सिद्धांत पर आधारित है कि राज्य जनता के लिए है, जनता द्वारा संचालित है और जनता के प्रति जवाबदेह है। भारत का संविधान भी इसी भावना को स्वीकार करता है। संविधान की प्रस्तावना “हम भारत के लोग” शब्दों से प्रारंभ होती है, जो स्पष्ट रूप से यह घोषणा करती है कि देश की संप्रभुता और सत्ता का अंतिम स्रोत जनता ही है। सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं और सरकारी संस्थाएँ जनता की सुविधा तथा कल्याण के लिए कार्य करती हैं। किंतु जब हम लोकतंत्र के व्यवहारिक स्वरूप को देखते हैं तो अनेक बार यह आदर्श स्थिति वास्तविकता से काफी दूर दिखाई देती है।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि संविधान में जनता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त होने के बावजूद व्यवहार में वही जनता अक्सर उपेक्षित, असहाय और याचक की भूमिका में दिखाई देती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस नागरिक को व्यवस्था का केंद्र होना चाहिए, वह अनेक बार व्यवस्था के किनारे खड़ा दिखाई देता है। सरकारी कार्यालयों में अपने अधिकारों और वैधानिक सुविधाओं के लिए नागरिकों को बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। एक सामान्य व्यक्ति को प्रमाण पत्र बनवाने, भूमि अभिलेख प्राप्त करने, पेंशन, राशन, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सुविधा या अन्य सरकारी सेवाओं के लिए लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। कई बार उसे यह अनुभव होता है कि वह किसी अधिकार का उपयोग नहीं कर रहा, बल्कि किसी कृपा की याचना कर रहा है।

लोकतंत्र की आत्मा यह कहती है कि जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हों, किंतु व्यवहार में अनेक बार स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। चुनाव के समय जनता का महत्व अचानक बढ़ जाता है। नेता घर-घर पहुँचते हैं, हाथ जोड़ते हैं, वादे करते हैं और स्वयं को जनता का सेवक बताते हैं। किंतु चुनाव संपन्न होने के बाद जनता और प्रतिनिधियों के बीच दूरी बढ़ने लगती है। अनेक नागरिकों का अनुभव है कि जिन प्रतिनिधियों तक चुनाव से पहले पहुँचना आसान होता है, वे चुनाव के बाद सामान्य नागरिकों की पहुँच से दूर हो जाते हैं। इससे लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास कमजोर पड़ता है और यह भावना विकसित होती है कि सत्ता जनता की नहीं, बल्कि सत्ता प्राप्त समूहों की संपत्ति बनकर रह गई है।

लोकतंत्र में जनसेवा को सर्वोच्च मूल्य माना गया है, किंतु वास्तविकता में कई बार जनसेवा की अवधारणा सत्ता और विशेषाधिकार प्राप्त करने का माध्यम बन जाती है। सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने वाले अनेक लोग ईमानदारी और समर्पण के साथ कार्य करते हैं, किंतु यह भी सत्य है कि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, संसाधनों के दुरुपयोग और सत्ता के केंद्रीकरण जैसी समस्याएँ लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती हैं। जब सार्वजनिक पदों का उपयोग निजी लाभ के लिए होने लगता है, तब लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। जनता के करों से संचालित संसाधन यदि कुछ प्रभावशाली समूहों के हित में अधिक उपयोग होने लगें और आम नागरिक को उसका उचित लाभ न मिले, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है।

वास्तव में लोकतंत्र और राजतंत्र के बीच सबसे बड़ा अंतर यही माना जाता है कि लोकतंत्र में शासक और शासित का संबंध मालिक और प्रजा का नहीं, बल्कि सेवक और स्वामी का होता है। किंतु व्यवहारिक स्तर पर अनेक बार प्रशासनिक संस्कृति में औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेष दिखाई देते हैं। नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने के बजाय कई संस्थाएँ आदेशात्मक और नियंत्रणकारी दृष्टिकोण अपनाती हैं। लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए, किंतु कई बार नागरिकों को अपनी वैध माँगों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। यह स्थिति लोकतंत्र की मूल भावना के अनुकूल नहीं कही जा सकती।

लोकतंत्र का उद्देश्य केवल चुनाव कराना नहीं है। चुनाव लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक सफलता इस बात से निर्धारित होती है कि शासन व्यवस्था कितनी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित है। यदि नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, यदि सरकारी सेवाएँ समय पर न मिलें, यदि निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी सीमित हो और यदि सत्ता का उपयोग जनहित के बजाय विशेष हितों के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र का स्वरूप कमजोर पड़ने लगता है।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि लोकतंत्र की चुनौतियों के लिए केवल राजनेताओं या प्रशासन को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र एक साझी व्यवस्था है जिसमें नागरिकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जागरूक मतदाता, सक्रिय नागरिक समाज, स्वतंत्र मीडिया, उत्तरदायी संस्थाएँ और मजबूत संवैधानिक व्यवस्थाएँ लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती हैं। जब नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग रहते हैं, तब लोकतंत्र अधिक उत्तरदायी बनता है। इसलिए लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए नागरिक चेतना का विकास भी उतना ही आवश्यक है जितना कि प्रशासनिक सुधार।

आज आवश्यकता इस बात की है कि लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित न माना जाए। शासन व्यवस्था का प्रत्येक अंग इस भावना के साथ कार्य करे कि वह जनता का सेवक है और जनता ही उसकी वास्तविक स्वामी है। सरकारी कार्यालयों को नागरिक-अनुकूल बनाना होगा। प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होगा। जनप्रतिनिधियों को चुनावी वादों और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के प्रति अधिक गंभीर होना होगा। सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही नागरिकों को भी लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक अधिकारों और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के प्रति अधिक सजग होना होगा।

भारतीय लोकतंत्र ने अनेक उपलब्धियाँ हासिल की हैं और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में उसकी पहचान स्थापित हुई है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र के आदर्श और उसके व्यवहारिक स्वरूप के बीच अभी भी एक उल्लेखनीय दूरी मौजूद है। संविधान ने जनता को सर्वोच्च स्थान दिया है, किंतु उस संवैधानिक भावना को प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवहार में पूरी तरह उतारना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब नागरिक स्वयं को व्यवस्था का याचक नहीं, बल्कि सम्मानित अधिकार-संपन्न स्वामी अनुभव करे; जब जनप्रतिनिधि सत्ता के अधिकारी नहीं, बल्कि जनता के उत्तरदायी सेवक के रूप में कार्य करें; और जब शासन का प्रत्येक निर्णय नागरिक हित को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करे। लोकतंत्र की आत्मा भी यही है और उसका अंतिम लक्ष्य भी यही होना चाहिए।

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डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स के सलाहकार संपादक हैं और सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के संपादक की भी भूमिका निभा रहे हैं)

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