महालया-नवरात्रि पर गुवाहाटी के माँ कामाख्या मंदिर में शक्ति आराधना

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी । महालया और शारदीय नवरात्रि के आगमन के साथ ही गुवाहाटी के नीलाचल पर्वत स्थित माँ कामाख्या शक्तिपीठ में लाखों श्रद्धालुओं के आगमन का क्रम जारी है। देश के विभिन्न हिस्सों से भक्त माँ के दर्शन और विशेष पूजा-अर्चना के लिए पहुँच रहे हैं। इसी दौरान गुवाहाटी के दो प्राचीन मंदिरों—माँ कामाख्या और माँ उग्रतारा देवालय—में दुर्गोत्सव की तैयारियाँ भी चल रही हैं। इस वर्ष दुर्गोत्सव 16 से 21 अक्टूबर 2026 तक मनाया जाएगा।

शारदीय नवरात्रि के दौरान देवी के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। सामान्य सामुदायिक दुर्गा पूजा की तरह इन दोनों प्राचीन मंदिरों में मिट्टी की विशाल प्रतिमाएँ, कलात्मक सजावट और रोशनी से जगमगाते भव्य पंडाल नहीं बनाए जाते। देवी के इन पवित्र धामों में सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं के अनुरूप पूजा-अर्चना होती है। दोनों मंदिरों में दुर्गा पूजा के दौरान पशु बलि की परंपरा भी निभाई जाती है। देवी दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में गिने जाने वाले माँ कामाख्या मंदिर को नीलाचल पर्वत पर स्थित होने के कारण विशेष धार्मिक महत्त्व प्राप्त है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माँ कामाख्या मंदिर का निर्माण कामदेव ने भगवान विश्वकर्मा की सहायता से कराया था। प्राग्ज्योतिषपुर के दानव राजा नरकासुर ने देवी कामाख्या से विवाह करने की इच्छा से पहाड़ी की तलहटी से मंदिर तक पत्थर का रास्ता बनवाया था, लेकिन वह अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका। बाद में देवी ने भगवान विष्णु की सहायता से नरकासुर का वध किया।
माँ कामाख्या मंदिर की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि गर्भगृह में देवी की कोई प्रतिमा नहीं है। मुख्य मंदिर के भीतर एक गुफा में योनि के आकार की शिलाकृति की पूजा की जाती है। प्राकृतिक झरने का जल इस शिलाकृति को सदैव नम बनाए रखता है।
दूसरी ओर, गुवाहाटी के उजानबाजार क्षेत्र में जोरपुखुरी के पश्चिमी हिस्से में स्थित माँ उग्रतारा देवालय भी शक्ति उपासना का एक प्राचीन केंद्र है। दुर्गोत्सव के दौरान दोनों मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और तीर्थयात्री पहुँचते हैं। उग्रतारा मंदिर में भी देवी की कोई प्रतिमा नहीं है। यहाँ गर्भगृह में जल से भरे एक कुंड को देवी की उपस्थिति का प्रतीक मानकर पूजा जाता है और श्रद्धालु इसी स्वरूप में माँ उग्रतारा की आराधना करते हैं। अहोम राजा शिव सिंह के शासनकाल में 1725 ईस्वी में उग्रतारा मंदिर का निर्माण कराया गया था। इस मंदिर में लगभग 982 वर्षों से लगातार शारदीय दुर्गा पूजा होने का दावा किया जाता है और इसे क्षेत्र में माँ तारा की आराधना की सबसे पुरानी निरंतर परंपराओं में से एक बताया जाता है। भूकंप के कारण मंदिर के ऊपरी हिस्से को नुकसान पहुँचा था। इसके बाद वर्तमान मंदिर में कई बार मरम्मत और बदलाव किए गए।
पौराणिक कथा के अनुसार, सती देवी शक्ति का एक स्वरूप थीं और राजा दक्ष की पुत्री थीं। उनका विवाह भगवान महादेव से हुआ था। राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में सती को आमंत्रित नहीं किया गया था, फिर भी वह यज्ञस्थल पर पहुँच गईं। दक्ष अपने दामाद शिव से प्रसन्न नहीं थे और उन्होंने वहाँ महादेव के प्रति अपमानजनक बातें कहीं। इससे आहत होकर सती ने यज्ञस्थल पर ही अपने प्राण त्याग दिए।
सती की मृत्यु का समाचार सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो उठे। दक्ष को दंड देने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी के पार्थिव शरीर को कंधे पर उठाकर तांडव नृत्य शुरू कर दिया। उनका यह विनाशकारी नृत्य कई दिनों तक चलता रहा और समूचे ब्रह्मांड पर संकट मंडराने लगा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु से शिव के तांडव को रोकने का उपाय करने की प्रार्थना की।
इसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को कई हिस्सों में विभाजित कर दिया। उनके शरीर के अलग-अलग अंग भारतवर्ष के विभिन्न स्थानों पर गिरे और कालांतर में उन स्थानों पर शक्तिपीठ स्थापित हुए।
लोकमान्यता है कि माँ दुर्गा अपने चार बच्चों के साथ पृथ्वी पर अपने मायके आती हैं और विजयादशमी के दिन कैलाश पर्वत लौट जाती हैं। महालया को देवी के पृथ्वी पर आगमन से जोड़कर देखा जाता है। दुर्गा पूजा के अनुष्ठान षष्ठी से आरंभ होते हैं और अगले तीन दिनों तक देवी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। दसवें दिन विजयादशमी मनाई जाती है। इस दिन प्रतिमाओं का विसर्जन देवी के कैलाश लौटने का प्रतीक माना जाता है। परंपरागत रूप से माँ दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है।
दुर्गोत्सव महिषासुर पर देवी दुर्गा की विजय का प्रतीक है। इसी कारण माँ दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक भैंसे के रूप वाला असुर देवताओं के विरुद्ध युद्ध करने लगा और उसे ऐसा वरदान प्राप्त था कि कोई पुरुष उसे पराजित नहीं कर सकता था। अंततः देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुँचे। तीनों देवताओं की संयुक्त दिव्य शक्तियों से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। सिंह पर सवार होकर और देवताओं से प्राप्त अनेक अस्त्र-शस्त्र धारण कर देवी ने महिषासुर का वध किया तथा दैवी शक्ति की विजय सुनिश्चित की।
जय देवी माँ!

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