महाशक्तियों का हस्तक्षेप, सत्ता परिवर्तन और इतिहास का प्रतिफल

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दिल्ली । मेरा मानना है कि 1980 के दशक में सोवियत संघ में शुरू हुई उथल-पुथल और 1991 में उसके विघटन को केवल एक कारण से नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे आंतरिक परिस्थितियाँ भी थीं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के दबाव भी। वेनेजुएला, अफगानिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका और नेपाल के घटनाक्रमों को देखते हुए मेरे मन में एक प्रश्न उठता है—क्या इन सबके पीछे कहीं न कहीं महाशक्तियों के रणनीतिक हित और तथाकथित डीप स्टेट की भूमिका भी हो सकती है?

मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जो देश या नेतृत्व अमेरिका के रणनीतिक हितों के अनुरूप नहीं चलता, उसके विरुद्ध दबाव बनाने की नीति अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दिखाई देती रही है। हालाँकि, प्रत्येक घटना के कारणों और बाहरी हस्तक्षेप की भूमिका की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है। भारत में CJP की गतिविधियों को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखना और उनके वास्तविक स्वरूप को तथ्यों के आधार पर समझना उचित होगा।

किसी भी देश की राजनीतिक अस्थिरता और विनाश अंततः उसके नागरिकों को प्रभावित करता है। भारतीय दर्शन का सिद्धांत है—जैसा करोगे, वैसा भरोगे। इतिहास में कोई भी शक्ति स्थायी नहीं रही। कौन जानता है कि दस-पंद्रह वर्ष बाद अमेरिका स्वयं ऐसी आंतरिक परिस्थितियों का सामना करे, जो कभी सोवियत संघ के विघटन का कारण बनी थीं? इतिहास की यही अनिश्चितता सत्ता और शक्ति के अहंकार के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
इस समय जब राष्ट्र विरोधी ताक़तों को बाह्य शक्ति, संसाधन एवं षड्यंत्र को इम्प्लीमेंट करने के तरीकों की पकी पकाई जहरीली रोटी मिल रही है तब हमारा भी कर्तव्य है कि राष्ट्र हित में एकजुटता दिखायें । राष्ट्र को विघटन से बचाने के अपनी प्रतिबद्धता व सामर्थ्य से अधिक कुछ करें ।

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