महिला पत्रकार ऋचा पराशर की शिकायत और प्रेस संस्थाओं की चुप्पी

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दिल्ली। 12 अक्टूबर 2026 की शाम करीब 6:30 बजे सुप्रीम कोर्ट परिसर में एक घटना हुई, जिसे वनइंडिया की एसोसिएट प्रोड्यूसर ऋचा पराशर ने अपनी आपराधिक शिकायत में विस्तार से दर्ज कराया है। वे लगभग ग्यारह सप्ताह तीन दिन की गर्भवती थीं (एलएमपी 24 जुलाई 2026)। वे पेशेवर ड्यूटी पर रजिस्ट्री काउंटर के पास थीं, जब विपक्षी नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का जुलूस नारेबाजी करते हुए परिसर में प्रवेश कर रहा था।

पराशर की शिकायत के अनुसार, उन्होंने गांधी से सुप्रीम कोर्ट परिसर में सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौजूदगी पर सवाल पूछा। इसके बाद गांधी ने उन्हें गेट की ओर धक्का दिया। उन्होंने बार-बार कहा, “सर, धक्का मत दीजिए, हम जा रहे हैं,” लेकिन धक्का इतना जोरदार था कि वे संतुलन खोकर गिर पड़ीं और हाथों से गिरने को रोकने की कोशिश की। शिकायत में कहा गया है कि यह भीड़ की सामान्य धक्का-मुक्की नहीं, बल्कि जानबूझकर लगाया गया धक्का था। वे चिल्लाईं, लेकिन गांधी आगे बढ़ गए और कार्यकर्ता नारे लगाते रहे। हाथों से खून निकल रहा था। करीब 40 मिनट तक वे फुटपाथ पर बैठी मदद मांगती रहीं।

उसी रात करीब 9 बजे उन्हें सर गंगा राम अस्पताल ले जाया गया। अगले दिन भर्ती हुईं। डिस्चार्ज समरी में ‘प्राइमिग्राविडा एट 11 वीक्स 3 डेज पीओजी विद हाइपोथायरायडिज्म विद हिस्ट्री ऑफ फॉल’ दर्ज है। पेट के निचले हिस्से में दर्द, अल्ट्रासाउंड से फीटल कार्डियक एक्टिविटी चेक, और सुरक्षित निगरानी के लिए भर्ती का जिक्र है। वे 13 अक्टूबर को दवाइयों के साथ डिस्चार्ज हुईं, आगे की स्कैनिंग और दर्द/ब्लीडिंग पर तुरंत रिपोर्ट करने के निर्देश के साथ।

शिकायत में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 74 (महिला की शील भंग करने के इरादे से आपराधिक बल), 115(2) (स्वेच्छा से चोट), 131 (गंभीर उकसावे के बिना आपराधिक बल), 125 (लापरवाही से जीवन/सुरक्षा खतरे में डालना) और 3(5) (साझा इरादे) के तहत राहुल गांधी और अन्य के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है। शिकायत में मेडिकल रिकॉर्ड, आधार और प्रेस आईडी (आईएन1706) संलग्न हैं। सुप्रीम कोर्ट ने घटना पर संज्ञान लिया है और 12 अक्टूबर के मूल वीडियो संरक्षित करने के आदेश दिए हैं।

यह मामला केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं है। एक गर्भवती महिला पत्रकार सुप्रीम कोर्ट परिसर में ड्यूटी के दौरान गिरती है, अस्पताल जाती है, और मेडिकल रिकॉर्ड में ‘हिस्ट्री ऑफ फॉल’ दर्ज होता है। कोई भी राजनीतिक पद कानून से ऊपर नहीं है। पत्रकार का काम सवाल पूछना और कवरेज करना है। अगर किसी नेता की मौजूदगी में ही ऐसा बल प्रयोग होता है और आवाज नारेबाजी से दबा दी जाती है, तो यह रिपोर्टिंग के अधिकार पर हमला है।

यहीं प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, वूमेन्स प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड से सीधा सवाल बनता है। इन संस्थाओं ने कई मौकों पर पत्रकारों की सुरक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता और महिला पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार पर बयान जारी किए हैं। क्या इस शिकायत को पढ़ने के बाद वे चुप रहेंगे? क्या गर्भावस्था की स्थिति, मेडिकल रिकॉर्ड और सुप्रीम कोर्ट परिसर में हुई घटना पर्याप्त नहीं है कि वे एक पत्रकार के पक्ष में खड़े हों और निष्पक्ष जांच की मांग करें? क्या वे केवल चुनिंदा मामलों में आवाज उठाते हैं?

पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है कि सत्ता के सामने सवाल पूछने वाले को धक्का न मिले। अगर प्रेस संस्थाएं इस शिकायत को ‘राजनीतिक’ कहकर नजरअंदाज करती हैं, तो वे अपने ही सदस्यों के अधिकारों की रक्षा में विफल साबित होंगी। ऋचा पराशर ने शिकायत में साफ कहा है कि वे केवल अपना काम कर रही थीं। अब सवाल यह है कि प्रेस क्लब, वूमेन्स प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड इस लड़ाई में एक पत्रकार का साथ देंगे या नहीं। उनकी चुप्पी भी एक जवाब है।

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