राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : शताब्दी यात्रा : 02  

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा के संदर्भ में इस इन्फो पैक में चार प्रमुख विषयों को शामिल किया गया है। इनमें संघ का कार्य, विस्तार एवं उद्देश्य, संघ–यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव; तथा पंच परिवर्तन जैसे पहलू प्रमुख हैं। इन विषयों के माध्यम से संघ की स्थापना से लेकर उसके विकास, परंपराओं और राष्ट्रजीवन में उसके योगदान तक की एक समग्र जानकारी प्रस्तुत की जा सकती है।

मातृशक्ति और श्रीगुरु जी

  • अपने इस देश में संकट काल में स्त्री राखी भेज कर दूसरों को भाई बनाती थी। जिसे रक्षा भेजी जाती वह भाई हो जाता और एक बार जो भाई बना, वह अपने प्राण देकर भी अपनी बहन की रक्षा करता था। यह परिपाटी पुरानी चली आ रही है। भैया-दूज के समय हर एक मनुष्य बहन से टीका लगवाता है। बहन न हो तो पड़ोसी के घर टीका लगवाने जाता है और बहन बनाता है। एक बार टीका लगा कि जन्म-भर के लिए बहन के भाव आ जाते हैं। ( श्रीगुरूजी समग्र, खंड 2, पृष्ठ 66)
  • माता केवल एक महिला ही नहीं वरन्‌ इससे बहुत श्रेष्ठ धरातल पर एक विशाल व्यक्तित्व होती है। वह हमारे लिए शक्ति का मूल स्रोत है। (श्रीगुरूजी समग्र, खंड 3, पृष्ठ 273)
  • अपने राष्ट्र की जीवनधारा अक्षुण्ण रखने का उत्तरदायित्व महिलाओं ने ही संभाला है, आगे भी उन्हे निभाना है। आज सर्वत्र सद्भावना व शुद्धता का अभाव व स्वार्थ दिखाई देता है। इस वातावरण को अपनी अतीव पवित्रता से  प्रभावित करने का सामर्थ्य स्त्रियों में ही है – ऐसा मेरा विचार है। (श्रीगुरूजी समग्र, खंड 5, भारतीय नारी का दायित्व, पृष्ठ 6)

जहाँ पर माता का अपमान होता है, वहाँ भगवान भी क्षुब्ध हो जाते हैं और उन्हें अवतार-कार्य की प्रेरणा मिलती है। यह भूमि हमारी शाश्वत माता है। माता और मातृभूमि के अपमान का बोध होने पर कार्य के लिए चालना मिलती है। (श्रीगुरूजी समग्र, खंड 5, भारतीय नारी का दायित्व, पृष्ठ 7)


नारी
–गरिमा को बनाए रखने की आवश्यकता

अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा इस तथ्य को रेखांकित करना चाहती है कि भारतीय जीवनमूल्यों एवं भारतीय परम्परा के अनुसार नारी और पुरुष को परस्पर पूरकता एवं सामंजस्य के संबंधों के आधार पर परिवार का सुसंचालन करते हुए राष्ट्रजीवन के विविध क्षेत्रों में अपनी-अपनी भूमिका का निर्वहन करना चाहिए। भारत का इतिहास व वाङ्मय नारी की महत्ता व गुणगान से भरा पड़ा है। विश्व के प्राचीनतमग्रन्थ ऋग्वेद में 30 से अधिक महिला मंत्र-दृष्टाओं का उल्लेख है तथा जीवन के सभी क्षेत्रों में उनकी सम्मानजनक सहभागिता के प्रचुर उल्लेख विद्यमान हैं। आगे भी यह धारा प्रवाहमान होती रही है। यह तो सच है कि महिला एवं पुरुष के बीच कुछ निसर्गप्रदत्त अंतर होता है। किंतु भारत की परम्परा ने महिला के प्रति किसी भी प्रकार के भेदभाव को मान्यता नहीं दी है, अपितु उसे सदैव एवं सर्वत्र अत्यन्त श्रद्धा व सम्मान का स्थान दिया है। अत: यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि महिलाओं के प्रति किसी भी प्रकार का भेदभावपूर्ण व्यवहार न हो तथा निर्णयप्रक्रिया में सदैव उनकी भागीदारी बनी रहे।

आगे चलकर विलासितापूर्ण जीवनशैली में से उत्पन्न वातावरण से जीवन में धीरे-धीरे स्खलन प्रारम्भ हुआ। विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा हमारी आस्थाओं-श्रद्धाओं पर चुन-चुन कर प्रहार प्रारम्भ हुए और हमारे विश्व-वंदित जीवनमूल्य तहस-नहस होने लगे। भौतिकता की चकाचौंध में हम पश्चिम के अन्धानुकरण-पथ परचल पड़े, जहाँ नारी स्वातंत्र्य के नाम पर उच्छृंखलता ही मिली। वैश्वीकरण और उदारीकरण की आँधी में महिलाओं को सम्मान का पात्र नहीं, बल्कि भोग-वस्तु बनाने की होड़ मच गई। प्रतिनिधि सभा इस बात पर चिन्ता व्यक्त करती है कि विज्ञापनों, पत्र-पत्रिकाओं, टी.वी. समाचारों, टी.वी. धारावाहिकों एवं चलचित्रों में महिलाओं के भोंडे तथा अश्लीलतापूर्ण चित्रों एवं दृश्यों को प्रचारित-प्रसारित कर भारतीय समाज में नारी की गरिमा व सम्मान को शर्मनाक ढंग से ध्वस्त करने एवं इनके परिणामस्वरूप परिवार को तोड़ने के कुत्सित प्रयास चल रहे हैं।

अ.भा.प्र.सभा महिलाओं के प्रति बढ़ती जा रही अभद्रता और छेड़छाड़ से लेकर उनके यौन शोषण, उत्पीड़न तथा अन्य संगीन अपराधों को खेदजनक मानती है। यह त्रासदी ही है कि उन्हें स्त्री-भ्रूणहत्या और दहेज-हिंसा ही नहीं, अपितु यौन शोषण की यंत्रणा भी कार्यस्थान और सार्वजनिक स्थानों से लेकर अपने घरों के दायरों तक में झेलनी पड़ती है। प्रतिनिधि सभा माँग करती है कि सरकार महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षण तथा सशक्तीकरण के साथ घरेलू हिंसा और सार्वजनिक व कार्यस्थलों पर होने वाले दुर्व्यवहार शोषण के खिलाफ बने कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करे और विज्ञापनों, समाचार-पत्रों एवं इलैक्ट्रोनिक मीडियाके कार्यक्रमों में नारी की गरिमा बनाए रखने की दृष्टि से उपयुक्त आचार संहिता एवं कड़े कानून बनाए।

प्रतिनिधि सभा यह भी गहराई से अनुभव करती है कि इस संस्कृति-विध्वंसक परिस्थिति में सार्थक परिवर्तन लाने हेतु समाज की मानसिकता को भी आमूलाग्र बदलना होगा। केवल सरकारी कानूनों के भरोसे बैठे रहना आत्मवंचना होगी। समाजको यह प्रामाणिकता से अनुभव करना होगा कि उसका निर्माण परिवार संस्था से होता है और परिवार की धुरी स्त्री होती है; अत: स्त्री को सुविज्ञ, सजग और सशक्त किए बिनाविकसित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। साथ ही महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहारकी दृष्टि से परिवार, शिक्षा, मीडिया एवं समाज की मनोभूमिका में परिवर्तन नितान्त आवश्यक है। अ.भा.प्र.सभा साधु-सन्तों और सामाजिक नेताओं से भी इस सन्दर्भ में अग्रणी भूमिका निभाने हेतु आवाहन करती है।

संघ और सामाजिक समरसता

डॉ. मोहन भागवत जी सामाजिक समरसता पर बल देते हुए कहते हैं कि “जिस क्षेत्र में हम रहते हैं, हमारा संचार है, जाना-आना है, उठना-बैठना है, कार्यालय है, अपनी बस्ती है, वहाँ जितने प्रकार के लोग रहते हैं, वे सब हमारे अपने हैं। हम तो पूरे समाज को एक ही मानते हैं, लेकिन समाज में लोग प्रकार मानते हैं, जात-पात मानते हैं। जातिगत विषमता की समस्या है। सब प्रकार के लोगों में अपने व्यक्तिगत मित्र होने चाहिए। उनके कुटुंब में अपने कुटुंब की मित्रता होनी चाहिए। उनका घर में आना-जाना, उठना-बैठना, पर्व-त्योहारों पर सुख-दुख में सहभागी होना, यह सब होते रहना चाहिए। जैसे मित्रों का चलता है, वैसे ही हमारा और हमारे परिवार का, सब प्रकार के परिवारों में, सब प्रकार के लोगों में होना चाहिए। आज शुरू करें, तो तीन-चार वर्ष में पूरा वातावरण बन जाएगा। लेकिन प्रारंभ तो करना पड़ेगा, सबको करना पड़ेगा। जहाँ अपना एक ऐसा समूह बन जाता है, उसकी साख बनती है, वह कहेगा तो बातें होती हैं। वहाँ पर मंदिर, पानी, श्मशान में कोई भेद नहीं होना चाहिए। वह सबके लिए है। मंदिर भक्तों के लिए है। भक्त किस जाति का है, यह नहीं पूछा जाता। पानी सब मनुष्यों के लिए है, उसमें भेद नहीं होता। मरने के बाद भी श्मशान में भेद क्यों होना चाहिए? अपने गाँव में, अपनी बस्ती में ये सब करना चाहिए। (डॉ. मोहन भागवत साक्षात्कार : 100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज, सुरुचि प्रकाशन, पृष्ठ 48)

संघ शाखा के माध्यम से अस्पृश्यता का उपचार : अस्पृश्यता को परिभाषित करते समय श्री गुरुजी का कथन है, “दूसरे शब्दों में अस्पृश्यता एक मानसिक विकृति है। मानसिक सुधार संस्कारों द्वारा ही संभव है। संस्कार एकात्मता का, एकरसता का, भ्रातृभाव का, सेवाभाव का निरंतर करना चाहिए। संघ शाखा की कार्यपद्धति इस में अद्वितीय यश प्राप्त कर चुकी है। वर्षा शिविर में महात्मा गांधी ने अनुभव किया कि सभी शिविरार्थी एक समान धरातल पर है। अस्पृश्य-स्पृश्य ऐसा कोई भेदभाव उनमें नहीं है। पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में डॉ. बाबासाहब अंबेडकरजी को भी इसी सत्य का अनुभव आया। संघ शाखा से संस्कारित हिंदू केवल हिंदूभाव जानता है, उसे अपने जन्मजाति विस्मरण हो जाता है। संघ में न आनेवाले, संघ के बाहर जो विशाल हिंदू समाज है उसके मन को कैसे साफ किया जाय यह समस्या है।

समाज में एकता को लेकर श्रीगुरुजी के विचार

एकता के प्रभावी उपाय : श्री गुरूजी एकता पर बल देने और भेदों की अनदेखी करने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि इसके लिए भजन-कीर्तन अथवा रामायण व महाभारत की कथाओं को सुनाने आदि का कार्यक्रम किया जा सकता हे, जहाँ सभी हिंदू विशुद्ध धर्म-प्रेम की पवित्र धारा में समान भ्रातृ-भावना से अनुप्राणित होकर अस्पृश्य-स्पृश्य आदि का भेद भूलकर एकत्र हों। साक्षरता, स्वास्थ्य, खेल इत्यादि के प्रोत्साहन हेतु सेवा प्रकल्प प्रारंभ किए जा सकते हैं। इस हेतु आधुनिक दृश्य-श्रव्य उपकरणों की भी उपयोगी ढंग से अपनाया जा सकता है। परंतु इन सभी गतिविधियाँ का केंद्र-बिंदु हृदय को प्रभावित करना, एकताकारी सत्प्रवृत्तियों पर बल देना तथा मतभेदों की उपेक्षा करना होना चाहिए।

छुआछूत और जातियां : श्री गुरूजी का मत है कि समाज में छुआछूत की प्रक्रिया हमें रोकनी है। इस बात को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि पहले अपने देश में कुल 18 जातियाँ थी। संभवतः अब 18 हजार हो गई हैं। कहा जाता है कि उनका आपस में कोई संबंध नहीं। मुझे बडा आश्चर्य होता है जब कुछ लोग कहते हैं कि कुछ जातियॉं तो स्पर्श करने योग्य नहीं है। ऐसे लोग यह भी कहते हैं, चूँकि उन्होंने घोर कृत्य किए थे, इसलिए उन्हें समाज के बाहर करने का दंड दिया गया था। यदि यह बात मान भी ली जाए तो भी यह कई शताब्दियों पहले की बात है। उसके लिए आज उनके वंशजों को दंडित करते रहने का कोई कारण दिखाई नहीं देता। वंशपरंपरा से समाजबाह्यता की बात मुझे बिलकुल नहीं जॅचती। किसी व्यक्ति ने समाज-विरोधी कोई कार्य किया हो तो उसे दंडित किया जा सकता है। परंतु उसके वंशजों को क्‍यों कर प्रताडित किया जाए? किसी समूह को समाजबाह्य करने में बहुत बडा खतरा रहता है। अपने समाज के अंग को इस प्रकार पृथक कर देते हैं, तव टूटकर अलग होनेवाला हिस्सा अपने अस्तित्व के लिए सहज ही एक अलग गुट बनाकर काम करता है। यह गुट अपने विचित्र व्यवहार द्वारा कालांतर में संपूर्ण समाज को खोखला बना डालता है। इस तरह से खोला बना समाज संसार में टिक नहीं सकता। समाज को खोखला करनेवाली इस छुआछूत की प्रक्रिया को हमें रोकना ही चाहिए।

हरिजन बांधवों के साथ सद्भाव : श्री गुरूजी का मानना है कि हरिजन बांधवों को अगर आज की परिस्थिति से क्षोभ है, तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता है। उनके मन की कटुता दूर हो और वे अपने को समाज का गौरवपूर्ण अंग समझें, इस पद्धति से उनके साथ बर्ताव करना चाहिए। इसी क्रम में श्री गुरूजी कहते हैं कि युगानुसार समाज के व्यवहार में परिवर्तन होता रहता है। कानून को परिस्थिति के अनुसार बदलना पड़ता है और निरुपयोगी सिद्ध हुआ तो रद्द करना पड़ता है, यह सदैव का अनुभव है।

मानवीय संवेदना की आवश्यकता : श्री गुरूजी मानवीय संवेदना की आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं कि निराशा को छोडकर सच्ची आत्मीयता से अपने समाज बधुओं के कष्ट दूर करने के लिए सन्नद्ध होना चाहिए। सोचना चाहिए कि विदेशों से आनेवाले पर्यटकों के समक्ष हाथ पसारकर भीख माँगता हुआ अपना समाजबंधु दिखाई देता है, क्या यह हमारे लिए अपमानास्पद बात नहीं है? ऐसी स्थिति निर्माण करनी चाहिए कि विदेशी ही क्यों, किसी के भी समक्ष कोई हाथ पसारता हुआ दिखाई न दे। हमें अपने मन में यही विचार दृढ करना चाहिए कि अपने समाज के प्रत्येक बंधु को हम स्वावलंबी बनाकर खड़ा करेंगे।

हमारा सच्चा राष्ट्रीय जीवन सर्वसमावेशी : श्री गुरूजी भारतीय समाज में समरसता का उद्घोष करते हुए कहते हैं कि हमारा सच्चा राष्ट्रीय जीवन सर्वसमावेशी है। भारतीय प्राचीन परंपरा की एकात्मकता और समरसता को बताते हुए श्रीगुरूजी कहते हैं कि भारत का राष्ट्रीय जीवन अति पुरातन है। यहाँ के समाज-जीवन का ताना-बाना सर्वसमावेशी, विशाल जीवन-दर्शन से उद्भूत और समान जीवन-आदर्शों से परिपूरित सांस्कृतिक परंपराओं के इर्द-गिर्द बुना हुआ है। यह जीवंत परंपरा इस भूमि पर इस्लामी एव ईसावादी आकांताओं के पदार्पण से बहुत पहले सदियों से विद्यमान है। जातियों, वर्गों, सम्प्रदायों यहाँ तक कि राजनैतिक साम्राज्यों में मत-भिन्रता एवं ऊपरी विविधताओं के होते हुए भी उनमें अंतर्निहित एकता-सूत्र कभी विच्छिन्न नहीं हुआ। इस एकात्म प्रवाह से परिपूर्ण जीवन की अभिव्यक्ति करनेवाला मानव-समूह ही हिंदू के रूप में विख्यात हुआ। इसलिए भारत में राष्ट्रीय जीवन वास्तव में हिंदू राष्ट्रीय जीवन ही है।

समाज में समरसता को बढ़ावा देने की दिशा में श्री गुरूजी कहते हैं कि जाति और विश्वास से परे प्रत्येक व्यक्ति को यह शिक्षा देनी होगी कि प्रत्येक भारतवासी का यह परम कर्त्तव्य है कि वह भारत के हिन्दू राष्ट्रवाद के सत्य का बेझिझक उद्घोष करे। इस राष्ट्र के प्रति उत्कट समर्पण का भाव सभी के मन में उद्दीप्त करना होगा।

श्री गुरूजी का मानना है कि मतपंथों की सुरक्षा व सम्मान करते हुए उन्हें इस राष्ट्र के मूल्यों, आदशों, जीवन-दृष्टि, इतिहास व परंपराओं के प्रति स्नेह व आदर प्रकट करने तथा अपनी आकांक्षाओं को राष्ट्र के साथ एकाकार करने का संस्कार देने की व्यवस्था करनी होगी।

20 जुलाई 1959 को श्री गुरूजी ने शृंगेरी मठ के श्रीमद् शंकराचार्य स्वामीजी को पत्र लिखा। स्वामीजी उस समय तमिलनाडु में तिरुचिरप्पल्लि जिले में, मुसिरि तहसील में अयलूर गांव में थे। गुरुजी का वह पत्र एक नम्र निवेदन था, एक प्रार्थना थी, सर्वसामान्य सात्विक आस्तिक हिन्दुहृदय की तड़पन थी। पत्र इस प्रकार है : “कालटी में श्रीशंकर कॉलेज है, उस संबन्ध में वहाँ के श्रीरामकृष्णाश्रम के स्वामी आगमानन्दजी ने श्रीचरणों में वस्तुस्थिति का वर्णन किया ही होगा। आगमानन्द स्वामी आर्थिक संकटों के कारण तथा इन सब कार्यकलापों के फलस्वरूप कुछ अप्रिय होने के कारण कॉलेज का भार वहन कर सकेंगे, ऐसा दिखता नहीं। श्री रामकृष्ण मिशन का केन्द्रस्थान बेलूर मठ के प्रमुख भी अर्थाभाव के कारण कॉलेज का भार नहीं ले रहे हैं। अभी जो ऋण है उससे मुक्त होने पर आगे का भार वे ले सकेंगे, ऐसा समाचार मिला है। किन्तु यदि श्री शृंगेरी मठ उस कॉलेज में उचित परिवर्तन संवर्धन कर संस्कृत, वेद, वेदांग, दर्शन, शास्त्रादि की शिक्षा का स्थान वहाँ बनावें और उस की ऐहिक शिक्षा की शाखा के रूप में विद्यमान कॉलेज का कार्य चलाने दें तो श्री शृंगेरी मठ की परंपरा के प्रतिकूल न होकर आज का कॉलेज भी चल सकेगा एवं श्रीमदाचार्य के आविर्भावस्थान पर श्रीमदाचार्य के नाम पर खुला हुआ यह विद्यालय बंद होने की आपत्ति टल सकेगी। अनेक जानकारों का यह मत है जो में नम्रतापूर्वक श्रीचरणों में निवेदन कर रहा हूँ।”

योग्य विचार विमर्श के उपरान्त उचित आदेश प्रदान कर कॉलेज का रक्षण करें। कॉलेज से संबन्धित सद्यः कालीन कार्यकर्ताओं को वह आदेश शिरोधार्य होगा, श्रेष्ठ आशीष के रूप में वे उसे ग्रहण करेंगे, ऐसा मैं समझता हूँ। श्रीमत् आचार्यचरणों से वे परिचित भी है।”

जब गुरुजी यह पत्र शृंगेरी आचार्य को लिख रहे थे वे भली भांति जानते थे कि मठ की असमर्थता क्या हो सकती है। शृंगेरी मठ धर्म-दर्शन संबन्धित विद्यापीठों के अतिरिक्त भौतिकी विद्या संस्थायें नहीं चलाता है। वह मठ की परंपरा है। अतः एव गुरुजी ने लिखा ‘मठ की परंपरा के प्रतिकूल न होकर’ और पत्र में उस के लिए उपाय भी सुझाया। अंत में गुरुजी की इच्छा पूरी हो गयी। श्रीमत् शंकराचार्य ने समस्या से संबन्धित व्यक्तियों को बुलाकर उन से विचार विमर्श कर गुरुजी द्वारा सूचित आपत्ति से महाविद्यालय को बचाया। फल स्वरूप हिन्दूसमाज का स्वाभिमान भी बच गया।

उपेक्षित बंधुओं की सेवा : श्रीगुरूजी अपने जीवनकाल में उपेक्षित बन्धुओं की सेवा। नागपुर के अंध विद्यालय के एक संस्थापक श्रीवामनराव वाडेगाँवकर उनके घनिष्ट मित्र थे। श्रीवाडेगाँवकर अपनी आयु के दसवें वर्ष से ही अंधे हो गये थे। फलस्वरूप गुरुजी के हृदय में उनके लिए सहज अनुकम्पा थी। वे प्रायः उनसे मिलने जाते तथा उनके अंध विद्यालय के लिए निधि एकत्र करने के निमित्त उनका हाथ अपने हाथ में पकडकर या उन्हें साइकिल पर आगे बिठाकर शहर भर में घुमा लाते थे। सच्ची सेवा एक ऐसी पवित्र और स्वयंस्फूर्त भावना है, जिसके सम्मुख निंदा-स्तुति की चेतना नष्ट हो जाती है। इसी सेवाभाव की प्रेरणा से पंद्रह अध्यायों का वेदांतविषयक “पंचदशी” नामक ग्रंथ उन्होंने श्रीवाडेगाँवकर को टीका के साथ पढकर सुनाया था। श्रीगुरूजी में यह समरसता अत्यंत उत्कट रूप में पाई जाती है।

श्री गुरूजी सामाजिक समरसता का विचार करते समय वनवासी बांधवों का भी विचार करते है। आदिवासी शब्दप्रयोग और उसके कारण निर्माण किए गए अनेक भ्रमों के खतरे श्री गुरुजी जानते थे। गिरि-कंदरों में निवास करनेवाले अपने बंधु को वे पराया नहीं मानते थे।

श्री गुरूजी कहते हैं कि वन्य प्रातं में निवास करनेवाले इन बंधुओं से मिलने पर अनुभव होता है कि ये लोग अनेक गुणों से परिपूर्ण होते हैं, यथा- साहस, बुद्धिमत्ता, परिश्रमशीलता, सत्य-निष्ठा, निश्छल आत्मीयता तथा सांस्कृतिक एव आध्यात्मिक। हमें कुछ श्रेष्ठतम सैनिक इसी समाज ने दिए हैं। संभवत केवल महाराणा प्रताप ही ऐसे व्यक्ति थे, जो इनसे घनिष्ठ संबंध स्थापित कर इन्हें शेष समाज की बराबरी पर ले आए थे। उन अंचलों के वनवासी भील राजपूर्तों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा शौर्यपूर्वक पीढी-दर-पीढी करते रहे।

श्रीगुरुजी का विचार हैं कि वनों में रहनेवाले अपने बंधुजनों के साथ हमको समरस होना चाहिए। सामाजिक समरसता की दिशा में वे आगे कहते हैं कि  “अब यह हमारा परम कर्तव्य है कि हम इन उपेक्षित बंधुओं के बीच जाएँ और उनके जीवनस्तर में सुधार लाने हेतु पूरी शक्ति से जुट जाएँ। हमें ऐसी योजनाएँ बनानी होगी जिनसे उनकी मूलभूत भौतिक आवश्यकताओं एवं सुख-साधनों की पूर्ति हो सके। उन्हें इन योजनाओं से लाभान्वित कराने हेतु हमें विद्यालय, छात्रावास व प्रशिक्षण केंद्र खोलने होंगे।” शेष हिंदू समाज के साथ उनको समरस करने हेतु ‘हमें ऊँच-नीच की मिथ्या धारणाओं का परित्याग कर समता की भावना के साथ उनमें घुलना-मिलना चाहिए।”

अनेकता में एकता : श्री गुरूजी अनेकता में एकता को बताते हुए विचार करते हैं कि अपने देश में भी तो पूजा के अनेक रूप अनेक प्रकार और अनेक प्रकार के देवता विद्यमान हैं, यही नहीं, अनेक प्रकार के पुराण और अनेक प्रकार के पंथ इत्यादि भी हैं और इन सबसे अपने को पृथक मानने वाले भी हैं। दक्षिण में तो शैव और वैष्णव का झगडा भी हो गया था। तुलसीदास जी जैसे विद्वान लोगों ने अपने ग्रंथों के प्रचार द्वारा यह झगडा दूर करने के लिए ‘मानस’में यहाँ तक लिखा कि जो शिव की मानता है और विष्णु को नहीं मानता है वह अधोगति को जाएगा और जो विष्णु को मानता है तथा शिव की अवहेलना करता है, वह शैव नरक में गिरेगा। ऐसा कहकर, दोनों का समान रूप से एक ही ईश्वर के नाते अंतः करण से आदर करने को प्रेरित किया।

इसी क्रम में श्री गुरूजी कहते हैं कि अपने समाज की रचना के लिए लगनेवाले जो संस्कार हैं, उनमें थोडा-बहुत भिन्नत्व देखने के लिए मिलता है। परिणामस्वरूप अपना यह समाज इस छोटी सी भिन्नता को लेकर ही पृथक-पृथक अंशो में बँट गया है।

श्री गुरूजी का मानना है कि अपने यहाँ चातुर्वर्ण्य है। चातुर्वर्ण्य, याने एक शरीर के अवयव के रूप में संपूर्ण समाज है, एक ही उसकी शक्ति है, एक ही उसका चैतन्य है और एक ही उसका जीवनरस है। इस प्रकार की धारणा को अपने अंदर स्थापित करें।

वस्तुतः श्री गुरूजी आत्मीयता को सामाजिक समरसता की दिशा में सर्वोत्तम समाधान के रूप में देखते हैं।

संघ और स्वदेशी

स्वाधीन भारत में स्वभाषा, स्वभूषा और स्वबोध का विचार : सरसंघचालकमोहनभागवत

स्वाधीन भारत में वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी स्वभाषा और स्वभूषा के साथ-साथ स्वबोध के विचार को रखते हैं। उनका मानना है कि अपने घर की चौखट के अंदर अपनी भाषा चाहिए, अपनी वेशभूषा चाहिए। भाषा, भूषा, भजन, भोजन अपने घर के अंदर अपना चाहिए। अपनी परंपरा का चाहिए। भ्रमण और भवन भी अपना ही चाहिए। अपना भवन अपनी परंपरा से होना चाहिए। बहुत अच्छा घर बनाया और पूजा घर नहीं बनाया, तो वह हिन्दू परंपरा का घर नहीं होगा। पूजा घर रहता है, अच्छे स्थान पर रहता है। पूजा घर बनाने को कहा तो सीढ़ी के नीचे जो त्रिकोण होता है उसमें बना दिया, ऐसा नहीं करना। ठीक से भाषा, भूषा, भजन, भवन, भ्रमण, भोजन होना चाहिए। भ्रमण, यानि वही जो पहले कहा, कि कुंभलगढ़ लेकर जाओ बच्चों को। पेरिस, सिंगापुर भी देखिए। दुनिया देखनी चाहिए, लेकिन कुंभलगढ़ भी देखिए और झुग्गी-झोपड़ी भी देखिए। वहाँ रहने वाले अपने लोग हैं, अपने बंधु हैं। कल हो सकता है कि उनमें से एकाध अरबपति बने और अपने सामने बड़ी बिल्डिंग बनाए। इस अपनत्व के साथ अपने घर की चौखट के अंदर अपना व्यवहार करना चाहिए।

ठीक है, फुल पैंट में रहना पड़ता है, पाश्चात्य वेश में रहना पड़ता है, कोई विरोध नहीं। वैसे देखा जाए तो अपना वेश या पराया वेश नहीं होता। जो विधिवत यानी कन्वीनिएंट है, वह पहनना। परंतु हमको धोती पहनना आता ही नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए। हमारे देश की आबो-हवा के अनुसार ये हमारी परंपरा में बने हैं। कम से कम पर्व-त्योहारों पर पहनना चाहिए। यह स्वबोध है। अपना हस्ताक्षर हम अपनी भाषा में कर नहीं सकते..! छोटी बात है। बदल दीजिए अगर अंग्रेजी में करते हैं तो। अपनी भाषा में कीजिए। जहाँ आवश्यक है, वहाँ अपनी भाषा के शब्द प्रयोग करें। यह वृत्ति है। ‘स्व’ का बोध होने से आदमी बनता है। स्व के आधार पर ही प्रगति होती है।

 स्वदेशी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का स्वदेश प्रेम बहुत गहरा था। उनका मानना था कि स्वदेशी नीति एवं दृष्टिकोण के अभाव में स्वराज्य बिल्कुल अधूरा ही है। स्वदेशी नीति के द्वारा ही राष्ट्रीय निधि को मजबूत बनाया जा सकता है। सरकार को इसलिए त्वरित कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

स्वदेशी वस्तुओं की कमी पर चिंता प्रकट करते हुए और स्वदेशी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने के लिए वह कहते हैं कि हमें उद्योगों का विकेंद्रीकरण करना होगा। छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों को लेकर चलना होगा। बड़े दुःख की बात है कि पंचवर्षीय योजना में बड़े-बड़े उद्योगों के लिए 1500 करोड़ रुपए रखे गए हैं, जबकि छोटे-छोटे उद्योगों के लिए केवल 300 करोड़। यही कारण है कि छोटे-छोटे उद्योग बिगड़ते जा रहे हैं व स्वदेशी वस्तुओं का ह्रास होता जा रहा है।

दीनदयाल जी कहते हैं कि

  • विदेशी माल पर नियंत्रण कर स्वदेशी को प्रोत्साहन दिया जाए।
  • दूतावासों में केवल स्वदेशी, विशेषत: कुटीर उद्योग निर्मित वस्तुओं का ही उपयोग हो।

उद्योग नीति में ऐसे उद्योगों को कोई स्थान नहीं, जिन्हें थोड़ी पूँजी से तथा थोड़े ज्ञान से चलाया जा सकता है। जो कुछ छोटे-छोटे उद्योग लड़ाई के काल में पनपे थे, वे नष्ट हो रहे हैं। आयात-निर्यात की नीति इन स्वदेशी उद्योगों के लिए हानिकर रही है। विदेशी पूँजीपति भ्रष्ट नौकरशाही को सहज ही अपने अनुकूल कर लेते हैं, जिससे भारत के उद्योगों के हित के प्रतिकूल आयात किया जाता है। निर्यात पर लगाए गए टैक्सों ने हमारे छोटे–छोटे ही नहीं, बड़े उद्योगों को भी आघात पहुँचाया है।

‘स्वदेशी’ की प्रासंगिकता और विदेशी वस्तुओं के लगातार प्रयोग के दूरगामी प्रभावों को बताते हुए दीनदयाल जी कहते हैं कि विदेशों की हर वस्तु हम बडे चाव से ले रहे हैं। विचार, व्यवस्था, पद्धति, पूँजी, उत्पादन-प्रणाली, प्रौद्योगिकी तथा उपभोग के मानदंड सभी क्षेत्रों में हम विदेशों पर निर्भर हैं। यह प्रगति का रास्ता नहीं। इससे विकास नहीं होगा। हम अपने ‘स्व’ को विस्मृत कर परतंत्र हो जाएँगे। ‘स्वदेशी’ के भावात्मक रूप को समझकर हमें उसे सृजन का आधार एवं अवलंब बनाना चाहिए।

स्वदेशी की भावना का पुनः जागरण और आत्मनिर्भरता

दीनदयाल जी का मानना है कि विदेशी मुद्रा विनिमय में युक्तिकरण के साथ-साथ ही हमारे जीवन के प्रति नजरिए और हमारी नीतियों में भी बदलाव आना चाहिए। हमें स्वदेशी की भावना को फिर से जगाना होगा। उन ग़लत ख़यालों को, जो कि हमारे मन में घर कर गए. हैं, उन्हें हटाना होगा। प्रगति सिर्फ़ किन्ही विदेशी वस्तुओं, पश्चिमी देशों से आई चीज़ों के भरोसे नहीं होती। आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का भाव जैसे ही जागेगा, वैसे ही डॉलर की जरूरत कम पड़ने लगेगी। सफ़र तभी कीजिए जब वह ज़रूरी हो’, यह युद्ध के दौरान का रेलवे का वह नारा था, जो उसने भीड़ कम करने के लिए चलाया था। “ विदेशी मुद्रा तभी लें जब बहुत आवश्यक हो’ और “विदेश यात्रा तभी, जब बहुत आवश्यक हो’ के नारे अब हमारी जरूरत हैं। हमारी योजनाएँ अब उपलब्ध विदेशी मदद पर नहीं, हमारी आवश्यकताओं पर आधारित होनी चाहिए। जब हम खुद के स्रोत न जुटा पाएँ, केवल तभी किसी भी विदेशी मदद पर निर्भर हों। आख़िर क्यों हम डॉलर का इस्तेमाल करें, जब हम रुपए से काम कर सकते हैं!

वस्तुतः पंडित दीनदयाल जी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत को बलवान बनाने के लिए अर्थव्यवस्था के स्वदेशीकरण को विशेष महत्त्व देते हैं।

तृतीय पड़ाव

  • संघ कार्य की विकास यात्रा का तीसरा पड़ाव डॉ. हेडगेवार जन्मशती (1989) से प्रारम्भ हुआ। समाज के वंचित, दुर्बल और पिछड़े वर्गों तक पहुँचने का संकल्प लिया गया। आत्मीयता से उनकी सहायता और सेवा को अपना दायित्व मानते हुए समग्र विकास के उद्देश्य से 1990 मेंसेवा विभागकी स्थापना हुई।
  • सम्पूर्ण समाज को प्रेम और आत्मीयता के आधार पर संगठित करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम था। शाखाओं और संघ शिविरों में स्वयंसेवक सेवा-भाव और अपनी कुशलता का अभ्यास करते हैं। वर्तमान में स्वयंसेवकों द्वारा विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से लगभग 1,29,000 सेवा कार्य और गतिविधियाँसंचालित हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक कार्य और स्वावलंबन प्रमुख हैं।
  • “राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति” में समाज के अनेक सज्जन स्वयं योगदान देना चाहते हैं। ऐसे प्रभावी व्यक्तियों की विशेषता, सक्रियता, उपलब्धियाँ और समाज-सेवा की जानकारी प्राप्त कर, साथ ही संघ का विचार और कार्य उनसे साझा करने के उद्देश्य सेसम्पर्क विभागका कार्य 1994 में प्रारम्भ हुआ।
  • धर्मजागरण: हिन्दू समाज के लोगों को मतांतरण (conversion) से बचाने और जो लौटना चाहें उनके लिएघर वापसीका मार्ग सरल बनाने का कार्य आरम्भ हुआ।
  • सामाजिक समरसता: अछूत प्रथा और जातीय अन्याय को दूर कर, सबको समान अवसर व सम्मान मिले—इसके लिए प्रयास शुरू हुए।
  • सामाजिक सद्भाव: जातीय विद्वेष मिटाने और साझा समस्याओं पर विचार हेतुसामाजिक सद्भाव बैठकोंकी श्रृंखला चली।
  • ग्राम विकास: सरकारी योजनाओं का उपयोग करते हुए ग्रामवासी मिलकर अपने गांव का सर्वांगीण विकास करेंगे—इस संकल्प से कार्य प्रारम्भ हुआ।
  • गौसेवा व संवर्धन: भारतीय नस्ल की गायों के संरक्षण, औषधीय महत्व, नस्ल सुधार और गोबर-आधारित जैविक खेती को बढ़ावा देने हेतु व्यापक कार्यक्रम चल रहे हैं। देशभर में हज़ारों गौशालाएँ स्थापित हुई हैं।

 

 

चतुर्थ पड़ाव

  • संघ कार्य काचौथा पड़ावचल रहा है, जिसमें प्रत्येक स्वयंसेवक अपनी रुचि व क्षमता के अनुसार किसी क्षेत्र को चुनकर समाज परिवर्तन में सक्रिय होता है। डॉ. हेडगेवार ने कहा था—“संघ कार्य केवल शाखा तक सीमित नहीं, सम्पूर्ण हिन्दू समाज ही कार्यक्षेत्र है।”
  • शाखाओं में पुरुषों के लिए व्यक्ति-निर्माण का कार्य होता है, तो महिलाओं के लिए यही कार्यराष्ट्र सेविका समितिकरती है। सेवा, संपर्क और प्रचार विभागों सहित धर्मजागरण, ग्राम विकास, कुटुंब प्रबोधन, समरसता, गौ-संवर्धन और पर्यावरण जैसे 32+ क्षेत्रों में स्वयंसेवक, मातृशक्ति और सज्जन शक्ति मिलकर सक्रिय हैं।

पंच परिवर्तन

संघ का अनुभव है कि समाज-परिवर्तन का महान कार्य केवल कुछ लोगों से नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की शक्ति से ही संभव है। इसलिए आगामी वर्षों के लिए संघ ने समाज-परिवर्तन कोपंच–परिवर्तनके रूप में समग्रतापूर्वक देखा है। इसका आशय है कि समाज जीवन में समयानुकूल परिवर्तन लाकर हम राष्ट्रहित में अपने जीवन को ढालें।

सामाजिक समरसता

हिन्दू समाज की स्वाभाविक विशेषता समरसता रही है। किंतु समय के साथ जाति-भेद, ऊँच-नीच और अस्पृश्यता जैसी विकृतियाँ उत्पन्न हुईं, जिससे समाज के कुछ वर्गों को अन्याय और अपमान सहना पड़ा। आज यह बुराई त्याज्य है और इसका समाप्त होना अत्यंत आवश्यक है। संतों, गुरुओं और समाजसुधारकों ने इसे पाप और अमानवीय परंपरा बताया। संघ का आग्रह है कि समाज में सब समान हैं—इस भावना से सभी को जोड़कर एकत्व की स्थापना की जाए।

पर्यावरण संरक्षण

मानव जीवन पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) पर आधारित है। इनका संतुलन बिगड़ने से ही आज की पर्यावरणीय चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं। भारतीय परंपरा में पेड़-पौधों और प्रकृति की पूजा का जो भाव है, वही सच्चे अर्थों में पर्यावरण संरक्षण का आधार है। जल-बचत, वृक्षारोपण, स्वच्छता और ऊर्जा-संरक्षण प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। यही भाव नव राष्ट्र-निर्माण की आवश्यकता है।

कुटुंब–प्रबोधन

कुटुंब समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे प्रभावी इकाई है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में परिवार को आनंद और समृद्धि का केंद्र बताया गया है। परिवार में हिन्दू जीवन-शैली, संस्कार और कर्तव्यों का पोषण कर हमवसुधैव कुटुम्बकम्की भावना को जीवित रखते हैं। संघ का मानना है कि स्वस्थ परिवार से ही स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है।

स्व–आधारित जीवन

विदेशी दासता से मुक्त होकर स्वभाषा, स्वभूषा, स्वसंस्कृति और स्वदेशी उद्योगों पर बल देना आवश्यक है। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि स्वाभिमान के साथ व्यापार और उत्पादन करना है। रक्षा, विज्ञान और तकनीक में आत्मनिर्भर भारत—जैसे डीआरडीओ, इसरो, परम सुपरकंप्यूटर और कोविड वैक्सीन के उदाहरण—स्व-आधारित जीवन की दिशा में प्रेरणास्रोत हैं। स्थानीय व कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देकर हमें रोजगार और आत्मनिर्भरता दोनों को बढ़ाना है।

नागरिक कर्तव्यबोध और शिष्टाचार

संविधान ने हमें अधिकार दिए हैं, लेकिन साथ ही मौलिक कर्तव्यों का भी आग्रह किया है। राष्ट्रभक्ति केवल बड़े अवसरों पर नहीं, बल्कि दैनिक आचरण में झलकनी चाहिए—पानी-बिजली की बचत, ईंधन का संयमित उपयोग, अनुशासन, ईमानदारी और शिष्टाचार भी राष्ट्रसेवा हैं। अच्छे और जिम्मेदार नागरिक ही किसी भी देश की आंतरिक शक्ति और स्थायी विकास का आधार होते हैं।

 

 

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