पटना। भरत तिवारी मानसिक विक्षिप्त नही था वह बहुत ज्यादा संवेदनशील युवा था , बहुत ही ज्यादा भावुक और ऐसा व्यक्ति अगर हिम्मतवाला भी हो जाये जिसे गांवों में कहते हैं शेरदिल कलेजा वाला , जिगरा वाला , तो ऐसा व्यक्ति शेर की मांद में , सांपो के बिल में हाथ डालने वाला हद दर्जे का हिम्मती होता है। ऐसा व्यक्ति जब भी कोई काम करेगा तो बहुत दिल से करेगा और जिस काम को करने का मन नही तो उससे ब्रम्हा भी वह कार्य नहीं करवा सकते… और यही इनकी कमज़ोरी बन जाती है, दिल से लगा लेना जबकि दिल के साथ दिमाग भी लगाना चाहिए आखिर भगवान ने दिमाग क्यों दिया है यह भी सोचना चाहिए।
इतिहास में जितने भी दिलवाले हुए हैं वह ऐसे ही मारे गए हैं …आप जिसके लिए लड़ते हैं वही दिमाग का इतना ज्यादा प्रयोग करता है कि वह पीछे हट जाता है जबकि थोड़ा सा भी दिल गांव वाले लगाए होते जिनके लिए भरत लड़ रहा था तो आज भरत तिवारी जिंदा होता।

नेता और व्यापारी को आप कितना भी गाली दीजिये लेकिन सत्ता और समाज की कमान इन्ही के हाथों रहेगी , जानते हैं क्यों ? क्योंकि ये दिमाग ज्यादा और दिल थोड़ा सा ही प्रयोग करते हैं…
भरत तिवारी लंबे समय से शासन ,सत्ता से अपने बाढ़ग्रस्त गांव के लिए गुहार लगा रहा था । वह लचर सिस्टम से परेशान हो चुका था और इतना ज्यादा भावुक हो उठा कि हथियार उठा लिया… यही पर उसने बड़ी गलती कर दिया…
बिहार राज्य के भोजपुर जिले का जवनियाँ गांव जो गंगा जी के बाढ़ से पूरा गांव ही जलमग्न होकर गंगा जी मे समा गया… विस्थापितों के पुनर्वास के लिए नेताओ और अधिकारियों के ही दौड़ लगा रहा था उसे मिलता था तो सिर्फ आस्वासन । शासन के अधिकारी और नेता मंन्त्री भी क्या करे?? ये सभी एक भ्रष्ट और अत्याचारी व्यवस्था के अधीन नौकरी और नेतागिरी करते है …
भरत को संघर्ष करना था तो रास्ता हथियार उठाने का नही था…. तुम्हे लड़ना था तो–
तुम लड़ते…
अनशन करते
चुनाव का बहिष्कार करते
समाज को अपने साथ खड़ा करते
और स्वयं चुनाव लड़ते …… भरत तिवारी हथियार न उठाकर ऐसी लड़ाई लड़ते जिसमे समाज अथवा जनता का सहयोग लेते तो निश्चित ही कुछ ही वर्षो में भरत तिवारी को पता चलता कि वह जिस जनता अथवा समाज के लिए लड़ रहा है उसी समाज और जनता ने ही भ्रष्ट अधिकारी , भ्रष्ट नेता और बेईमान व्यापारी को अपने वीर्य से पैदा किया है ( यही वीर्य का तात्पर्य पुरुषार्थ से है ) लेकिन भरत तिवारी ठहरे नितांत भावुक ,अति संवेदनशील और हद दर्जे के हिम्मती….
सारी गलती पुलिस की ही नही है , पुलिस का तो काम ही है सरकार के आदेशों का पालन करना और वह वही काम कर रही थी… कई दिनों से भरत हथियार उठा कर वीडियो बना कर अधिकारियों को मारने की धमकी दे रहे थे… पुलिस पकड़ने गयी तो अपने घर से पुलिस पर फायरिंग करने लगे … खुलेआम पुलिस को लड़ने की चुनौती देने लगे वह भी हथियार के साथ… समय समय पर अपने हथियार से फायरिंग भी करते… निश्चित रूप से यह दुस्साहसिक आपराधिक कृत्य था …
घेरा बंदी के बाद जब भरत तिवारी ने लाइव वीडियो बनाते हुए भ्रष्ट सत्ता शासन को ललकारते हुए अपने हथियार पुलिस के सामने फेंक कर समर्पण कर दिया और पुलिस कह भी रही कि तुम समर्पण करो हम कुछ नही करेंगे…जबकि पुलिस उसे मानसिक विक्षिप्त घोषित कर चुकी थी तो उसका इलाज करवाती लेकिन पुलिस ने आत्मसमर्पण करने के बाद भरत तिवारी को बंदूक के बट से मारा फिर कई गोली उसे मार दिया …… यह बिहार पुलिस का निहायत ही कायराना घटिया अपराध है जिसे भगवान कभी भी क्षमा नही करेंगे… भरत तिवारी कोई अपराधी नही था वह एक राष्ट्रवादी संवेदनशील भावुक युवा था…मोदी -योगी के गीत गाता था लेकिन उसे क्या पता कि ‘ नेता सिर्फ नेता होता है ‘ ,…..
मेरा देश के युवाओ से अपील है कि एक बार भरत तिवारी को पढ़ने की कोशिश करना…अत्यंत सामान्य परिवार का युवा एक ऐसे देश मे जीवन जी रहा था जहाँ जीवन के मुद्दे जाति आरक्षण बनाये गए है , देश का पढ़ा लिखा प्रोफेसर ,डॉक्टर इंजीनियर और नेता जाति आरक्षण को मुद्दा बनाता हो वहाँ भरत तिवारी गरीबो के जीवन जीने की लड़ाई लड़ रहा था…
मैं भरत तिवारी को मानसिक विक्षिप्त नही मानता मैं उसे बलिदानी मानता हूं …. अगर भरत तिवारी बलिदानी नही है तो फिर चंद्रशेखर आज़ाद ,भगतसिंह असफाक , बिस्मिल भी बलिदानी नही है…



