मातृभाषा माध्यम में उच्च शिक्षा विकास को दे सकती है रफ्तार

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डॉ. शैलेश शुक्ला

लखनऊ । भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, वह चिंतन की धुरी है। जिस भाषा में मनुष्य सपने देखता है, तर्क करता है और सवाल पूछता है, उसी भाषा में यदि उसे ज्ञान मिले तो उसकी ग्रहणशीलता कई गुना बढ़ जाती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में उच्च शिक्षा का माध्यम क्या हो, यह प्रश्न केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय विकास से भी जुड़ा है। लंबे समय तक यह धारणा प्रचलित रही कि अंग्रेजी के बिना उच्च शिक्षा, विशेषकर तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा संभव नहीं है। अब समय और तकनीक दोनों ने इस धारणा को चुनौती दी है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस नीति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जहाँ तक संभव हो, उच्च शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या स्थानीय भाषा होनी चाहिए। यह कोई भावनात्मक आह्वान नहीं, बल्कि शैक्षणिक अनुसंधान पर आधारित सुझाव है। यूनेस्को ने अपने कई अध्ययनों में यह स्थापित किया है कि प्रारंभिक वर्षों में ही नहीं, बल्कि उच्च स्तर पर भी मातृभाषा में शिक्षा से अवधारणाओं की समझ अधिक गहरी होती है। जब छात्र को किसी जटिल सिद्धांत को पहले भाषा में अनुवाद करना पड़ता है और फिर समझना पड़ता है, तो उसकी संज्ञानात्मक ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा केवल भाषा को समझने में खर्च हो जाता है। यदि वही सिद्धांत उसकी मातृभाषा में मिले, तो वह ऊर्जा सीधे ज्ञान के विश्लेषण में लगती है।

भारत की जमीनी हकीकत इस तर्क को और मजबूत करती है। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन यानी एआईएसएचई की रिपोर्ट के अनुसार देश में उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात अभी भी लगभग 28 से 29 प्रतिशत के आसपास है। इसका अर्थ है कि 18 से 23 वर्ष के आयु वर्ग के लगभग 70 प्रतिशत युवा अभी भी उच्च शिक्षा की परिधि से बाहर हैं। इसके कई कारण हैं, जिनमें आर्थिक और सामाजिक कारण प्रमुख हैं, लेकिन भाषा एक अदृश्य अवरोध के रूप में काम करती है। देश के अधिकांश छात्र कक्षा 12 तक राज्य बोर्डों से अपनी मातृभाषा में पढ़कर आते हैं। अचानक स्नातक स्तर पर जब शिक्षा का माध्यम पूरी तरह से अंग्रेजी हो जाता है, तो उनमें से एक बड़ा वर्ग खुद को अलग-थलग महसूस करता है। कक्षा में प्रश्न पूछने में हिचक, उत्तर लिखने में कठिनाई और आत्मविश्वास में कमी इसी भाषा परिवर्तन का परिणाम है।

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि भारतीय भाषाओं में तकनीकी और उच्च स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं। यह तर्क एक दशक पहले तक कुछ हद तक मान्य हो सकता था, लेकिन आज यह अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी एआईसीटीई ने पिछले कुछ वर्षों में इंजीनियरिंग की शिक्षा को 12 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की पहल की है। इसके लिए मूल अंग्रेजी पुस्तकों का अनुवाद किया गया है और ई-कुबेर जैसे प्लेटफॉर्म पर यह सामग्री उपलब्ध कराई गई है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी कई विश्वविद्यालयों में भारतीय भाषाओं में पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए अनुदान और दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

अब इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका निर्णायक हो गई है। आज अनुवाद अब केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं रहा। एआई आधारित उपकरण संदर्भ के साथ अनुवाद करते हैं, तकनीकी शब्दावली को संरक्षित रखते हैं और विषय विशेषज्ञों द्वारा उसका पुनरीक्षण भी तेजी से संभव है। नेशनल ट्रांसलेशन मिशन जैसे प्रयास पहले से ही इस दिशा में काम कर रहे हैं। ऐसे में यह कहना कि पुस्तकें नहीं हैं, इसलिए मातृभाषा में शिक्षा नहीं दी जा सकती, यह तकनीकी युग में एक कमजोर तर्क बन जाता है। पुस्तकें तैयार करने में जितना समय और संसाधन लगेगा, उससे कई गुना अधिक समय और संसाधन हर वर्ष लाखों छात्र केवल अंग्रेजी को माध्यम के रूप में साधने में लगा देते हैं। यदि उसी सामूहिक प्रयास को सामग्री निर्माण में लगाया जाए, तो परिणाम स्थायी होगा।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि मातृभाषा में उच्च शिक्षा का अर्थ अंग्रेजी का बहिष्कार नहीं है। अंग्रेजी का ज्ञान आज वैश्विक शोध, रोजगार और अंतरराष्ट्रीय संवाद के लिए आवश्यक है। इसलिए अंग्रेजी को एक मजबूत विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि छात्र उसमें दक्ष हो सकें। लेकिन अंग्रेजी को माध्यम बनाकर ज्ञान के द्वार पर ताला लगा देना उचित नहीं है। माध्यम और विषय में यही मूलभूत अंतर है जिसे समझने की आवश्यकता है। माध्यम वह है जो ज्ञान तक पहुँचने का रास्ता सुगम बनाता है, जबकि विषय एक कौशल है। जब हम अंग्रेजी को माध्यम बनाते हैं, तो हम अनजाने में उन छात्रों को दंडित करते हैं जिनके पास अंग्रेजी माध्यम के महंगे स्कूलों तक पहुँच नहीं थी।

मातृभाषा में शिक्षा का एक गहरा लोकतांत्रिक और आर्थिक पक्ष भी है। भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अभी भी कृषि, लघु उद्योग और स्थानीय बाजारों से जुड़ा है। यदि उच्च शिक्षा प्राप्त युवा अपनी भाषा में तकनीकी ज्ञान प्राप्त करता है, तो वह उस ज्ञान को सीधे अपने समुदाय और स्थानीय अर्थव्यवस्था में लागू कर सकता है। एक कृषि विज्ञान का छात्र यदि अपनी मातृभाषा में मृदा विज्ञान या जल प्रबंधन सीखता है, तो वह उसे अपने जिले के किसानों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचा सकता है। यही बात चिकित्सा, कानून और प्रबंधन के क्षेत्र में भी लागू होती है। कानून की पढ़ाई यदि स्थानीय भाषा में होगी,तो ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय तक पहुँच आसान होगी।

कई बार उदाहरण दिया जाता है कि जापान, जर्मनी, फ्रांस, रूस और चीन जैसे देशों ने अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करके ही वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति की है। वहाँ के छात्र बचपन से अपनी भाषा में उच्चतम तकनीक तक सीखते हैं और अंग्रेजी को एक अतिरिक्त भाषा के रूप में सीखते हैं। इसका परिणाम यह है कि उनका ज्ञान उनके समाज में गहराई तक उतरता है। भारत के पास भी यही क्षमता है। हमारे पास 22 अनुसूचित भाषाओं में समृद्ध साहित्य और वैज्ञानिक परंपरा रही है। आवश्यकता केवल उस परंपरा को आधुनिक पाठ्यक्रम से जोड़ने की है।

विकास की रफ्तार का सीधा संबंध मानव संसाधन की गुणवत्ता से है। यदि देश के केवल 10 प्रतिशत अंग्रेजी जानने वाले वर्ग को ही उच्च शिक्षा में सहजता मिलती है और 90 प्रतिशत अपनी भाषा के कारण संघर्ष करता है, तो राष्ट्रीय प्रतिभा का एक बड़ा हिस्सा अविकसित रह जाता है। मातृभाषा में उच्च शिक्षा इस असंतुलन को ठीक कर सकती है। इससे कक्षा में मौलिक प्रश्न पूछने वाले छात्रों की संख्या बढ़ेगी, शोध में नए दृष्टिकोण आएंगे और नवाचार स्थानीय समस्याओं से जुड़ेगा। जब छात्र अपनी भाषा में सोचने के लिए स्वतंत्र होगा, तभी वह रटने के बजाय सृजन कर पाएगा।

इसलिए मातृभाषा में उच्च शिक्षा कोई पिछड़ेपन की ओर लौटना नहीं, बल्कि भविष्य की ओर एक व्यावहारिक कदम है। यह गरीब, वंचित और ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों को बराबरी के मंच पर लाने का प्रयास है। अंग्रेजी एक खिड़की के रूप में खुली रहे, जिससे हम दुनिया को देख सकें, लेकिन घर की नींव हमारी अपनी भाषाओं में ही मजबूत होनी चाहिए। तभी उच्च शिक्षा कुछ लोगों की सुविधा से निकलकर पूरे देश के विकास का इंजन बन पाएगी।

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