मीडिया ट्रायल का दोहरा चरित्र: राम मंदिर मामले में जांच की प्रतीक्षा क्यों नहीं?

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अयोध्या (उत्तर प्रदेश) : राम मंदिर अयोध्या में भक्तों के चढ़ावे की कथित हेराफेरी का मामला गंभीर है। पिछले महीने उत्तर प्रदेश सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुरोध पर तीन सदस्यीय एसआईटी गठित की। प्रारंभिक जांच में नकदी गिनती, सोना-चांदी के रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और सुरक्षा प्रक्रियाओं में अनियमितताएं सामने आईं। आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया, लगभग 80 लाख रुपये बरामद हुए। एसआईटी अब पांच वर्षों के ट्रस्ट खातों की री-ऑडिट कर रही है, जिसमें निर्माण व्यय और आभूषण दान शामिल हैं। कुछ आरोपियों के घरों पर बुलडोजर की कार्रवाई की चर्चा भी है।

ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय समेत कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया। यूपी पुलिस और  एसआईटी की जांच जारी है। अपराध साबित होने पर कड़ी सजा और संपत्ति जब्ती की मांग हर तरफ है। रामलला के दान में गबन महापाप है-इस बात पर हिंदू समाज का हर वर्ग एकमत है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यह मामला मीडिया ट्रायल का शिकार बन जाता है। वे ही पत्रकार और यूट्यूबर, जो पिछले सात-आठ वर्षों में ‘मीडिया ट्रायल’ शब्द का इस्तेमाल कर मीडिया के ही एक वर्ग को ‘गोदी मीडिया’ बताकर बार बार विभिन्न मामलों में केस को प्रभावित करने का आरोप लगाते रहे, आज राम मंदिर मामले में रोज नई-नई कहानियां गढ़ रहे हैं। कांग्रेस से जुड़े माने जाने वाले एंकर और आईटी सेल से प्रेरित यूट्यूब चैनल्स इस मुद्दे को एजेंडा बनाने में लगे हैं।

इस श्रृंखला में संदीप चौधरी, अजीत अंजुम, रवीश कुमार जैसे नामों की कमी नहीं है। इन्होंने अतीत में कई संवेदनशील मामलों में ‘जांच तक चुप रहो, मीडिया ट्रायल मत करो’ का उपदेश दिया। कोविड के समय जमात वाली या फिर रिया चक्रवर्ती की स्टोरी भूले तो नहीं होंगे आप लोग। अब इन्हीं के चैनलों पर राम मंदिर को लेकर ‘200 करोड़ का डकैत’, ‘ट्रस्ट की चुप्पी का खेल’, ‘बड़ी मछली बच रही हैं’ जैसी सुर्खियां रोज चल रहीं हैं। एसआईटी अभी प्रारंभिक रिपोर्ट दे रही है, री-ऑडिट चल रहा है, बड़े नामों की भूमिका पर पूछताछ हो रही है-फिर भी फैसला सुनाने की जल्दबाजी क्यों? थोड़ा ठहर जाओ। एक बार रिपोर्ट आ जाए फिर जी भर कर रिपोर्ट करना।

यह दोहरा मापदंड है। जब कोई अन्य संस्था या व्यक्ति पर आरोप लगता है तो ये ‘प्रेस फ्रीडम’, ‘जांच पूरी होने दो’ का राग अलापते हैं। लेकिन जब राम मंदिर जैसे भावनात्मक मुद्दे पर सवाल उठता है तो ट्रायल शुरू। भक्तों की आस्था को चोट पहुंचाने वाला नैरेटिव बनाया जा रहा है। एक ओर कहते हैं ‘राम मंदिर सबका है’, दूसरी ओर उसी मंदिर के दान पर राजनीतिक पूंजी कमाने की कोशिश।

तथ्य यह है कि एसआईटी यूपी सरकार ने बनाई, ट्रस्ट ने खुद शिकायत की। आठ गिरफ्तारियां हुईं, नकदी बरामद हुई। जांच में और नाम आ सकते हैं-चाहे छोटे कर्मचारी हों या बड़े पदाधिकारी। लेकिन जांच को राजनीतिक हथियार बनाने से पहले इंतजार क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में तत्काल सुनवाई से इनकार किया। फिर भी कुछ एंकर रोज ‘ब्रेकिंग’ चला रहे हैं, बिना सबूत के बड़े-बड़े आरोप लगा रहे हैं।

यह प्रवृत्ति नई नहीं। 2019 के बाद राम मंदिर निर्माण, प्राण-प्रतिष्ठा और अब दान प्रबंधन-हर चरण पर कुछ वर्ग ने इसे राजनीतिक बनाने की कोशिश की। जबकि करोड़ों भक्तों ने अपनी श्रद्धा से दान दिया। गरीब- अमीर, एनआरआई सबने योगदान किया। अगर कोई गबन हुआ तो वह आस्था की चोरी है। लेकिन उसी आस्था को राजनीति का हथियार बनाना भी अपराध है।


संदीप चौधरी जैसे एंकर लंबे समय से विपक्षी दलों की लाइन पर बहस करते दिखते हैं। अजीत अंजुम और रवीश कुमार ने भी ‘मीडिया ट्रायल’ के खिलाफ कई व्याख्यान दिए। आज वही लोग राम मंदिर मामले में ‘ट्रस्ट ने सब छिपाया’, ‘योगी सरकार बचाने की कोशिश’ जैसे नैरेटिव चला रहे हैं। जबकि एसआईटी रिपोर्ट सार्वजनिक होने वाली है, और यूपी सरकार ने स्पष्ट कहा है-कोई दोषी बचेगा नहीं।

मीडिया की भूमिका निगरानी रखना है, ट्रायल नहीं। जांच एजेंसियां अपना काम करें। अगर बड़े नाम निकलते हैं तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई हो। बुलडोजर, जेल, संपत्ति जब्ती-जो भी कानून कहे। लेकिन रोज नई कहानी गढ़कर राम मंदिर को विवादास्पद बनाना श्रीराम भक्तों के साथ अन्याय है।

अब तक जो हुआ सो हुआ। आगे जांच पूरी होने तक एजेंडा चलाने वालों को याद रखना चाहिए-राम मंदिर केवल ईंट-गारे का ढांचा नहीं, करोड़ों भारतीयों की आस्था का प्रतीक है। इस आस्था पर सियासत करने वाले खुद इतिहास में दर्ज होंगे। सजा अपराधियों को मिलनी चाहिए, लेकिन बिना सबूत के चैनलों और यू ट्यूब के एंकर द्वारा चलाया जाने वाला ट्रायल किसी को भी स्वीकार्य नहीं।

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आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

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