मेरी पुस्तक अमृत कुंभ में एक चैप्टर है :- “विवाह सूक्त”

2-16.jpeg

अभिजीत सिंह

दिल्ली । पुस्तक का कथानक यूं है कि निवेदिता नाम की एक महिला “स्वामी विवेकानंद एकेडमी” नाम से एक स्कूल शुरू करती है। उद्देश्य था – बच्चों को उनके धर्म और संस्कृति से परिचित कराना पर कई कारणों से वो उसमें सफल नहीं होतीं। अनेक कारणों में एक कारण बच्चों का इन विषयों में रुचि न लेना भी था।

एक दिन एक कैफे में निवेदिता आनंद को एक लड़का मिलता है – समीर राघवन जो पिता का इलाज कराने कुछ दिनों के लिए दिल्ली आया हुआ है। समीर की जब निवेदिता से बात होती है तो समीर कहता है कि मैं कुछ दिन बच्चों को बतौर गेस्ट टीचर पढ़ा सकता हूं, जिसमें मैं कोशिश करूंगा कि उन्हें उनके धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के विषयों में रुचि हो जाए।


कुछ दिनों के क्लास के बाद ही स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन का अवसर आता है और क्लास की बच्चियां एक छोटे से नाटक का थीम चुनना तय करती है। इसमें उसकी मदद करते हैं उसके गेस्ट टीचर – समीर राघवन।

इस चर्चा में समीर से बच्चियां वही पूछती हैं, जो वाम खेमा हमेशा से उन्हें सिखाता आया है कि हिन्दू धर्म ने स्त्रियों को क्या दिया है?

जबाब में समीर कहते हैं – इसे ऐसे न पूछकर ऐसे पूछो कि “स्त्रियों ने हिन्दू धर्म को क्या दिया है” तो मैं इसका जो उत्तर दूंगा वो मेरी और सम्पूर्ण हिन्दू समाज की ओर से स्त्रियों के लिए कृतज्ञता ज्ञापन जैसा होगा।

और इसके बाद समीर उसकी बात सुनकर हतप्रभ उन बच्चियों को “विवाह सूक्त” के बारे में बताता है।

समीर उनसे जो कहता है, वो तो मेरी पुस्तक में बहुत विस्तार से है पर उसका सार – संक्षेपण यूं है –

नारी सम्मानित रहे, सुरक्षित रहे और समाज के घटिया लोग उसे अपनी कुदृष्टि का शिकार न बनाए साथ ही समाज सभ्य प्रजनन की रीति से आगे बढ़े इस हेतु एक सुदृढ़ “नियमावली” की आवश्यकता थी।

पर ये बनाये कौन?

ये प्रश्न जब हमारे ऋषियों के समक्ष आया तो उन्होंने बहुत विचार के बाद कहा –

देखो ! ये प्रश्न नारी और फिर सबसे बढ़कर समाज की सुदृढ़ संरचना का है तो इसके लिए नियमावली भी “नारी” ही बनाये और फिर उनके इस आह्वान पर आगे आईं एक देवी जिनका नाम था – “सूर्या सावित्री”

इस नारी के समक्ष सारी मानवजाति को नतमस्तक होना चाहिए; क्योंकि इस नारी ने दुनिया को “विवाह” नाम की संस्था से परिचित कराया। इस तेजस्वी एवं विदुषी महिला ने वेद के सूक्त ही रच दिए जिसे कहा गया- “विवाह-सूक्त”

है न रोचक कि मानव जीवन के सबसे बड़े स्तंभों में एक ‘विवाह’ संस्था की नियमावालियां किसी पुरुष ने नहीं बल्कि एक स्त्री ने बनाई है

और उसमें उसने पुरुषों को अधिकारपूर्वक नैतिक होने की शपथ दिलाई है ताकि समाज मर्यादित रहे और उसने अपने “सूक्त” में ‘नारी’ को हर तरह से सुरक्षित और सम्मानित करने की भी व्यवस्था दी।

“सूर्या सावित्री” ने 47 मंत्रों के “विवाह सूक्त” को लिखा जिसके आधार पर आगे “हिन्दू विवाह पद्धति” जिसका अनुपालन हम सब कर रहे हैं और जिसके “एकपत्नीव्रत” के आदेश का अनुपालन करने के कारण “प्रभु श्रीराम” के नाम के आगे “मर्यादा पुरुषोत्तम” जुड़ा।

आपको पता है “देवी सूर्या” ने नारी को कैसे-कैसे अधिकार दिए? उन्होंने कहा :-

स्त्री को विधवा विवाह की अनुमति है।

पुरुष के बहुविवाह का निषेध किया और उसकी निंदा करते हुए कहा-“जिस प्रकार रथ का घोड़ा दोनों धुराओं के मध्य में दबा हुआ चलता हैं वैसे ही एक समय में दो स्त्रियाँ करनेवाला पति दबा हुआ होता हैं अर्थात परतंत्र हो जाता हैं ,इसलिए एक समय दो व अधिक पत्नियाँ करना उचित नहीं हैं।”

स्त्री हेतु किसी तलाक जैसी कोई अवधारणा नहीं रखी बल्कि ये कहा- “तुम दोनों इस संसार व गृहस्थ आश्रम में सुख पूर्वक निवास करो, तुम्हारा कभी परस्पर वियोग न हो, सदा प्रसन्नतापूर्वक अपने घर में रहो।”

स्त्री को गृहस्वामिनी, गृहपत्नी और ‘साम्राज्ञी’ कहा गया।

ये कहा गया कि अगर कोई पिता दहेज़ देने में सक्षम नहीं है तो उस कन्या के गुण को ही उसका लाया दहेज़ माना जाएगा।

जानते हैं इन सूक्तों के आधार पर “पाणिग्रहण” के समय जब पिता कन्या का हाथ, वर के हाथ में देता है तो उस समय पति कन्या का वरण करते हुए उसे क्या वचन देता है? वो उससे कहता है:- तेरे सौभाग्य के लिए तेरा यह हाथ मैं अपने हाथ में लेता हूं। मैं तेरा पति हूं, मेरे साथ ही तू वृद्ध हो। भाग्यपति अर्यमा, सविता, पुरंधि आदि समस्त दिव्य विभूतियों ने तुझे मेरे हाथों में सौंपा है कि मैं गृहस्थ धर्म का पालन कर सकूं।”

इस देवी और विदुषी महिला ने इस सूक्त के आधार पर स्त्री-पुरुष के “दाम्पत्य जीवन” को नई परिभाषा दी। “विवाह-सूक्त” लिखकर उस देवी ने सम्पूर्ण हिंदू समाज को एक ऐसा उपहार दिया है, जिसके लिए हिंदू समाज उस “महीयसी” के प्रति सदैव ऋणी रहेगा।

मैं कई हिंदूवादी लड़कियों को देखता हूँ जो हिंदुत्व-निष्ठ होते हुए भी कहीं न कहीं हिन्दू धर्म के नारी वाले पक्ष शंकित रहतीं हैं तो उनको मैं पूरे गर्व से बताना चाहता हूँ कि दुनिया में आपका “हिन्दू धर्म” अकेला ऐसा है जिसने विवाह संस्था की तमाम-नियमावली आपसे लिखवाई है और जिसके कारण अनीति के अस्ताचल काल में भी हिन्दू समाज स्त्री के प्रति कभी अनुदार नहीं हुआ। “देवी सूर्या” प्रणीत पति-पत्नी के इसी आर्ष संबंधों की पवित्रता के रक्षण के लिए रावण का वध हुआ था और इसी के लिए दुर्योधन की जंघाएँ तोड़ी गई थी।

आप गर्व करो कि “हिन्दू धर्म” की “स्टेक होल्डर” आप हो इसलिए जब कोई जाकिर नाईक राजा दशरथ का उदाहरण देते हुए बेशर्मी से आपसे कहता है न कि हिन्दू धर्म में भी तो बहुविवाह होते थे तो उसकी आँखों में आँखें डालकर उससे कहो- किये होंगे राजा दशरथ ने बहुविवाह पर मेरी पूर्वज, मेरी माँ देवी सूर्या ने ऐसी व्यवस्था दी है कि मेरा हिन्दू समाज अपना “आदर्श” एक विवाह की मर्यादा रखने वाले श्रीराम जी को मानता है दशरथ को नहीं।

“हिन्दू धर्म में नारी” विषय पर आपको लांछित करने वाले हरेक से कहो कि देवी “सूर्या” ने जो विवाह व्यवस्था दी थी उसे बाद में “सुवर्चला” नामक विदुषी ने और पुष्ट किया और विवाह संस्कार को पुष्टता देने वाली ये दोनों महिलाएं ही थीं क्या तुम्हारे यहाँ कोई है ऐसी नारी जिसने “विवाह-संहिता” को छूने का भी साहस किया हो?

हिन्दू धर्म में एक नहीं वरन ऐसी अनेकों व्यवस्थाएं हैं जिसे हिन्दू देवियों ने रचा और परिवर्धित किया है, अपने इस गौरव का घोष कीजिये और आगे आकर हमारा प्रबोधन कीजिये क्योंकि हम भी उन्हीं ऋषियों की संततियां हैं जो विवाह जैसे महत्वपूर्ण विषय पर प्रबोधन के लिए आपके समक्ष नत थे।

मनु ने अपनी स्मृति में स्त्रियों को पूजने का निर्देश इसी कारण दिया था।

पुस्तक पढ़ेंगे तो उन प्रश्नों के उत्तर भी मिलेंगे, जिसको लेकर कोई भी कुछ भी बकवास कर जाता है।

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top