माटी उवाच : मिट्टी की स्मृतियों से उठती आवाज़

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डॉ. कुमुद रामानंद बंसल

दिल्ली । कुछ पुस्तकें कहानियाँ सुनाती हैं, कुछ विचार प्रस्तुत करती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जो पाठक को उस संसार में ले जाती हैं जहाँ शब्दों से अधिक मौन बोलता है। माटी उवाच ऐसी ही एक पुस्तक है।

यह कहानी-संग्रह भारतीय आदिवासी जीवन के बाहरी चित्रों का नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक चेतना का साहित्यिक दस्तावेज़ है। यहाँ जंगल केवल वृक्षों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवित उपस्थिति है; नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि स्मृतियों और संबंधों की वाहक हैं; और मिट्टी केवल भूमि नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान और अस्तित्व का आधार है।

इस संग्रह की बारह कहानियाँ भारत के विविध जनजातीय संसारों की यात्रा कराती हैं। रात की शेवाली प्रकृति और उपचार के संबंध को उद्घाटित करती है; दिमनगंगा की संध्या विकास और विस्थापन के प्रश्न उठाती है; छोटी चतुरी मानवीय करुणा और सहज विश्वास का उत्सव है। मिट्टी के ताल और पहचान के धागे स्मृति, समुदाय और सांस्कृतिक पहचान की पड़ताल करती हैं। नाच का दर्पण तथा धुआँ और ढोल आदिवासी उत्सवधर्मिता और सामूहिक जीवन की ऊर्जा को स्वर देते हैं। अमर पत्ता, सोयरी बाई की दीवार और रेत की चिट्ठी विरासत, स्त्री-अनुभव और समय की नश्वरता को स्पर्श करती हैं। जंगल की साँस और मोर की चाल प्रकृति, स्वाभिमान और आत्म-खोज की गहरी संवेदनाओं को सामने लाती हैं। इन सबके बीच उपसंहार पुस्तक की मूल चिंता को एक सूत्र में पिरो देता है—मनुष्य और धरती के रिश्ते की चिंता।

इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ आदिवासी पात्र किसी अध्ययन-वस्तु या रोमांचक लोक-कथा के पात्र नहीं बनते। वे अपनी पूरी गरिमा, संवेदना और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित होते हैं। लेखक उनके लिए बोलने का दावा नहीं करता; वह उनके साथ बैठकर सुनने का प्रयास करता है। यही कारण है कि इन कहानियों में सहानुभूति नहीं, सहभागिता है; वर्णन नहीं, अनुभव है।

आज जब जंगलों को संसाधन, नदियों को जल-भंडार और मिट्टी को केवल भूमि मानने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, तब माटी उवाच हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध उपयोग का नहीं, संवाद का भी है। यह पुस्तक बार-बार हमें उस प्रश्न के सामने खड़ा करती है जिसे आधुनिक समाज लगभग भूल चुका है—क्या विकास और संवेदना साथ-साथ चल सकते हैं?

इन कहानियों का महत्व केवल साहित्यिक नहीं, सांस्कृतिक और नैतिक भी है। वे हमें याद दिलाती हैं कि भारत की आत्मा केवल महानगरों में नहीं बसती; वह उन जंगलों, पहाड़ियों और नदी-तटों में भी जीवित है जहाँ आज भी मनुष्य प्रकृति से संवाद करना जानता है।

माटी उवाच अंततः मिट्टी की आवाज़ सुनने का निमंत्रण है—उस मिट्टी की, जो बोलती कम है, पर याद बहुत कुछ दिलाती है। यह पुस्तक पाठक को केवल कथाएँ नहीं देती; वह उसे ठहरना, सुनना और पुनः स्मरण करना सिखाती है।

जब मिट्टी बोलती है, तो वह शोर नहीं करती—वह स्मरण कराती है।
जब जंगल बोलता है, तो वह उपदेश नहीं देता—वह संबंध रचता है।
और जब मनुष्य सुनना सीख जाता है, तब उसे पता चलता है कि धरती केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि जीवन की सबसे पुरानी गुरु है।

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