मोदी के मैजिक मंत्र : विचारों को राष्ट्रीय मिशन में बदलने की संचार कला

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(A Mass Communication Study)
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दिल्ली : देश अपने घरों में बंद था। सड़कें सुनसान थीं, बाजार खामोश थे और कोरोना का डर हर दिमाग में पहुंच चुका था। इसी माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टेलीविजन पर देश को संबोधित किया।
शाम पांच बजे ताली, घंटी या थाली बजाने की अपील हुई। कुछ दिन बाद रात नौ बजे नौ मिनट तक दीया, मोमबत्ती या मोबाइल की रोशनी जलाने का संदेश आया।
इन अपीलों पर बहस हुई। उनके प्रभाव को लेकर अलग-अलग राय भी सामने आई। लेकिन संचार के स्तर पर संदेश स्पष्ट था: समय तय था, निर्देश सरल थे और नागरिक की भूमिका साफ थी।
यहीं से नरेंद्र मोदी की राजनीतिक संचार शैली को समझने का एक रास्ता मिलता है। पिछले एक दशक से अधिक समय में उन्होंने नीतियों, योजनाओं और राष्ट्रीय लक्ष्यों को छोटे सूत्रों, नारों और याद रहने वाले वाक्यों में प्रस्तुत किया है।
3S, 5T, 5F, पंच प्रण और सप्तधारा इसके उदाहरण हैं।
ग्रामीण विकास, कौशल, तकनीक, आत्मनिर्भरता या विकसित भारत; इन विषयों को अक्सर कुछ शब्दों में समेटा जाता है। लक्ष्य, दिशा और नागरिक की भूमिका एक साथ रखी जाती है।
यही मास कम्युनिकेशन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है: जटिल विचार को सरल संदेश में बदलना।
तीन, पांच और सात का सूत्र
5T—Talent, Tradition, Tourism, Trade और Technology में विकास के पांच क्षेत्रों को एक साथ रखा गया।
Talent और Technology भविष्य की ओर संकेत करते हैं। Tradition और Tourism सांस्कृतिक विरासत को आर्थिक गतिविधि से जोड़ते हैं। Trade बाजार और व्यापार का पक्ष सामने लाता है।
इसी तरह 3S: Speed, Skill और Scale विकास के तीन पहलुओं को संक्षेप में रखता है।
गति चाहिए। कौशल चाहिए। और काम बड़े पैमाने पर होना चाहिए।
5F: Farm, Fibre, Fabric, Fashion और Foreign कृषि से निर्यात तक की वैल्यू चेन को पांच शब्दों में पेश करता है।
एक और यादगार सूत्र है:
IT + IT = IT
Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow.
ऐसे सूत्रों की ताकत उनकी संक्षिप्तता में है। वे किसी लंबे भाषण का विकल्प नहीं हैं, लेकिन पूरे विचार को याद रखने का माध्यम बन सकते हैं।
नारे और स्मृति
Reform, Perform, Transform सुधार, प्रदर्शन और बदलाव को एक क्रम में रखता है।
Per Drop More Crop जल और कृषि के संबंध को चार शब्दों में व्यक्त करता है।
Make in India, Atmanirbhar Bharat और Vocal for Local उत्पादन, आत्मनिर्भरता और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े विचारों को अलग-अलग अभियानों के रूप में सामने लाते हैं।
इसी तरह सबका साथ, सबका विकास बाद में सबका विश्वास और सबका प्रयास से विस्तृत हुआ।
चार शब्द: साथ, विकास, विश्वास और प्रयास, एक राजनीतिक संदेश को याद रखने योग्य रूप देते हैं।
भाजपा संगठन के संदर्भ में बताए गए सात शब्द: सेवाभाव, संतुलन, संयम, समन्वय, सकारात्मकता, संवेदना और संवाद, भी इसी भाषायी तकनीक का उदाहरण हैं। विपक्ष इस कला को जुमलेबाजी कहता है।
समान ध्वनि और क्रमबद्धता स्मृति को आसान बनाते हैं। यहां भाषा सिर्फ सूचना नहीं देती। वह सूचना को याद रखने योग्य बनाती है।
कोविड और सहभागी संचार
कोविड महामारी के दौरान संचार शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। देश में भय था, आर्थिक गतिविधियां बंद थीं और स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव था।
जनता कर्फ्यू की अपील के बाद कोरोना योद्धाओं के सम्मान में ताली, घंटी और थाली बजाने का संदेश आया। फिर 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा हुई।
लॉकडाउन समझाने के लिए लक्ष्मण रेखा का रूपक इस्तेमाल किया गया।
घर आपकी सीमा है। बाहर न निकलें। संक्रमण की कड़ी तोड़ें।
इसके बाद नौ बजे नौ मिनट की अपील आई। बत्तियां बुझाने और रोशनी जलाने का साझा प्रतीक बनाया गया।
सात बिंदुओं वाली अपील में बुजुर्गों की सुरक्षा, सामाजिक दूरी, गरीबों की मदद, कर्मचारियों की चिंता और कोरोना योद्धाओं के सम्मान जैसे विषय शामिल थे।
इन संदेशों में एक महत्वपूर्ण संचार तत्व था: नागरिक को दर्शक नहीं, सहभागी बनाना।
सरकार क्या कर रही है, यह बताने के साथ नागरिक से यह भी कहा गया कि वह क्या कर सकता है।
मास कम्युनिकेशन में इसे सहभागी संचार की दृष्टि से देखा जा सकता है।
संकट से विकसित भारत तक
मोदी की संचार शैली केवल तत्काल संकटों तक सीमित नहीं रही। बाद में यही तकनीक दीर्घकालीन लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल हुई।
पंच प्रण में 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, विरासत पर गर्व, एकता और नागरिक कर्तव्य जैसे विषय शामिल किए गए।
2047 एक लंबी समय-सीमा है। पंच प्रण उसे पांच बिंदुओं में व्यवस्थित करता है।
इसी तरह Demography, Democracy और Diversity को भारत की तीन प्रमुख शक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
दूसरी ओर भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण जैसे राजनीतिक मुद्दों को भी तीन के ढांचे में रखा गया।
फिर आया सप्तधारा का विचार। इसमें मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण, तकनीक और नवाचार, कनेक्टिविटी, रक्षा, ग्रीन और ब्लू इकोनॉमी तथा भारत की सॉफ्ट पावर को विकास की अलग-अलग धाराओं के रूप में रखा गया।
यहां एक और संचार तकनीक दिखाई देती है; परंपरागत प्रतीकों को आधुनिक नीतिगत भाषा से जोड़ना।
सप्त सिंधु जैसी सांस्कृतिक स्मृति के साथ आधुनिक विकास की सात धाराओं को जोड़ा जाता है।
इस तरह कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम टेक्नोलॉजी और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विषयों के साथ योग, आयुर्वेद, संस्कृति और पर्यटन भी राष्ट्रीय विकास की भाषा में शामिल होते हैं।
मोदी से
आगे की संचार शैली
सूत्रों और संक्षिप्त अवधारणाओं का इस्तेमाल केवल प्रधानमंत्री तक सीमित नहीं है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बदलती वैश्विक व्यवस्था को 3Cs: Competition, Conflict और Choke Points जैसे ढांचों में समझाया है।
इसी संदर्भ में Derisking और Diversification जैसे शब्द वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति को समझाने के उपकरण बने हैं।
Just in Time से Just in Case की ओर बदलाव भी इसी तरह एक जटिल आर्थिक विचार को एक छोटे वाक्य में ढालता है।
यह दिखाता है कि संक्षिप्त सूत्र अब भारतीय सार्वजनिक नीति की भाषा का हिस्सा बन रहे हैं।
मगर नारा शासन नहीं होता है; यहीं इस संचार शैली की सीमा पर भी ध्यान देना जरूरी है।
नारा नीति का विकल्प नहीं है। संदेश कारखाना नहीं बनाता। मंत्र रोजगार पैदा नहीं करता। कोई आकर्षक वाक्य नदी को साफ नहीं कर सकता।
अंततः किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके परिणामों से ही होगा ।
सरकारी दावों की जांच जरूरी है। आर्थिक आंकड़ों की समीक्षा जरूरी है। पत्रकारों, विशेषज्ञों, नागरिकों और विपक्ष को सवाल पूछने का अधिकार है। संचार लोगों को किसी नीति या अभियान से जोड़ सकता है। लेकिन उसकी सफलता का अंतिम पैमाना उसका वास्तविक प्रभाव है।
इसलिए प्रभावी राजनीतिक संचार और प्रभावी शासन को एक ही चीज नहीं माना जा सकता।
संक्षिप्तता का विज्ञान
भारत जैसे विशाल और विविध देश में सार्वजनिक संचार की सबसे बड़ी चुनौती है; एक ही संदेश को करोड़ों लोगों तक पहुंचाना।
इसके लिए भाषा सरल होनी चाहिए। संदेश दोहराया जा सके। नागरिक को अपनी भूमिका समझ में आए। और विचार इतना छोटा हो कि वह भाषण से निकलकर रोजमर्रा की बातचीत में पहुंच सके।
भारत में छोटे राजनीतिक नारों की परंपरा पुरानी है। गांधी के दौर में भारत छोड़ो और करो या मरो जैसे वाक्यों ने बड़े आंदोलनों को भाषा दी।
आज माध्यम बदल गए हैं। टेलीविजन, मोबाइल, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने संचार की गति कई गुना बढ़ा दी है।
लेकिन मूल सिद्धांत वही है:
एक विचार। एक उद्देश्य। एक स्पष्ट भूमिका।
मोदी के 3S, 5T, 5F, पंच प्रण, सप्तधारा और Per Drop More Crop जैसे सूत्र इसी दृष्टि से मास कम्युनिकेशन के अध्ययन के उपयोगी उदाहरण हैं।
इनका महत्व केवल इस बात में नहीं है कि वे आकर्षक हैं। उनका महत्व इस बात में है कि वे जटिल विचारों को संक्षिप्त, दोहराने योग्य और याद रखने योग्य बनाते हैं।
एक संदेश अखबार की हेडलाइन बनता है। फिर टीवी की पट्टी। फिर सोशल मीडिया पोस्ट। फिर व्हाट्सऐप संदेश। अंततः वह आम बातचीत का हिस्सा बन सकता है।
यही किसी राजनीतिक संदेश की संचार-यात्रा है।
एक अच्छा वक्ता लोगों को सोचने के लिए विचार देता है।
एक प्रभावी संचारक उस विचार को याद रखने योग्य बनाता है।
और सफल सार्वजनिक संचार तब होता है, जब याद किया गया विचार कार्रवाई से जुड़ जाए।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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