मुंबई के डब्बावाले हमें सिखाते हैं कि सरकार और समाज को केवल शिकायतें और समस्याएँ ही न गिनाते रहिए, कुछ अच्छा और कुछ सकारात्मक अपने स्तर पर भी कीजिए। हो सके तो समस्या की बजाए समाधान ही पेश कीजिए। हमेशा अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना भी जरूरी है और अपने कर्त्तव्यों को निभाना एक स्वस्थ लोकतंत्र में उससे अधिक आवश्यक है।
भोपाल: डब्बावाला आज सामुदायिक संगठन, निरंतर सक्रियता, अटूट सकारात्मकता और अंतत: टिकाऊ सफलता की एक विश्वविख्यात कहानी है, जिसके पीछे बहुत सामान्य पृष्ठभूमि के कम पढ़ेलिखे लोग हैं। उनकी कहानी देश-दुनिया के बड़े प्रबंधन संस्थानों में पढ़ाई जाती है। मेरे देखे इस कहानी का एक पंक्ति में सार है-केवल शिकायतें और समस्याएँ मत गिनाइए, कुछ समाधान भी लाइए!
मुंबई के डब्बावाला सुनील गवांडे ने विश्वविद्यालय आकर अपनी परंपरागत टोपी पहनाई तो मुझे वर्षों पहले महाराष्ट्र में अन्ना हजारे के गांव की यात्रा याद आ गई। मुझे अहमदनगर जिले में अण्णा के गाँव रालेगण सिद्धि में जाकर ज्ञात हुआ था कि यह सफेद टोपी मूलतः महाराष्ट्र के वारकरी पंथ की है। किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है। रालेगण सिद्धि में अन्ना का परिवार भी इनमें से एक है। पंढरपुर के विठोबा से इनका गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव भारत की भक्ति परंपरा का एक सदियों पुराना मजबूत अध्याय है।

मुंबई में 1890 में डब्बा वाला की कहानी शुरु होती है। घर का बना भोजन दूर दफ्तरों में काम करने वालों तक पहुंचाने की सतत सेवा। आज दो लाख लंच बॉक्स लेकर निकले हर दिन 6000 डब्बावाले मुंबई की सड़कों और लोकल ट्रेनों में देखे जा सकते हैं। यह कठोर अनुशासन, समय प्रबंधन और टीम वर्क की शानदार मिसाल है, जो भारत का वास्तविक परिचय देती है। एक ऐसा परिचय जो अपने पुरुषार्थ और पराक्रम से बनता है। गर्मी, सर्दी या बारिश के हर प्रतिकूल मौसम में भी जारी एक निरंतर सेवा।
डब्बावाला की कहानी में यह भी विचारणीय है कि हमारे यहाँ ऐसे कितने काम हैं, जो किसी संगठन, समाज, संस्था या व्यक्ति के स्तर पर आरंभ हुए हों और 137 साल में एक शानदार परंपरा बन गए हों। किसी भी महान व्यक्ति के जाते ही उनका विचार और उनका काम शिथिल हो जाता है या बुराइयों से भरकर नष्ट हो जाता है। गाँधी, विनोबा, जेपी के ऐसे अनेक उदाहरण ताजे अतीत में ही मिल जाएंगे। मगर न के बराबर ऐसे भी उदाहरण हैं, जो तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों को पार करके भी दशकों की यात्रा करते हैं। मुंबई की सीमा में डब्बावाले एक ऐसी ही मिसाल हैं।
सफेद टोपी और सफेद झक परिधान में ही रहने वाले डब्बा वाले उस राज्य से हैं, जिसने छत्रपति शिवाजी और वीर सावरकर जैसी महान विभूतियों को जन्म दिया है। ये लोग हमें सिखाते हैं कि केवल शिकायतें और समस्याएँ ही न गिनाते रहिए, कुछ अच्छा अपने स्तर पर भी कीजिए। समस्या की बजाए समाधान पेश कीजिए। दूसरों के लिए प्रेरणा बनिए। हमेशा अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना भी जरूरी है और अपने कर्त्तव्यों को निभाना भी।
डब्बावाला की संगठित सेना में कभी किसी अधिकार का शोर नहीं सुना गया। वे कभी धरना या हड़ताल पर नहीं बैठे। मुंबई सपनों का शहर है। देश भर से आए अनेक सामान्य लोगों को बिजनेस और सिनेमा के शिखर तक पहुंचाने वाला एक अनूठी ऊर्जा से भरा शहर। यहाँ की ठसाठस भरी आबादी और बेहद कठिन जीवनचर्या में सबसे कम कमाने वाले संतोषी प्राणी हैं हमारे डब्बावाला। हर समाज, हर संगठन, हर निकाय और हर संस्थान में इस ढँग से काम हों तो यह देश किन शिखरों को छू सकता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
मुंबई के श्रम वीरों और 137 साल की उनकी गौरवशाली परंपरा को हृदय से प्रणाम!



