राजीव तुली
दिल्ली। दशकों तक भारत में भ्रष्टाचार को मुख्य रूप से राजनीतिक समस्या के रूप में पेश किया जाता रहा। जब भी कोई बड़ा घोटाला सामने आता, निगाहें स्वाभाविक रूप से मंत्रियों और चुने हुए प्रतिनिधियों की ओर मुड़ जाती थीं। नौकरशाहों को, खासकर आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) के सदस्यों को, अक्सर स्थायी और कथित रूप से तटस्थ मशीनरी माना जाता था, जो सिर्फ राजनीतिक फैसलों को लागू करती है। मौजूदा सरकार का रुख इस धारणा को चुनौती देना शुरू कर रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों पर सीबीआई की जांच, प्रवर्तन निदेशालय की जांच, गिरफ्तारी, निलंबन, अभियोजन की मंजूरी और उनकी संपत्तियों की जांच बढ़ी है। उभरता संदेश सीधा है: प्रशासनिक ताकत जवाबदेही से बचने की ढाल नहीं बन सकती।
सबसे बड़ा बदलाव पारंपरिक विभागीय सतर्कता से बहु-एजेंसी वित्तीय जांच है। अब सिर्फ यह नहीं देखा जाता कि अधिकारी ने सेवा नियम तोड़ा या अनियमित फाइल मंजूर की; एजेंसियां धन के निशान का पीछा कर रही हैं-बैंक खाते, संपत्तियां, निवेश, शेल कंपनियां और अपराध से कथित आय। प्रवर्तन निदेशालय की ताजा वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 और 2025-26 में अभियोजन शिकायतें तेजी से बढ़ीं, औसतन करीब 600 शिकायतें सालाना, जबकि 2014–15 से 2023–24 के बीच औसत करीब 130 था। ये आंकड़े ईडी के पूरे पीएमएलए कार्यभार के हैं, सिर्फ आईएएस अधिकारियों के नहीं, लेकिन ये उस व्यापक वित्तीय प्रवर्तन माहौल को दिखाते हैं जिसमें भ्रष्टाचार के मामले अब चल रहे हैं।
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के अपने आंकड़े आईएएस के बारे में अधिक प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं। उसकी वार्षिक रिपोर्ट 2024–25 में दर्ज है कि 1 अप्रैल 2023 से 13 मार्च 2025 के बीच भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 22 मामलों में 22 आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी दी गई। इसमें विभिन्न चरणों में 24 अनुशासनात्मक कार्यवाहियां, पांच मामलों में निलंबन अवधि का विस्तार, और अप्रैल 2024–मार्च 2025 के दौरान आईएएस अधिकारियों के खिलाफ 1,272 शिकायतें भी दर्ज हैं, जिनमें से 1,213 का निपटारा हो चुका है। ये संख्याएं दोषसिद्धि नहीं हैं और इन्हें गलत काम का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन ये संस्थागत जांच की व्यापकता जरूर दिखाती हैं।

हालिया हरियाणा सरकारी धन का मामला इस नए रुख को खास तौर पर स्पष्ट करता है। सीबीआई ने आठ हरियाणा सरकारी विभागों और संगठनों के ₹593 करोड़ के कथित दुरुपयोग के मामले में 19 आरोपियों में छह आईएएस अधिकारियों का नाम लेकर आरोपपत्र दाखिल किए हैं। जांच में सरकारी अधिकारियों, बैंक अधिकारियों और निजी व्यक्तियों के गठजोड़ का आरोप है। सीबीआई ने मामले में वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को गिरफ्तार किया है और जांच कई आरोपपत्रों के जरिए आगे बढ़ी है। मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है, लेकिन इसकी अहमियत इस बात में है कि वरिष्ठ नौकरशाह खुद एक बड़ी वित्तीय जांच के केंद्रीय विषय बन गए हैं।
बिहार का संजीव हंस मामला इस रणनीति का दूसरा पहलू दिखाता है। ईडी ने मनी-लॉन्ड्रिंग जांच के सिलसिले में कई स्थानों पर तलाशी ली और बेहिसाब नकदी, सोना, चांदी और अन्य सबूत बरामद करने की सूचना दी। एजेंसी का आरोप था कि हंस ने करीब ₹90 करोड़ की अवैध संपदा अर्जित की। पटना हाई कोर्ट ने बाद में उन्हें जमानत दे दी और आरोपों की परीक्षा अभी न्यायिक प्रक्रिया में होनी है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच कथित प्रशासनिक कदाचार पर नहीं रुकी; उसने उससे जुड़ी कथित वित्तीय आय और संपत्तियों का पता लगाने की कोशिश की।
यह मायने क्यों रखता है? आईएएस भारतीय प्रशासनिक ढांचे में असाधारण स्थान रखती है। अधिकारी जिलाधिकारी, आयुक्त, सचिव, प्रधान सचिव और सार्वजनिक निगमों के प्रमुख बन सकते हैं। उनकी जिम्मेदारियों में जमीन, बुनियादी ढांचा, खरीद, खनन, आबकारी, कल्याण योजनाएं, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और हजारों करोड़ का व्यय शामिल हो सकता है। मंत्री कोई परियोजना घोषित कर सकता है, लेकिन प्रक्रियाएं तैयार करना, टेंडर संसाधित करना, फाइलें देखना, क्रियान्वयन की निगरानी करना और भुगतान अधिकृत करना अक्सर अधिकारियों के हाथ में होता है। इसलिए प्रशासनिक जिम्मेदारी भी राजनीतिक जिम्मेदारी जितनी ही जांच की हकदार है।
नई प्रवर्तन सोच को एक वाक्य में समेटा जा सकता है: “पैसे का पीछा करो।” पहले भ्रष्टाचार की जांच सरकारी फाइल तक सीमित रह सकती थी। आज जांचकर्ता कथित आय को मूल लेनदेन से बैंक खातों, संपत्तियों, निवेश और अन्य वित्तीय ढांचों तक ले जा सकते हैं। इससे भ्रष्टाचार से कथित लाभ छिपाना कहीं कठिन और उनका पता लगाना संभावित रूप से आसान हो जाता है।
लेकिन सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई सिविल सेवा के खिलाफ लड़ाई न बन जाए। किसी आईएएस अधिकारी को सिर्फ इसलिए दोषी नहीं माना जा सकता कि उसके खिलाफ जांच शुरू हो गई। गिरफ्तारी दोषसिद्धि नहीं है, और आरोपपत्र वे आरोप हैं जिन्हें अदालत में साबित किया जाना है। इसलिए जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता, उचित प्रक्रिया और न्यायिक निगरानी जरूरी हैं। ईमानदार नौकरशाहों को राजनीतिक दबाव से उतना ही बचाया जाना चाहिए जितना नागरिकों को भ्रष्ट अधिकारियों से।
भारत के भ्रष्टाचार-रोधी ढांचे की असली कमजोरी अंतिम फैसले तक पहुंचने में लगने वाला समय है। किसी अधिकारी की जांच हो सकती है, गिरफ्तारी हो सकती है या आरोपपत्र दाखिल हो सकता है, फिर भी कार्यवाही वर्षों चल सकती है। मौजूदा रुख की असली परीक्षा छापों या गिरफ्तारियों की संख्या नहीं, बल्कि सबूतों की गुणवत्ता, मुकदमों की गति, कानूनी रूप से स्थापित अवैध संपत्तियों की वसूली और जहां अपराध साबित हो वहां दोषसिद्धि होगी।
उद्देश्य आईएएस को कमजोर करना नहीं होना चाहिए। भारत को मजबूत, पेशेवर और राजनीतिक रूप से तटस्थ सिविल सेवा की जरूरत है। लेकिन प्रशासनिक स्वतंत्रता का मतलब प्रशासनिक छूट नहीं हो सकता। ईमानदार अधिकारी को प्रभावी सतर्कता व्यवस्था से डरने की कोई बात नहीं होनी चाहिए; भ्रष्ट अधिकारी को रैंक, पदनाम या सेवानिवृत्ति के पीछे छिपने की कोई जगह नहीं मिलनी चाहिए।
इसलिए मोदी सरकार के रुख को भ्रष्टाचार और नौकरशाही की दंडमुक्ति के खिलाफ बढ़ती सख्त लड़ाई के रूप में समझा जा सकता है। इससे अंततः साफ-सुथरा प्रशासन बनेगा या नहीं, यह निरंतर प्रवर्तन, संस्थागत स्वतंत्रता और समय पर न्यायिक नतीजों पर निर्भर करेगा। भारत को अपनी सिविल सेवा के खिलाफ युद्ध की जरूरत नहीं। उसे वहां युद्ध की जरूरत है जहां सार्वजनिक शक्ति का दुरुपयोग हो। सिद्धांत सरल होना चाहिए: कोई मंत्री कानून से ऊपर नहीं, कोई नौकरशाह कानून से ऊपर नहीं, और कोई संस्था जवाबदेही से ऊपर नहीं।
(श्री तुली का यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसका हिन्दी भावानुवाद मीडिया स्कैन ने किया है)



