नेहा सिंह राठौर मामला: सहानुभूति का खेल या सोची-समझी रणनीति?

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फिल्म का नाम: Heroine (2012), डायरेक्टर: मधुर भंडारकर।

माही (करीना कपूर) एक स्टार अभिनेत्री है, जिसका रिश्ता सुपरस्टार आर्यन खन्ना (अर्जुन रामपाल) से है। दोनों एक सेक्स टेप बनाते हैं। रिश्ते टूटने के बाद माही डिप्रेशन में चली जाती हैं, फिल्में नहीं मिलतीं और मार्केट डाउन हो जाता है।वह एक पीआर मैनेजर पल्लवी नारायण (दिव्या दत्ता) को हायर करती हैं, जो sensationalist टोटके अपनाकर उसकी इमेज री-ब्रांड करती है। माही क्रिकेटर अंगद पॉल (रणदीप हुड्डा) के साथ रिश्ता बनाती है, कुछ फिल्में करती है, लेकिन फिर से गिरावट आती है। लो-बजट फिल्म में काम करती है, लेकिन अटेंशन नहीं मिलता। आर्यन से फिर मिलती है, बड़ी फिल्म का ऑफर आता है लेकिन डायरेक्टर उसे कास्ट करने से इनकार कर देता है क्योंकि उसकी ‘सेलिंग’ खत्म हो चुकी है।

माही की एक लो-बजट फिल्म रिलीज होने वाली है लेकिन कोई हंगामा नहीं है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार उसे मॉक करते हैं कि आर्यन के साथ दूसरी एक्ट्रेस कास्ट हो गई।

माही गुस्से और निराशा में आ जाती है। पल्लवी के साथ मिलकर वे तय करती हैं कि पुराना सेक्स टेप (माही + आर्यन का) लीक कर दिया जाए ताकि कॉन्ट्रोवर्सी बने और फिल्म हिट हो जाए। टेप वायरल हो जाता है, फिल्म हिट होती है। पीआर और सिस्टम माही को बताते हैं कि उसकी मार्केट वैल्यू खत्म हो चुकी है, अब सिर्फ स्कैंडल ही बेचा जा सकता है।

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अक्टूबर के इन दिनों में जब मुख्यधारा की मीडिया पर समाज का भरोसा धीरे-धीरे लौटने लगा था और सोशल मीडिया पर कांग्रेस समर्थक पूर्व संपादकों व कंटेंट क्रिएटर्स की ‘लेन-देन वाली पत्रकारिता’ की चर्चा आम हो चुकी थी, अचानक नेहा सिंह राठौर का मामला सुर्खियों में आ गया। एबीपी न्यूज पर उनके खिलाफ कथित अपमानजनक रिपोर्टिंग को लेकर उन्होंने सोशल मीडिया पर आवाज उठाई।

शुरुआत में लोगों की सहानुभूति उनके साथ थी और चैनल के प्रति नाराजगी भी दिखी। लेकिन जल्द ही पूरा कांग्रेस इकोसिस्टम जब सक्रिय हो गया। हर छोटे-बड़े नेता और आईटी सेल के कार्यकर्ता इस मुद्दे पर लिखने लगे, जैसे कोई बड़ी साजिश उजागर हुई हो।

संदेह तब और गहराया जब मामले को चैनल की भूल मानने के बजाय सीधे मोदी सरकार से जोड़ने की कोशिश की गई। सवाल यह है कि भाजपा ऐसी बिना सिर-पैर की खबर क्यों चलवाएगी, जबकि सोशल मीडिया पर ऐसे मुद्दों पर ‘जनता की अदालतें’ बैठाने वाले दिमागी नक्सली सक्रिय रहते हैं, जिनसे पार पाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए मुश्किल होता है।

दूसरी बात, अगर भाजपा की तरफ से ऐसा होता तो उसके आईटी सेल द्वारा वायरल करने का प्रयास जरूर दिखता। लेकिन यहां वायरल कौन कर रहा है? ‘कोठा वाली’ जैसे शब्दों को एम्प्लीफाई करने से किसे फायदा दिख रहा है? कांग्रेस का पूरा तंत्र इस पर लिख रहा है, जबकि एबीपी के एंकर संदीप चौधरी, जिन्हें कांग्रेसी गठबंधन के नेता अक्सर ईमानदार बताते हैं, से कोई नहीं पूछ रहा कि आपके चैनल पर यह कैसे हुआ। किसी ने सार्वजनिक रूप से यह भी नहीं कहा कि अगर भाजपा ने किया है तो संदीप चौधरी कांग्रेस का कांग्रेस और भाजपा का भाजपा कर देगा।

नेहा की पोस्टों का टाइमलाइन और भी दिलचस्प है। बीस घंटे पहले उन्होंने लिखा कि कोर्ट में मुलाकात होगी, न्याय चाहिए माफी नहीं। अठारह घंटे पहले नरेंद्र मोदी और एनसीडब्ल्यू को टैग कर एबीपी से गरिमा की ठेस का जिक्र किया। सत्रह घंटे पहले फिर वही बात दोहराई। आठ घंटे पहले स्मृति ईरानी को टैग किया, सात घंटे पहले रेखा गुप्ता को। लेकिन कोर्ट अभी तक नहीं गईं। सोशल मीडिया ट्रायल चल रहा है। पोस्टों के बीच का अंतराल ऐसा है कि लाइक्स-कमेंट्स का सिलसिला बना रहे। बाईस घंटे बीतने के बाद भी एफआईआर दर्ज न होना क्या संकेत देता है?

विडंबना यह है कि एबीपी ने एक बार नेहा के सेक्स रैकेट चलाने का आरोप लगाया था, माफी भी मांग ली। लेकिन नेहा ने खुद इसे पचास बार दोहराया। लोग उन्हें भूल चुके थे, अब यह मुद्दा उन्हें फिर चर्चा में ला रहा है। अगर सूचना प्रसारण मंत्री इस पर चैनल पर पाबंदी लगा दें तो कांग्रेस इकोसिस्टम को सदमा लगेगा।

सवाल यह है कि क्या यह पत्रकारिता के अधिकारों की लड़ाई है या कंटेंट क्रिएटर्स के भरोसे टिके विपक्षी गठबंधन की सोची-समझी कोशिश? समय बताएगा।

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