एबीपी न्यूज ने नेहा के खिलाफ ऐसी खबर चलाई जिसे उन्होंने झूठा और मानहानिकारक बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि चैनल ने जानबूझकर उन्हें वेश्या कहकर बदनाम किया। इस पर भाजपा सांसद कंगना रनौत ने स्पष्ट कहा कि राजनीतिक मतभेद अलग हैं, लेकिन किसी महिला को टीआरपी के लिए बेबुनियाद बदनाम करना घोर अशोभनीय है। उन्होंने एबीपी के जिम्मेदारों से जवाबदेही मांगी। नेहा ने जवाब में एबीपी पर फेक न्यूज चलाने का आरोप लगाया और सम्मान आहत होने की बात कही।

यहां संदेह का बिंदु यह है कि गंभीर आरोप के बावजूद नेहा ने अब तक एबीपी न्यूज के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं कराई। इसके बजाय वे लगातार भाजपा से जुड़ी महिलाओं को टैग कर रही हैं। महिलाओं से जुड़ा मुद्दा है तो उन्हें अपनी कांग्रेस पार्टी की सुप्रिया श्रीनेत जैसी नेताओं के पुराने बयानों को याद दिलाना चाहिए। सुप्रिया श्रीनेत ने एक बार कंगना रनौत पर “मंडी में क्या भाव” जैसी टिप्पणी की थी, जिसकी निंदा उचित है, लेकिन नेहा का ध्यान भाजपा ‘केंद्रित’ है। उन्होंने सपा, राजद या कांग्रेस के किसी नेता से सवाल नहीं पूछा।
एबीपी जैसे चैनल को भाजपा का एजेंट बताना भी विरोधाभासी है, क्योंकि वहां संदीप चौधरी जैसे लोग काम करते हैं। यदि कोई भाजपाई षड्यंत्र उनके रहते चैनल में चल रहा होता तो वे इस्तीफा देकर निकल आते।
नेहा लंबे समय तक चर्चा से दूर रहीं हैं। अब विवाद को उन्होंने चर्चा में लौटने का अवसर बना लिया है। वे लगातार विक्टिम कार्ड खेल रहीं हैं और कांग्रेस-रुझान वाले चैनल में भाजपा के तत्व खोज रहीं हैं। यह संदेह पैदा करता है कि मामला केवल व्यक्तिगत अपमान का नहीं, बल्कि रचा-बसा खेल भी हो सकता है। कांग्रेस इकोसिस्टम पर निर्भरता, रील्स के जरिए कमाई और विपक्षी दलों द्वारा प्रचार का इतिहास इस आशंका को बल देता है। हाल ही में विशाल माहेश्वरी ने कांग्रेसी कंटेंट क्रिएटर्स के नेटवर्क को उजागर किया, जहां वीडियो के पैसे तय होते हैं। नेहा के पक्ष में लिखने वालों में ऐसे लोग भी शामिल हैं जो पैसे लेकर भाजपा-विरोधी कंटेंट बनाते हैं।
यदि नेहा इस आरोप को गंभीर मानती हैं तो पुलिस और अदालत का रास्ता खुला है। सोशल मीडिया पर टैग और रील्स से आरोप सिद्ध नहीं होते। एक महिला का सम्मान आहत होने पर कानूनी कार्रवाई सबसे मजबूत संदेश देती है। केवल तमाशा खड़ा करने से न तो न्याय मिलता है और न ही मीडिया की जवाबदेही तय होती है। यह मामला याद दिलाता है कि राजनीतिक विरोध और व्यक्तिगत मानहानि के बीच की रेखा स्पष्ट होनी चाहिए। बिना कानूनी कदम के आरोप लगाना और चुनिंदा नेताओं को घेरना संदेह को और गहरा करता है।



