कोच्चि। ओणम को सामान्यतः केरलम् के प्रमुख फसल पर्व और राजा महाबली की स्मृति से जुड़ा उत्सव माना जाता है। घरों में पुक्कलम सजते हैं, ओणसद्या बनती है, नौका प्रतियोगिताएं होती हैं और लोकजीवन उल्लास से भर उठता है। केरलम् पर्यटन भी ओणम को फसल उत्सव तथा महाबली और वामन की परंपरा से संबंधित पर्व के रूप में वर्णित करता है, किंतु भारतीय दर्शन की दृष्टि से ओणम को समझने पर इसके भीतर प्रकृति, अन्न, प्राण, चेतना, समर्पण और परम सत्ता के बीच संबंध का अत्यंत गहरा सूत्र दिखाई देता है।
यह सूत्र तैत्तिरीय उपनिषद के पंचकोश चिंतन से लेकर ऋग्वेद में वर्णित विष्णु के त्रिविक्रम स्वरूप और श्रीमद्भागवत में राजा बलि के आत्मसमर्पण तक जाता है। इस दृष्टि से ओणम अन्न की समृद्धि का उत्सव होने के साथ जीवनदायिनी प्राणशक्ति के प्रति कृतज्ञता और उस विराट सत्ता के प्रति समर्पण का पर्व भी बन जाता है, जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है।
अन्न: जीवन का पहला आधार
तैत्तिरीय उपनिषद मानव अस्तित्व को पांच स्तरों में समझाता है। ये हैं अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष। यह चिंतन मनुष्य को उसके स्थूल शरीर से लेकर चेतना के सूक्ष्मतम स्तर तक ले जाता है। तैत्तिरीय उपनिषद की ब्रह्मानंदवल्ली में कहा गया है- “अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते। अथो अन्नेनैव जीवन्ति। अथैनदपि यन्त्यन्ततः।” (तैत्तिरीय उपनिषद, ब्रह्मानंदवल्ली, 2.1.1)
अर्थ स्पष्ट है कि प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न से जीवन धारण करते हैं और अंततः उसी प्रकृति में लौट जाते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद की भृगुवल्ली में इसी चिंतन को और आगे ले जाकर कहा गया है- “अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।” (तैत्तिरीय उपनिषद, भृगुवल्ली, 3.2.1)
यहां अन्न को ब्रह्म के चिंतन का विषय बनाया गया है। साधक की ब्रह्मज्ञान की यात्रा में अन्न एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। शरीर अन्न से बना है, शरीर के माध्यम से जीवन का अनुभव होता है और इसी जीवन से चेतना की उच्चतर खोज प्रारंभ होती है। वस्तुत: यहीं ओणम का पहला आध्यात्मिक अर्थ सामने आता है। खेत की फसल पृथ्वी, जल, सूर्य, ऋतु, बीज और मानव श्रम की संयुक्त परिणति है, इसलिए नई फसल का स्वागत प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संस्कार है।
अन्न से प्राण की ओर
तैत्तिरीय उपनिषद की भृगुवल्ली अन्न के बाद प्राण को ब्रह्म की खोज में अगला सोपान बनाती है। वहां कहा गया है, “प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति।” (तैत्तिरीय उपनिषद, भृगुवल्ली, 3.3.1)। यहां दर्शन एक महत्वपूर्ण दिशा ग्रहण करता है। अन्न शरीर का आधार है, प्राण उस शरीर को जीवन देता है। अन्नमय कोष के भीतर प्राणमय कोष की अनुभूति होती है, इसीलिए अन्न और प्राण को अलग-अलग खानों में बांटकर देखने के बजाय भारतीय चिंतन उन्हें जीवन की निरंतर प्रक्रिया के दो जुड़े हुए स्तरों के रूप में देखता है।
अब इसे ओणम पर्व के साथ जोड़कर देखें, तब ध्यान में आता है कि खेत में पैदा हुआ अन्न प्रकृति की संचित ऊर्जा है। मनुष्य जब उसे ग्रहण करता है, तो वही ऊर्जा शरीर और प्राण की गतिविधियों को संचालित करती है। इस अर्थ में फसल का उत्सव जीवन के उत्सव में बदल जाता है।
विष्णु: विराट व्याप्ति का वैदिक प्रतीक
ओणम के दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष को समझने के लिए विष्णु के वैदिक स्वरूप पर ध्यान देना आवश्यक है। ऋग्वेद के विष्णु सूक्त में उनके त्रिविक्रम रूप का उल्लेख मिलता है- “इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्।” (ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 22, मंत्र 17)। अगले मंत्र में विष्णु के तीन पगों का उल्लेख है- “त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः।” (ऋग्वेद, 1.22.18)। वस्तुत: ऋग्वैदिक विष्णु के ये तीन पग आगे चलकर वामन और त्रिविक्रम की पुराण परंपरा में अत्यंत प्रभावशाली प्रतीक बनते हैं। सायण भाष्य में विष्णु के तीन पगों को पृथ्वी, अंतरिक्ष और द्युलोक से संबंधित व्याख्या भी प्राप्त होती है।
अत: वामन कथा को सिर्फ राजा और एक ब्राह्मण बालक के बीच भूमि के दान की कथा मान लेना भारी भूल होगी, क्योंकि इस वक्त जिस तरह का नैरेटिव चलाने का प्रयास हो रहा है, उसमें यह भी एक चिंता का विषय है! वस्तुत: यह दृष्टिकोण उसके वैदिक संदर्भ को सीमित कर देता है, जबकि इसके भीतर विराट सत्ता की सर्वव्यापकता का भाव जुड़ा है।
महाबली और तीन पग का रहस्य
श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में वामन भगवान और राजा बलि का प्रसंग विस्तार से आता है। बलि अत्यंत शक्तिशाली और दानी राजा थे। वामन ने उनसे तीन पग भूमि मांगी। बलि ने वचन दे दिया। वामन ने विराट रूप धारण किया और दो पगों में समस्त उपलब्ध क्षेत्र को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए स्थान शेष नहीं था। यही कथा का मोक्ष क्षण है, जिसमें देह की मुक्ति है, भीतर का मोह ब्रह्म से समा जाता है। एकल सत्ता, परासत्ता में विलुप्त हो जाती है, क्षण, विलुप्त हो चुका हुआ है, व्यक्ति, विराट में समा जाता है, वह उसी का स्वरूप बन जाता है।
वस्तुत: इस कथा में बलि ने अपना सिर प्रस्तुत करते हुए कहा- “पदं तृतीयं कुरु शीर्ष्णि मे निजम्।” (श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कंध 8, अध्याय 22, श्लोक 2) यह वाक्य भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में आत्मसमर्पण का अत्यंत प्रभावशाली प्रतीक बन गया। बलि के पास धन था, भूमि थी, सत्ता थी, प्रतिष्ठा थी। दो पगों में सब चला गया। तीसरे पग के लिए उन्होंने अपना सिर दे दिया। अर्थात् बाहरी संपत्ति के बाद स्वयं का अहंकार भी समर्पित कर दिया।
बलि का समर्पण और विष्णु की स्वीकृति
यहां ‘बलि’ और उसके भाव को व्यापक अर्थों में समझने की आवश्यकता है। सिर्फ दान के अर्थ में जो इस घटनाक्रम को देखेंगे वह शायद इस कथा से बहुत कुछ प्राप्त न कर पाएं। कथा का आध्यात्मिक पक्ष यह है कि मनुष्य जब अपनी संपत्ति को अपना अंतिम सत्य मानता है, तब वामन उसे विराट सत्ता का बोध कराते हैं। पृथ्वी, आकाश और समस्त लोक जिस सत्ता के भीतर हैं, उनके सामने व्यक्तिगत स्वामित्व का अहंकार सीमित हो जाता है।
बलि का मस्तक आगे बढ़ाना इसी बोध का प्रतीक है। यह पराजय से अधिक आत्मस्वीकृति है। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पास ऐसा कुछ नहीं है जो उस विराट सत्ता से बाहर हो। इसी कारण वामन द्वारा तीसरा चरण बलि के सिर पर रखना केवल दंड की घटना नहीं है। भागवत परंपरा में इसके बाद बलि को सुतल लोक का अधिपति बनाए जाने और भगवान द्वारा उनके द्वारपाल बनने की कथा आती है। समर्पण यहां अनुग्रह का द्वार बनता है।
ओणम में अन्न, प्राण और विष्णु का मिलन
अब ओणम के मूल स्वरूप को समझना आसान हो जाता है। फसल अन्न का प्रतीक है। अन्न शरीर का आधार है। शरीर में प्राण जीवन की गति पैदा करता है। प्राण और प्रकृति के पीछे जो विराट व्यवस्था है, भारतीय चिंतन उसे परम सत्ता से जोड़कर देखता है, इसलिए ओणसद्या इस अन्न संस्कृति की सामूहिक अभिव्यक्ति है। पुक्कलम प्रकृति के सौंदर्य का उत्सव है। वल्लमकली सामूहिक ऊर्जा और जीवन के उल्लास को अभिव्यक्त करती है।
इस प्रकार ओणम में खेत से घर तक और शरीर से चेतना तक एक निरंतर संबंध दिखाई देता है। अन्न जीवन देता है, प्राण उसे गति देता है और आध्यात्मिक चिंतन मनुष्य को उस व्यापक सत्ता की ओर ले जाता है जिसके सामने बलि अपना मस्तक अर्पित करते हैं।
पंचकोश से आनंदमय कोष तक
तैत्तिरीय उपनिषद की यात्रा अन्नमय से प्राणमय, प्राणमय से मनोमय, मनोमय से विज्ञानमय और अंततः आनंदमय कोष तक पहुंचती है। इस क्रम को ओणम के प्रतीकात्मक अर्थ से जोड़कर देखें तो पर्व की बाहरी समृद्धि धीरे धीरे आंतरिक आनंद की ओर संकेत करती है। अन्न हमें जीवन का आधार देता है। प्राण जीवन को गति देता है। मन अनुभव करता है। विज्ञान विवेक प्रदान करता है और आनंद उस गहरे संतोष की अनुभूति है जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व को व्यापक सत्य से जोड़ता है। वहीं, अन्नमय कोष मनुष्य को उसकी प्रकृति से जोड़ता है, प्राणमय कोष जीवन की अनुभूति कराता है और आत्मसमर्पण उसे उस विराट चेतना की ओर ले जाता है, जिसे वैदिक परंपरा विष्णु की व्यापकता और त्रिविक्रम सत्ता के रूप में स्मरण करती है।
इस दृष्टि से महाबली की कथा ओणम के भीतर एक महत्वपूर्ण आत्मिक संदेश रखती है। बाहरी वैभव मनुष्य को महान नहीं बनाता। महानता तब प्रकट होती है जब मनुष्य अपने अहंकार से ऊपर उठकर विराट सत्ता के प्रति समर्पण का भाव स्वीकार करता है। ओणम का सबसे गहरा संदेश शायद यही है कि अन्न का सम्मान जीवन का सम्मान है, प्राण का सम्मान चेतना का सम्मान है और अहंकार का समर्पण परम सत्ता की ओर मनुष्य की यात्रा है।
यहां महाबली की कथा मनुष्य को बता रही है कि सत्ता और संपत्ति सीमित हैं। वामन का त्रिविक्रम रूप का संदेश ही यही है कि विराट सत्ता के सामने संसार की सीमाएं छोटी हैं। यही ओणम का वह आध्यात्मिक आयाम है, जो फसल की सुनहरी बालियों, ओणसद्या की थाली, फूलों के पुक्कलम और महाबली के झुके हुए मस्तक को एक ही दार्शनिक सूत्र में पिरो देता है। यहां उत्सव बाहर भी है और भीतर भी। खेत में अन्न की समृद्धि है और अंतर्मन में समर्पण का भाव। यही समृद्धि और समर्पण मिलकर ओणम को भारत के हिन्दू जीवनदर्शन के एक विशिष्ट पर्व के रूप में स्थापित करते हैं।



