पहले चंपतराय को जाने

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सर्वेश कुमार सिंह

लखनऊ । श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे को लेकर चर्चा है। सच क्या है एसआईटी जांच रिपोर्ट में पता चलेगा। लेकिन मीडिया, सोशल मीडिया में कई नामों को आरोपित किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी ने ट्रस्ट, संघ और भाजपा को निशाना बनाया है। ये उनकी भविष्य की रणनीति है। संदेह पैदा हुआ है तो सच सामने आना चाहिए।

मुझे सिर्फ चंपत जी के बारे में बात करनी है। वह भी इसलिए कि बगैर किसी आधार, तथ्य और प्रमाण के उन पर आरोप लगाए जा रहे है। आज अखिलेश यादव ने एक वीडियो शेयर किया है,जिसमें आल्हा की तर्ज पर इस प्रकरण को किसी गायक से तैयार कराया गया है। इसमें सीधे चंपत जी को आरोपित करके उनकी मानहानि की गई है। इस गायक और शेयर करने वालों को एसआईटी जांच रिपोर्ट के बाद अपनी गलती का अहसास होगा।
मैं चंपत जी को केवल पत्रकार के रूप में नहीं एक विद्यार्थी और शिक्षार्थी के रूप में 49 साल से जानता हूं। यानी कि 1977 से जब मैं 11वीं का छात्र था। उस समय चंपत जी संघ में थे, लेकिन प्रचारक नहीं थे। वे धामपुर (बिजनौर) के आरएसएम डिग्री कॉलेज में फिजिक्स के प्रवक्ता था। यानी डिग्री कॉलेज में वेतनभोगी। उन्होंने 1980 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन विभाग प्रचारक (मुरादाबाद) ओमप्रकाश जी की प्रेरणा से प्रचारक जीवन स्वीकार किया। जिस दिन ओमप्रकाश जी ने उनसे कहा नौकरी छोड़ दो उसी दिन उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। प्रचारक बन गए। संघ ने परंपरा के विपरीत उन्हें सीधे देहरादून का जिला प्रचारक बनाया। संघ में आमतौर पर कोई सीधे जिला प्रचारक नहीं बनता है। वे नगीना के बेहद सामान्य परिवार से है, परिवार में उनके बड़े भाई इंजीनियर से सेवानिवृत्त हुए है। अगर चंपत जी को धन की लालसा होती तो वे नौकरी में रहते। आज डिग्री कॉलेज के प्रिंसिपल से सेवानिवृत्त होते।
1977 से मेरा चंपत जी से परिचय आरम्भ हुआ और आज तक यथावत है। मैने उन्हें जिस सादगी में 1977 के एक प्रशिक्षण में अमरोहा में जैसे देखा, वैसे ही आज भी है। कम लोग जानते है कि जब 1984 में दिल्ली की धर्म संसद के बाद श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को विश्व हिंदू परिषद ने अपने हाथ में लिया, तो संघ से अशोक सिंहल जी समेत कई प्रचारक विहिप में भेजे गए थे। उनमें चंपत जी भी थे। उन्हें पश्चिम उत्तर प्रदेश प्रांत का संगठन मंत्री बनाया गया था। इस आंदोलन से प्रत्यक्ष रूप में अनेक नाम जुड़े है लेकिन पर्दे के पीछे रहकर रणनीति बनाने, क्रियान्वित करने, मुकदमों की सिस्टेमेटिक पैरवी करने, तथ्य एकत्रित करने का काम चंपत जी ने किया। सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमे की हर तारीख से पहले वकीलों की दिल्ली में बैठके कराते थे। मैं उन दिनों दिल्ली में था।
विश्व हिन्दू परिषद पर 2017-18 में ऐतिहासिक संकट आया था। जब कार्यकारी अध्यक्ष डॉ प्रवीण तोगड़िया जी के साथ नेतृत्व का टकराव हुआ। उस संकट से विहिप को चंपत जी के नेतृत्व ने ही उबारा था। जिस दिन डा तोगड़िया जी ने आरके पुरम कार्यालय पहुंचने की घोषणा की थी। उस दिन में संयोग से वहीं था।
चंपत जी विहिप में उपाध्यक्ष भी है। वे अशोक जी के अध्यक्ष रहते उनके साथ संगठन महामंत्री और महामंत्री भी रहे। अशोक जी का उन पर अटूट विश्वास था। उनके संघ और विहिप में प्रचारक जीवन पर कोई आरोप प्रत्यारोप कभी प्रमाणित नहीं हो सकता क्योंकि उनका लक्ष्य संगठन कार्य रहा है, धन कमाना होता तो शिक्षक की नौकरी का त्याग नहीं करते।
श्रीराम मंदिर निर्माण की नींव रखी जाने से लेकर उसकी पूर्णता और प्राण प्रतिष्ठा पूर्ण कराने तक उन्होंने जिस मनोयोग और विज्ञान के शिक्षक होने के नाते कौशल से कार्य पूर्ण कराया है उसके लिए उनका अभिनंदन किया जाना चाहिए। चंपत राय होना आसान नहीं है, एक जीवन होम करने के बाद कोई चंपतराय होता है।
मुझे अपने साथियों से भी आग्रह करना है। हमें सूचना देनी है और ये धर्म भी है और व्यवसायिक दायित्व भी। लेकिन तथ्यों के साथ ही। अतिशयोक्ति और सुनी हुई बातों को प्रकाशित करने से पहले जांच परख भी लेना चाहिए। मैं अपने निजी विश्वास से कह सकता हूं कोई भी जांच हो जाए, चंपत जी की निष्ठा और ईमानदारी निःसंदेह है।

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