दिल्ली। क्रांति कभी संगठन, कैडर और लंबी जमीन से पैदा होती थी। किसान यूनियनें, छात्र संघ और मजदूर संगठन सालों तक गांव-गांव काम करते थे, फिर सड़क पर टिकते थे।
आज वही संघर्ष रीलों में सिमटता दिखता है। 2026 के कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन ने इंस्टाग्राम पर पांच दिनों में डेढ़ करोड़ फॉलोअर्स जुटाए। जंतर-मंतर पर तंबू लगे, लेकिन नेतृत्व विकेंद्रीकृत था, जिला समितियां नहीं थीं। हर प्रदर्शनकारी रिपोर्टर बन गया। शॉर्ट वीडियो, मीम और लाइव ने कहानी फैलाई। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ। फिर तंबू उठे और बहस ऑनलाइन रह गई। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल सक्रियता तब तक जीवित रहती है जब तक जमीन पर मौजूदगी हो। जमीन खत्म हुई तो हैशटैग भी ठंडा पड़ गया।
इसी दौरान राजनीतिक दल और सरकारें इन्फ्लुएंसर खरीद रही हैं। एक रील के लिए बीस हजार से अस्सी हजार रुपये तक के ऑफर आम हो गए हैं। बड़े क्रिएटर्स के लिए राशि लाखों में पहुंचती है। 2024 के चुनाव में पार्टियों ने इन्फ्लुएंसरों से बिना स्पॉन्सर्ड टैग के प्रचार करवाया। डिजिटल खर्च कुल प्रचार बजट का दस प्रतिशत से चालीस-पचास प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। आंदोलन भी अब ब्रांड की तरह स्वाइप-अप सत्याग्रह बन गया है—तेज विजुअल, भावनात्मक हुक, एल्गोरिदम के अनुकूल सामग्री।
नतीजा यह है कि संघर्ष की गहराई घट रही है। संगठन बनाने, स्थानीय मुद्दे जोड़ने और लंबे दबाव बनाए रखने की जगह वायरल क्षण आ गए हैं। आरक्षण हटाओ या ई-20 जैसे अभियान रीलों से शुरू होते हैं, फॉलोअर्स बढ़ते हैं, फिर बिखर जाते हैं।
युवा आंदोलनों का बड़ा हिस्सा सेलेक्टिविज्म और पेड कैंपेन में बदल रहा है। क्रांति संगठन से उतरकर रील में घुस गई है। जमीन खाली पड़ रही है, जबकि स्क्रीन पर शोर बाकी है।



