मैंने उनसे कहा कि मैं आपका ग्राहक हूँ। अपनी सुविधाओं के लिए आपको रुपयों का भुगतान करता हूँ। क्या आपको मेरी रुचि, मेरी भाषा, मेरी भूषा, मेरी पहचान व संस्कृति का सम्मान नहीं करना चाहिए? वे चौंकें, फिर मैंने उनसे अनुरोध किया कि जब आप फॉर्म भरवाते हैं, तब क्या आप यह कॉलम भरवाते हैं कि आपको कौन-सा समाचार-पत्र चाहिए, आप किस भाषा में हमारी सेवा चाहेंगें? यह ठीक वैसा ही है, जैसे आप मुझसे पूछते हैं कि आप शाकाहारी हैं या मांसाहारी?
फिर मैंने उनसे औपनिवेशिक मानसिकता, स्वभाषा एवं संस्कृति के महत्त्व, दुनिया के विकसित देशों में भाषा के प्रति वहाँ के नागरिकों का दृष्टिकोण, भाषा के आधार पर बौद्धिकता मापने के दोषपूर्ण चलन, प्रतिदिन एक भाषा के विलुप्त होने आदि पर उनसे लंबी बातचीत की, वे लगभग 10 की संख्या में थे, सभी मेरी बातों से पूर्णतः सहमत थे, पर अंत में नौकरी की विवशता की बात करने लगे। यह स्वाभाविक है, क्योंकि हर कामकाजी व्यक्ति के सामने यह संकट उपस्थित होता है। वे अंततः नौकरी के दबाव में झुक जाते हैं, अन्यथा अपनी भाषा के प्रति हरेक व्यक्ति के भीतर स्वाभाविक प्रेम होता है। विदेशों में यही प्रेम पारस्परिक संपर्क व परिचय का माध्यम बनता है। आपने देखा होगा कि मारवाड़ी, गुजराती समाज के व्यक्ति चाहे कहीं भी रहें, उन्होंने अपनी भाषा और अपनी संस्कृति नहीं छोड़ी, यह उनकी मजबूती है, कमजोरी नहीं। बल्कि हिंदीतर प्रदेशों में अपनी-अपनी मातृभाषा के प्रति लोगों का जुड़ाव अभी भी अधिक देखने को मिलता है।
बहरहाल होटल स्टाफ ने अपने मालिक का ईमेल एड्रेस दिया कि इस पर एक मेल भेज दें। मैं निश्चित मेल भेजूँगा।
परंतु एक अनुरोध आपसे भी करना चाहूँगा।
देखिए, यदि हमारा आचार-व्यवहार बाजार तय कर रहा है तो क्या हमें बाजार को अपनी भाषाई शक्ति की अनुभूति नहीं करानी चाहिए? ट्रेन, एयरपोर्ट, होटल्स, सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़े संस्थानों में अपनी पसंद के समाचार-पत्र व पत्रिका माँगें। न दें तो उन्हें बड़ी आत्मीयता से ऐसा करने कहें। दबाव से सरकारें झुकती हैं, तो बाजार क्यों नहीं? बाजार तो माँग के आधार पर ही चलता है। मैंने इस यात्रा में लगभग दस बड़ी जगहों पर ऐसा किया और उन्होंने मेरी पसंद के अखबार मुझे उपलब्ध कराए। ध्यान दें, मेरी पसंद के, यानी ऐसे समाचार पत्र एवं पत्रिकाएँ जो भाषा तो मेरी रख रहे हैं, पर कथ्य अ-राष्ट्रीय और अप-सांस्कृतिक परोस रहे हैं, उन्हें मैंने अस्वीकृत किया और लोगों को भी उसके बारे में बताया।
चाहे वह अंग्रेजी हो या अन्य कोई भी भाषा, किसी से कोई शिकायत नहीं, सब भाषा अच्छी होती है, सीख सकें तो सब सीखें, बल्कि बचपन में अनेक भाषाएँ सीखनी चाहिए। वह भविष्य में काम आएगी, पर अपनी भाषा से प्यार करें, उसे सहेजें, प्रोत्साहित करें, आज के संदर्भ में यह भी देशभक्ति है। कामकाजी दुनिया में भी धीरे-धीरे ऐसा वातावरण बनाएँ, यदि आप शीर्ष पद पर हों तो समय-समय पर अपनी भाषा में अवश्य बात करें। आपकी टीम के सदस्यों में आपका सम्मान बढ़ जाएगा, परिणाम बेहतर आएगा, टीम के सभी सदस्यों के कार्यों में कुशलता आएगी। कोई भी व्यक्ति अपनी ही भाषा में अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है। आपने एक साँचा बना लिया और हरेक को उसके अनुसार ढाल रहे हैं। कितनी विचित्र बात है कि विविधता का राग अलापने वाले सभी देशज भाषाओं को समाप्त कर एक विदेशी भाषा का आधिपत्य स्थापित करना चाहते हैं! मुझे केवल इस आधिपत्य से आपत्ति है। यूनेस्को की रिपोर्ट कहती है कि प्रतिदिन दुनिया की एक भाषा विलुप्त हो रही है, अपनी भाषा को विलुप्त होने से बचाएं। भाषा प्रयोग से ही जीवित रहती है।



