पत्रकारिता की आड़ में सत्ता-परिवर्तन की साजिश: IWPC और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का दुरुपयोग

2-4-4.jpeg

दिल्ली:  दिल्ली के लुटियंस जोन में स्थित इंडियन वुमेन्स प्रेस कॉर्प्स (IWPC) और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) को सरकार ने पत्रकारों की सुविधा के लिए रियायती दरों पर भूमि आवंटित की थी। उद्देश्य स्पष्ट था—रिपोर्टिंग, संवाद और पेशेवर आदान-प्रदान। न तो कोई विचारधारा विशेष का अड्डा बनाने की अनुमति थी, न ही सत्ता-परिवर्तन की योजनाओं की जमीन। लेकिन हाल के वर्षों में ये दोनों संस्थान एकतरफा सक्रियता और खुली राजनीतिक साजिशों का केंद्र बनते जा रहे हैं। प्रश्न यह है कि क्या यह आवंटन की शर्तों का खुला उल्लंघन नहीं है? पत्रकारों का क्लब पत्रकारों के बीच भेदभाव नहीं कर सकता। जब अर्णव गोस्वामी, अमन चोपड़ा, अशोक श्रीवास्तव, प्रखर श्रीवास्तव, रचित कौशिक जैसे दर्जनों राष्ट्रीय विचार से जुड़े पत्रकारों पर हमले हुए, पुलिसिया कार्रवाई हुई या भीड़ ने उन्हें घेरा, तब दोनों क्लबों ने चुप्पी साधी। छोटे-छोटे मुद्दों पर बयान जारी करने वाली संस्थाएं इन मामलों में मौन रहीं। उनके परिसर में बांग्लादेश जैसी ‘रिजीम चेंज’ की खुली चर्चा हुई और अब तक आधिकारिक निंदा नहीं आई। यह पक्षपात पत्रकारिता के नाम पर सत्ता-विरोधी अभियान का औजार बनने का संकेत है।

आवंटन की शर्तें और उनका उल्लंघन

IWPC को विंडसर रोड पर प्राइम लोकेशन दी गई थी। इंडिया गेट, जनपथ, कनाट प्लेस और प्रमुख राजनीतिक कार्यालयों के निकट यह जगह महिला पत्रकारों के लिए थी ताकि उन्हें कठिनाइयों का सामना न करना पड़े। जब अनुराग ठाकुर सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे, तो लीज रद्द कर दी गई थी क्योंकि यह स्थान सरकार-विरोधी गतिविधियों का केंद्र बन रहा था। बाद में अर्बन डेवलपमेंट मंत्री हरदीप पुरी की मध्यस्थता से महिला पत्रकारों के प्रतिनिधियों ने विश्वास दिलाया कि क्लब विशुद्ध पत्रकारिता के लिए रहेगा और राजनीतिक अड्डा नहीं बनेगा। लीज नवीनीकृत हुई।

सरकारी भूमि का पट्टा (लीज) कोई स्वामित्व अधिकार नहीं है। भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) के अंतर्गत ये संपत्तियां निश्चित शर्तों, समय-सीमा और उद्देश्य के अधीन दी जाती हैं। शर्तों में स्पष्ट है कि आवंटन पत्रकारों की सुविधा के लिए है, न कि व्यावसायिक, राजनीतिक या षड्यंत्रकारी गतिविधियों के लिए। दिल्ली जिमखाना क्लब या रेस क्लब जैसे मामलों में अदालतों और सरकार ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि लीज की अवधि समाप्त होने, शुल्क बकाया या शर्तों के उल्लंघन पर संपत्ति वापस ली जा सकती है। जब IWPC या PCI के प्रांगण में सार्वजनिक रूप से ‘रिजीम चेंज’ की बात होती है। IWPC में पुरुष अतिथि बिना महिला ‘सदस्य’ के घंटों कब्जा जमाए रहते हैं, और IWPC का उपयोग पुरुष अतिथियों का समूह चल रहे आंदोलन के बेस कैंप के तौर पर कर रहा होता है, तब यह स्पष्ट उल्लंघन है। सरकार ने गुडविल जेस्चर के रूप में स्थान दिया था। सहयोग की शर्तें एक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता या सत्ता-परिवर्तन की जमीन बनने की अनुमति नहीं देतीं।

महिला पत्रकारों के क्लब का राजनीतिक अड्डा बनना

IWPC का मूल उद्देश्य महिला पत्रकारों को सुरक्षित और सुविधाजनक स्थान देना था। लेकिन ‘कॉकरोच आंदोलन’ के दौरान स्थिति उलट गई। कांग्रेस समर्थक और कुछ यूट्यूबर्स ने इसे शील्ड की तरह इस्तेमाल किया। अजीत अंजुम पर आरोप है कि उन्होंने पत्नी के नाम पर क्लब में अपना दफ्तर ही खोल दिया। पत्नी मौजूद नहीं होती थीं, लेकिन पुरुष टीम लॉन से लेकर डाइनिंग स्पेस तक कब्जा जमा लेती थी। महिला पत्रकार थककर आतीं तो कुर्सियों पर पुरुषों का कब्जा देखकर झुंझला जातीं। एक महिला पत्रकार के अनुसार, ऐसा लगता था कि पूरा आंदोलन IWPC से ही संचालित हो रहा है।

एक महिला पत्रकार के नाम पर छह पुरुष अतिथि क्लब घंटों बैठे रहे। सभी कॉकरोच आंदोलन के लिए नैरेटिव बना रहे थे। जिनके नाम पर यह सभी बैठे थे, पूछताछ पर पता चला कि वे महिला सदस्य नहीं आईं हैं, लेकिन उनके पुरुष साथी के साथ आए कर्मचारी लाइव शो के लिए महंगे उपकरण और तामझाम लेकर पहुंचे थे। इतने कर्मचारी और उपकरण कहां से आ रहे हैं, यह सवाल अनुत्तरित है। वरिष्ठ पत्रकारों ने विरोध किया तो उन्हें ‘भाजपाई’ और ‘संघी’ कहकर चुप कराने की कोशिश हुई।

यही लोग जो अपनी महिला वरिष्ठ पत्रकार साथी को संघी कह रहीं थीं, जब प्रांजय गुहा ठाकुरता, राहुल देव, अभिसार शर्मा या अजीत अंजुम की टाइमलाइन पर चौबीस घंटे एक ही दिशा का कंटेंट दिखता है, तो उन्हें कांग्रेस समर्थक क्यों नहीं कहती? द्वैत स्पष्ट है। महिला पत्रकारों की सुविधा के लिए दी गई जगह पुरुष-प्रधान राजनीतिक ऑपरेशन का केंद्र बन गई। यह न केवल महिलाओं के साथ अन्याय है, बल्कि आवंटन की मूल भावना का अपमान भी है।

एकतरफा बयानबाजी और पत्रकारों के साथ भेदभाव

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और IWPC दोनों ही लंबे समय से उन लोगों के नेतृत्व में हैं जो भाजपा और आरएसएस से नफरत को अपनी पहचान मानते हैं। यह कोई नया आरोप नहीं है। पत्रकारों के ये क्लब छोटे मुद्दों पर बयान जारी करते हैं, लेकिन जब राष्ट्रीय विचार से जुड़े पत्रकारों पर हमले हुए, उनके कपड़े फटे, उन्हें हूट किया गया या पुलिसिया कार्रवाई हुई, तब दोनों क्लब मौन रहे। एक बार भी वे उनके साथ खड़े नहीं दिखे। क्या यह भेदभाव ठीक है?

वरिष्ठ पत्रकार अनीता चौधरी प्रेस क्लब आफ इंडिया के पैनल में थीं। उनका अनुभव बताता है कि सरकार के प्रति थोड़े झुकाव ने पूरे पैनल को उनका दुश्मन बना दिया और उन्होंने निराश होकर अब क्लब जाना ही बंद कर दिया। अजीत अंजुम जैसे लोग राजीव शुक्ला की नौकरी कर चुके हैं और आज भी राजीव गांधी के पुत्र के लिए सक्रिय रहते हैं, फिर भी उन्हें प्रेस क्लब ‘कांग्रेस का दरबारी’ नहीं कहता। पूरा इकोसिस्टम एक दिशा में झुका है। जब पीड़ित पत्रकारों को बुलाने की बात होती है तो उन पत्रकारों को क्यों नहीं बुलाया जाता जिन्हें प्रदर्शनकारियों ने घेरा, जिन्हें बोलने से रोका गया? क्लब की प्राथमिकता में वे नहीं हैं। यह भेदभाव पत्रकारिता के नैतिक आधार को कमजोर करता है। पत्रकारों का क्लब सभी पत्रकारों के लिए होना चाहिए, न कि किसी विचारधारा का आश्रय स्थल।

रिजीम चेंज की खुली चर्चा और चुप्पी

हाल में प्रेस क्लब के परिसर में बांग्लादेश जैसी ‘रिजीम चेंज’ की सार्वजनिक घोषणा हुई। यह कोई निजी बातचीत नहीं थी। ऐसे में क्लब प्रबंधन की चुप्पी क्या कहती है। अभी तक उस बयान की निंदा नहीं हुई है। जब कोई संस्थान सरकार से लीज पर चलता है और उसके प्रांगण में खुलेआम सत्ता परिवर्तन की बात होती है, तब यह केवल भाषण की स्वतंत्रता नहीं रहती। यह आवंटन की शर्तों का उल्लंघन बन जाता है। मुश्किल सवाल पूछने वालों को नजरअंदाज किया जाता है या बाहर कर दिया जाता है। जो भाजपा और संघ से जितनी नफरत व्यक्त कर सकता है, उसके लिए दरवाजे तुरंत खुल जाते हैं।

यह प्रवृत्ति केवल भाषण तक सीमित नहीं है। आंदोलनों के दौरान ये स्थान सुरक्षित ठिकाना बन जाते हैं क्योंकि पुलिस पत्रकारों के क्लब होने के कारण सामान्य पूछताछ से बचती है। परिणाम यह कि विरोध के नाम पर प्रोपगैंडा का बेस कैंप तैयार होता है। यदि क्लब वास्तव में न्यूट्रल स्पेस होता तो हर विचार के पत्रकारों को समान स्थान मिलता और हर हमले पर समान प्रतिक्रिया होती। चुप्पी स्वयं एक बयान है।

सरकार का दायित्व और समाधान

सरकार ने इन संस्थानों को सुविधा दी है, अधिकार नहीं। पंजीकृत संस्था होने के नाते वे गुडविल जेस्चर का लाभ उठा रहे हैं। जब शर्तें टूटती हैं—चाहे लीज अवधि, शुल्क या उद्देश्य का उल्लंघन हो—तो कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई संभव है। पब्लिक प्रीमाइसेज (इवेक्शन ऑफ अनऑथराइज्ड ऑक्यूपेंट्स) एक्ट और L&DO के नियम सरकार को नोटिस देने और कब्जा वापस लेने का अधिकार देते हैं। जनहित या शर्तों के उल्लंघन का हवाला देकर कार्रवाई की जा सकती है।

केंद्र सरकार को दोनों क्लबों से स्पष्ट जवाब मांगना चाहिए: क्या वे भाजपा और आरएसएस से नफरत करने वालों के शेल्टर के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं? क्या रिजीम चेंज की चर्चा उनकी स्वीकृति से हुई? प्रबंधन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पैनल और कार्यक्रमों में सभी विचारधाराओं के पत्रकार शामिल हों। आवंटन की शर्तों की समीक्षा और पारदर्शिता जरूरी है। यदि कोई संस्थान पत्रकारिता के बजाय सक्रियता और साजिश का केंद्र बनता है, तो सरकार का दायित्व बनता है कि वह पत्रकारों के वास्तविक हित और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करे।

पत्रकारिता की आड़ में किसी भी तरह की षड्यंत्रकारी गतिविधि स्वीकार्य नहीं हो सकती। क्लबों का उद्देश्य संवाद और पेशेवर सहयोग है, न कि सत्ता-परिवर्तन का औजार बनना। जब तक यह भेदभाव और दुरुपयोग जारी रहेगा, तब तक यह प्रश्न उठता रहेगा कि क्या ये संस्थान अभी भी अपने मूल उद्देश्य पर खरे हैं या सरकारी सहयोग का दुरुपयोग कर रहे हैं। जवाब दोनों क्लबों और सरकार दोनों को देना चाहिए।

Share this post

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top