– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भोपाल । जनजातीय समाज की पहचान क्या है? क्या वह जन्म के साथ मिली एक ऐसी स्थायी मुहर है, जिसका व्यक्ति के बाद के सामाजिक जीवन से कोई संबंध आवश्यक नहीं? क्या किसी जनजाति में जन्म लेने के बाद व्यक्ति दशकों तक उस समुदाय से दूर रहकर, उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था से अलग जीवन जीकर भी उसी समुदाय का सदस्य बना रह सकता है? और यदि ऐसा हो सकता है, तो फिर जनजातीय पहचान का अर्थ क्या रह जाएगा?
वस्तुत: सोनभद्र की नन्हकी उर्फ नैमुन्निशा से जुड़े इलाहाबाद हाईकोर्ट के 14 सितंबर 2026 के फैसले ने इन प्रश्नों को बेहद गंभीर कानूनी विमर्श में बदल दिया है। न्यायालय ने धर्म परिवर्तन को अनुसूचित जनजाति की सदस्यता समाप्त करने का स्वतः आधार नहीं माना। साथ ही उसने यह भी स्पष्ट किया कि जन्म से किसी जनजाति में होना हर परिस्थिति में वर्तमान एसटी स्थिति का अंतिम प्रमाण नहीं बन सकता। व्यक्ति का जनजातीय जीवन, सामाजिक संगठन, परंपराओं से संबंध, सामुदायिक सहभागिता और मूल जनजातीय समुदाय की स्वीकृति भी महत्वपूर्ण कसौटियां हैं।
यदि हम गहराई से देखें तो भारत में जनजातीय समाज की पहचान उसकी विशिष्ट जीवन-पद्धति से बनी है। उसकी अपनी सामाजिक संरचना है, सामुदायिक संस्थाएं हैं, परंपराएं हैं, लोकाचार हैं, सांस्कृतिक स्मृतियां हैं और पीढ़ियों से चली आ रही सामुदायिक चेतना है। जन्म इस पहचान का आरंभिक आधार है। परिवार इसे आगे बढ़ाता है। समाज इसे स्वीकार करता है। परंपरा इसे जीवित रखती है और समुदाय व्यक्ति को अपनी सामाजिक संरचना में स्थान देता है, इसलिए जनजातीय पहचान को महज एक प्रमाण-पत्र में बंद कर देना उस पहचान की वास्तविक प्रकृति को छोटा करना होगा।
आज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नन्हकी के मामले में इसी व्यापक दृष्टि को अपनाया है। कोर्ट के सामने यह प्रश्न था कि जन्म से भुइयां अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने का दावा और तहसीलदार द्वारा जारी एसटी प्रमाण-पत्र क्या बाद की परिस्थितियों के सामने भी पर्याप्त हैं। न्यायालय ने पूरे सामाजिक और दस्तावेजी साक्ष्य को साथ रखकर स्थिति का परीक्षण किया। इस फैसले को इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने वाले हर जनजातीय व्यक्ति पर लागू होने वाले किसी स्वतः नियम के रूप में पढ़ना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
वस्तुत: यहां असली सवाल धर्म से आगे का है, जिसमें कि किसी व्यक्ति ने अपना धर्म बदला, यह एक तथ्य है, किंतु इसी के साथ यह दूसरा तथ्य भी जुड़ा हुआ है कि उसके बाद उसका सामाजिक जीवन कैसा रहा। मूल जनजातीय समुदाय से उसके संबंध बने रहे या समाप्त हो गए, यह तीसरा और कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है। नन्हकी के मामले में राज्य की ओर से जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया गया, उनमें इस्लामी रीति से विवाह, नैमुन्निशा नाम से लंबे समय तक जीवन, बच्चों के मुस्लिम नाम, परिवार रजिस्टर में मुस्लिम मजहब (धर्म) का उल्लेख और भुइयां समुदाय की परंपराओं, सामाजिक जीवन तथा सामुदायिक स्वीकृति के निरंतर संबंध का पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत न होना शामिल था।
इस आधार पर न्यायालय ने इन तथ्यों को अलग-अलग निर्णायक मानने के स्थान पर समग्र परिस्थितियों के रूप में देखा। यहां समझ लें कि धर्म परिवर्तन एक तथ्य है, पहचान का सामाजिक विच्छेद उससे आगे की स्थिति है। यह बात समझने की आवश्यकता है कि अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक और वैधानिक संरक्षण क्यों बनाया गया है। आरक्षण, भूमि-सुरक्षा और अन्य विशेष व्यवस्थाएं उन समुदायों की ऐतिहासिक सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं।
इनका उद्देश्य उन समुदायों को संरक्षण देना है, जिनकी विशिष्ट परिस्थितियां उन्हें व्यापक समाज से अलग संवेदनशील स्थिति में रखती रही हैं। ऐसे में संरक्षण का आधार जिस जनजातीय पहचान को बनाया गया है, उस पहचान का वास्तविक अस्तित्व भी महत्वपूर्ण होगा। यदि कोई व्यक्ति अपने जनजातीय समाज के साथ जुड़ा हुआ है, उसी समुदाय के सामाजिक जीवन में भाग लेता है, उसकी परंपराओं और सामाजिक संस्थाओं से संबंध रखता है तथा समुदाय उसे अपना सदस्य मानता है, तो पहचान की निरंतरता का सामाजिक आधार सामने रहता है।
दूसरी ओर, यदि लंबे समय में व्यक्ति का जनजातीय समाज से संपर्क टूट चुका है, उसकी सामाजिक पहचान पूरी तरह बदल चुकी है, सामुदायिक जीवन से दूरी बन चुकी है और मूल समुदाय की स्वीकृति का प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है, तो यह पूछना कानून का स्वाभाविक अधिकार है कि वर्तमान जनजातीय पहचान का आधार क्या है।
एसटी प्रमाण-पत्र का महत्व अपनी जगह है। सरकारी प्रमाण-पत्र किसी व्यक्ति की जनजातीय स्थिति का महत्वपूर्ण साक्ष्य है। मगर प्रमाण-पत्र को ऐसी ढाल मानना, जिसके आगे बाद के सभी तथ्य अप्रासंगिक हो जाएं, न्यायिक परीक्षण की दृष्टि से उचित नहीं होगा। नन्हकी के मामले में भी अदालत ने यही दृष्टिकोण अपनाया। परिवार रजिस्टर में मुस्लिम धर्म की प्रविष्टि को उसने अकेले निर्णायक आधार नहीं माना। विवाह, बदली हुई सामाजिक पहचान, लंबे समय तक उसी सामाजिक परिवेश में जीवन और मूल भुइयां समुदाय से निरंतर संबंध का पर्याप्त प्रमाण न होना, इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखा गया।
अतत: यह माना कि संबंधित तारीखों पर भुइयां जनजाति की सदस्यता की निरंतरता पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुई। यह दृष्टिकोण प्रमाण-पत्र और वास्तविक सामाजिक स्थिति के बीच संबंध को रेखांकित करता है। मामला तीन कृषि भूमि सौदों से जुड़ा था। अनुसूचित जनजाति की भूमि के हस्तांतरण को लेकर उत्तर प्रदेश के भूमि कानूनों में विशेष प्रतिबंध रहे हैं। ऐसी स्थिति में यह तय करना जरूरी था कि संबंधित व्यक्ति उस समय वास्तव में एसटी की श्रेणी में आता था या नहीं।
यहीं जनजातीय पहचान का प्रश्न सीधे भूमि-सुरक्षा से जुड़ जाता है। यदि कानून जनजातीय भूमि की रक्षा करता है, तो उस सुरक्षा का लाभ किसे मिलेगा, यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जमीन का पंजीकरण, राजस्व रिकॉर्ड में नाम और लंबे समय तक कब्जा जैसे तथ्य अपनी जगह हैं। मूल प्रश्न उस वैधानिक पात्रता का रहता है जिसके आधार पर विशेष संरक्षण उपलब्ध है।
मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट के चिंताड़ा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य फैसले ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक व्यवस्थाओं के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जनजातियों के संबंध में संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 धर्म आधारित बहिष्कार निर्धारित नहीं करता। इसलिए जनजातीय स्थिति का निर्धारण धर्म परिवर्तन मात्र से नहीं किया जा सकता। अदालत ने जनजातीय पहचान के आवश्यक तत्वों में कस्टमरी प्रैक्टिसेज, सोशल ऑर्गनाइजेशन, कम्युनिटी लाइफ और संबंधित जनजातीय समुदाय की अक्सेप्टेंस को महत्वपूर्ण माना। यानी सर्वोच्च न्यायालय के सामने भी पहचान का प्रश्न जन्म से आगे जाकर सामाजिक जीवन तक पहुंचा है।
आज जनजातीय समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में भूमि, संस्कृति, भाषा और सामुदायिक संरचना की सुरक्षा शामिल है। ऐसे समय में जनजातीय पहचान को सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड की श्रेणी मानना गंभीर भूल होगी। जनजातीय समाज का अस्तित्व उसकी सामूहिकता में है। उसकी शक्ति उसके समुदाय में है। उसकी पहचान उसके जीवन में है। यदि कोई व्यक्ति अपने मूल समुदाय के साथ संबंध बनाए रखता है, तो बदलती परिस्थितियों में भी उसकी जनजातीय पहचान के बने रहने की पूरी गुंजाइश है।
शहर में रहना, आधुनिक शिक्षा लेना, नौकरी करना या जीवनशैली में परिवर्तन करना अपने आप जनजातीय पहचान समाप्त नहीं करता। मगर बात तब बदलती है जब सामाजिक परिवर्तन इतना गहरा हो जाए कि व्यक्ति का अपने मूल समुदाय से वास्तविक संबंध ही समाप्त हो जाए। जहां समुदाय से रिश्ता नहीं, वहां समुदाय की सदस्यता का सामाजिक आधार क्या है? यही वह प्रश्न है जिससे बचा नहीं जा सकता।
यदि धर्म परिवर्तन के साथ व्यक्ति की संपूर्ण सामाजिक पहचान बदल जाती है, मूल समुदाय से लंबे समय का विच्छेद हो जाता है और जनजातीय जीवन से उसका वास्तविक संबंध समाप्त हो जाता है, तो जन्म का पुराना प्रमाण अपने आप वर्तमान सामाजिक पहचान का अंतिम उत्तर कैसे बन सकता है? वास्तव में किसी समुदाय की पहचान का संरक्षण तभी संभव है जब उस समुदाय की वास्तविक सदस्यता का अर्थ भी सुरक्षित रहे। जन्म से जनजातीय होना एक ऐतिहासिक तथ्य है। जनजातीय समाज का सदस्य बने रहना एक सामाजिक वास्तविकता है। दोनों के बीच अंतर समझना होगा।
व्यक्ति का जन्म बदला नहीं जा सकता। मगर उसका सामाजिक जीवन बदल सकता है। वह अपने मूल समुदाय के साथ संबंध कायम रखता है या उनसे पूरी तरह दूर हो गया है। इसी वास्तविकता को कानून के सामने आने पर जांचा जा सकता है। वास्तविकता यही है कि जनजातीय पहचान का अर्थ उस समाज के जीवन में है।
आखिर जिस समाज की पहचान, संस्कृति और जीवन-पद्धति की रक्षा के लिए संविधान ने विशेष संरक्षण दिया है, उस समाज से वास्तविक संबंध समाप्त होने के बाद उस संरक्षण की पात्रता पर प्रश्न उठाना संविधान की भावना के विरुद्ध कैसे माना जा सकता है? जनजातीय पहचान जन्म से मिल सकती है, मगर उसका सामाजिक अर्थ समुदाय से संबंध में जीवित रहता है। जब वह संबंध ही समाप्त हो जाए, तब जनजातीय होने का दावा भी अपने मूल आधार की परीक्षा के सामने खड़ा होगा। यही सोनभद्र के फैसले का सबसे बड़ा संदेश है।
वास्तव में इस निर्णय ने देश भर में उन तमाम लोगों को भी पूरी तरह से जनजाति वर्ग से बाहर का रास्ता दिखाने का मार्ग प्रशस्त किया है, जोकि इस्लाम या ईसाइयत को पूरी तरह से अपना चुके हैं, किंतु आरक्षण का भरपूर लाभ जनजाति प्रमाण-पत्र के आधार पर उठा रहे हैं। अब समय आ गया है कि ऐसे सभी लोगों को चिन्हित किया जाए और मिलनेवाले सभी एसटी लाभों से उन्हें बाहर किया जाए, ताकि अन्य वास्तविक जनजाति बन्धु उसका पूर्ण लाभ ले सकें।



