दिल्ली। किताब का लोकार्पण ज्ञान का उत्सव होना चाहिए। लेखक वर्षों की साधना, शोध और एकांत के बाद कोई कृति लेकर आता है। मंच पर उसी कृति और उसी लेखक को केंद्र में होना चाहिए। पर राष्ट्रीय विचार परिवार के कई कार्यक्रमों में यह दृश्य उलटा दिखता है। लोकार्पण के नाम पर नेताओं की कतार खड़ी कर दी जाती है। लेखक किनारे खिसक जाता है और मंच राजनीतिक उपस्थिति का मंच बन जाता है।
नेताओं का सम्मान आवश्यक है। वे पुस्तकें पुस्तकालयों तक पहुँचाने, वितरण बढ़ाने और संसाधन जुटाने में सहायक हो सकते हैं। नेटवर्किंग से संगठन भी मजबूत होता है। पर किताब के लोकार्पण का अर्थ यही नहीं हो सकता। जब कार्यक्रम में आए अधिकांश लोग लेखक या विषय से कम और संपर्क साधने से अधिक जुड़े दिखते हैं, तो साहित्यिक आयोजन की आत्मा कमजोर पड़ जाती है।
यह नेताओं के विरोध का विषय नहीं है। यह अपने लेखकों और विद्वानों को उचित स्थान देने का विषय है। यदि परिवार बार-बार दावा करता है कि उसके पास विद्वान हैं, तो उन विद्वानों को मंच का केंद्र बनाना चाहिए। जिसे आप राष्ट्रीय विचार परिवार का लेखक कहते हैं, उनमें सत्तर से अस्सी प्रतिशत विद्वानों का शाखा से सीधा संबंध न होना कोई अपमान की बात नहीं, बल्कि एक तथ्य है। इसे स्वीकार कर सुधार की दिशा में सोचना चाहिए।
किताब तब जीवित रहती है जब लेखक का शब्द सबसे आगे रहता है। नेता सहायक बनें, अधिष्ठाता न बनें। यदि यह भूल सुधार ली जाए तो लोकार्पण सही अर्थ में ज्ञान का उत्सव बनेगा और विचार परिवार की बौद्धिक गहराई भी अधिक विश्वसनीय लगेगी। सम्मान नेताओं का भी रहे, पर लेखक का स्थान पहले हो। यही संतुलन परिवार की परंपरा को और समृद्ध करेगा।



