प्रसंगवश : कालिदास की भूल और डिजिटल इंडिया की ‘डाल’ पर शुल्क की कुल्हाड़ी

unnamed-2-1.jpg
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल। संस्कृत साहित्य के शिखर पुरुष महाकवि कालिदास के प्रारंभिक जीवन का एक प्रसंग अत्यंत प्रसिद्ध है। ज्ञान और बोध से शून्य कालिदास एक वृक्ष की उसी डाल को कुल्हाड़ी से काट रहे थे, जिस पर वे स्वयं बैठे थे। राहगीरों ने उन्हें टोका कि ऐसा करने से वे स्वयं नीचे गिरेंगे और चोटिल होंगे, परंतु कालिदास ने उस समय इस चेतावनी को अनसुना कर दिया। परिणाम वही हुआ, डाल कटी और वे धड़ाम से नीचे आ गिरे। इस आत्मघाती कृत्य के बाद जब उन्हें विद्वानों द्वारा सत्य का ज्ञान दिया गया, तब कहीं जाकर उनके ‘ज्ञान चक्षु’ खुले और वे मूर्खता के अंधकार से निकलकर प्रज्ञा के आलोक की ओर बढ़े।

आज भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट भुगतानों पर 0.4 फीसद मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने का निर्णय ठीक वैसी ही नीतिगत भूल प्रतीत होता है। सरकार जिस ‘डिजिटल ट्रांजैक्शन’ और ‘कैशलेस इकोनॉमी’ की मजबूत डाल पर बैठकर देश की जीडीपी और कर संग्रह को बढ़ाने का दावा कर रही है, वह अब उसी डाल को शुल्क रूपी कुल्हाड़ी से काटने की तैयारी में है।

पिछले एक दशक में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) भारत की सबसे बड़ी सफलता को दर्शाता है। इसने देश के आर्थिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया, जिसमें कि देश के 55 करोड़ से अधिक सक्रिय उपयोगकर्ता और करोड़ों छोटे-बड़े व्यापारी इस तंत्र से जुड़े। जब लेन-देन डिजिटल हुआ, तो अनौपचारिक अर्थव्यवस्था बैंकिंग प्रणाली के दायरे में आ गई। इसके कारण सरकार का जीएसटी संग्रह रिकॉर्ड ₹1.8 लाख करोड़ से ₹2 लाख करोड़ प्रति माह के स्तर को छूने लगा।

यूपीआई की इस अभूतपूर्व सफलता का एकमात्र सबसे बड़ा स्तंभ इसका पूरी तरह से निःशुल्क होना था। उपभोक्ताओं और व्यापारियों ने इसे इसलिए अपनाया क्योंकि यह नकद से अधिक सुरक्षित और पूरी तरह मुफ्त था, किंतु अब जब ₹2,000 से ऊपर के लेन-देन पर 0.4 फीसद का शुल्क (अधिकतम ₹300) लगाया जा रहा है, तो आप यह मानकर चलें कि केंद्र सरकार के लिए यह कदम आत्मघाती साबित होगा।

वस्‍तुत: इसके पीछे उल्‍लेखित ठोस तथ्य और आंकड़े मौजूद हैं, जिन्‍हें बिल्‍कुल भी नकारा नहीं जा सकता है। जैसे कि भारत में खुदरा व्यापारियों का नेट प्रॉफिट मार्जिन बहुत कम होता है, आमतौर पर तीन फीसद से पांच प्रतिशत तक यह देखा जाता है। ऐसे में यदि सरकार उनसे 0.4 प्रतिशत का शुल्क लेगी, तो यह उनके मुनाफे का सीधे 10 से 13 प्रतिशत हिस्सा छीन लेगी। जिसका परिणाम यह होगा कि व्यापारी इस शुल्क से बचने के लिए ग्राहकों को दोबारा नकद में भुगतान करने के लिए मजबूर या प्रोत्साहित करेंगे। वहीं, इस शुल्क के लागू होने से उच्च-मूल्य वाले मर्चेंट डिजिटल ट्रांजैक्शन में 15 फीसद से 20 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ सकती है।

सरकार का तर्क है कि यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाने के लिए सालाना लगभग ₹20,000 करोड़ का खर्च आता है, जिसकी भरपाई के लिए यह शुल्क जरूरी है, किंतु कालिदास की तरह सरकार दूरगामी नुकसान को नहीं देख पा रही है, यदि सिर्फ 15 प्रतिशत लेन-देन भी वापस नकद (ब्लैक मनी/अनअकाउंटेड कैश) में बदल जाता है, तो अर्थव्यवस्था से पारदर्शिता खत्म होगी। इसके कारण सरकार को जो जीएसटी और कॉर्पोरेट/आयकर का नुकसान होगा, वह इस यूपीआई शुल्क से मिलने वाले ₹20,000 करोड़ के राजस्व से कहीं अधिक (अनुमानित ₹50,000 करोड़ से ऊपर) होगा। यानी थोड़े से राजस्व के लालच में सरकार अपने बड़े टैक्स बेस का नुकसान कर बैठेगी।

दूसरी ओर भले ही सरकार कह रही है कि यह शुल्क व्यापारियों पर लगेगा, किंतु अर्थशास्त्र का बुनियादी नियम है कि हर अप्रत्यक्ष लागत अंततः उपभोक्ता पर ट्रांसफर होती है। व्यापारी अपने उत्पादों की कीमतें 0.5 फीसद से अधिकतम दो प्रतिशत तक बढ़ा देंगे। इससे बाजार में अप्रत्यक्ष महंगाई बढ़ेगी और डिजिटल भुगतान के प्रति जनता का विश्वास कमजोर होगा। यह इसलिए भी संभव है, क्‍योंकि बाजार पर न राज्‍यों के स्‍तर पर और न ही केंद्र के स्‍तर पर लागत के मुकाबले एमआरपी पर किसी का कोई जोर नहीं है। जिसकी जो इच्‍छा होती है, वह उसकी वह एमआरपी तय करता है।

अत: हम फिर एक बार कालिदास पर आते हैं, जैसे उन्‍हें जब अपनी भूल का अहसास कराया गया, तब उन्होंने तंत्र-मंत्र और अज्ञानता को छोड़कर मां सरस्वती की साधना की और महान ग्रंथों की रचना की। ठीक इसी तरह, केंद्र सरकार को भी अपने ‘आर्थिक ज्ञान चक्षु’ खोलने की आवश्यकता है। वस्‍तुत: राष्ट्रीय अवसंरचना का सिद्धांत यही कहता है कि जैसे सरकार राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे लाइनों और सार्वजनिक पार्कों का निर्माण करती है और उनका पूरा खर्च जनता से सीधे वसूलने के बजाय उसे ‘देश के विकास की लागत’ मानती है, वैसे ही यूपीआई को एक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (सार्वजनिक संपत्ति) माना जाना चाहिए।

ऐसे में तथ्‍य यही समझ आता है कि इस पूरे प्रकरण में सब्सिडी ही सही मार्ग है। सरकार को व्यापारियों की जेब काटने के बजाय अपने केंद्रीय बजट से हर साल ₹15,000 से ₹20,000 करोड़ की स्थायी वित्तीय सहायता बैंकों और एनपीसीआई को देनी चाहिए। यह खर्च देश की जीडीपी को मिलने वाली रफ्तार और पारदर्शी टैक्स कलेक्शन के सामने बेहद मामूली है, यह तो सरकार एवं उनके आर्थ‍िक विशेषज्ञ भी जानते ही हैं।

वस्‍तुत: यूपीआई पर शुल्क लगाने का निर्णय ठीक वैसा ही है जैसा उस सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को काटने जैसा है, जो प्रतिदिन सरकार को टैक्स के रूप में करोड़ों का राजस्व दे रही है। यदि सरकार ने समय रहते इस फैसले की समीक्षा नहीं की और अपने नीतिगत ‘ज्ञान चक्षु’ नहीं खोले, तो डिजिटल इंडिया की यह ऐतिहासिक डाल कट जाएगी और देश की अर्थव्यवस्था वापस ‘कैश इज किंग’ (नकद राज) के पुराने और पारदर्शी-हीन दौर में पहुंच जाएगी।

अच्‍छा हो, केंद्र की मोदी सरकार कालिदास की भूल से कुछ सीख लेगी, वैसे भी सरकार में बैठे एवं केंद्र में जिस राजनीतिक पार्टी की सत्‍ता है वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हर वर्ष कालीदास की जयन्‍ती पर उन्‍हें उनके विद्या योगदान के लिए नमन तो करती ही है, आशा है, उनके आचरण से सबक भी लेगी, इसलिए इस शुल्क को तुरंत वापस लेना चाहिए ताकि देश के डिजिटल पैर सुरक्षित रहें।

(लेखक फिल्‍म सेंसर बोर्ड, एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्‍य एवं पत्रकार हैं)

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top